Rashtra Tak, Author at Rashtra Tak Hindi Monthly Magazine Tue, 02 Jun 2026 12:59:15 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://www.rashtratak.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-cropped-WhatsApp-Image-2025-05-08-at-2.40.25-PM-32x32.jpeg Rashtra Tak, Author at Rashtra Tak 32 32 आरईसीपीडीसीएल ने कर्नाटक की इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन परियोजना की एक विशेष प्रयोजन वाहन (एसपीवी), हम्पापुरा पावर ट्रांसमिशन लिमिटेड, को मेसर्स रेसोनिया लिमिटेड को सौंपा https://www.rashtratak.com/recpdcl-has-acquired-spv-hampapura-power-transmission-limited-a-special-purpose-vehicle-for-the-intra-state-transmission-project-of-karnataka/ Tue, 02 Jun 2026 12:59:14 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2295 आरईसी पावर डेवलपमेंट एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड (आरईसीपीडीसीएल), जो विद्युत मंत्रालय के तत्वावधान में महारत्न सीपीएसयू, आरईसी लिमिटेड की पूर्ण स्वामित्व

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आरईसी पावर डेवलपमेंट एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड (आरईसीपीडीसीएल)जो विद्युत मंत्रालय के तत्वावधान में महारत्न सीपीएसयूआरईसी लिमिटेड की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी हैने 30 मई 2026 को टीबीसीबी मार्ग के तहत कर्नाटक की इनएसटीएस ट्रांसमिशन परियोजना के लिए एक परियोजना-विशिष्ट एसपीवी (विशेष प्रयोजन वाहन)हम्पापुरा पावर ट्रांसमिशन लिमिटेडसफल बोलीदाता मैसर्स रेसोनिया लिमिटेड को सौंप दी।

मेसर्स रेसोनिया लिमिटेडआरईसीपीडीसीएल (बिड प्रोसेस कोऑर्डिनेटर) द्वारा आयोजित टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (टीबीसीबी) प्रक्रिया के माध्यम से सफल बोलीदाता के रूप में उभराताकि बिल्डओनऑपरेट एंड ट्रांसफर (बूट) आधार पर ट्रांसमिशन परियोजना का विकास किया जा सके।

एसपीवी को श्रीमती मोनिशा बरुआजीएम और एचओडीआरईसीपीडीसीएल द्वारा श्री तुषार छाबड़ाहेड (बिजनेस एक्विजिशन)रेसोनिया लिमिटेड को प्रबंध निदेशककेपीटीसीएलआरईसीपीडीसीएल के वरिष्ठ अधिकारियों और कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के अधिकारियों की उपस्थिति में सौंपा गया। परियोजना की कार्यान्वयन अवधि 24 महीने है।

इस योजना में मुख्य रूप से हम्पापुरा में 400/220/33 केवी जीआईएस सब-स्टेशन की स्थापनाजगलूर से कडाकोला तक लगभग 299 किमी की 400 केवी डबल सर्किट लाइनहम्पापुरा से नागमंगलामद्दुरतुबिनाकेरे और हुयगोनाहल्ली तक लगभग 125 किमी की 220 केवी डबल सर्किट लाइन और जगलूर-कडाकोला से प्रस्तावित 765/400 केवी सीएनहाली स्टेशन तक 400 केवी डीसी क्वाड मूस लाइन का एलआईएलओ और अन्य संबंधित कार्य शामिल हैं।


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नारायणा विहार, नई दिल्ली में अंतर्निहित दिव्यता के जागरण हेतु समर्पित दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान संस्थान की एक नई शाखा का उद्घाटन समारोह https://www.rashtratak.com/inauguration-of-a-new-branch-of-divya-jyoti-jagrati-sansthan-dedicated-to-the-awakening-of-inherent-divinity/ Tue, 02 Jun 2026 09:41:37 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2287 ब्रह्मज्ञान के शाश्वत विज्ञान के माध्यम से वैश्विक शांति स्थापना हेतु एक और महत्वपूर्णकदम आगे बढ़ाते हुए, दिव्य

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ब्रह्मज्ञान के शाश्वत विज्ञान के माध्यम से वैश्विक शांति स्थापना हेतु एक और महत्वपूर्णकदम आगे बढ़ाते हुए, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) द्वारा नई दिल्ली केनारायणा विहार में एक नए आश्रम का शुभ उद्घाटन किया गया यह नवीन केंद्र A-53, नारायणा विहार, नई दिल्ली-110028 में स्थापित किया गया है

 

इस भव्य उद्घाटन समारोह में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया तथा इसशुभ अवसर को श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनायादिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी(संस्थापक एवं संचालक, डीजेजेएस) की कृपा एवं आशीर्वाद से कार्यक्रम का शुभारम्भपावन वैदिक हवन यज्ञ के साथ हुआवैदिक मंत्रों की गूंजती ध्वनियों के मध्य संपन्न हुएइस आध्यात्मिक अनुष्ठान ने सम्पूर्ण वातावरण को पवित्रता, शांति और आध्यात्मिकतरंगों से दियाभावपूर्ण भक्तिमय प्रस्तुतियों ने समारोह को और अधिक दिव्यबनाया जिससे उपस्थित श्रद्धालु भक्ति की गहराइयों में निमग्न हो गए तथा उनके हृदयएवं मन परमात्मा की ओर उन्मुख हुए

सभा को संबोधित करते हुए, डीजेजेएस प्रतिनिधियों ने शास्त्रों की सनातन ज्ञानधारा कोअत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत कियाउन्होंने स्पष्ट किया कि मानव जीवन का परम उद्देश्यकेवल संसारिक उपलब्धियों, भौतिक संपदा, सामाजिक प्रतिष्ठा या संबंधों तक सीमितनहीं हैजीवन का वास्तविक लक्ष्य हैईश्वर साक्षात्कार, अर्थात् परम दिव्यता से पूर्णयोगयह परम लक्ष्य केवल युग के पूर्ण सतगुरु की कृपा द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, जो ब्रह्मज्ञान रूपी शाश्वत सनातन दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैंयह दिव्य ज्ञान साधकको अपने अंतर्जगत में परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव कराता है और उसे ध्यान की आंतरिकयात्रा पर अग्रसर करता हैपूर्ण गुरु के मार्गदर्शन में नियमित साधना के माध्यम सेसाधक धीरे-धीरे संसारिक भ्रमों से पार हो अपनी अंतर्चेतना का जागरण करता है, स्थायीशांति और तृप्ति का अनुभव करता है तथा अंततोगत्वा जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति कीओर अग्रसर होता हैभौतिक जगत में रहते हुए भी, वास्तविक आश्रय और स्थायी शांतिकेवल ब्रह्मज्ञान पर आधारित ध्यान साधना के द्वारा अंतर्मुख होकर ही प्राप्त की जासकती है

उन्होंने बताया कि दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी, वर्तमान युग के पूर्ण सतगुरु केरूप में, असंख्य जिज्ञासुओं को ब्रह्मज्ञान की दीक्षा देकर उन्हें जीवन के उच्च उद्देश्य सेपुन: जोड़ रहे हैं साथ ही, उन्हें एक ऐसा व्यावहारिक आध्यात्मिक साधन प्रदान कर रहेहैं, जोकेवल उनके आंतरिक विकास को पोषित करता है, बल्कि सांसारिकउत्तरदायित्वों के निर्वहन में भी स्पष्टता, संतुलन और विवेक प्रदान करता है आश्रम कायह उद्घाटन इस श्रेष्ठ उद्देश्य की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है

यह नवीन आध्यात्मिक केंद्र भक्तों एवं साधकों के लिए दिव्य ज्ञान का प्रकाशस्तंभसाबित होगा, जहां आसपास क्षेत्र के लोग नियमित रूप से सत्संग, भजन, ध्यान सत्रोंतथा सेवा कार्यक्रमों में भाग ले सकेंगेइन प्रयासों के माध्यम से आश्रम का उद्देश्य लोगोंको आंतरिक रूपांतरण के लिए प्रोत्साहित करना और आत्म-जागृति से लेकर वैश्विकशांति की व्यापक दृष्टि को साकार करने में सार्थक योगदान देना है

इस प्रकार, संस्थान के इस नवीन आश्रम का उद्घाटन समारोह प्राचीन वैदिक परंपराओं, आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति-भावना का सुंदर संगमना जिसने प्रत्येक व्यक्ति केभीतर सुप्त दिव्यता के जागरण और मानवता को उद्देश्यपूर्ण, शांतिपूर्ण एवं प्रकाशमयजीवन की ओर मार्गदर्शन हेतु एक सशक्त आध्यात्मिक केंद्र की आधारशिला रखी

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कानून, नैतिकता और जीवन के बीच चिकित्सक की दुविधा https://www.rashtratak.com/the-physicians-dilemma-between-law-morality-and-life/ Tue, 02 Jun 2026 09:35:50 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2284 आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने मानव जीवन की रक्षा, उपचार और संवर्धन के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियाँ हासिल की

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आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने मानव जीवन की रक्षा, उपचार और संवर्धन के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियाँ हासिल की हैं। आज ऐसे अनेक रोगों का उपचार संभव है जिन्हें कभी असाध्य माना जाता था। गर्भस्थ शिशु की स्वास्थ्य स्थिति का सूक्ष्म परीक्षण, जन्मजात विकृतियों की पहचान तथा मातृ स्वास्थ्य की निगरानी जैसी तकनीकों ने चिकित्सा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। किंतु विज्ञान की इस प्रगति के साथ कुछ जटिल नैतिक और कानूनी प्रश्न भी सामने आए हैं। विशेष रूप से तब, जब चिकित्सकों के सामने ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जहाँ कानून की सीमाएँ और जीवन बचाने का उनका मूल कर्तव्य एक-दूसरे से टकराते प्रतीत होते हैं। व्यवहार्य भ्रूणों वाली गर्भावस्थाओं के देर से चिकित्सकीय समापन से जुड़े मामले इसी प्रकार की चुनौतीपूर्ण स्थिति प्रस्तुत करते हैं।
चिकित्सा व्यवसाय का मूल सिद्धांत जीवन की रक्षा करना है। प्राचीन हिप्पोक्रेटिक शपथ से लेकर आधुनिक चिकित्सा नैतिकता तक, चिकित्सकों को रोगी के हित को सर्वोपरि रखने की शिक्षा दी जाती है। “किसी को हानि न पहुँचाना” और “रोगी के सर्वोत्तम हित में कार्य करना” चिकित्सा आचारशास्त्र के आधारभूत सिद्धांत हैं। दूसरी ओर, चिकित्सक किसी लोकतांत्रिक समाज में कानून से ऊपर नहीं हो सकते। उन्हें विधिक प्रावधानों, न्यायालयों के आदेशों और राज्य द्वारा निर्धारित मानकों का पालन भी करना पड़ता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी विशेष मामले में कानूनी आदेश और चिकित्सकीय नैतिकता अलग-अलग दिशा में संकेत देने लगते हैं।
भारत में गर्भसमापन से संबंधित कानूनी ढाँचा मुख्य रूप से चिकित्सा गर्भसमापन अधिनियम (Medical Termination of Pregnancy Act) पर आधारित है। समय-समय पर इसमें संशोधन कर महिलाओं के प्रजनन अधिकारों, स्वास्थ्य सुरक्षा और बदलती चिकित्सकीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखा गया है। इसके बावजूद अनेक ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें गर्भावस्था उन्नत अवस्था में पहुँच चुकी होती है और भ्रूण व्यवहार्य अर्थात गर्भ के बाहर भी जीवित रहने में सक्षम माना जाता है। ऐसी स्थिति में यदि भ्रूण में गंभीर विकृतियाँ पाई जाएँ, या गर्भवती महिला का मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा हो, तो गर्भसमापन का प्रश्न केवल कानूनी नहीं बल्कि गहरे नैतिक विमर्श का विषय बन जाता है।
व्यवहार्य भ्रूणों के संदर्भ में सबसे बड़ी नैतिक चुनौती यह है कि चिकित्सक एक साथ दो जीवनों से संबंधित निर्णय का सामना कर रहे होते हैं। एक ओर गर्भवती महिला की स्वायत्तता, स्वास्थ्य और गरिमा का प्रश्न है, वहीं दूसरी ओर उस भ्रूण का संभावित जीवन है जो चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से जीवित रहने में सक्षम हो सकता है। यदि कानून गर्भसमापन की अनुमति देता है, तब भी चिकित्सक के सामने यह प्रश्न बना रहता है कि क्या वे उस प्रक्रिया में भाग लें जो एक संभावित जीवन का अंत कर सकती है। इसके विपरीत, यदि कानून अनुमति नहीं देता लेकिन महिला का जीवन या मानसिक स्वास्थ्य गंभीर खतरे में है, तो चिकित्सक स्वयं को नैतिक रूप से हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य महसूस कर सकते हैं।
चिकित्सा नैतिकता में रोगी की स्वायत्तता को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। प्रत्येक सक्षम वयस्क व्यक्ति को अपने शरीर और स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने का अधिकार है। गर्भावस्था के मामलों में यह अधिकार विशेष महत्व रखता है क्योंकि गर्भधारण और प्रसव का प्रत्यक्ष प्रभाव महिला के शरीर, स्वास्थ्य और जीवन पर पड़ता है। किंतु व्यवहार्य भ्रूणों की स्थिति में यह अधिकार पूर्णतः निरपेक्ष नहीं रह जाता। समाज और कानून दोनों भ्रूण के संभावित जीवन को भी एक नैतिक मूल्य के रूप में स्वीकार करते हैं। परिणामस्वरूप चिकित्सक महिला की इच्छा और भ्रूण के हितों के बीच संतुलन बनाने की कठिन जिम्मेदारी का सामना करते हैं।
देर से गर्भसमापन के मामलों में भ्रूण संबंधी गंभीर विकृतियाँ अक्सर निर्णय को और जटिल बना देती हैं। कई बार चिकित्सकीय परीक्षणों से पता चलता है कि भ्रूण ऐसे रोग या विकार से ग्रस्त है जो जन्म के बाद जीवन को अत्यंत कष्टदायक बना देगा अथवा जीवित रहने की संभावना नगण्य होगी। ऐसे मामलों में गर्भावस्था जारी रखना माता-पिता और भावी बच्चे, दोनों के लिए गंभीर मानसिक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है। चिकित्सक यदि गर्भसमापन का समर्थन करते हैं तो वे पीड़ा को कम करने के सिद्धांत का पालन कर रहे होते हैं। लेकिन यदि भ्रूण व्यवहार्य अवस्था में पहुँच चुका है, तो वही निर्णय जीवन समाप्त करने की नैतिक आलोचना का कारण भी बन सकता है।
न्यायालयों द्वारा दिए जाने वाले आदेश भी चिकित्सकों के लिए दुविधा उत्पन्न कर सकते हैं। अनेक मामलों में अदालतें विशेषज्ञ चिकित्सा बोर्डों की राय के आधार पर गर्भसमापन की अनुमति देती हैं या उसे अस्वीकार करती हैं। हालांकि अंतिम आदेश कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है, फिर भी प्रक्रिया को अंजाम देने वाले चिकित्सकों को अपने नैतिक विवेक से जूझना पड़ता है। वे जानते हैं कि कानून ने अनुमति दी है, लेकिन व्यक्तिगत और पेशेवर स्तर पर वे उस निर्णय को लेकर असहज हो सकते हैं। दूसरी ओर यदि अदालत अनुमति नहीं देती और चिकित्सक को लगता है कि महिला का स्वास्थ्य गंभीर संकट में है, तो वे स्वयं को नैतिक रूप से विवश अनुभव कर सकते हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू चिकित्सा उत्तरदायित्व का है। चिकित्सकों को न केवल नैतिक बल्कि कानूनी परिणामों का भी सामना करना पड़ सकता है। यदि वे कानूनी प्रावधानों से बाहर जाकर निर्णय लेते हैं तो उन पर आपराधिक या व्यावसायिक कार्रवाई हो सकती है। वहीं यदि वे केवल कानूनी सुरक्षा के लिए ऐसा निर्णय लेते हैं जो रोगी के हित में नहीं है, तो चिकित्सा नैतिकता के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है। इस प्रकार वे दोहरी जवाबदेही के बीच फँस जाते हैं—एक कानून के प्रति और दूसरी अपने पेशे के नैतिक आदर्शों के प्रति।
ऐसे मामलों में चिकित्सा बोर्डों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। बहुविषयक विशेषज्ञ समितियाँ विभिन्न चिकित्सा, नैतिक और सामाजिक पहलुओं का समग्र मूल्यांकन कर सकती हैं। इससे निर्णय किसी एक चिकित्सक की व्यक्तिगत धारणा पर आधारित न होकर सामूहिक विशेषज्ञता पर आधारित होता है। फिर भी अंतिम निर्णय का नैतिक भार अक्सर उन चिकित्सकों पर ही रहता है जो प्रक्रिया को क्रियान्वित करते हैं। इसलिए संस्थागत समर्थन और स्पष्ट दिशानिर्देशों की आवश्यकता बनी रहती है।
समाज की बदलती संवेदनाएँ भी इस बहस को प्रभावित करती हैं। एक ओर महिलाओं के प्रजनन अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर विकलांगता अधिकारों और भ्रूण जीवन के संरक्षण की वकालत करने वाले समूह भी सक्रिय हैं। चिकित्सक इन परस्पर विरोधी सामाजिक अपेक्षाओं के बीच कार्य करते हैं। उनके निर्णयों का मूल्यांकन केवल चिकित्सा मानकों से नहीं बल्कि नैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टिकोणों से भी किया जाता है। इससे उन पर अतिरिक्त मानसिक दबाव पड़ता है।
मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। देर से गर्भसमापन से जुड़े मामलों में चिकित्सक, माता-पिता और स्वास्थ्यकर्मी सभी भावनात्मक तनाव का अनुभव कर सकते हैं। जीवन और मृत्यु से जुड़े निर्णय केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं होते; वे गहरे मानवीय अनुभव होते हैं। कई चिकित्सक नैतिक संकट, अपराधबोध या भावनात्मक थकान का सामना करते हैं। इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था को उनके लिए भी मनोवैज्ञानिक और नैतिक परामर्श की व्यवस्था करनी चाहिए।
इस पूरे विमर्श में यह समझना आवश्यक है कि कानून और नैतिकता हमेशा विरोधी नहीं होते। दोनों का उद्देश्य अंततः मानव कल्याण और न्याय की स्थापना ही है। लेकिन वास्तविक जीवन की जटिल परिस्थितियों में उनके बीच तनाव उत्पन्न हो सकता है। व्यवहार्य भ्रूणों वाली गर्भावस्थाओं के देर से चिकित्सकीय समापन के मामले यही दर्शाते हैं कि किसी भी नियम या सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मामले की अपनी विशिष्ट परिस्थितियाँ होती हैं जिनका संवेदनशील और विवेकपूर्ण मूल्यांकन आवश्यक है।
आगे बढ़ते हुए आवश्यकता इस बात की है कि कानून अधिक स्पष्ट, वैज्ञानिक और मानवीय बने। न्यायालयों, चिकित्सा संस्थानों और नीति-निर्माताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए। चिकित्सकों को नैतिक निर्णय लेने के लिए प्रशिक्षण और संस्थागत समर्थन उपलब्ध कराया जाए। साथ ही महिला की गरिमा, स्वायत्तता और स्वास्थ्य के साथ-साथ भ्रूण जीवन के नैतिक महत्व को भी संतुलित रूप से स्वीकार किया जाए। केवल कानूनी औपचारिकताओं या भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के आधार पर ऐसे मामलों का समाधान संभव नहीं है।
अंततः चिकित्सक केवल तकनीकी विशेषज्ञ नहीं होते; वे जीवन से जुड़े सबसे कठिन निर्णयों के साक्षी और सहभागी भी होते हैं। जब कानूनी आदेश और जीवन बचाने का उनका प्राथमिक कर्तव्य परस्पर टकराते हैं, तब उनकी भूमिका और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है। व्यवहार्य भ्रूणों वाली गर्भावस्थाओं के देर से चिकित्सकीय समापन से जुड़े मामले हमें यह याद दिलाते हैं कि चिकित्सा केवल विज्ञान नहीं, बल्कि संवेदना, नैतिकता और मानवीय विवेक का भी क्षेत्र है। ऐसे प्रश्नों के उत्तर श्वेत-श्याम नहीं होते; वे अनेक धूसर क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम चिकित्सकों को दोषी या नायक के सरल खाँचों में न बाँधें, बल्कि उन जटिल परिस्थितियों को समझें जिनमें वे मानव जीवन, कानून और नैतिकता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

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जब ट्रेंड तय करने लगे ! लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनमत https://www.rashtratak.com/when-trends-begin-to-be-determined-public-opinion-is-the-biggest-power-of-democracy/ Tue, 02 Jun 2026 09:31:02 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2281 लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनमत होता है। यह जनमत किसी एक दिन या एक चुनाव के दौरान

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लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनमत होता है। यह जनमत किसी एक दिन या एक चुनाव के दौरान निर्मित नहीं होता, बल्कि समाज में निरंतर चलने वाले संवाद, बहस, विचार-विमर्श, सामाजिक अनुभवों, राजनीतिक चेतना और नागरिक भागीदारी की लंबी प्रक्रिया से आकार लेता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों का सूचित निर्णय, विभिन्न विचारों का आदान-प्रदान और असहमति के प्रति सम्मान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। लंबे समय तक भारत में जनमत के निर्माण का आधार प्रत्यक्ष संवाद, जनसभाएँ, सामाजिक संगठन, समाचार-पत्र, पुस्तकें, शिक्षण संस्थान और जनआंदोलन रहे। लेकिन डिजिटल क्रांति के बाद यह परिदृश्य तेजी से बदला है। आज सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि वह जनमत निर्माण की सबसे प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा है। ऐसे समय में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या अब जनमत नागरिकों के स्वतंत्र चिंतन से अधिक सोशल मीडिया ट्रेंड और एल्गोरिदम द्वारा निर्धारित होने लगा है?
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और साथ ही दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल उपभोक्ता समूहों में से एक भी। करोड़ों लोग प्रतिदिन फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब, व्हाट्सऐप और अन्य डिजिटल मंचों का उपयोग करते हैं। समाचारों से लेकर राजनीतिक विचारों तक, समाज के बड़े वर्ग की प्राथमिक जानकारी अब इन्हीं प्लेटफॉर्मों से प्राप्त होती है। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पहले जहाँ नागरिक किसी मुद्दे पर अखबार पढ़कर, बहस सुनकर या स्थानीय स्तर पर चर्चा करके राय बनाते थे, वहीं अब राय निर्माण की प्रक्रिया काफी हद तक डिजिटल मंचों पर निर्भर हो गई है। इस प्रक्रिया में सोशल मीडिया एल्गोरिदम की भूमिका केंद्रीय हो गई है।
एल्गोरिदम ऐसे तकनीकी तंत्र हैं जो यह तय करते हैं कि किसी उपयोगकर्ता को कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी और कौन-सी नहीं। वे उपयोगकर्ता की पसंद, गतिविधियों, खोज इतिहास और ऑनलाइन व्यवहार का विश्लेषण करके सामग्री का चयन करते हैं। तकनीकी दृष्टि से उनका उद्देश्य उपयोगकर्ता को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखना होता है, क्योंकि डिजिटल कंपनियों का आर्थिक मॉडल इसी पर आधारित है। लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से यह प्रक्रिया कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। यदि नागरिकों को वही सामग्री दिखाई जाए जो उनकी पूर्व मान्यताओं से मेल खाती हो, तो क्या वे विविध विचारों से परिचित हो पाएँगे? यदि एल्गोरिदम यह तय करने लगें कि कौन-सा मुद्दा महत्वपूर्ण है, तो क्या लोकतांत्रिक विमर्श स्वतंत्र रह पाएगा?
आज सोशल मीडिया पर ट्रेंड होना किसी विषय की लोकप्रियता का प्रमुख संकेतक माना जाता है। कोई हैशटैग लाखों बार साझा हो जाए तो वह राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाता है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि जो ट्रेंड कर रहा है वही जनभावना का प्रतिनिधित्व कर रहा है। किंतु यह आवश्यक नहीं कि ट्रेंड वास्तव में समाज की व्यापक राय का प्रतिबिंब हो। अनेक बार ट्रेंड संगठित डिजिटल अभियानों, राजनीतिक प्रचार, भुगतान आधारित प्रचार रणनीतियों या बॉट नेटवर्क द्वारा भी निर्मित किए जाते हैं। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि डिजिटल दृश्यता और वास्तविक जनसमर्थन हमेशा समानार्थी नहीं होते।
जमीनी स्तर की राजनीतिक भागीदारी और डिजिटल सक्रियता के बीच का अंतर भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास प्रत्यक्ष जनसहभागिता के अनेक उदाहरणों से भरा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन में लोगों ने जेल यात्राएँ कीं, सत्याग्रह किए और सामाजिक परिवर्तन के लिए व्यक्तिगत जोखिम उठाए। बाद के दशकों में भी अनेक आंदोलनों ने नागरिकों को प्रत्यक्ष रूप से संगठित किया। इन आंदोलनों में लोगों के बीच संवाद, विश्वास और सामूहिकता का निर्माण होता था। इसके विपरीत डिजिटल सक्रियता अक्सर प्रतीकात्मक भागीदारी तक सीमित रह जाती है। किसी पोस्ट को साझा करना, किसी हैशटैग का समर्थन करना या प्रोफाइल फोटो बदलना आसान है, लेकिन यह हमेशा वास्तविक सामाजिक हस्तक्षेप में परिवर्तित नहीं होता। परिणामस्वरूप राजनीतिक भागीदारी का एक नया स्वरूप विकसित हुआ है जिसमें दृश्यता अधिक और प्रत्यक्ष सामाजिक प्रतिबद्धता अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
सोशल मीडिया एल्गोरिदम का एक महत्वपूर्ण प्रभाव तथाकथित “इको चैंबर” और “फिल्टर बबल” के रूप में सामने आता है। जब कोई व्यक्ति किसी विशेष प्रकार की सामग्री देखता या पसंद करता है, तो एल्गोरिदम उसे उसी प्रकार की और सामग्री दिखाने लगते हैं। धीरे-धीरे वह व्यक्ति ऐसे डिजिटल वातावरण में पहुँच जाता है जहाँ उसे मुख्यतः वही विचार दिखाई देते हैं जिनसे वह पहले से सहमत होता है। इससे वैचारिक विविधता कम हो जाती है और विरोधी विचारों के प्रति असहिष्णुता बढ़ने लगती है। लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिक विभिन्न दृष्टिकोणों को सुनने और समझने के लिए तैयार हों। लेकिन यदि एल्गोरिदम नागरिकों को वैचारिक रूप से अलग-अलग खेमों में बाँट दें, तो लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है।
भारत में राजनीतिक ध्रुवीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर विभिन्न राजनीतिक समूह अपने-अपने डिजिटल समुदायों में सक्रिय रहते हैं। इन समुदायों के भीतर साझा की जाने वाली सामग्री अक्सर एक विशेष दृष्टिकोण को पुष्ट करती है और विरोधी विचारों को संदेह, उपहास या शत्रुता की दृष्टि से प्रस्तुत करती है। इससे समाज में संवाद की जगह टकराव की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक और आवश्यक है, लेकिन जब असहमति संवाद के बजाय वैमनस्य का रूप लेने लगे तो लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर पड़ने लगती है।
फेक न्यूज़ और दुष्प्रचार का प्रश्न भी सोशल मीडिया एल्गोरिदम से गहराई से जुड़ा हुआ है। एल्गोरिदम उन सामग्रियों को अधिक बढ़ावा देते हैं जिन पर लोग तेजी से प्रतिक्रिया देते हैं। अक्सर भावनात्मक और सनसनीखेज सामग्री तथ्यात्मक और संतुलित सामग्री की तुलना में अधिक तेजी से फैलती है। यही कारण है कि झूठी खबरें, आधे-अधूरे तथ्य, भ्रामक वीडियो और मनगढ़ंत दावे सोशल मीडिया पर अत्यंत तेजी से वायरल हो जाते हैं। भारत में कई अवसरों पर फेक न्यूज़ ने सामाजिक तनाव, सांप्रदायिक विवाद और सार्वजनिक भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है। चुनावी राजनीति में भी गलत सूचनाओं का उपयोग मतदाताओं की राय को प्रभावित करने के लिए किया जाता रहा है। जब नागरिकों के निर्णय तथ्यात्मक जानकारी के बजाय दुष्प्रचार पर आधारित होने लगें, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
सोशल मीडिया ने राजनीतिक संचार को भी पूरी तरह बदल दिया है। पहले राजनीतिक दलों को जनता तक पहुँचने के लिए रैलियों, सभाओं, पोस्टरों और पारंपरिक मीडिया का सहारा लेना पड़ता था। अब वे सीधे नागरिकों के मोबाइल फोन तक पहुँच सकते हैं। यह सुविधा लोकतंत्र के लिए सकारात्मक भी है क्योंकि इससे सूचना का प्रवाह तेज हुआ है। लेकिन इसके साथ ही माइक्रो-टार्गेटिंग जैसी नई रणनीतियाँ भी विकसित हुई हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ताओं के व्यवहार से संबंधित विशाल मात्रा में डेटा एकत्र करते हैं। इस डेटा के आधार पर अलग-अलग समूहों को अलग-अलग राजनीतिक संदेश भेजे जा सकते हैं। इससे राजनीतिक प्रचार अधिक प्रभावी तो हो जाता है, लेकिन पारदर्शिता कम हो जाती है। नागरिकों को यह पता ही नहीं चलता कि उन्हें जो संदेश दिखाया जा रहा है, वही संदेश अन्य नागरिकों को भी दिखाई दे रहा है या नहीं। लोकतंत्र का आदर्श सार्वजनिक और खुला विमर्श है, जबकि माइक्रो-टार्गेटिंग राजनीतिक संवाद को खंडित और निजी बना सकती है।
हालाँकि सोशल मीडिया और एल्गोरिदम के प्रभाव को केवल नकारात्मक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। इन मंचों ने अनेक सकारात्मक अवसर भी प्रदान किए हैं। समाज के हाशिए पर स्थित समूहों, महिलाओं, युवाओं, ग्रामीण समुदायों और अल्पप्रतिनिधित्व वाले वर्गों को अपनी बात रखने का नया मंच मिला है। कई सामाजिक मुद्दे जो पहले मुख्यधारा मीडिया में पर्याप्त स्थान नहीं पाते थे, सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय बहस का विषय बने हैं। डिजिटल माध्यमों ने सूचना तक पहुँच को अधिक लोकतांत्रिक बनाया है और नागरिकों को सत्ता से सीधे संवाद करने का अवसर दिया है। कई जनहित अभियानों ने सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक समर्थन प्राप्त किया है। प्राकृतिक आपदाओं, सामाजिक आंदोलनों और जनजागरूकता अभियानों में डिजिटल प्लेटफॉर्म की सकारात्मक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब तकनीकी मंच स्वयं लोकतांत्रिक विमर्श के निर्णायक बनने लगते हैं। किसी लोकतंत्र में यह निर्णय नागरिकों और संस्थाओं का होना चाहिए कि कौन-से मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, न कि किसी निजी कंपनी के एल्गोरिदम का। लेकिन व्यवहार में कई बार यही होता दिखाई देता है कि जो विषय एल्गोरिदमिक रूप से अधिक दृश्यता प्राप्त कर लेता है, वही सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ जाता है। इससे उन महत्वपूर्ण मुद्दों की उपेक्षा हो सकती है जो डिजिटल रूप से आकर्षक नहीं हैं, लेकिन सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ग्रामीण संकट, श्रमिक अधिकार, शिक्षा की गुणवत्ता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्थानीय प्रशासन जैसे विषय अक्सर मनोरंजक या विवादास्पद सामग्री की भीड़ में दब जाते हैं।
भारत जैसे लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह डिजिटल तकनीक के लाभों को स्वीकार करते हुए उसके दुष्प्रभावों को कैसे नियंत्रित करे। इसके लिए केवल सरकारी नियमन पर्याप्त नहीं होगा। डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना आवश्यक है ताकि नागरिक सूचना का आलोचनात्मक मूल्यांकन कर सकें। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में मीडिया साक्षरता तथा तथ्य-जाँच संबंधी शिक्षा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया कंपनियों को भी अपने एल्गोरिदम की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ानी होगी। राजनीतिक विज्ञापनों और डिजिटल प्रचार अभियानों के लिए स्पष्ट नियमों की आवश्यकता है ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की निष्पक्षता बनी रहे। स्वतंत्र मीडिया, नागरिक समाज और शैक्षणिक संस्थानों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र केवल तकनीक से संचालित नहीं हो सकता। तकनीक लोकतंत्र का साधन हो सकती है, उसका विकल्प नहीं। सोशल मीडिया नागरिकों को जोड़ सकता है, लेकिन वह वास्तविक सामाजिक संबंधों और जमीनी भागीदारी का स्थान नहीं ले सकता। किसी पोस्ट को साझा करना और किसी आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी हैशटैग को ट्रेंड कराना और समाज में स्थायी परिवर्तन लाना भी समान नहीं हैं। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति अभी भी जागरूक नागरिकों, स्वतंत्र चिंतन, सार्वजनिक संवाद और सामूहिक भागीदारी में निहित है।
जब ट्रेंड जनमत को प्रभावित करने लगें, तब नागरिकों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उन्हें यह समझना होगा कि हर वायरल सामग्री सत्य नहीं होती, हर ट्रेंड जनभावना का प्रतिनिधित्व नहीं करता और हर डिजिटल बहस लोकतांत्रिक विमर्श नहीं होती। लोकतंत्र की रक्षा केवल संस्थाएँ नहीं करतीं, बल्कि सचेत नागरिक भी करते हैं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि डिजिटल युग में नागरिक तकनीक का उपयोग करें, लेकिन उसके द्वारा नियंत्रित न हों। यदि हम ऐसा कर पाए, तो सोशल मीडिया लोकतंत्र को सशक्त बनाने का माध्यम बनेगा; अन्यथा यह खतरा बना रहेगा कि एक दिन जनमत नागरिकों की स्वतंत्र चेतना से नहीं, बल्कि एल्गोरिदम द्वारा निर्मित ट्रेंड से निर्धारित होने लगेगा। यही हमारे समय की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक चुनौती है।

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क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता कोरा बुलबुला है या वास्तविक चुनौती? https://www.rashtratak.com/is-artificial-intelligence-a-bubble-or-a-real-challenge/ Tue, 02 Jun 2026 09:06:31 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2277 मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसी क्रांतियां हुई हैं जिन्होंने जीवन की दिशा और दशा दोनों को

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मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसी क्रांतियां हुई हैं जिन्होंने जीवन की दिशा और दशा दोनों को बदल दिया। कृषि क्रांति ने मनुष्य को स्थायित्व दिया, औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन और श्रम की परिभाषा बदली, सूचना क्रांति ने ज्ञान और संचार की सीमाएं समाप्त कर दीं। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई की क्रांति मानव इतिहास के एक नए मोड़ पर खड़ी है। यह केवल एक तकनीकी परिवर्तन नहीं है, बल्कि मनुष्य की बुद्धि, निर्णय क्षमता, रोजगार, सामाजिक संरचना, शासन व्यवस्था और यहां तक कि उसके अस्तित्व और अस्मिता से जुड़ा प्रश्न बन चुकी है। यही कारण है कि आज विश्वभर में यह बहस तेज हो रही है कि क्या एआई मानव जीवन के लिए वरदान सिद्ध होगी या वह धीरे-धीरे मनुष्य के महत्व को ही चुनौती देने लगेगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल मशीनों को चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन कार्यों को भी करने लगी है जिन्हें लंबे समय तक केवल मनुष्य की विशिष्ट क्षमता माना जाता था। लेखन, चित्र निर्माण, संगीत रचना, रोगों का निदान, न्यायिक विश्लेषण, वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रशासनिक निर्णय जैसे क्षेत्रों में इसकी बढ़ती उपस्थिति ने अनेक नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि मशीनें सोचने, सीखने और निर्णय लेने लगेंगी तो मनुष्य की विशिष्टता क्या रह जाएगी? यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं, बल्कि दार्शनिक और नैतिक भी है।
मानव अस्मिता का आधार उसकी चेतना, संवेदना, रचनात्मकता और नैतिक विवेक है। एआई के पास विशाल सूचनाओं का भंडार और तीव्र गणनात्मक क्षमता अवश्य है, लेकिन उसके पास अनुभवजन्य चेतना, करुणा, आत्मबोध और मूल्यबोध नहीं है। फिर भी जब मशीनें कविता लिखती हैं, चित्र बनाती हैं और संवाद करती हैं, तब यह भ्रम उत्पन्न होने लगता है कि वे मनुष्य का स्थान ले सकती हैं। वास्तव में चुनौती यह नहीं है कि मशीनें मनुष्य बन जाएंगी, बल्कि यह है कि कहीं मनुष्य स्वयं मशीनों की तरह व्यवहार करने न लगे। यदि जीवन का प्रत्येक निर्णय गणनात्मक दक्षता और आंकड़ों के आधार पर होने लगे, तो मानवीय संवेदनाएं और नैतिक मूल्य हाशिये पर जा सकते हैं। इसी संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है कि क्या भविष्य में एक नई मानव संरचना का निर्माण होगा? विश्व के अनेक वैज्ञानिक और तकनीकी चिंतक यह मानते हैं कि आने वाले दशकों में जैविक मनुष्य और डिजिटल तकनीक के बीच की दूरी लगातार कम होगी। मस्तिष्क और कंप्यूटर के प्रत्यक्ष संपर्क, कृत्रिम अंगों, स्मृति-विस्तार तकनीकों और जैव-तकनीकी हस्तक्षेपों के माध्यम से एक ऐसे युग की कल्पना की जा रही है जहां मनुष्य और मशीन का सम्मिलित स्वरूप विकसित हो सकता है। यह संभावना जितनी आकर्षक दिखाई देती है, उतनी ही चिंताजनक भी है। यदि तकनीकी रूप से उन्नत मनुष्य और सामान्य मनुष्य के बीच गहरी खाई बन गई तो सामाजिक असमानता का एक नया रूप सामने आ सकता है।
एआई के बढ़ते प्रभाव के साथ रोजगार और अर्थव्यवस्था में भी व्यापक परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। अनेक क्षेत्रों में नियमित और दोहराव वाले कार्य मशीनों द्वारा किए जाने लगे हैं। इससे यह आशंका उत्पन्न हुई कि बड़ी संख्या में रोजगार समाप्त हो जाएंगे। विश्व की कई बड़ी तकनीकी कंपनियों ने लागत कम करने और उत्पादकता बढ़ाने के नाम पर कर्मचारियों की संख्या घटाई है। किंतु हाल के अनुभव यह भी बताते हैं कि एआई मानव श्रम का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकी है। जटिल निर्णय, नवाचार, मानवीय संबंधों का प्रबंधन और परिस्थितिजन्य विवेक जैसे क्षेत्रों में मनुष्य की भूमिका अभी भी केंद्रीय बनी हुई है। यहीं पर वैश्विक शोध संस्था गार्टनर की हालिया रिपोर्ट विशेष महत्व रखती है। गार्टनर ने अपनी नवीनतम विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में संकेत दिया है कि एआई अब अत्यधिक अपेक्षाओं के शिखर से आगे बढ़कर मोहभंग के चरण में प्रवेश कर रही है। अनेक कंपनियों ने इससे तत्काल आर्थिक लाभ और उत्पादकता में चमत्कारी वृद्धि की उम्मीद की थी, लेकिन वास्तविक परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं मिले। परियोजनाओं की ऊंची लागत, आंकड़ों की सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं, गलत या भ्रामक उत्तर देने की प्रवृत्ति और स्पष्ट उपयोगिता सिद्ध न कर पाने जैसी समस्याएं सामने आई हैं। रिपोर्ट में यह आशंका भी व्यक्त की गई है कि लगभग एक-तिहाई परियोजनाएं प्रारंभिक चरण के बाद बंद हो सकती हैं क्योंकि वे अपने निवेश के अनुरूप परिणाम देने में असफल रही हैं। यह निष्कर्ष इस धारणा को चुनौती देता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता तत्काल सभी समस्याओं का समाधान बन जाएगी।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि एआई एक अस्थायी बुलबुला है जो शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा। इतिहास बताता है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति के प्रारंभिक चरण में उत्साह और अतिशयोक्ति दोनों मौजूद रहते हैं। बाद में वास्तविक उपयोगिता के आधार पर उसका संतुलित विकास होता है। इंटरनेट के साथ भी यही हुआ था। प्रारंभिक उत्साह के बाद अनेक कंपनियां समाप्त हो गईं, लेकिन इंटरनेट स्वयं विश्व व्यवस्था का आधार बन गया। एआई के साथ भी कुछ ऐसा ही होने की संभावना है। अतः इसका अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन भी उचित नहीं है और इसके शीघ्र समाप्त हो जाने की कल्पना भी यथार्थवादी नहीं है। व्यापार जगत में एआई की भूमिका निरंतर बढ़ेगी। उत्पादन, विपणन, ग्राहक सेवा, वित्तीय विश्लेषण और आपूर्ति प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में इसका व्यापक उपयोग होगा। इससे कार्यों की गति और दक्षता बढ़ेगी, किंतु साथ ही कार्यबल के स्वरूप में परिवर्तन आएगा। भविष्य में केवल तकनीकी ज्ञान पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि समस्या समाधान, रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता और भावनात्मक समझ जैसे गुण अधिक महत्वपूर्ण बनेंगे। इसलिए शिक्षा और कौशल विकास की पूरी व्यवस्था को नए सिरे से तैयार करना होगा।
प्रशासनिक क्षेत्र में भी एआई शासन को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने की क्षमता रखती है। नीतिगत विश्लेषण, संसाधनों का वितरण, स्वास्थ्य और शिक्षा योजनाओं का संचालन तथा आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में इसका उपयोग लाभकारी हो सकता है। लेकिन इसके साथ एक बड़ा खतरा भी जुड़ा है। यदि नागरिकों के व्यक्तिगत आंकड़ों का अत्यधिक संग्रह और विश्लेषण होने लगे तो निजता और स्वतंत्रता पर गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। इसलिए तकनीकी दक्षता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक होगा। सैन्य क्षेत्र में एआई का प्रयोग सबसे अधिक चिंताजनक माना जा रहा है। स्वायत्त हथियार प्रणालियां, मानव रहित युद्धक उपकरण और लक्ष्य चयन करने वाली मशीनें युद्ध की प्रकृति को पूरी तरह बदल सकती हैं। यदि किसी मशीन को जीवन और मृत्यु का निर्णय करने की शक्ति मिल जाए तो नैतिक और मानवीय प्रश्न अत्यंत गंभीर हो जाएंगे। इसलिए विश्व स्तर पर ऐसी तकनीकों के नियमन और नियंत्रण की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है।

 


इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मानव जीवन सुरक्षित, संतुलित और सार्थक कैसे बना रहे? इसका उत्तर तकनीक के विरोध में नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण उपयोग में निहित है। एआई को मानव जीवन का स्वामी नहीं, सहायक बनाना होगा। शिक्षा प्रणाली में नैतिकता, संवेदनशीलता, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों को अधिक महत्व देना होगा। मनुष्य की भावनात्मक बुद्धिमत्ता, करुणा, सहानुभूति और आध्यात्मिक चेतना ही वे क्षेत्र हैं जिन्हें कोई मशीन प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। साथ ही, वैश्विक स्तर पर ऐसे नियमों और नीतियों की आवश्यकता है जो एआई के विकास को मानव कल्याण की दिशा में नियंत्रित करें। यदि यह तकनीक केवल कुछ शक्तिशाली कंपनियों या राष्ट्रों के हितों तक सीमित रह गई तो असमानता और संघर्ष बढ़ सकते हैं। इसके विपरीत यदि इसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास के लिए किया जाए तो यह मानवता के लिए अभूतपूर्व अवसरों का द्वार खोल सकती है।
अंततः एआई न तो पूर्णतः वरदान है और न ही अनिवार्य रूप से अभिशाप। यह एक शक्तिशाली साधन है जिसकी दिशा और परिणाम मनुष्य के विवेक पर निर्भर करेंगे। चुनौती मशीनों से नहीं, बल्कि इस बात से है कि क्या मनुष्य अपनी मानवीयता, संवेदनशीलता और नैतिक चेतना को सुरक्षित रख पाएगा। भविष्य का प्रश्न यह नहीं है कि एआई कितनी शक्तिशाली होगी, बल्कि यह है कि मनुष्य कितना सजग, उत्तरदायी और मूल्यनिष्ठ बना रहेगा। यदि मानवता तकनीकी प्रगति और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित कर सकी, तो एआई मानव विकास का नया अध्याय लिखेगी अन्यथा वही तकनीक असंतुलन, असमानता और अस्तित्वगत संकट का कारण भी बन सकती है। यही हमारे सम

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भ्रष्टाचार एक दीमक है, इसे समाप्त करना सभी की जिम्मेदारी – ज्यूडिशियल काउंसिल https://www.rashtratak.com/corruption-is-a-termite-it-is-everyones-responsibility-to-end-it-judicial-council/ Sun, 31 May 2026 11:55:04 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2274 नई दिल्ली नई दिल्ली (न्यूज़ वार्ता): ज्यूडिशियल काउंसिल ने देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर गंभीर चिंता व्यक्त करते

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नई दिल्ली नई दिल्ली (न्यूज़ वार्ता): ज्यूडिशियल काउंसिल ने देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि भ्रष्टाचार एक ऐसी दीमक है जो राष्ट्र की नींव को अंदर ही अंदर खोखला कर देती है। यदि समय रहते इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका दुष्प्रभाव समाज, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता रहेगा। काउंसिल ने देशवासियों से भ्रष्टाचार के विरुद्ध एकजुट होकर संघर्ष करने और ईमानदार भारत के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया है।

ज्यूडिशियल काउंसिल के चेयरमैन श्री राजीव अग्निहोत्री ने कहा कि भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समान अवसर और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा आघात है। जब किसी व्यक्ति को अपने वैध कार्य के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, तब यह केवल उस व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे तंत्र का नैतिक पतन दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार गरीब और कमजोर वर्गों को सबसे अधिक प्रभावित करता है, क्योंकि उन्हें अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

श्री अग्निहोत्री ने कहा कि आज आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि समाज में ईमानदारी और नैतिकता की संस्कृति विकसित करने की है। भ्रष्टाचार तब तक समाप्त नहीं हो सकता जब तक आम नागरिक स्वयं इसके खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं दिखाएंगे। प्रत्येक व्यक्ति को यह संकल्प लेना होगा कि वह न तो रिश्वत देगा और न ही रिश्वत लेने वालों का समर्थन करेगा।

उन्होंने कहा कि देश के विकास की गति तभी तेज होगी जब शासन व्यवस्था पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी। भ्रष्टाचार के कारण विकास योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाता। जनता के लिए निर्धारित संसाधनों का दुरुपयोग होता है और राष्ट्र की प्रगति बाधित होती है। इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष केवल सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रीय कर्तव्य है।

ज्यूडिशियल काउंसिल का मानना है कि युवाओं की भूमिका इस अभियान में सबसे महत्वपूर्ण है। यदि युवा पीढ़ी ईमानदारी, नैतिकता और पारदर्शिता के मूल्यों को अपनाएगी, तो भविष्य में एक मजबूत और भ्रष्टाचार-मुक्त भारत का निर्माण संभव होगा। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को भी जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से भ्रष्टाचार विरोधी संदेश को जन-जन तक पहुंचाना चाहिए।

श्री अग्निहोत्री ने कहा कि डिजिटल तकनीक और पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रियाएं भ्रष्टाचार को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। सरकारी सेवाओं का अधिकाधिक डिजिटलीकरण, शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करना तथा जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है। साथ ही, भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले नागरिकों और व्हिसलब्लोअर्स को पर्याप्त सुरक्षा और प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

श्री राजीव अग्निहोत्री ने देशवासियों से अपील करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई किसी एक संगठन, संस्था या सरकार की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की लड़ाई है। जब तक समाज का प्रत्येक वर्ग इस बुराई के विरुद्ध जागरूक होकर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएगा, तब तक स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यदि हम सभी मिलकर ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं, तो निश्चित रूप से भारत को भ्रष्टाचार-मुक्त और विकसित राष्ट्र बनाया जा सकता है।

अंत में ज्यूडिशियल काउंसिल ने सभी नागरिकों से भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने, नैतिक मूल्यों को अपनाने तथा राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया। संस्था का संदेश स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार रूपी दीमक को समाप्त करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है और एक जागरूक, ईमानदार तथा उत्तरदायी समाज ही विकसित भारत का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

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कथावाचक आचार्य इंद्रशेखर मिश्र जी द्वारा श्रीमद भगवद्गीता कथा का आयोजन https://www.rashtratak.com/organization-of-srimad-bhagavad-gita-katha-by-narrator-acharya-indrashekhar-mishra-ji/ Fri, 29 May 2026 12:47:56 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2263 दिल्ली किराड़ी बलजीत विहार शिव मंदिर के पास स्थित मैदान में श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन शुक्रवार को

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दिल्ली किराड़ी बलजीत विहार शिव मंदिर के पास स्थित मैदान में श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन शुक्रवार को श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का प्रसंग सुनाया गया। इस व्यास पीठ पर विराजमान कथावाचक आचार्य इंद्रशेखर मिश्र जी

महाराज ने रास के पांच अध्याय का वर्णन किया और आचार्य जी ने कहा कि इस कथा में भगवान कृष्ण दशम स्कंद पाठ और भजन के गाये जाने वाले पंचगीत भागवत के पंच प्राण हैं
और आचार्य जी ने कहा कि इस कथा में भगवान कृष्ण दशम स्कंद पाठ और भजन के गाये जाने वाले पंचगीत भागवत के पंच प्राण हैं जो भी ठाकुरजी के इन पांच गीतों को भाव से गाता है वह भव से पार हो जाता है। भागवत कथा पुराण में यह कहा है कि उन्हें वृंदावन की भक्ति सहज प्राप्त हो जाती है।
आचार्य जी ने बताया कि भगवान श्री कृष्ण ने गौ माता की सेवा करते थे और उन्हें चराने के लिए जमुना के किनारे गए, जहां पर  कालिया नाग का पूरा अत्याचार रहा उसी के बध के कारण ही भगवान ने अपने सखाओं के साथ मिलकर इस तरह का खेल रचा और कालिया का बध किया ।
कथा में भगवान का मथुरा प्रस्थान, कंस का वध, महर्षि संदीपनी के आश्रम में विद्या ग्रहण करना, कालयवन का वध, उधव गोपी संवाद, ऊधव द्वारा गोपियों को अपना गुरु बनाना, द्वारका की स्थापना एवं रुक्मणी विवाह के प्रसंग का संगीतमय भावपूर्ण पाठ किया गया। इस अवसर पर कथा के दौरान आचार्य ने कहा कि महारास में भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाकर गोपियों का आह्वान किया और महारास लीला के द्वारा ही जीवात्मा परमात्मा का ही मिलन हुआ। जीव और ब्रह्म के मिलने को ही महारास कहते है।इस अवसर पर क्षेत्र के तमाम गणमान्य में पंडित हरि कुमार त्रिपाठी ,रोहतास पूर्व निगम पार्षद , के पी सिंह, जंग बहादुर सिंह,राम सागर तिवारीनरेंद्र सिंह ,दिनेश दूबे,अभिषेख त्रिपाठी , आदि एवं अन्य भक्त मौजूद रहे।

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अग्रवाल समाज राष्ट्रहित के कार्यों में सदैव अग्रणी भूमिका में रहा और रहेगा: विनीत लोहिया https://www.rashtratak.com/vineet-lohia-has-always-been-and-will-remain-in-the-leading-role-in-the-works-of-social-service-cooperation/ Fri, 29 May 2026 02:32:42 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2258 अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन के राष्ट्रीय अधिवेशन एवं नवनिर्वाचित राष्ट्रीय पदाधिकारियों के शपथ ग्रहण कार्यक्रम में विनीत कुमार लोहिया

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अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन के राष्ट्रीय अधिवेशन एवं नवनिर्वाचित राष्ट्रीय पदाधिकारियों के शपथ ग्रहण कार्यक्रम में विनीत कुमार लोहिया ने कहा कि महाराजा अग्रसेन जी की प्रेरणा से अग्रवाल समाज सेवा, सहयोग, सामाजिक समरसता और राष्ट्रहित के कार्यों में सदैव अग्रणी भूमिका निभाता रहा है।
“एक ईंट और एक रुपया” के मानवीय दर्शन को आत्मसात करते हुए समाज निरंतर शिक्षा, संस्कार, सेवा और जनकल्याण के विविध आयामों में उल्लेखनीय योगदान दे रहा है। विश्वास है कि नवनिर्वाचित कार्यकारिणी इस गौरवशाली परंपरा को नई ऊर्जा, नई चेतना और सेवाभावी संकल्पों के साथ और अधिक समृद्ध करेगी।
इसके साथ उन्होंने कहा कि समाज में एक ऐसा माहौल होना चाहिए जिससे लोकतंत्र मजबूत होगा, सामाजिक असमानताएं कम होंगी और राष्ट्र विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा। शिक्षा को व्यक्ति निर्माण और चिकित्सा को जीवन रक्षा का माध्यम माना गया था। लेकिन स्वतंत्रता के लगभग आठ दशकों बाद स्थिति चिंताजनक प्रश्न खड़े करती है कि क्या ये दोनों क्षेत्र अपने मूल उद्देश्य से भटककर व्यवसाय और बाजार के अधीन नहीं हो गए हैं? आज शिक्षा और चिकित्सा दोनों क्षेत्रों में जो विसंगतियां दिखाई देती हैं, वे केवल व्यवस्थागत संकट नहीं बल्कि सामाजिक संकट का रूप ले चुकी हैं। एक ओर शिक्षा व्यवस्था परीक्षा, अंकों और प्रतिस्पर्धा की आर्थिक मशीन बन गई है, वहीं दूसरी ओर चिकित्सा सेवा लाभ-हानि के गणित में उलझती दिखाई देती है। इन दोनों क्षेत्रों की बढ़ती व्यावसायिकता ने आम आदमी को सबसे अधिक प्रभावित किया है। शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं था। शिक्षा अब डिग्री, नौकरी और प्रतिस्पर्धा तक सीमित होती दिखाई देती है! शिक्षा और चिकित्सा को पुनः सेवा और राष्ट्र निर्माण के मूल उद्देश्य से जोड़ा जाए।
सरकार, समाज, नीति निर्माताओं और निजी क्षेत्र को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें कोई बच्चा आर्थिक कारणों से शिक्षा से वंचित न हो और कोई नागरिक उपचार के अभाव में पीड़ित न रहे। यही स्वतंत्र भारत की मूल भावना थी और यही भविष्य का मार्ग भी होना चाहिए।

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क्या आम आदमी विकास से बाहर छूट रहा है? https://www.rashtratak.com/is-the-common-man-being-left-out-of-development/ Fri, 29 May 2026 01:52:53 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2255 आर्थिक विकास और आम आदमी के बीच की खाई एक जटिल बहस का विषय है, जिसे अलग-अलग नजरियों

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आर्थिक विकास और आम आदमी के बीच की खाई एक जटिल बहस का विषय है, जिसे अलग-अलग नजरियों से देखा जाता है। एक तरफ बड़े बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) और डिजिटलीकरण से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, तो वहीं दूसरी ओरआम आदमी को बड़ती महंगाई,महंगी शिक्षा -चिकित्सा और रोजगार के अवसरो की कमी जैसे कई संकटों का सामना करना पड़ रहा है ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नए भारत के निर्माण के जिन आधार स्तंभों की कल्पना की गई थी, उनमें शिक्षा और चिकित्सा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी। यह माना गया था कि यदि देश के नागरिक शिक्षित, स्वस्थ और जागरूक होंगे तो लोकतंत्र मजबूत होगा, सामाजिक असमानताएं कम होंगी और राष्ट्र विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा। शिक्षा को व्यक्ति निर्माण और चिकित्सा को जीवन रक्षा का माध्यम माना गया था। लेकिन स्वतंत्रता के लगभग आठ दशकों बाद स्थिति चिंताजनक प्रश्न खड़े करती है कि क्या ये दोनों क्षेत्र अपने मूल उद्देश्य से भटककर व्यवसाय और बाजार के अधीन नहीं हो गए हैं? आज शिक्षा और चिकित्सा दोनों क्षेत्रों में जो विसंगतियां दिखाई देती हैं, वे केवल व्यवस्थागत संकट नहीं बल्कि सामाजिक संकट का रूप ले चुकी हैं। एक ओर शिक्षा व्यवस्था परीक्षा, अंकों और प्रतिस्पर्धा की आर्थिक मशीन बन गई है, वहीं दूसरी ओर चिकित्सा सेवा लाभ-हानि के गणित में उलझती दिखाई देती है। इन दोनों क्षेत्रों की बढ़ती व्यावसायिकता ने आम आदमी को सबसे अधिक प्रभावित किया है। शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं था। शिक्षा अब डिग्री, नौकरी और प्रतिस्पर्धा तक सीमित होती दिखाई देती है।
शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं का सबसे भयावह चेहरा कोटा, सीकर और अन्य कोचिंग एवं शिक्षा केंद्रों में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं के रूप में सामने आया है। कोटा, जो कभी देश की शैक्षणिक आकांक्षाओं का केंद्र माना जाता था, अब विद्यार्थियों पर बढ़ते मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा, अकेलेपन और असफलता के भय के कारण आत्महत्या की घटनाओं से लगातार चर्चा में रहा है। कोटा, सीकर तथा अन्य कोचिंग नगरों में पिछले वर्षों में अनेक विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाओं ने शिक्षा व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर किया है। राजस्थान के सीकर में नीट परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र की आत्महत्या की घटना इसी विडंबना का उदाहरण है। परीक्षा रद्द होने से उत्पन्न अनिश्चितता और मानसिक तनाव ने एक संभावनाशील जीवन समाप्त कर दिया। यह घटना अकेली नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में 14,488 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की। औसतन हर 36 मिनट में एक विद्यार्थी जीवन समाप्त कर रहा है। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था की सामूहिक विफलता है।
दूसरी ओर नीट, नेट, प्रतियोगी भर्ती परीक्षाओं तथा अन्य राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, परिणामों में विवाद और अनिश्चितता की स्थितियों ने विद्यार्थियों में गहरा असंतोष और अविश्वास पैदा किया है। वर्षों की तैयारी करने वाले छात्र जब परीक्षा प्रणाली को ही अविश्वसनीय पाते हैं तो उनमें निराशा और मानसिक तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। आज परीक्षा प्रणाली अविश्वसनीय होती जा रही है। प्रश्नपत्र लीक होना, परीक्षाओं का रद्द होना, मूल्यांकन विवाद, शोध कार्यों में साहित्यिक चोरी, पीएचडी प्रक्रियाओं का औपचारिक बन जाना और कोचिंग संस्कृति का बढ़ना शिक्षा के बाजारीकरण की तस्वीर प्रस्तुत करता है। शिक्षा अब ज्ञान से अधिक निवेश और प्रतिफल का विषय बनती जा रही है। धीरे-धीरे शिक्षा सेवा से व्यवसाय में बदलती गई। बड़े निजी विद्यालय, कोचिंग संस्थान और विश्वविद्यालय आज करोड़ों के उद्योग बन चुके हैं। डॉक्टर और इंजीनियर बनाने के सपनों का ऐसा व्यापार खड़ा हुआ जिसमें अभिभावक आर्थिक रूप से टूटने लगे। आज एक सामान्य परिवार अपने बच्चों की शिक्षा के लिए जीवन भर की बचत खर्च करने को विवश है। विद्यालयों की ऊंची फीस, निजी कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और उच्च शिक्षा की महंगी व्यवस्था ने शिक्षा को आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया है।
इसी प्रकार चिकित्सा क्षेत्र की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। चिकित्सा को कभी सेवा का क्षेत्र माना जाता था, लेकिन आज निजी चिकित्सालयों की बढ़ती संख्या और उनकी व्यावसायिक प्रवृत्ति ने आम नागरिक को संकट में डाल दिया है। इलाज इतना महंगा हो गया है कि अनेक परिवार बीमारी के कारण आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। निजी अस्पतालों में उपचार, जांच, आईसीयू, दवाओं का खर्च और नकली दवाओं में जीवन समाप्त होने की घटनाएं लगातार बढ़ी है। अनेक मामलों में अनावश्यक परीक्षण, अत्यधिक शुल्क और व्यावसायिक दृष्टिकोण की शिकायतें सामने आती रहती हैं। चिकित्सा सेवा का उद्देश्य रोगी को राहत देना था, लेकिन कई स्थानों पर वह लाभ कमाने की प्रणाली में बदलती दिखाई देती है।  जगह-जगह खुले निजी अस्पताल और शिक्षण संस्थान एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा में उतर आए हैं। लेकिन यह प्रतिस्पर्धा गुणवत्ता की अपेक्षा लाभ कमाने की अधिक दिखाई देती है। परिणाम यह हुआ कि शिक्षा और चिकित्सा दोनों ही सामान्य नागरिक की आर्थिक क्षमता से बाहर जाने लगी हैं। इन परिस्थितियों का एक सामाजिक दुष्परिणाम भी सामने आया है। आर्थिक दबाव, भविष्य की अनिश्चितता, शिक्षा का तनाव, महंगी चिकित्सा और रोजगार संकट के कारण अवसाद, मानसिक तनाव और आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। युवा पीढ़ी उपलब्धियों के दबाव में टूट रही है, जबकि परिवार आर्थिक बोझ से जूझ रहे हैं।
शिक्षा मंत्रालय को अधिक सशक्त, उत्तरदायी और कठोर भूमिका निभाते हुए परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी, तकनीक आधारित और सुरक्षित बनाना होगा। इसी प्रकार चिकित्सा क्षेत्र में देशभर में स्थापित हुए नए एम्स संस्थानों एवं उच्च चिकित्सा केंद्रों का लाभ वास्तव में आम नागरिक तक सरल, सस्ती और सुलभ व्यवस्था के रूप में पहुंचे, यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। आज आवश्यकता केवल बड़े अस्पताल बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें सर्वसुविधायुक्त, विशेषज्ञ सेवाओं से युक्त तथा दूरदराज और पिछड़े क्षेत्रों तक विस्तारित करने की है, ताकि महानगरों पर निर्भरता कम हो और ग्रामीण तथा वंचित वर्ग भी उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधाओं का लाभ सहजता से प्राप्त कर सके। नई शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, कौशल आधारित और बहुआयामी बनाने का प्रयास हुआ है। देश में नए आईआईटी, आईआईएम, केंद्रीय विश्वविद्यालय, एम्स और चिकित्सा संस्थानों की स्थापना की गई। उच्च शिक्षा और उच्च चिकित्सा के नए केंद्र विकसित हुए हैं। मेडिकल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि हुई और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के प्रयास किए गए।
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि पूरा परिदृश्य केवल निराशाजनक है। पिछले वर्षों में शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में कुछ सकारात्मक प्रयास भी हुए हैं। विशेष रूप से जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार आई, तब इन क्षेत्रों की संरचनात्मक कमियों की ओर अपेक्षाकृत गंभीर ध्यान दिया गया। चिकित्सा क्षेत्र में आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने गरीब वर्ग को राहत देने का प्रयास किया है। जिला स्तर तक चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार की दिशा में भी पहल हुई है। शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल शिक्षा, कौशल विकास और स्थानीय भाषाओं में अध्ययन पर बल दिया गया। लेकिन भारत जैसी विशाल जनसंख्या वाले देश में ये प्रयास अभी पर्याप्त नहीं कहे जा सकते। जिस गति से जनसंख्या बढ़ी है, उस अनुपात में सरकारी शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों का विस्तार नहीं हो पाया। यही कारण है कि निजी क्षेत्र ने उस खाली स्थान को भर दिया और धीरे-धीरे प्रमुख भूमिका में आ गया। अब आवश्यकता केवल नए संस्थान खोलने की नहीं बल्कि सरकारी शिक्षा और चिकित्सा को अधिक प्रभावी, सुलभ और उद्देश्यपूर्ण बनाने की है। सरकारी विद्यालयों और अस्पतालों की गुणवत्ता बढ़ानी होगी। उनमें आधुनिक संसाधन, प्रशिक्षित मानवबल और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। निजी शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों पर प्रभावी नियंत्रण भी आवश्यक है। शिक्षा और चिकित्सा को पूर्णतः बाजार की शक्तियों पर नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि ये केवल आर्थिक गतिविधियां नहीं बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व हैं। शिक्षा नीति को समाज और जीवन से जोड़ना होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा और चिकित्सा को पुनः सेवा और राष्ट्र निर्माण के मूल उद्देश्य से जोड़ा जाए। यदि ये दोनों क्षेत्र केवल व्यापार बन गए तो सामाजिक असमानता और बढ़ेगी, प्रतिभाएं टूटेंगी और आम आदमी विकास की मुख्यधारा से बाहर होता जाएगा। भारत के भविष्य की दिशा इस बात से तय होगी कि शिक्षा और चिकित्सा कितनी सुलभ, समान और मानवीय बनती हैं। सरकार, समाज, नीति निर्माताओं और निजी क्षेत्र को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें कोई बच्चा आर्थिक कारणों से शिक्षा से वंचित न हो और कोई नागरिक उपचार के अभाव में पीड़ित न रहे। यही स्वतंत्र भारत की मूल भावना थी और यही भविष्य का मार्ग भी होना चाहिए।

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भक्ति, बाबाओं की सत्ता और न्याय का विरोधाभास https://www.rashtratak.com/the-paradox-of-power-and-justice-of-bhakti-babas/ Fri, 29 May 2026 01:43:59 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2252 जेल, पैरोल और धार्मिक प्रभाव के बीच उलझता भारतीय समाज – डॉ.  सत्यवान सौरभ भारत में धर्म केवल

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जेल, पैरोल और धार्मिक प्रभाव के बीच उलझता भारतीय समाज
– डॉ.  सत्यवान सौरभ
भारत में धर्म केवल आस्था का विषय नहीं है; वह सामाजिक प्रभाव, राजनीतिक शक्ति और आर्थिक संरचना का भी बड़ा केंद्र बन चुका है। यही कारण है कि जब किसी बड़े धार्मिक बाबा, स्वयंभू संत या आध्यात्मिक संगठन के प्रमुख पर गंभीर आपराधिक आरोप लगते हैं, तब मामला केवल अदालत और कानून तक सीमित नहीं रहता। वह समाज की मानसिकता, भक्त-राजनीति, न्याय-व्यवस्था और राज्य की निष्पक्षता पर एक व्यापक बहस में बदल जाता है। पिछले कुछ वर्षों में देश ने कई ऐसे मामले देखे हैं जहाँ बड़े-बड़े धार्मिक चेहरों पर यौन शोषण, आर्थिक अनियमितता, हिंसा, अवैध कब्जे और सत्ता के दुरुपयोग जैसे आरोप लगे। कुछ मामलों में अदालतों ने दोष सिद्ध भी किए, लेकिन इसके बावजूद उनके प्रभाव, लोकप्रियता और अनुयायियों की संख्या में बहुत अधिक कमी दिखाई नहीं दी। यही विरोधाभास भारतीय समाज की सबसे जटिल सच्चाइयों में से एक है।
जब किसी दोषसिद्ध बाबा को पैरोल मिलती है, जेल से बाहर आने पर उसका भव्य स्वागत होता है, बड़ी गाड़ियों के काफिले चलते हैं, हजारों अनुयायी इकट्ठा होते हैं और पूरा वातावरण किसी धार्मिक उत्सव जैसा दिखाई देता है, तब एक बड़ा प्रश्न समाज के सामने खड़ा होता है—क्या भारत में आस्था न्याय से अधिक शक्तिशाली हो चुकी है? सामान्य परिस्थितियों में किसी अपराधी की जेल-रिहाई केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया होती है, लेकिन जब वही व्यक्ति करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र हो, तब उसकी हर गतिविधि राजनीतिक और सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लेती है।
भारतीय लोकतंत्र का संकट यही है कि यहाँ कई बार व्यक्ति “धार्मिक ब्रांड” बन जाता है। उसके खिलाफ अदालत का फैसला भी उसके अनुयायियों के विश्वास को पूरी तरह नहीं तोड़ पाता। भक्तों का एक बड़ा वर्ग हर आरोप को साजिश, राजनीति या धार्मिक षड्यंत्र के रूप में देखने लगता है। यही कारण है कि कुछ बाबाओं के खिलाफ गंभीर आरोप सिद्ध होने के बाद भी उनके डेरे, आश्रम और संस्थाएँ पहले की तरह चलती रहती हैं। उनके समर्थक उन्हें अपराधी नहीं, बल्कि “पीड़ित संत” के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह स्थिति केवल न्याय-व्यवस्था के लिए ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना के लिए भी चुनौती है।
समस्या केवल बाबाओं तक सीमित नहीं है; समस्या उस सामाजिक संरचना में भी है जो व्यक्ति-पूजा को विवेक से ऊपर रखती है। भारत के अनेक हिस्सों में धार्मिक बाबा केवल आध्यात्मिक गुरु नहीं होते, बल्कि लोगों के जीवन-निर्णयों, आर्थिक व्यवहार, सामाजिक संबंधों और राजनीतिक सोच तक को प्रभावित करते हैं। गरीब, वंचित और भावनात्मक रूप से टूटे लोग अक्सर ऐसे संगठनों में सुरक्षा, पहचान और सहारा खोजते हैं। धीरे-धीरे यह आस्था निर्भरता में बदल जाती है। यही निर्भरता कई बार सवाल पूछने की क्षमता को खत्म कर देती है। भक्त अपने गुरु के खिलाफ आए आरोपों को स्वीकार करने के बजाय पूरी व्यवस्था पर ही अविश्वास करने लगते हैं।
यह भी सच है कि सभी धार्मिक गुरु या संत एक जैसे नहीं होते। अनेक संत समाज-सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम भी करते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी बाबा के इर्द-गिर्द “असीम शक्ति” और “अंध-भक्ति” का ऐसा वातावरण बना दिया जाता है कि वह स्वयं को कानून और नैतिकता से ऊपर समझने लगे। इतिहास बताता है कि जब भी किसी व्यक्ति को बिना प्रश्न किए “दैवीय” बना दिया जाता है, तब शोषण और सत्ता-दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है। लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति या संस्था को सवालों से परे नहीं रखा जा सकता, चाहे वह राजनीतिक नेता हो, उद्योगपति हो या धार्मिक गुरु।
ऐसे मामलों में राज्य और राजनीति की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। बड़े धार्मिक संगठनों के पास विशाल जनसमर्थन होता है, जिसका चुनावी प्रभाव भी पड़ता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल अक्सर ऐसे संगठनों के प्रति नरम रुख अपनाते दिखाई देते हैं। कई बार यह धारणा बनती है कि प्रभावशाली बाबाओं को कानून से अधिक सामाजिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। चाहे यह पूरी तरह सच हो या नहीं, लेकिन यदि जनता के भीतर यह विश्वास पैदा हो जाए कि कानून सबके लिए समान नहीं है, तो न्याय-व्यवस्था की नैतिक विश्वसनीयता कमजोर होने लगती है।
पैरोल और कानूनी राहत अपने-आप में गलत नहीं हैं। भारतीय कानून हर कैदी को कुछ अधिकार देता है। लेकिन जब किसी प्रभावशाली बाबा की पैरोल सार्वजनिक शक्ति-प्रदर्शन में बदल जाती है, तब वह केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं रह जाती। वह समाज में यह संदेश देती है कि प्रभाव और भीड़ आज भी न्याय की भाषा को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि हर ऐसी रिहाई के बाद पीड़ितों, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों के भीतर असंतोष बढ़ता है। उन्हें लगता है कि जिन लोगों ने न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़ी, उनकी पीड़ा को समाज जल्दी भूल जाता है, लेकिन प्रभावशाली चेहरों की वापसी को उत्सव बना देता है।
यह पूरा घटनाक्रम मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। आज धार्मिक बाबाओं की छवि केवल आश्रमों में नहीं बनती, बल्कि कैमरों, वायरल वीडियो, भक्त-प्रचार और डिजिटल अभियानों के माध्यम से तैयार की जाती है। कुछ लोग उन्हें “मसीहा” बनाकर प्रस्तुत करते हैं, तो कुछ उन्हें “खलनायक” के रूप में। इस प्रक्रिया में कई बार तथ्य पीछे छूट जाते हैं और भावनाएँ केंद्र में आ जाती हैं। लोकतंत्र के लिए यह खतरनाक स्थिति है, क्योंकि किसी भी समाज का नैतिक संतुलन केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि विवेक और सत्य से बनता है।
भारत को अब यह समझना होगा कि धार्मिक आस्था और लोकतांत्रिक न्याय के बीच संतुलन बनाए बिना स्वस्थ समाज संभव नहीं है। किसी को पूजा जाने का अधिकार है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को कानून से ऊपर मान लेने का अधिकार किसी को नहीं हो सकता। यदि समाज “संत” और “अपराध” के बीच स्पष्ट रेखा नहीं खींच पाएगा, तो न्याय हमेशा भावनात्मक संघर्षों में उलझा रहेगा।
आज आवश्यकता केवल अदालतों की नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता की भी है। लोगों को यह समझना होगा कि सच्ची आध्यात्मिकता व्यक्ति-पूजा नहीं, बल्कि नैतिकता, संवेदनशीलता और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता में होती है। कोई भी बाबा, संत या धार्मिक नेता यदि समाज में सम्मान चाहता है, तो उसे सबसे पहले पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के प्रति सम्मान का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
अंततः यह प्रश्न किसी एक बाबा या किसी एक संगठन का नहीं है। यह उस समाज का प्रश्न है जो कई बार आस्था के नाम पर विवेक को स्थगित कर देता है। जब तक भारत में भक्ति और तर्क के बीच संतुलन नहीं बनेगा, तब तक ऐसे विवाद बार-बार सामने आते रहेंगे। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह धर्म का सम्मान करे, लेकिन न्याय को उससे नीचे न रखे।

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