मनोरंजन Archives - Rashtra Tak Hindi Monthly Magazine Wed, 26 Nov 2025 01:16:55 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://www.rashtratak.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-cropped-WhatsApp-Image-2025-05-08-at-2.40.25-PM-32x32.jpeg मनोरंजन Archives - Rashtra Tak 32 32 ही-मैन धर्मेंद्र को श्रद्धांजलि: सदियों तक याद रहने वाला बॉलीवुड का अमर सितारा https://www.rashtratak.com/tribute-to-hee-man-dharmendra-the-immortal-star-of-bollywood-who-will-be-remembered-for-centuries/ https://www.rashtratak.com/tribute-to-hee-man-dharmendra-the-immortal-star-of-bollywood-who-will-be-remembered-for-centuries/#respond Wed, 26 Nov 2025 01:09:33 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1234 अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ ( उ. प्र.)   हिंदी सिनेमा के रूपहले पर्दे पर एक ऐसा नाम

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  • अजय कुमार,
    वरिष्ठ पत्रकार
    लखनऊ ( उ. प्र.)
 

हिंदी सिनेमा के रूपहले पर्दे पर एक ऐसा नाम जिसने सात दशक तक अपनी चमक से परचम लहराया, वह नाम था धर्मेंद्र। पंजाब की मिट्टी से उठकर बॉलीवुड की सबसे बुलंद ऊंचाइयों तक पहुंचने वाले इस अभिनेता ने जो सफर तय किया, वह किसी सपने से कम नहीं। वह सिर्फ सुपरस्टार नहीं थे, बल्कि ऐसे कलाकार थे जिनके संवाद, जिनकी मुस्कान और जिनकी बहादुरी का अंदाज़ लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगा। उन्हें ही-मैन कहा गया, ग्रीक गॉड कहा गया, और यही दर्जे उन्हें उनकी प्रतिभा, सरलता और अदम्य हौसले ने दिलाए।

 

आज लाखों-करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में एक टीस है… दुख है… और कहीं न कहीं एक मलाल भी। उन्होंने अपने चहेते सितारे को वह विदाई नहीं दे पाई, जिसके वे सच्चे हकदार थे। अंतिम पलों तक अस्पताल से घर तक जो गोपनीयता बरती गई, उसने उनके चाहने वालों को बेचैन रखा। किसी महानायक को विदा देने का अपना एक तरीका होता है। लोगों को उनकी झलक आख़िरी बार देखने का हक होता है। पर इस बार यह हक छिन गया। यही सोचकर हर धर्मेंद्र प्रेमी का दिल भारी है।लेकिन जाने वाले चले जाते हैं… रह जाता है उनका काम, उनका प्यार, और उनकी अमर कहानी। धर्मेंद्र की कहानी ऐसी ही है। गांव के साधारण लड़के धरम सिंह देओल का मुंबई जाकर धर्मेंद्र बन जाना, और वहां लाखों दिलों पर राज करना। मिनर्वा सिनेमा में एक फिल्म देखते हुए उनके दिल में जो सपना जागा था, उसने पूरी दुनिया को चमत्कृत कर दिया। छठीं में पढ़ता एक सीधा-सादा लड़का, जिसे अपने स्कूल में पहली बार किसी से मासूम प्यार हुआ… वही लड़का बाद में भारतीय सिनेमा का सबसे आकर्षक चेहरा बना।

धर्मेंद्र ने अभिनय की शुरुआत उन फिल्मों से की, जिनमें उन्होंने भावनाओं की गहराई और इश्क की सादगी दिखाई। लेकिन असली तूफान तब आया, जब वह ऐक्शन के राजा बन गए। उन्होंने बॉडीबिल्डिंग को बॉलीवुड में नया स्थान दिया। मजबूत कंधे, दमदार आवाज, और सामने खड़ा विलेन हो या हालात  धर्मेंद्र कभी पीछे नहीं हटते थे। शोले में वीरू के किरदार ने पूरे देश को हिला दिया। वह सिर्फ मज़ाकिया बहादुर ही नहीं थे, बल्कि दोस्ती का सबसे खूबसूरत प्रतीक भी थे। बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना… यह सिर्फ संवाद नहीं था, एक मर्द की असली संवेदनशीलता की पहचान था उनकी फिल्में जैसे मेरा गाँव मेरा देश, यादों की बारात, जुगनू, शालीमार, चरस, द बर्निंग ट्रेन  हर दशक में धर्मेंद्र के नाम की गारंटी ही फिल्म की सफलता की गारंटी थी। ऐसा कम होता है कि दो-दो सुपरस्टार राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के दौर में कोई तीसरा कलाकार उसी दमखम से छाया रहे। पर धर्मेंद्र छाए रहे क्योंकि वह राजनीति और कैंपबाज़ी से दूर थे। वह किसी गुट का हिस्सा नहीं, बल्कि पूरी इंडस्ट्री के चहेते थे। उनके चेहरे पर कभी अहंकार की झलक नहीं आई। जितने बड़े स्टार, उतने ही ज़मीन से जुड़े इंसान।और जब वह रोमांस करते थे तो पर्दा पिघल जाता था। दर्शक मान लेते थे कि प्रेम इतना ही सहज, उतना ही खरा होता है। हेमा मालिनी के साथ उनकी जोड़ी तो आज भी दिलों में ताज़ा है। वह रिश्ते में भी उतने ही सच्चे थे, जितने पर्दे पर दिखाई देते थे। उनकी हंसी में पंजाब की मिट्टी की खुशबू थी, उनकी आंखों में जज़्बातों की सच्चाई।

 

समय बदला, दौर बदला, पर धर्मेंद्र की चमक नहीं घटी। जब कई बड़े सितारे अस्सी के दशक में फ्लॉप होने लगे थे, वह तब भी हिट पर हिट देते रहे लोहा, हुकूमत, कातिलों के कातिल जैसी फिल्में इस बात की गवाह हैं। यही कारण था कि उनकी फैन-फ़ॉलोइंग तीन-तीन पीढ़ियों तक फैली। दादा भी उनके दीवाने, बेटा भी और पोता भी।आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं, तो लोग टूटे हुए हैं। सोशल मीडिया से गलियों तक बस एक ही सवाल  आखिर क्यों उनके अंतिम संस्कार में वह राष्ट्रीय सम्मान नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे? क्यों वह चेहरे जिन्हें आखिरी बार देखकर लोग चैन पाते, उन्हें देखने का मौका किसी को नहीं मिला? क्यों ही-मैन को एक गहरे शीशों वाली एंबुलेंस में चुपचाप ले जाया गया? उनके चाहने वालों की पीड़ा यह सोचकर और बढ़ जाती है कि उनकी अंतिम यात्रा चुपके से पूरी हो गई, जबकि वह पूरी दुनिया के नायक थे।

पर शायद उनका परिवार नहीं चाहता था कि उनका आखिरी दृश्य भीड़, शोर और अफरातफरी में बदले। धर्मेंद्र जिंदगी भर शोहरत में रहे, शायद जाना उन्होंने सादगी से चाहा। फिर भी दिल तो फैंस का ही होता है… उसकी उम्मीदें हमेशा कुछ और चाहती हैं।धर्मेंद्र की जिंदगी में जितने चकाचौंध वाले दिन थे, उतनी ही भावुक यादें भी थीं। वह अपने स्कूल, अपनी मिट्टी, अपने साहनेवाल को कभी नहीं भूले। जब भी जाते, बचपन के दोस्तों से मिलते, अपने पिता की पुरानी कुर्सी देखकर भावुक हो जाते। यह वही धर्मेंद्र थे  सुपरस्टार भी और बहुत बड़ा इंसान भी।आज जब हम उनकी फिल्मों के दृश्य याद करते हैं  शोले का टंकी वाला वीरू, चुपके-चुपके का विनम्र प्रोफ़ेसर, मेरा गाँव मेरा देश का बदला लेने वाला हीरो  तो महसूस होता है, यह कलाकार कभी बुजुर्ग नहीं हुआ। वह हमेशा जवान रहा, हमेशा जिंदादिल रहा। यह विडंबना ही है कि जिसे दुनिया ने हाथों-हाथ सिर पर बैठाया, उसी दुनिया से उनका अंतिम मिलन अधूरा रह गया। लेकिन यह अधूरापन ही उनके प्रति लोगों का सच्चा प्रेम है। जब जनता किसी कलाकार के जाने पर रो पड़ती है तो यही सबसे बड़ा राष्ट्रीय सम्मान है। उन्हें सलामी बंदूकों से नहीं, करोड़ों दिलों से मिली।धर्मेंद्र जैसे सितारे मरते नहीं… वे सिर्फ पर्दे के पीछे चले जाते हैं। उनकी आवाज, उनकी हंसी, उनके संवाद, उनका अंदाज़ हमेशा जिंदा रहेगा। आने वाली पीढ़ियाँ भी जब वीरू की शरारतें देख हंसेंगी, जब गांव के नायक को बंदूक थामे देख रोमांचित होंगी  तब धर्मेंद्र फिर से परदे पर लौट आएंगे।आज हम सिर्फ इतना कहना चाहते हैं कि धरम जी, आपने हमें प्यार, हिम्मत और सादगी सिखाई। आप चले गए, पर हम आपको भूल नहीं पाएंगे और आपकी विरासत सदियों तक ज़िंदा रहेगी। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे। अफसोस यह है कि हम आपको आखिरी बार देख भी न पाए, पर विश्वास यह है कि आप हर दिल में हमेशा दिखाई देंगे।

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अंतर्राष्ट्रीय व्यापर मेले में अशोक खरबंदा के जादू ने मचाई धूम ! https://www.rashtratak.com/ashok-kharbandas-magic-created-a-stir-in-the-international-trade-fair/ https://www.rashtratak.com/ashok-kharbandas-magic-created-a-stir-in-the-international-trade-fair/#respond Fri, 21 Nov 2025 11:56:14 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1190 मेले में अशोक खरबंदा के जादू ने मचाई धूम ! अंतर्राष्ट्रीय व्यापर मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतरगत

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मेले में अशोक खरबंदा के जादू ने मचाई धूम ! अंतर्राष्ट्रीय व्यापर मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतरगत भारत मंडपम थिएटर में जादूगर अशोक खरबंदा और उनके बेटे सुमित खरबंदा ने शानदार जादुई प्रस्तुति दी ,!

ध्यान रहे पिछले 25 वर्षो से दर्शको की डिमांड पर लगातार जादुई प्रदर्शन कर रहे है ! और धूम मचा रहे है ! इनका रिंग गायब करने का जादू सबसे ज्यादा पसंद किया गया ! इनके साथ इनके सुपुत्र सुमित खरबंदा ने माइंड पढ़ना और हाथ की सफाई का शानदार जादू प्रस्तुत किया !

दोपहर को तीन बजे जब इनका जादू शुरू हुआ तो एमपी थिएटर सारा भर गया ! अंत में जब जादू से तिरंगा झंडा निकला और वंदे मातरम गीत बजाया तो सारा स्टेडियम वंदे मातरम , वंदे मातरम से गूंज उठा !

 

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मनोरंजन ऐप्स की अंधी दौड़ और बढ़ती अश्लीलता https://www.rashtratak.com/blind-race-of-entertainment-apps-and-increasing-obscenity/ https://www.rashtratak.com/blind-race-of-entertainment-apps-and-increasing-obscenity/#respond Sun, 16 Nov 2025 02:55:01 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1138 डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स तेज़ मुनाफ़े की दौड़ में कला, संवेदनशीलता और समाजिक मूल्यों को पीछे छोड़ते हुए अश्लीलता को

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डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स तेज़ मुनाफ़े की दौड़ में कला, संवेदनशीलता और समाजिक मूल्यों को पीछे छोड़ते हुए अश्लीलता को नया ‘मनोरंजन’ बना रहे हैं — इसका दुष्प्रभाव विशेषकर युवाओं की मानसिकता पर गहरा और खतरनाक है।
– डॉ सत्यवान सौरभ
डिजिटल क्रांति ने जिस तेज़ी से दुनिया को बदला है, उतनी ही तीव्रता से उसने हमारे मनोरंजन के साधनों को भी प्रभावित किया है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सस्ते डेटा ने मनोरंजन को घरों से निकलकर सीधा हर व्यक्ति की जेब और हाथों तक पहुँचा दिया है। आज सैकड़ों एंटरटेनमेंट ऐप्स—वेब सीरीज़, शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया स्ट्रीमिंग और लाइव शो—हर सेकंड दर्शकों का ध्यान खींचने की होड़ में हैं। यह सुविधा जितनी शानदार लगती है, उतनी ही गहरी चिंताओं को भी जन्म देती है। क्योंकि इसी आसानी ने मनोरंजन की परिभाषा को खतरनाक रूप से बदल दिया है। अब मनोरंजन का अर्थ कला, संस्कृति, कहानी या संवेदनशीलता नहीं रह गया है—बल्कि तेज़ व्यूज़, वायरल कंटेंट और उत्तेजक दृश्यों की अंधी प्रतिस्पर्धा बन गया है।
आज स्थिति यह है कि अनेक ऐप्स जान-बूझकर अश्लीलता, फूहड़ हरकतों, भद्दे संवादों और उत्तेजक दृश्यों को परोस रहे हैं। यह सामग्री न तो किसी रचनात्मकता की मिसाल है और न ही इससे समाजिक चेतना का विस्तार होता है। इसके पीछे केवल एक लक्ष्य है—तेज़ी से अधिक दर्शक, और इन दर्शकों के माध्यम से विज्ञापन व सब्सक्रिप्शन से होने वाला मुनाफ़ा। मनोरंजन उद्योग ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहाँ कला और संस्कृति की प्रतिष्ठा आर्थिक लालच के सामने निरर्थक होती जा रही है।
कभी भारतीय सिनेमा, थियेटर और साहित्य समाज के जीवन-मूल्यों को सहेजने का माध्यम माने जाते थे। कहानी, संवाद, अभिनय और कल्पना की शक्ति दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती थी। आज डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ने इसका बिल्कुल उल्टा माहौल तैयार कर दिया है। वेब सीरीज़ और शॉर्ट वीडियो में आपत्तिजनक भाषा, निर्बाध अश्लीलता और अनावश्यक अंतरंग दृश्यों को ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे यही “आधुनिकता” या “यथार्थवाद” हो। जबकि सच्चाई यह है कि यह यथार्थ नहीं, बल्कि एक जानबूझकर पैदा किया गया भ्रम है—जिसमें दर्शक को उत्तेजना व सनसनी के माध्यम से बांधकर रखा जाए।
इस दौड़ की सबसे बड़ी कीमत युवा पीढ़ी चुका रही है। किशोरों के हाथ में मोबाइल है और मोबाइल के अंदर ऐसी दुनिया है जो बिना किसी रोक-टोक के उन्हें प्रभावित कर रही है। किशोरावस्था वह समय होता है जब व्यक्तित्व, सोच, नैतिकता और सामाजिक मूल्य बनते हैं। लेकिन इन ऐप्स पर उपलब्ध सामग्री उन्हें तेज़-तर्रार, उथला और अक्सर भ्रमित कर देने वाला दृष्टिकोण देती है। संबंधों के प्रति गलत धारणाएँ बनती हैं, महिलाओं के प्रति सम्मान घटता है, और जीवन को केवल शारीरिक आकर्षण, भौतिकता और दिखावे के रूप में समझने की प्रवृत्ति
आज का युवा जिस प्रकार की सामग्री रोज़ देख रहा है, वह उसके व्यवहार, शब्दों, संवेदनाओं और जीवन के आकलन को धीरे-धीरे बदल रही है। जिस चीज़ को वह “मनोरंजन” या “ट्रेंड” समझ रहा है, वह वास्तव में उनके भीतर मूल्यहीनता और अवसाद पैदा कर रही है। कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रकार का कंटेंट आँखों को आकर्षित भले करे, लेकिन दिमाग पर भारी बोझ डालता है। तेज़–तेज़ दृश्यों, अश्लील संवादों, अनियंत्रित भावनाओं और आक्रामक प्रस्तुतियों से किसी भी किशोर का मानसिक संतुलन प्रभावित होना स्वाभाविक है।
लेकिन समस्या का एक और पहलू भी है—कंटेंट निर्माता और ऐप कंपनियाँ ज़िम्मेदारी से बचने के लिए ‘यूज़र चॉइस’, ‘एडल्ट टैग’ या ‘व्यूअर डिस्क्रेशन’ जैसे शब्दों का सहारा लेती हैं। वे यह कहती हैं कि दर्शक स्वयं चयन करें कि वे क्या देखना चाहते हैं। यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं, लेकिन अधूरा अवश्य है। क्योंकि जब कोई ऐप अपनी पूरी मार्केटिंग रणनीति ही उत्तेजक और भड़काऊ सामग्री पर आधारित रखता है, तब दर्शक का चुनाव स्वतंत्र कम और प्रभावित अधिक होता है। जिस सामग्री को लगातार प्रमोट किया जाएगा, वही अधिक देखी जाएगी।
नियामक तंत्र की स्थिति भी उतनी ही कमज़ोर है। भारत में फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड है, टीवी के लिए प्रसारण नियंत्रण है, लेकिन डिजिटल ऐप्स लगभग बिना किसी प्रभावी नियंत्रण के चल रहे हैं। दिशा-निर्देश तो बनाए गए हैं, पर उनका पालन न तो कठोर है और न ही नियमित। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को लगता है कि वे आम मीडिया कानूनों से ऊपर हैं। उनका तर्क है कि इंटरनेट एक “स्वतंत्र माध्यम” है। लेकिन क्या स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि समाजिक संतुलन को बिगाड़ने वाली सामग्री को खुली छूट दे दी जाए? क्या संस्कृति, नैतिकता और संवेदनाओं को नज़रअंदाज़ कर देना ही स्वतंत्रता है?
समस्या का एक सामाजिक आयाम भी है। परिवार अपने स्तर पर बच्चों को रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन डिजिटल दुनिया की जटिलता इतनी है कि पूरी तरह नियंत्रण लगभग असंभव है। विशेषकर मध्यम वर्गीय और ग्रामीण परिवारों में डिजिटल साक्षरता अभी विकसित नहीं हुई है। माता-पिता यह नहीं जानते कि कौन-सा कंटेंट बच्चों के लिए अच्छा है और कौन-सा हानिकारक। ऐप कंपनियाँ भी माता-पिता को मार्गदर्शन देने के बजाय उनका उपयोगकर्ता विस्तार करने में अधिक रुचि रखती हैं।
ऐसे समय में हमें यह समझना होगा कि समाधान केवल प्रतिबंधों में नहीं है। समाधान एक व्यापक सामाजिक जागरूकता, नैतिक उत्पादन नीति और कड़े नियमन के संतुलन में है। मनोरंजन कंपनियाँ स्वयं यह तय करें कि क्या दिखाना उचित है। वे कला और व्यावसायिकता के बीच संतुलन बनाएं। अश्लीलता के सहारे व्यूज़ पाने की आदत छोड़ें और रचनात्मक, भावनात्मक तथा सामाजिक रूप से उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करें।
साथ ही, सरकार को डिजिटल प्लेटफार्मों पर वैसा ही नैतिक नियंत्रण लागू करना होगा जैसा टीवी या फिल्मों पर होता है। पारदर्शी नियम, कठोर दंड और स्पष्ट श्रेणीकरण इस दिशा में आवश्यक कदम हो सकते हैं।
समाज का कर्तव्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अभिभावकों को डिजिटल साक्षरता दी जानी चाहिए। युवाओं को यह समझाया जाना चाहिए कि मनोरंजन और उत्तेजना में बहुत अंतर होता है। फूहड़ता से मिली त्वरित प्रसन्नता जीवन के गहरे अनुभवों और रचनात्मक आनंद का विकल्प नहीं हो सकती।
मनोरंजन का उद्देश्य केवल चौंकाना या उत्तेजित करना नहीं है; उसका उद्देश्य मन को संवेदनशील बनाना, सोच को गहराई देना और समाज को बेहतर दिशा देना है। लेकिन जब ऐप्स की दुनिया कला को छोड़कर अश्लीलता की ओर भागने लगे, तब संस्कृति और सभ्यता दोनों संकट में पड़ती हैं।
हमारे सामने आज यही प्रश्न है—क्या हम ऐसी डिजिटल दुनिया चाहते हैं जहाँ मनोरंजन का आधार रचनात्मकता, सांस्कृतिक मूल्य और सामाजिक ज़िम्मेदारी हो? या हम ऐसे युग में प्रवेश करने जा रहे हैं जहाँ उत्तेजना ही कला बन जाएगी और सनसनी ही मनोरंजन?
समय की मांग है कि हम स्पष्ट रूप से कहें: हमें मनोरंजन चाहिए—लेकिन ऐसा नहीं जो समाज को खोखला कर दे।
अगर डिजिटल दुनिया इस दिशा में नहीं बदली, तो आने वाली पीढ़ियाँ एक ऐसे सांस्कृतिक अंधकार में प्रवेश करेंगी, जहाँ मनोरंजन तो बहुत होगा, पर उसका कोई अर्थ नहीं
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बड़े बड़े नैन वाली मीठे मीठे बैन वाली”द्रौपदी “- चन्द्रशेखर मिश्र https://www.rashtratak.com/draupadi-with-big-eyes-and-sweet-eyes-chandrashekhar-mishra/ https://www.rashtratak.com/draupadi-with-big-eyes-and-sweet-eyes-chandrashekhar-mishra/#respond Thu, 13 Nov 2025 21:17:23 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1125 तू दुर्गा बनिके अईलू तोहरे बल वीर चलावत भाला। माई सरस्वती तू बनलू तोहरी किरिपा कविता बनि जाला।

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तू दुर्गा बनिके अईलू तोहरे बल वीर चलावत भाला।
माई सरस्वती तू बनलू तोहरी किरिपा कविता बनि जाला।
आठ भुजा नभचुम्बी धुजा नही मैहर मे सीढियाँ चढ़ी जाला।
राउर ऊची अदालत बा बदरा जह से रचिके रही जला।। १ ॥

नही ढोवात अन्हार क भार बा, ताकत बाटे ढोवाई न देते।
झंखत बाटी अजोर बदे दीयरी ढिबरी से छुवाई न देते।
भोर समै पछ्तईबे अकेलई राह अन्हारे देखाई न देते।
बाती अकेली कहाँ ले जरई तनिका भर नेह चुवाई न देते॥ २॥

देखले कबौ न बाटी पढ़ले जरूर बाटी सुनीले कि ऋषि मुनि झूठ नाही बोलेले।
ब्रम्हा बिसुन औ महेश तीनिउ मोहि गईले माई तोर बीन कौन कौन सुर खोलेले।
द्रौपदी बेचारी बाटे खाली एक साड़ी बाटे उहो न बचत बाटे बैरी मिली छोरले।
अस गाढ़ समय मे देखब तोहार हंस हाली-हाली उड़ले कि धीरे-धीरे डोललें॥ ३॥

ना लूटिहई द्रौपदी कतहू मतवा भेजबू जौउ धोती एहां से।
रोज तू सुरुज बोवलू खेत मे रोजई भेजलू जोती एहीं से।
माई रे तोरे असिसन के बल पाउब छंद के मोती एहीं से।
बाटई हमे बिस्वास बड़ा निह्चाई निकले रस सोती एहीं से ॥ ४ ॥

ढोग कविताई क रचाई गैल बाटै तब छोड़ी के दूआरी तोर बोल कहाँ जाई रे।
भाव नाही भाषा नाही छंद रस बोध नाही कलम न बाटै नाही बाटै रोसनाई रे।
कौरव सभा मे आज द्रौपदी क लाज बाटै गाढे में परली बाटै मोर कविताई रे।
हियरा लगाई तनी अचंरा ओढाई लेते लडिका रोवत बा उठाई लेते माई रे ॥ ५ ॥

ओहि दिन पुरहर राष्ट्र धृतराष्ट भैल भागि मे बिधाता जाने काउ रचि गईलें।
नाऊ त धरमराज नाहि बा सरम लाज हाइ राम लाज क जहाज पचि गईलें।
ठाट बाट हारि गईलें राजपाट हारि गईलें आगे अब काउ हारे काउ बची गईलें।
अंत जब द्रौपदी के दाँउ पर धई देले अनरथ देखि हहकार मची गईलें॥ ६ ॥

नाहि ढेर बड़ि बाटै नही ढेर छोटी बाटै नाहि ढेर मोटि बाटै नाहि ढेर पतरी।
छोट छोट दांत बाटै मोती जोति माथ बाटै तनी मनि गोरी बाटै ढेर ढेर सवंरी।
बड़ बड़ बाल बाटै गोल गोल गाल बाटै गोड लाल लाल बाटै लाल लाल अगुँरी।
बड़े बड़े नैन वाली मीठे मीठे बैन वाली द्रौपदी जुआरिन के दाँउ पर बा धरी॥ ७ ॥
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चंद्रशेखर मिश्र

चंद्रशेखर मिश्र

 

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असरानी का निधन: राष्ट्र तक न्यूज़ को जिन्होंने एक्टिंग को बताया था साइंस https://www.rashtratak.com/death-of-asrani-who-called-acting-a-science/ https://www.rashtratak.com/death-of-asrani-who-called-acting-a-science/#respond Tue, 21 Oct 2025 01:49:32 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=994 अभिनेता असरानी का 84 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया है. असरानी के निजी सचिव

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अभिनेता असरानी का 84 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया है. असरानी के निजी सचिव बाबूभाई ने  उनकी मौत की पुष्टि की है.

उन्होंने बताया कि असरानी पिछले चार दिनों से स्वास्थ्य संबंधी शिकायत की वजह से मुंबई के जुहू स्थित आरोग्य निधि अस्पताल में भर्ती थे और सोमवार दोपहर क़रीब 3 से 3.30 बजे के बीच उनका निधन हुआ.

मुंबई के सांताक्रूज़ इलाक़े के शास्त्री नगर स्थित श्मशान भूमि में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया जहां उनके परिवार के सदस्य समेत क़रीबी लोग मौजूद थे.

असरानी 84 साल के थे. उनका पूरा नाम गोवर्धन असरानी था और उनका जन्म साल 1941 में जयपुर में हुआ था.

मौत के कुछ ही घंटों के बाद असरानी के अंतिम संस्कार किए जाने को लेकर पूछे गए सवाल पर असरानी के निजी सचिव बाबूभाई ने बीबीसी हिंदी को बताया कि असरानी ने अपनी पत्नी मंजू से कहा था कि वह नहीं चाहते हैं कि उनकी “मौत सुर्ख़ियों में जगह बनाए और इस पर ज़्यादा हो हल्ला हो और यही वजह है कि असरानी के अंतिम‌ संस्कार के बाद ही उनकी मौत से संबंधित जानकारी सार्वजनिक की गई.”

असरानी के अंतिम संस्कार के वक़्त बेहद क़रीबी लोगों के अलावा उनकी पत्नी मंजू, असरानी की बहन और भतीजे मौजूद थे.

हाल ही में उन्होंने राष्ट्रातक न्यूज़ हिन्दी की ख़ास सिरीज़ ‘कहानी ज़िंदगी की’ में अपने करियर और जीवन से जुड़े कई क़िस्से साझा किए थे.

‘कहानी ज़िंदगी की’ में असरानी ने बताया था कि उनके पिता जयपुर में कार्पेट कंपनी के मैनेजर थे और उनकी पैदाइश से लेकर स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई जयपुर में ही हुई थी.

उन्होंने राष्ट्रातक को बताया था कि मैट्रिक पास करने के बाद ही उन्होंने फ़िल्मों में जाने का मन बना लिया था, लेकिन शुरुआती कोशिशों के बावजूद फ़िल्मी सफ़र शुरू नहीं हो सका. इसके बाद उन्होंने तय किया कि कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद पुणे के फ़िल्म

इंस्टीट्यूट में एक्टिंग सीखेंगे.

उन्होंने दो-तीन साल आकाशवाणी, जयपुर में भी काम किया और फिर पुणे के फ़िल्म इंस्टीट्यूट में एडमिशन लिया.

पुणे में असरानी को मशहूर एक्टिंग टीचर रोशन तनेजा ने पढ़ाया. उनके शब्दों में, “फ़िल्म इंस्टीट्यूट पहुंचने के बाद पता चला कि एक्टिंग के पीछे मेथड होते हैं. ये प्रोफ़ेशन किसी साइंस की तरह है. आपको लैब में जाना पड़ेगा, एक्सपेरिमेंट्स करने पड़ेंगे.”

उन्होंने कहा था कि उन्हें समझ आया कि एक्टिंग में आउटर मेक-अप के अलावा इनर मेक-अप भी बहुत ज़रूरी है.

असरानी ने इंटरव्यू में एक्टर मोतीलाल से मिले सबक़ को भी याद किया था. उन्होंने कहा था, “एक बार एक्टर मोतीलाल गेस्ट के तौर पर पुणे के फ़िल्म इंस्टीट्यूट आए थे. मेरी एक्टिंग की छोटी सी एक्सरसाइज़ देखकर उन्होंने मुझसे पूछा, तुम राजेंद्र कुमार की फ़िल्में बहुत देखते हो. उनकी कॉपी कर रहे हो. हमें फ़िल्मों में कॉपी नहीं चाहिए.”

“ये बहुत बड़ा सबक़ था. मोतीलाल के कहने का मतलब था कि तुम्हारे अंदर जो टैलेंट है, उसे बाहर निकालो.”

फ़िल्मों में पहला मौक़ा

असरानी

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इमेज कैप्शन, फ़िल्म ‘गुड्डी’ में एक छोटे से रोल से हुई थी असरानी के फ़िल्मी करियर की शुरुआत

असरानी ने बताया था कि पुणे के फ़िल्म इंस्टीट्यूट में एडिटिंग सिखाने के लिए डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी आते थे. एक दिन उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी से अपने लिए चांस मांगा था, लेकिन उस दिन बात आगे नहीं बढ़ी थी.

कुछ दिनों बाद ऋषिकेश मुखर्जी ‘गुड्डी’ फ़िल्म में गुड्डी के रोल के लिए एक लड़की की तलाश में फ़िल्म इंस्टीट्यूट आए. उन्होंने असरानी से जया भादुरी के बारे में पूछा और उन्हें बुलाने के लिए कहा. ऋषिकेश मुखर्जी के साथ उस दिन उनकी टीम आई थी, जिनमें राइटर गुलज़ार भी थे.

असरानी ने बताया था, “ऋषिकेश मुखर्जी जया भादुरी से बात करते-करते आगे बढ़ गए, तो मैंने गुलज़ार से अपने लिए छोटे-मोटे रोल की बात की. गुलज़ार ने मुझे गुड्डी फ़िल्म में ही एक छोटे से रोल के बारे में बताया. इसके बाद मैंने ऋषिकेश मुखर्जी से वही रोल मांगा और आख़िरकार बाद में मुझे वो रोल मिल गया.”

वो कहते थे, “फ़िल्म हिट हो गई. तब मनोज कुमार की नज़र मुझ पर पड़ गई. उनको लगा कि इसको भी ले सकते हैं, ऐसे करते-करते चार-पांच फ़िल्में मिल गईं और यहां से मेरा करियर शुरू हुआ.”

‘शोले’ का जेलर और हिटलर की मिसाल

एक्टर असरानी

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इमेज कैप्शन, असरानी ने पुणे के फ़िल्म इंस्टीट्यूट से एक्टिंग की पढ़ाई की

राष्ट्रातक से बातचीत में असरानी ने बताया था कि फ़िल्म शोले में ‘अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर’ का किरदार निभाने के लिए उन्हें हिटलर की मिसाल दी गई थी.

उन्होंने कहा था कि राइटर सलीम-जावेद और डायरेक्टर रमेश सिप्पी ने उन्हें बुलाया था. तब उन्हें न तो शोले के बारे में जानकारी थी और न जेलर के किरदार के बारे में.

उन्होंने बताया था कि, “एक जेलर का किरदार है, जो ख़ुद को बहुत होशियार समझता है, लेकिन वो वैसा है नहीं, इसलिए उसे शोऑफ़ करना पड़ता है कि वो बहुत बढ़िया जेलर है.”

असरानी ने याद किया था, “उन्होंने पूछा, ‘कैसे करेंगे इसको?’ मैंने कहा कि जेलर के कपड़े पहन लेंगे. उन्होंने कहा, ‘नहीं’. उन्होंने सेकंड वर्ल्ड वॉर की किताब खोली, उसमें हिटलर के नौ पोज़ थे.”

हिटलर के पोज़ देखकर असरानी को लगा था कि उन्हें हिटलर का रोल करना है, फिर समझाया गया कि उन्हें हिटलर के बोलने के तरीके पर गौर करना है.

उन्होंने कहा था, “हिटलर की आवाज़ रिकॉर्डेड है और दुनिया के सारे ट्रेनिंग स्कूलों, एक्टिंग कोर्सेज़ में हर स्टूडेंट को वो आवाज़ सुनाई जाती है.”

उन्होंने बताया था कि हिटलर की आवाज़ के उतार-चढ़ाव को उन्होंने शोले में जेलर के डायलॉग में अपनाया था.

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राम राज के नाम पर, रावण हैं चहुँ ओर। धर्म-जाति दानव खड़ा, मुँह बाए पुरजोर।। https://www.rashtratak.com/ravana-is-in-the-name-of-ram-raj-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a3/ https://www.rashtratak.com/ravana-is-in-the-name-of-ram-raj-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a3/#respond Tue, 30 Sep 2025 01:48:33 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=851 घर-घर में रावण हुए, चौराहे पर कंस । बहू-बेटियां झेलती, नित शैतानी दंश ।। मन के रावण दुष्ट का, होगा कब संहार

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  • घर-घर में रावण हुए, चौराहे पर कंस ।
    बहू-बेटियां झेलती, नित शैतानी दंश ।।
  • मन के रावण दुष्ट का, होगा कब संहार ।
    जलते पुतले पूछते, बात यही हर बार ।।
  • पहले रावण एक था, अब हर घर, हर धाम।
    राम नाम के नाम पर, पलते आशाराम।।
  • बैठा रावण हृदय जो, होता है क्या भान।
    मान किसी का कब रखे, सौरभ ये अभिमान।।
  • रावण वध हर साल ही, होते है अविराम।
    पर रावण मन में रहा, सौरभ क्या परिणाम।।
  • हारे रावण अहम तब, मन हो जब श्री राम।
    धीर वीर गम्भीर को, करे दुनिया प्रणाम।।
  • झूठ-कपट की भावना,  द्वेष छल अहंकार।
    सौरभ रावण शीश है, इनका हो संहार।।
  • अंतर्मन से युद्ध कर, दे रावण को मार।
    तभी दशहरे का मने, सौरभ सच त्यौहार।।
  • राम राज के नाम पर, रावण हैं चहुँ ओर।
    धर्म-जाति दानव खड़ा, मुँह बाए पुरजोर।।
  • -प्रियंका सौरभ 
    रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
    कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
    उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)-127045

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मेंढकों के टर्राने से वनराज कभी राह नहीं बदला करते https://www.rashtratak.com/vanraj-never-change-the-path-due-to-the-frogs/ https://www.rashtratak.com/vanraj-never-change-the-path-due-to-the-frogs/#respond Mon, 29 Sep 2025 11:03:45 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=829  जो कहा वो करके दिखाया, जो नहीं कहा वो भी कर दिखाया   सुशील कुमार ‘नवीन‘ आज लिखने

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 जो कहा वो करके दिखाया, जो नहीं कहा वो भी कर दिखाया

 

सुशील कुमारनवीन

आज लिखने का मन बना तो एक पुराना किस्सा याद हो आया। एक अकडूऔर अड़ियल परिवार रेलयात्रा कर रहा था। पतिपत्नी,बेटाबेटी कुल चारसदस्य। टिकट चार थी। कब्जा छह सीट पर किए बैठे थे। कोई सरकने कीकहता तो उलझ पड़ते। एक स्टेशन पर एक पहलवान रेल में सवार हुआ।उसने बैठने के लिए सीट मांगी तो परिवार के मुखिया ने आदतन पहलवान कोझिड़क दिया। पहलवान को गुस्सा आया और उसने एक जोरदार मुक्का हेडऑफ फैमिली के मुंह पर जड़ दिया। मुक्का लगते ही हेड का सिर चकरागया। शेष मेंबर देखते रह गए पर किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि पहलवानको कुछ कह दे।

    पिटाई के शिकार बने हेड ने सोचा कि पहलवान से मुकाबला तो हो हीनहीं सकता। चुप रहा तो घर जाकर पत्नी मजाक उड़ाएगी कि बड़े हीरो बनेफिरते हो। एक मुक्के ने सारी हीरोगिरी निकाल दी। हिम्मत जुटाई औरपहलवान को ललकारा। पहलवान! तुमने मेरे मारा, मैने सहन कर लिया।हिम्मत है तो मेरी पत्नी को मारकर दिखा। फिर बताता हूं। पत्नी कुछ कहपाती, इतनी देर में पहलवान ने उसके मुंह पर एक धर दिया। पत्नी के मुक्कालगते ही हेड चुप बैठ गया।

    अब पत्नी ने सोचा कि पति तो चाल चल गया। बेटा तेरा जरूर मजाकउड़ाएगा कि पापा पर तो अकड़ दिखाती रहती हो। आज एक पहलवान नेतुम्हारी सारी अकड़ ढीली कर दी। दर्द को सहन करती हुई गुस्से में उसनेपहलवान को ऐसे ललकारा मानो अब खैर नहीं। बोलीसुन ले पहलवान! तुमने मेरे पति को मारा, मैं चुप रही। मुझे मारा, चलो यहां तक भी चुप हूं।तुम इतने ही बड़े पहलवान हो तो मेरे बेटे को मारकर दिखाओ वो तेरा एकबार में हो कल्याण कर देगा।

    अब बेटे का चेहरा देखने लायक था। समझ गया कि मम्मी ने उसेफंसा दिया। कुछ बोलता, इससे पहले पहलवान ने उसके भी मुक्का जड़दिया। अब बिना मार खाए सिर्फ बहन बची थी। घर पर तो वह शेरनी बनीरहती है, पापा मम्मी से कई बार पिटवाया हुआ था। आज मौका मिल गया।पहलवान को ललकारा। पहलवान! ये मत समझना कि मेरे मम्मीपापा कोमारकर तुमने कोई बड़ी जंग जीत ली है। वे तो शरीफ हैं , पर मैं ऐसा नहीं हूं।तेरा इलाज पक्का होगा। इससे पहले तू मेरी शेरनी बहन को मारकर दिखा।एक झटके में तेरा काम कर दें, तो फिर कहना। बहन कुछ समझ पातीइससे पहले एक मुक्का उसे भी जा लगा। अब चारों पिटाई के मामले मेंबराबर हो चुके थे। अब डिब्बे में सन्नाटा था।

    पहलवान को सीट मिल गई। तीनचार स्टेशन के बाद वह उतर गया।साइड की सीट पर बैठे बुजुर्ग ने हेड को कहाभले मानस, तुम तो पिट लिएथे, ये सारे घर वाले क्यों पिटवाए। सीट पहले ही उसे दे देते। कम से कमइन्हें तो मार नहीं पड़ती। जवाब मिला कि बाबा! अगर मैं अकेला पिट जातातो घर जाकर ये सब मेरा मजाक उड़ाते। अब अब पिट गए हैं तो कोई किसीका मजाक नहीं बनाएगा।

     कुछ ऐसा ही इस बार एशिया कप में पाकिस्तान के साथ हुआ है। टीमकी तो जलालत तीनों मैचों में हुई ही है,जाते जाते उनके बोर्ड मुखिया भीकरवा गए। अब अब बराबर हो गए हैं कोई किसी को कुछ नहीं कहेगा।महाभारत में महात्मा विदुर ने कहा है

कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्विंसिते प्रतिहिंसितम्।

तत्र दोषं पश्यामि शठे शाठ्यं समाचरेत्॥

भाव है कि जो जैसा करता है, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए।हिंसा करता है, तो हिंसा करनी चाहिए। यदि दुष्ट(शठ) के साथदुष्टता(शठता) की जाए, तो इसमें कोई दोष नहीं माना जाता।

      एशिया कप की शुरुआत से ही भारत इस बार पाकिस्तान के खिलाफमुखर रहा है। टूर्नामेंट में खेलने या खेलने पर भी अंतिम समय तक संशयथा। खेलते तो सीधा फायदा पाकिस्तान को होना था। जो भारत के हरक्रिकेट प्रेमी को नागवार गुजरता। इसलिए इस बार कुछ अलग ही खेलखेलना तय हुआ। उधर, एशिया कप की शुरुआत से पहले दूसरी तरफ सेबयानबाजी जोरों पर थी, हम ये कर देंगे, वो कर देंगे। बुमराह की छह की छहगेंदों पर छक्के मारेंगे। हमारे आफरीदी के आगे बुमराह कुछ नहीं है। कप परहमारा हक है। इसे हम हर हाल में जीतकर लौटेंगे। पर दावा भारत के साथपहले ही मैच में फुस्स हो

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:“खामोशी का असर: परिवार और समाज पर संवादहीनता का बोझ” https://www.rashtratak.com/effect-of-silence-the-burden-of-communication-on-family-and-society/ https://www.rashtratak.com/effect-of-silence-the-burden-of-communication-on-family-and-society/#respond Mon, 22 Sep 2025 15:15:52 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=755 खामोशी का असर: परिवार और समाज पर संवादहीनता का बोझ” आज के व्यस्त और डिजिटल जीवन में संवादहीनता

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खामोशी का असर: परिवार और समाज पर संवादहीनता का बोझ”
आज के व्यस्त और डिजिटल जीवन में संवादहीनता परिवार और समाज की बड़ी चुनौती बन गई है। बातचीत की कमी भावनात्मक दूरी, गलतफहमियाँ और मानसिक तनाव बढ़ाती है। परिवार में बच्चे और बड़े एक-दूसरे की भावनाओं को साझा नहीं कर पाते, जबकि समाज में सहयोग और सामूहिक प्रयास कमजोर पड़ते हैं। इसका समाधान नियमित संवाद, साझा गतिविधियाँ, सकारात्मक सुनना और डिजिटल सीमाएँ तय करना है। संवादिता केवल बातचीत नहीं, बल्कि विश्वास, समझ और संबंधों की नींव है। इसे प्राथमिकता देकर हम परिवार और समाज को मजबूत और भावनात्मक रूप से स्वस्थ बना सकते हैं।
– डॉ सत्यवान सौरभ
आज का समय बहुत तेजी से बदल रहा है। तकनीकी प्रगति और व्यस्त जीवनशैली ने हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ ही एक गंभीर समस्या भी सामने आई है – संवाद हीनता। संवाद हीनता का अर्थ है बातचीत और विचारों के आदान-प्रदान की कमी। यह केवल शब्दों की कमी नहीं है, बल्कि एक ऐसी स्थिति है जिसमें लोग अपनी भावनाओं, समस्याओं और अनुभवों को साझा नहीं कर पाते। परिवार, मित्रता और समाज सभी पर इसका गहरा असर पड़ता है।
परिवार जीवन का वह आधार है जहाँ बच्चे और बड़े अपने अनुभव साझा करते हैं और आपसी समझ विकसित करते हैं। लेकिन आज, व्यस्त जीवन, डिजिटल साधनों का अधिक प्रयोग और पीढ़ियों के अंतर ने पारिवारिक संवादिता को कमजोर कर दिया है। माता-पिता अपने काम और जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त रहते हैं कि बच्चों के साथ समय बिताना मुश्किल हो जाता है। वहीं, बच्चे स्कूल, कोचिंग और मोबाइल की दुनिया में उलझे रहते हैं। परिणामस्वरूप, घर में बैठकर खुलकर बातचीत करना लगभग कम होता जा रहा है।
डिजिटल दुनिया ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसके दुष्परिणाम भी हैं। स्मार्टफोन, टीवी और सोशल मीडिया ने परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे से दूर कर दिया है। युवा सदस्य अधिक समय इन माध्यमों में व्यतीत करते हैं और आमने-सामने संवाद कम हो जाता है। ऐसे संवाद अक्सर सतही हो जाते हैं और भावनाओं की गहराई को व्यक्त नहीं कर पाते।
पीढ़ियों का अंतर भी संवाद में बाधा डालता है। बुजुर्ग अनुभव और परंपरा पर भरोसा करते हैं, जबकि युवा आधुनिक दृष्टिकोण और स्वतंत्रता की ओर अधिक झुकाव रखते हैं। यह अंतर कभी-कभी परिवार में गलतफहमी और असहमति को जन्म देता है। छोटे-छोटे झगड़े या आलोचना भी भावनात्मक दूरी बढ़ा देती है और परिवार में मानसिक तनाव उत्पन्न करती है।
संवाद हीनता केवल परिवार तक सीमित नहीं है। समाज में भी लोग अपनी राय, शिकायत या सुझाव साझा नहीं करते। इससे सहयोग और सामूहिक प्रयास कमजोर पड़ते हैं और गलतफहमियाँ बढ़ती हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी मोहल्ले में सफाई या सुरक्षा संबंधी समस्या को साझा नहीं किया जाता, तो समाधान कठिन हो जाता है और विवाद पैदा हो सकते हैं।
संवाद हीनता के कई कारण हैं। व्यस्त जीवनशैली, डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक उपयोग, डर या शर्म की भावना, मानसिक तनाव, सामाजिक दूरी और पीढ़ियों के बीच अंतर—ये सभी मिलकर लोगों को खुलकर संवाद करने से रोकते हैं। इसके नकारात्मक प्रभाव व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर दिखाई देते हैं। व्यक्ति में अकेलापन और मानसिक तनाव बढ़ता है, आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है। परिवार में विश्वास और समझ की कमी होती है। समाज में सहयोग और सामूहिक प्रयास कम हो जाते हैं।
इस समस्या को दूर करने के लिए कुछ उपाय अपनाए जा सकते हैं। सबसे पहले, नियमित संवाद का समय निर्धारित करना जरूरी है। परिवार के साथ भोजन, चाय या वीकेंड पर बातचीत को प्राथमिकता दी जा सकती है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है सुनने और समझने की आदत। आलोचना से बचकर, एक-दूसरे की बात ध्यानपूर्वक सुनना और समझना संवादिता को बढ़ाता है। तीसरी बात है साझा गतिविधियों का महत्व। खेल, यात्रा, हॉबीज़ या सामाजिक कार्यों में परिवार और दोस्तों को शामिल करने से संवाद प्राकृतिक रूप से बढ़ता है।
डिजिटल उपकरणों का संतुलित उपयोग भी जरूरी है। मोबाइल और टीवी से समय निकालकर आमने-सामने बातचीत को प्राथमिकता देना चाहिए। साथ ही, अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करना भी आवश्यक है। डर या शर्म के कारण अपनी भावनाओं को दबाना संवादिता को और कमजोर करता है। बच्चों को भी अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
संक्षेप में, संवादिता जीवन का वह आधार है जो रिश्तों, विश्वास और सहयोग को मजबूत करती है। संवाद हीनता केवल बातचीत की कमी नहीं है, बल्कि परिवार और समाज की संरचना को प्रभावित करने वाली गंभीर समस्या है। इसे समय रहते पहचानना और समाधान करना आवश्यक है। खुली बातचीत, सकारात्मक सुनना और साझा गतिविधियाँ न केवल परिवार और समाज को मजबूती देती हैं, बल्कि व्यक्तिगत विकास और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं।
आज की चुनौती यह है कि हम अपनी व्यस्तता, डिजिटल साधनों और पीढ़ियों के अंतर के बावजूद संवादिता को प्राथमिकता दें। संवादिता ही वह माध्यम है जो हमें एक-दूसरे के करीब लाती है, समझ को गहरा करती है और समाज में सामूहिक सहयोग को बढ़ावा देती है। परिवार और समाज तभी सशक्त रह सकते हैं जब संवादिता मौजूद हो और इसे बढ़ावा दिया जाए। यही हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता और जिम्मेदारी है।

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लघु कथा “दस दिन का अहम” https://www.rashtratak.com/short-story-is-important-of-ten-days/ https://www.rashtratak.com/short-story-is-important-of-ten-days/#respond Sat, 16 Aug 2025 19:53:19 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=531 बड़ा भाई छठी कक्षा से ही घर संभालने लगा था। पिता ज़िम्मेदारियों से बचते रहे, तो घर चलाने

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बड़ा भाई छठी कक्षा से ही घर संभालने लगा था। पिता ज़िम्मेदारियों से बचते रहे, तो घर चलाने की जिम्मेदारी उसी पर आ गई। दिन में पढ़ाई और शाम को ट्यूशन पढ़ाकर उसने न केवल अपनी पढ़ाई की, बल्कि छोटे भाई की फीस और बहनों की ज़रूरतें भी पूरी कीं। बहनों के कपड़े, किताबें, दवाई—सब कुछ उसकी कमाई से आता।
समय के साथ बड़ा हुआ, नौकरी मिली तो सबसे पहले घर की जर्जर दीवारें बनवाईं, पक्का मकान खड़ा किया, गाड़ी खरीदी। घर का हर छोटा-बड़ा काम उसकी तनख्वाह और पत्नी के सहयोग से चलता रहा। पत्नी की FD भी परिवार की ज़रूरतों में टूट गई। जब पत्नी की नौकरी लगी, तो उसका वेतन भी घर के खर्चों में लगा दिया गया।
फिर एक दिन छोटा भाई भी नौकरी पर लग गया। बड़े भाई को लगा अब घर का बोझ आधा हो जाएगा। पर कुछ ही दिनों में छोटे के स्वभाव में बदलाव आने लगा। उसने गिनाना शुरू कर दिया—“मैंने इतना दिया, मैंने उतना किया।” अहंकार धीरे-धीरे उसके शब्दों और व्यवहार में उतर आया।
बड़ों ने यह सब देखा, लेकिन चुप रहे। सास-ससुर ने छोटे को कभी नहीं टोका़। बात यहीं तक नहीं रही—गालियाँ देना, अपमानजनक बातें कहना आम हो गया। शादी के बाद तो हालात और बिगड़े। एक दिन छोटा भाई, उसी बड़े भाई का गला पकड़ चुका था, जिसने बचपन से उसे अपने कंधों पर बिठाकर रखा था।
बड़े भाई ने कुछ नहीं कहा। वह बस चुप रहा।
उसके मन में यही चल रहा था—
“सालों का साथ, त्याग और प्रेम… सब कुछ सिर्फ़ दस दिनों के अहम में हार गया।”

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कहानी: डिजिटल राखी लेखिका: डॉ. सत्यवान सौरभ https://www.rashtratak.com/story-digital-rakhi-writer-dr-satyavan-saurabh/ https://www.rashtratak.com/story-digital-rakhi-writer-dr-satyavan-saurabh/#respond Thu, 07 Aug 2025 07:04:53 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=448 रक्षाबंधन की सुबह थी। मुंबई के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहने वाली श्रद्धा की आँखें अलार्म के

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रक्षाबंधन की सुबह थी। मुंबई के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहने वाली श्रद्धा की आँखें अलार्म के तीसरी बार बजने के बाद खुलीं। खिड़की से बाहर झाँका तो बादलों से ढका आसमान और हल्की फुहारें उसके मन की हलचल से मेल खा रही थीं। लेकिन आज कुछ अलग था—आज रक्षाबंधन था।
श्रद्धा की माँ हर साल इस दिन पर घर को फूलों से सजाती थीं, मिठाई बनती थी, और भाई को तिलक लगाकर राखी बाँधने के बाद आरती उतारी जाती थी। लेकिन इस बार सब कुछ बदल चुका था। अब वह अकेली थी। माँ-पापा को गए हुए दो साल हो चुके थे, और भाई ऋषभ अमेरिका में था।
श्रद्धा ने अपने मोबाइल पर व्हाट्सएप खोला और भाई को “हैप्पी राखी भैया” का मैसेज भेज दिया। थोड़ी देर बाद उसने अपने लैपटॉप पर ज़ूम मीटिंग का लिंक खोल लिया — यह ऑफिस मीटिंग नहीं, भाई के साथ एक वर्चुअल राखी सेरेमनी की थी।
लिंक पर क्लिक करते ही स्क्रीन पर ऋषभ की मुस्कुराती हुई शक्ल आई।
“हाय दीदी! कैसी हो?”
“ठीक हूँ भैया… तुम्हें राखी की ढेर सारी शुभकामनाएं।” श्रद्धा ने कैमरे के सामने एक राखी दिखाई, और फिर पास रखे एक छोटे से थाल में तिलक, चावल और मिठाई का इंतज़ाम कर लिया।
ऋषभ मुस्कुराया, “इस बार कुछ खास किया है मैंने।”
“क्या?”
“तूने जो राखी मुझे मेल से भेजी थी, वो मैंने 3D प्रिंटर से प्रिंट की… और फिर उसको फ्रेम में लगवा लिया। मेरे वर्कडेस्क पर है।”
श्रद्धा की आँखें भीग गईं। उसने जानबूझ कर राखी इस बार अमेरिका भेजी थी, भले ही हर साल भाई मना करता था। आज पहली बार उसे लगा कि डिजिटल दूरी के बावजूद रिश्ता ज़िंदा है।
श्रद्धा ने तिलक किया, मिठाई खिलाई (स्क्रीन पर ही सही), और राखी बाँधी। ऋषभ ने भी डिजिटल गिफ्ट कार्ड भेजा, साथ में एक लंबा सा ईमेल:
> “दीदी, हर साल तेरा बिना बोले सब कुछ समझ जाना, मेरी छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुरा देना, और बिना कहे ही मेरी दुनिया को ठीक कर देना…
इन सबका कोई मोल नहीं है।
मैं जानता हूँ, तू अब अकेली है। पापा-मम्मी के जाने के बाद ये त्यौहार भी जैसे बेमानी हो गया था, लेकिन तूने कभी मुझे फील नहीं होने दिया।
तू मेरी सबसे बड़ी ताक़त है। राखी केवल धागा नहीं है, ये एक वादा है — कि चाहे मैं कितनी भी दूर रहूँ, तुझे हमेशा अपनी हिफाज़त में रखूँगा।
और हाँ… अगली बार राखी पर मैं इंडिया आ रहा हूँ। रियल राखी के लिए।
– तेरा ऋषभ”
श्रद्धा की आँखों से आँसू बह निकले। उसके मन की सूनी राखी अचानक सबसे खूबसूरत हो गई।
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श्रद्धा एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर डिजाइनर थी। वह अपने काम में माहिर थी, आत्मनिर्भर और संवेदनशील भी। लेकिन हर बार रक्षाबंधन आते ही वह एक बच्ची बन जाती थी। माँ के हाथों की बनी खीर, पापा की शरारतें, और ऋषभ का मिठाई के लिए जिद करना — ये सब यादें आज भी ताज़ा थीं।
आज उसने ऑफिस से छुट्टी ली थी। एक ओर ज़ूम कॉल से भाई को राखी बाँध दी थी, पर दिल का कोना अब भी अधूरा था। वह बालकनी में बैठी थी, आसमान की ओर देख रही थी।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
“कौन हो सकता है?” उसने मन में सोचा।
दरवाज़ा खोला तो सामने डिलीवरी बॉय खड़ा था। हाथ में एक खूबसूरत पैकेट था।
“मैम, यह आपके लिए अमेरिका से है।”
श्रद्धा ने हस्ताक्षर किए और पैकेट खोला। उसमें एक छोटा सा म्यूजिकल बॉक्स था। जैसे ही उसने ढक्कन खोला, एक प्यारी सी धुन बजने लगी — वही गाना जो वो और ऋषभ बचपन में मिलकर गाते थे: “फूलों का तारों का, सबका कहना है, एक हज़ारों में मेरी बहना है”—
बॉक्स के अंदर एक पेंडेंट था, जिसमें उनके बचपन की फोटो जड़ी थी, और एक छोटा सा कार्ड:
> “दीदी,
यह हमारे बचपन की आवाज़ है। ताकि जब भी तू खुद को अकेला महसूस करे, यह तुझे याद दिला दे कि मैं हमेशा तेरे साथ हूँ।
– ऋषभ”
श्रद्धा ने वह पेंडेंट अपने गले में पहन लिया। वह अब मुस्कुरा रही थी, और उस मुस्कुराहट में आँसू भी थे, सुकून भी।
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शाम को श्रद्धा अपनी कॉलोनी के बच्चों के साथ मिलकर एक छोटा-सा राखी समारोह आयोजित करती है। वह जानती है कि बहुत से बच्चे ऐसे हैं जिनके भाई दूर रहते हैं या हैं ही नहीं। वह उन बच्चों को राखी बाँधने का अवसर देती है और उन्हें बताती है कि भाई-बहन का रिश्ता केवल खून का नहीं होता, भावनाओं का भी होता है।
वहाँ एक छोटी बच्ची, सिम्मी, उससे पूछती है, “दीदी, अगर मेरा कोई भाई नहीं है तो क्या मैं किसी को राखी नहीं बाँध सकती?”
श्रद्धा मुस्कुरा कर कहती है, “तू जिसे अपना मीत समझे, उसे राखी बाँध सकती है। रक्षा का रिश्ता प्यार का होता है, खून का नहीं।”
वह बच्ची अपनी एक सहेली को राखी बाँधती है और सब तालियाँ बजाते हैं। श्रद्धा की आँखों में चमक थी। उसने महसूस किया कि रक्षाबंधन अब केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं, यह एक सामाजिक भावना बन गया है — एक-दूसरे की रक्षा का संकल्प।
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रात को जब श्रद्धा ने अपने कमरे की लाइट बंद की, तो दीवार पर उस पेंडेंट की छाया थी। जैसे उसकी स्मृतियाँ अब भी उसके पास थीं। मोबाइल पर ऋषभ का एक और मैसेज आया:
> “दीदी, अगली बार जब तू राखी बाँध रही होगी, मैं तेरे सामने बैठा रहूँगा… कोई स्क्रीन नहीं, कोई दूरी नहीं।”
श्रद्धा ने रिप्लाई किया:
> “मैं इंतज़ार करूँगी, भैया। इस बार राखी सिर्फ डिजिटल नहीं होगी… असली होगी, गर्माहट के साथ।”
वह मुस्कुराई, और चैन से सो गई।
सीख: रिश्ते बदलते दौर के साथ अपने रूप बदल सकते हैं, लेकिन उनकी आत्मा हमेशा वही रहती है। डिजिटल दुनिया में भी अगर भावनाएँ सच्ची हों, तो दूरी कोई मायने नहीं रखती। रक्षाबंधन केवल एक धागा नहीं, वह विश्वास की डोर है, जो हर दिल से जुड़ सकती है।

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