राजनीति Archives - Rashtra Tak Hindi Monthly Magazine Sat, 25 Apr 2026 04:05:54 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://www.rashtratak.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-cropped-WhatsApp-Image-2025-05-08-at-2.40.25-PM-32x32.jpeg राजनीति Archives - Rashtra Tak 32 32 राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी छोड़ी, बीजेपी में शामिल होने पर आम आदमी पार्टी ने क्या कहा https://www.rashtratak.com/raghav-chaddha-left-aam-aadmi-party-and-joined-bjp/ Sat, 25 Apr 2026 03:51:17 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2200 राज्यसभा में सांसद राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी (आप) छोड़कर बीजेपी में शामिल होने का एलान किया

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राज्यसभा में सांसद राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी (आप) छोड़कर बीजेपी में शामिल होने का एलान किया है.

शुक्रवार को संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ प्रेस कांफ्रेंस कर राघव चड्ढा ने कहा, “हमने तय किया है कि हम, राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के दो तिहाई सदस्य संविधान के प्रावधानों के अनुसार बीजेपी में शामिल हो रहे हैं.”

आम आदमी पार्टी ने बीजेपी की आलोचना करते हुए इसे ‘ऑपरेशन लोटस’ करार दिया.

जबकि आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने ताज़ा घटनाक्रम को लेकर एक्स पर राघव चड्ढ का नाम लिए बिना सिर्फ़ इतना लिखा, “बीजेपी ने फिर से पंजाबियों के साथ किया धक्का.”

आम आदमी पार्टी ने इस महीने की शुरुआत में राज्यसभा में पार्टी के डिप्टी लीडर की ज़िम्मेदारी राघव चड्ढा की जगह अशोक कुमार मित्तल को दे दी थी. तब राघव चड्ढा ने कहा था कि वह जनहित के मुद्दे उठाते रहे हैं और सवाल पूछा कि इससे आम आदमी पार्टी का क्या नुक़सान हुआ होगा.

मैं माननीय राज्यसभा सभापति को एक पत्र प्रस्तुत करूँगा, जिसमें राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक को भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने के कारण राज्यसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित करने की मांग की जाएगी, क्योंकि यह संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता त्यागने के समान है.”

राघव चड्ढा और संदीप पाठक ने क्या कहा?

राघव चड्ढा का कोट

राघव चड्ढा ने कहा, “आम आदमी पार्टी, जिसे मैंने अपने खून पसीने से सींचा और जिसे मैंने अपनी युवावस्था के 15 साल दिए, वह अब अपने सिद्धांतों, मूल्यों और बुनियादी नैतिकताओं से पूरी तरह भटक चुकी है. अब यह पार्टी देश या राष्ट्रीय हित के लिए काम नहीं कर रही है, बल्कि निजी स्वार्थ के लिए काम कर रही है.”

उन्होंने कहा, “आप में से कई लोग पिछले कुछ वर्षों से मुझसे यह कहते आ रहे हैं, और मैंने भी व्यक्तिगत रूप से यह महसूस किया है कि मैं सही आदमी हूं, लेकिन ग़लत पार्टी में हूँ. मैं दोहराता हूँ, ‘मैं सही आदमी हूँ, लेकिन गलत पार्टी में हूं.’ इसलिए, आज मैं घोषणा करता हूँ कि मैं आम आदमी पार्टी से खुद को अलग कर रहा हूँ और जनता के पास जा रहा हूं.”

पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए राघव चड्ढा ने कहा, “राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 10 सांसद हैं. इनमें से दो-तिहाई से ज़्यादा हमारे साथ हैं. उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए हैं और आज सुबह हमने हस्ताक्षरित पत्र और दस्तावेज़ राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए. इनमें से तीन यहां आपके सामने मौजूद हैं. हमारे अलावा हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रमजीत सिंह साहनी और स्वाति मालीवाल शामिल हैं.”

राघव चड्ढा के साथ प्रेस कांफ्रेंस में शामिल सांसद संदीप पाठक ने बताया “मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं सोचा था कि ऐसी स्थिति आएगी

पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए राष्ट्र तक के स्वतन्त्र पत्रकार राज कुमार चाँद से राघव चड्ढा ने कहा, “राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 10 सांसद हैं. इनमें से दो-तिहाई से ज़्यादा हमारे साथ हैं. उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए हैं और आज सुबह हमने हस्ताक्षरित पत्र और दस्तावेज़ राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए. इनमें से तीन यहां आपके सामने मौजूद हैं. हमारे अलावा हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रमजीत सिंह साहनी और स्वाति मालीवाल शामिल हैं.”

राघव चड्ढा के साथ प्रेस कांफ्रेंस में शामिल सांसद संदीप पाठक ने बताया कि “मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं सोचा था कि ऐसी स्थिति आएगी लेकिन ऐसा हुआ. मैं पिछले 10 सालों से इस पार्टी का हिस्सा था. आज मैं आम आदमी पार्टी (आप) से अपना रास्ता अलग कर रहा हूं.”

“जब किसी पार्टी से जुड़ने की बात आई, तो मैंने ‘आप’ इसलिए जॉइन की क्योंकि वह नई राजनीति और काम की राजनीति की बात करती थी. पिछले 10 सालों में मैंने पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम किया. मैंने जो भी राजनीतिक फैसले लिए, वे हमेशा पार्टी के हित को सबसे ऊपर रखकर लिए. आज मैं भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो रहा हूँ और ‘आप’ में अपने सभी पदों से इस्तीफ़ा दे रहा हूं.”

आम आदमी पार्टी ने बताया ‘ऑपरेशन लोटस’

लेकिन ऐसा हुआ. मैं पिछले 10 सालों से इस पार्टी का हिस्सा था. आज मैं आम आदमी पार्टी (आप) से अपना रास्ता अलग कर रहा हूं.”

“जब किसी पार्टी से जुड़ने की बात आई, तो मैंने ‘आप’ इसलिए जॉइन की क्योंकि वह नई राजनीति और काम की राजनीति की बात करती थी. पिछले 10 सालों में मैंने पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम किया. मैंने जो भी राजनीतिक फैसले लिए, वे हमेशा पार्टी के हित को सबसे ऊपर रखकर लिए. आज मैं भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो रहा हूँ और ‘आप’ में अपने सभी पदों से इस्तीफ़ा दे रहा हूं.”

आम आदमी पार्टी ने बताया ‘ऑपरेशन लोटस’

कैप्शन, राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा में नेता और नेशनल मीडिया प्रभारी संजय सिंह ने शुक्रवार शाम चार बजे प्रेस कांफ्रेंस करराघव चड्ढा समेत पार्टी के 7 सांसदों के बीजेपी में शामिल होने को ‘ऑपरेशन लोटस’ करार दिया.

संजय सिंह ने कहा, “आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को विधायक, सांसद बनाया. सब कुछ दिया लेकिन उन्होंने पार्टी के साथ विश्वासघात किया. पंजाब के लोग उन्हें कभी माफ़ नहीं करेंगे.”

उन्होंने कहा, “राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, राजेंद्र गुप्ता, विक्रमजीत साहनी, संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह को आप और जनता ने ज़मीन से उठाकर संसद में पहुंचाया. इन सातों ने पंजाब की जनता की पीठ में छुरा घोंपा है, धोखा दिया है. भगवंत मान की सरकार को धोखा दिया है.”

उन्होंने कहा, “भगवंत मान सरकार अच्छा काम कर रही है इसलिए ऑपरेशन लोटस खेला जा रहा है, ईडी-सीबीआई का इस्तेमाल किया जा रहा है. अशोक मित्तल के घर दो-चार दिन पहले ईडी का छापा पड़ा, भय दिखाया और तोड़ लिया.”

उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “यह ऑपरेशन लोटस है, अमित शाह, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पंजाब के लोगों को धोखा देने के लिए है चलाया गया है.”

पंजाब सीएम भगवंत मान ने क्या कहा

भगवंत मान
इमेज कैप्शन, पंजाब के सीएम भगवंत मान ने कहा कि ‘लोग नहीं पार्टी बड़ी होती है’

राघव चड्ढा के दो-तिहाई सांसदों के बीजेपी में विलय करने का एलान करने के बाद और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने शुक्रवार शाम प्रेस कॉन्फ़्रेंस की.

उन्होंने कहा, “पार्टी बड़ी होती है, संगठन बड़ा होता है, लोग बड़े नहीं होते हैं. ये 6-7 लोग जो गए हैं, वो पंजाब नहीं हैं. ये गद्दार हैं. पंजाबियों के गद्दार हैं. बैठे-बिठाए गद्दी मिल गई, इन्हें वोट तो मांगने नहीं पड़े. न कहीं हाथ जोड़ने पड़े, न कहीं गलियों में जाकर लोगों के मुद्दों पर बात करनी पड़े. बस बनी-बनाई सीट मिल गई, चलो जी वहां राज्यसभा में जाकर तिकड़मबाजियां करने लगे.”

“होना इनका वहां भी कुछ नहीं है, क्योंकि वह बीजेपी है. वह रंग लगाकर छोड़ देते हैं. कैप्टन साहब खुद बोलते हैं कि मुझे कोई नहीं पूछता. मैंने मनप्रीत बादल का कभी नाम नहीं सुना. बिट्टू का थोड़ा चलता है, उसे मंत्री बना दिया है. जिस दिन उन्हें पता चलेगा कि उनकी पंजाब में नहीं चलती है, उस दिन उन्हें भी बाहर कर देंगे.”

केजरीवाल के भरोसेमंद रणनीतिकार थे कभी

राघव चड्ढा और अरविंद केजरीवाल
इमेज कैप्शन, राघव चड्ढा और अरविंद केजरीवाल

साल 2013 में जब अन्ना हज़ारे का इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन अपने आख़िरी दौर में था, तभी राघव चड्ढा की मुलाकात अरविंद केजरीवाल से हुई.

पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट राघव चड्ढा राघव उस समय लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई कर के भारत लौटे थे.

डेली ओ की एक रिपोर्ट के अनुसार राघव चड्ढा का पार्टी में पहला असाइनमेंट दिल्ली जनलोकपाल बिल का ड्राफ़्ट तैयार करने वाले अधिवक्ता राहुल मेहरा को असिस्ट करना था. उन्हें ये ज़िम्मेदारी अरविंद केजरीवाल ने सौंपी थी.

राघव चड्ढा पार्टी के सबसे युवा प्रवक्ता बने और कुछ ही समय में राघव चड्ढा टेलीविज़न पर आम आदमी पार्टी का चेहरा बन चुके थे.

आम आदमी पार्टी की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार राघव साल 2013 में आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र बनाने वाली टीम के सदस्य थे. कुछ समय के लिए वह पार्टी के कोषाध्यक्ष भी बनाए गए.

एक दशक पहले एक वॉलंटियर के तौर पर अरविंद केजरीवाल की टीम में शामिल हुए राघव चड्ढा अब उनके सबसे भरोसेमंद रणनीतिकारों में गिने जाते हैं.

साल 2019 में राघव चड्ढा दक्षिणी दिल्ली की संसदीय सीट पर चुनाव लड़े, लेकिन असफल रहे. इसके बाद 2020 विधानसभा चुनाव में उन्होंने दिल्ली की राजेंद्र नगर सीट से जीत दर्ज की.

मार्च 2022 में राघव चड्ढा और चार अन्य लोगों को आम आदमी पार्टी ने पंजाब से राज्यसभा के लिए मनोनीत किया. उस समय राघव चड्ढा 33 साल के थे और सबसे युवा सांसद बने.

ये माना जाता है कि साल 2022 में पंजाब में मिली आम आदमी पार्टी की बड़ी जीत में राघव चड्ढा ने अहम भूमिका निभाई. पंजाब की सफलता को देखते हुए ही पार्टी ने उन्हें 2022 के आख़िर में गुजरात विधानसभा चुनाव की भी ज़िम्मेदारी सौंपी और सह प्रभारी बनाया.

 

दिल्ली विधान सभा सदस्य श्री तिलक राज गुप्ता को राष्ट्र समाज पत्रिका भेट करते हुए

 

 

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Lenskart के बाद अब एअर इंडिया निशाने पर, केबिन क्रू के लिए ‘नो सिंदूर, नो बिंदी’ नियम से भड़के लोग https://www.rashtratak.com/after-lenskart-now-air-india-on-target/ Tue, 21 Apr 2026 08:16:04 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2192 सोशल मीडिया यूजर्स ने एअर इंडिया के केबिन क्रू हैंडबुक के कथित पन्नों के स्क्रीनशॉट वायरल कर दिए,

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सोशल मीडिया यूजर्स ने एअर इंडिया के केबिन क्रू हैंडबुक के कथित पन्नों के स्क्रीनशॉट वायरल कर दिए, जिनमें केबिन क्रू के लिए शादी का चूड़ा, मंगलसूत्र, बिंदी, सिंदूर, टीका (तिलक) और कलावा जैसी हिंदू परंपरागत चीजें पहनने पर रोक बताई गई है।

नई दिल्ली। लेंसकार्ट के ड्रेस कोड विवाद के महज कुछ दिनों बाद, देश की प्रमुख एयरलाइन एअर इंडिया अब इसी तरह के विवाद में फंस गई है।

सोशल मीडिया यूजर्स ने एअर इंडिया के केबिन क्रू हैंडबुक के कथित पन्नों के स्क्रीनशॉट वायरल कर दिए, जिनमें केबिन क्रू के लिए शादी का चूड़ा, मंगलसूत्र, बिंदी, सिंदूर, टीका (तिलक) और कलावा जैसी हिंदू परंपरागत चीजें पहनने पर रोक बताई गई है।

एक्स पर यूजर प्रणव महाजन ने कई स्क्रीनशॉट शेयर किए, जिनमें लिखा था कि ड्यूटी के दौरान बिंदी, सिंदूर, तिलक और कलावा पहनना मना है। पोस्ट तेजी से वायरल हुई और हजारों यूजर्स ने तीखी प्रतिक्रियाएं दीं।

कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि जब मुस्लिम देशों की एयरलाइंस में हिजाब की अनुमति है, तो भारत की राष्ट्रीय एयरलाइन क्यों हिंदू प्रतीकों पर रोक लगा रही है? कुछ ने इसे हिंदू-विरोधी भावना से जोड़ा, जबकि अन्य ने लेंसकार्ट विवाद से तुलना की।

हिजाब, पगड़ी पहन सकते हैं, तिलक, कलावा-सिंदूर बैन विवाद पर लेंसकार्ट के संस्थापक पियूष बंसल ने दी सफाई
लेंसकार्ट (Lenskart) के ड्रेस कोड (ग्रूमिंग पॉलिसी) को लेकर हाल ही में एक बड़ा विवाद खड़ा हुआ है, जिसमें कर्मचारियों के हिंदू धार्मिक प्रतीकों जैसे सिंदूर, बिंदी, तिलक और कलावा पहनने पर रोक लगाने की बात सामने आई थी, जबकि हिजाब और काली पगड़ी की अनुमति थी। इस फरमान पर भारी आक्रोश और सोशल मीडिया पर बॉयकॉट की मांग के बाद कंपनी ने सफाई दी है।

एअर इंडिया का स्पष्टीकरण

विवाद बढ़ने पर एअरइंडिया ने सफाई दी है। एयरलाइन का कहना है कि वायरल हो रहे स्क्रीनशॉट पुराने दस्तावेज से लिए गए हैं और वर्तमान में लागू नहीं हैं। प्रवक्ता ने बताया कि कर्मचारियों को बिंदी लगाने की पूरी अनुमति है और कंपनी किसी भी धार्मिक प्रतीक पर रोक नहीं लगाती।

हालांकि, सोशल मीडिया पर यूजर्स अभी भी पुरानी 2022 की ग्रूमिंग गाइडलाइंस का हवाला दे रहे हैं, जिसमें बड़े बिंदी, सिंदूर, कलावा और डिजाइन वाली चूड़ियों पर सख्ती थी।

भारत की प्रमुख ओम्नीचैनल आईवियर (चश्मा) रिटेल चेन लेंसकार्ट ने कंपनी के ड्रेसकोड विवा पर सफाई पेश की है। कंपनी के संस्थापक और सीईओ पियूष बंसल ने 12 घंटे बाद एक्स पर एक और बड़ी पोस्ट साझा करके अपना पक्ष रखा है। कंपनी एक स्टाइल गाइड को लेकर आलोचना का सामना कर रही थी। जिसमें हिजाब-पगड़ी को पहनने की अनुमति दी गई थी लेकिन कलावा, सिंदूर पर रोक लगाई गई थी।

मामले से जुड़ी मुख्य बातें 
  • विवादित पॉलिसी: कंपनी के ‘स्टाइल गाइड’ दस्तावेज़ में स्टोर के कर्मचारियों को तिलक, सिंदूर, बिंदी और कलावा (हाथ में धागा) पहनने से मना किया गया था, जिसे ‘भेदभावपूर्ण’ बताया गया।
  • कंपनी की सफाई: विवाद बढ़ने के बाद, लेंसकार्ट ने स्पष्ट किया कि सिंदूर, बिंदी, तिलक और कलावा जैसी आस्था के प्रतीकों का वह पूरा सम्मान करती है और उन्हें अपनी संस्कृति का हिस्सा मानती है।
  • नया रुख: कंपनी ने सफाई देते हुए कहा कि वह अपनी ‘इन-स्टोर स्टाइल गाइड’ को मानकीकृत कर रही है और हिंदू संस्कृति के हर प्रतीक (बिंदी, सिंदूर, कलावा) का स्वागत करती है, न कि उन्हें प्रतिबंधित।
  • पीयूष बंसल का बयान: लेंसकार्ट के फाउंडर पीयूष बंसल ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा कि विवादित दस्तावेज़ वर्तमान गाइडलाइन को नहीं दर्शाता है।
हंगामा क्यों हुआ?
हिंदू संगठनों ने आरोप लगाया कि कंपनी एक तरफ हिजाब (धार्मिक प्रतीक) को अनुमति दे रही है, लेकिन हिंदू आस्था के प्रतीकों (सिंदूर, बिंदी) पर रोक लगा रही है।

ड्रेस कोड पर Lenskart की सफाई

आईवियर कंपनी लेंसकार्ट के एक अंदरूनी दस्तावेज में ऑफिस के ड्रेस कोड से जुड़े निर्देश दिए गए थे। इस दस्तावेज़ को लेकर तब बड़ा विवाद खड़ा हो गया, जब लोगों ने बताया कि इसमें काम की जगह पर बिंदी और तिलक लगाने की मनाही है, जबकि हिजाब पहनने की इजाजत दी गई है। जैसे-जैसे यह विवाद बढ़ता गया। लेंसकार्ट के फाउंडर और सीईओ पियूष बंसल ने सफाई दी कि यह नीति दस्तावेज गलत था और कंपनी की मौजूदा गाइडलाइंस को नहीं दिखाता था। अपनी पहली सफाई के करीब 12 घंटे बाद बंसल ने X पर एक और पोस्ट में बताया कि वायरल हो रहा दस्तावेज ट्रेनिंग का एक पुराना नोट था। उन्होंने माना कि यह कंपनी की एचआर की नीति नहीं है, और इसमें गलती से बिंदी/तिलक का जिक्र किया गया था, जिसे पहले ही हटा दिया गया था।

नोट: यह जानकारी अप्रैल 2026 के ताजा विवाद पर आधारित है।

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सांसदों की संख्या क्यों बढ़ाई जा रही है ? इससे लोकतंत्र मजबूत होगा या सिर्फ खर्च बढ़ेगा? https://www.rashtratak.com/to-850/ Mon, 20 Apr 2026 03:11:01 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2168 543 सांसद कम पड़ रहे है देश की जनता के टैक्स का पैसा लूटने में, जो अब इनकी

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543 सांसद कम पड़ रहे है देश की जनता के टैक्स का पैसा लूटने में, जो अब इनकी संख्या 850 की जा रही है मै महिलाओं के 33% आरक्षण के समर्थन में हूँ, लेकिन उनको ये 33% 543 सीटो में से दे दीजिए।

850 लोकसभा सीट करके कौन देश की आर्थिक स्थिति पर बोझ डाला जा रहा है सारी सैलरी भत्ते फंड यात्राएं , दैनिक भत्ते , फोन , मेडिकल सुविधा मिलाकर 5 लाख रुपया हर सांसद प्रति महीने देश के खजाने से लूट रहा है

काम जीरो , रिस्पॉनबल्टी जीरो , ऊपर से इनको Y+ सिक्योरिटी और विकास कार्यों में से कमीशन भी मिलता है
चारों और से देश को लुटा जा रहा है

अब सांसद 543 से 850 होंगे , उसके बाद विधायकों की संख्या तो सीधे सीधे 2 से 3 हजार बढ़ेगी , कितना ज्यादा रुपया इनकी सैलरी और सिक्योरिटी में जाएगा देश का विचार कीजिए।

और इस 33% में कोई भी गरीब मजदूर किसान या मध्यम वर्ग की महिलाएं सांसद नहीं चुनी जाएगी, चुनी जाएगी कंगना, जया बच्चन,स्मृति ईरानी।

20 राज्यों में बीजेपी की सरकार है और महिला मुख्यमंत्री मात्र 1 है कौन से मान सम्मान की बात की जा रही है समझ में नहीं आ रहा है।ये सीटे बढ़ाकर तो आप अपना राजनीतिक स्वार्थ साध रहे हो और देश की जनता पर बोझ डाल रहे हो।

 

केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल ने 16 अप्रैल को संसद में तीन बिल पेश किए, जिनका मकसद महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करना और लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाना है.

मेघवाल ने कहा, “लोकसभा के सदस्यों की संख्या में 50% की बढ़ोतरी की जाएगी. जिससे लोकसभा के सदस्यों की संख्या बढ़कर 815 हो जाएगी. इनमें से 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.”

उन्होंने कहा, “महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होने के बाद न तो पुरुषों को और न ही किसी राज्य को किसी तरह का कोई नुकसान होगा.”

सितंबर 2023 में पास हुए ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ या महिला आरक्षण अधिनियम के तहत, लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित की गईं.

मेघवाल ने कहा कि ये संशोधन इसलिए लाए गए, क्योंकि आरक्षण मौजूदा जनगणना से जुड़ा हुआ था. ऐसे में 2029 के आम चुनावों से पहले इसे लागू करना संभव नहीं होता.

यह एक बहुत ही गंभीर और चर्चा का विषय है। भारत में लोकसभा सीटों के परिसीमन (Delimitation) और सांसदों की संख्या बढ़ाने को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है।
यहाँ इस बदलाव के पीछे के मुख्य कारण और जनता के बीच उठ रहे सवालों का विवरण दिया गया है:
🏛 सांसदों की संख्या क्यों बढ़ाई जा रही है?
संसद की सीटों की संख्या बढ़ाने का मुख्य आधार जनसंख्या है।
  • पुराना आँकड़ा: वर्तमान में 543 सीटें 1971 की जनगणना पर आधारित हैं।
  • जनसंख्या वृद्धि: पिछले 50 वर्षों में भारत की आबादी लगभग दोगुनी से अधिक हो गई है।
  • प्रतिनिधित्व: तर्क यह है कि एक सांसद अब बहुत बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे क्षेत्र का विकास प्रभावित होता है।
  • नया संसद भवन: नए संसद भवन को इसी भविष्य को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जहाँ लोकसभा में 888 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है।
💰 जनता के पैसे और खर्च पर चिंता
आपका यह कहना कि “टैक्स का पैसा लूटा जा रहा है” कई लोगों की साझा चिंता को दर्शाता है। सांसदों की संख्या बढ़ने से सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ेगा:
  • वेतन और भत्ते: हर नए सांसद को वेतन, आवास, यात्रा भत्ता और चिकित्सा सुविधाएँ दी जाएंगी।
  • MPLAD फंड: प्रत्येक सांसद को अपने क्षेत्र के विकास के लिए सालाना ₹5 करोड़ का फंड मिलता है।
  • पेंशन: कार्यकाल खत्म होने के बाद जीवनभर की पेंशन का बोझ भी बढ़ेगा।
⚖ परिसीमन की चुनौतियाँ
सांसदों की संख्या बढ़ाने के साथ कुछ राजनीतिक और सामाजिक विवाद भी जुड़े हैं:
  • उत्तर बनाम दक्षिण: दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल) ने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है। यदि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ीं, तो उत्तर भारतीय राज्यों (जैसे UP, बिहार) की सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी और दक्षिण का प्रभाव कम हो जाएगा।
  • प्रभावी शासन: क्या ज्यादा सांसद होने से लोकतंत्र मजबूत होगा या सिर्फ खर्च बढ़ेगा? यह एक बड़ा सवाल है।
इस बदलाव के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि:
  • क्षेत्र छोटा होने से विकास कार्यों की निगरानी बेहतर होगी?
  • या फिर सांसदों की संख्या बढ़ाने के बजाय तकनीक और स्थानीय प्रशासन (Panchayats) को मजबूत करना चाहिए?
आप इसके बारे में और क्या सोचते हैं, जरूर बताएं।
पंडित हरिशंकर द्रिवेदी
प्रसिद्ध समाज सुधारक
मुंबई महाराष्ट्र

इस्कॉन मंदिर में श्री श्री राधा पार्थसारथी जी को शीतलता प्रदान करने के लिए पूरे चंदन का लेप


अक्षय तृतीया से ईस्ट ऑफ कैलाश स्थित इस्कॉन मंदिर में श्री श्री राधा पार्थसारथी जी को शीतलता प्रदान करने के लिए पूरे चंदन का लेप किया गया । यह चंदन यात्रा २१ दिन तक चलेगा , राधा पार्थसारथी, सीताराम लक्ष्मण हनुमान जी, गौर-निताई एवं लक्ष्मी नरसिंह प्रहलाद महाराज के श्रीविग्रह पर लेपन किया जाएगा । श्रद्धालु भक्त आकर दर्शन करें और आशीर्वाद प्राप्त करें ।

व्रजेन्द्र नंदन दास
राष्ट्रीय संपर्क निदेशक इस्कॉन नयी दिल्ली

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संविधान की सुविधाएँ अधिकार हैं, लेकिन उनका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए: जगतगुरु https://www.rashtratak.com/the-facilities-of-the-constitution-are-rights-but-they-should-not-be-misused-jagatguru/ Mon, 13 Apr 2026 22:09:06 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2126 नई दिल्ली (राष्ट्र तक)   धर्म, जाति और धर्मांतरण का प्रश्न भारत के सामाजिक, संवैधानिक और राष्ट्रीय जीवन

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नई दिल्ली (राष्ट्र तक)   धर्म, जाति और धर्मांतरण का प्रश्न भारत के सामाजिक, संवैधानिक और राष्ट्रीय जीवन से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील और जटिल विषय है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया यह निर्णय कि यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को स्वीकार कर लेता है तो वह अनुसूचित जाति का संवैधानिक दर्जा और उससे जुड़े लाभों का अधिकारी नहीं रहेगा, केवल एक सामान्य कानूनी निर्णय नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान की मूल भावना, सामाजिक न्याय की अवधारणा और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता को ध्यान में रखकर दिया गया एक दूरगामी और ऐतिहासिक निर्णय है। इस निर्णय को भारतीय न्याय व्यवस्था की परिपक्वता, संतुलन और दूरदर्शिता का प्रतीक कहा जा सकता है।भारत राजनेताओ द्वारा अपराध को रोकने के प्रयास कम उसे बड़ाने के लिए आँग में घी डालने का काम करते हैं जो राष्ट्र और समाज के लिए सबसे बड़ा अपराध होता हैं ।

 

उल्लेखनीय विचार व्यक्त करते हुए श्री मदजगतगुरू रामानुजचार्य स्वामी अवधेश प्रपन्नाचार्य महराज जी ने कहा- उन्होंने अपने जीवन में कई ऐसे कार्य किए जो किसी धर्म जाति संप्रदाय से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण और समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं ।

भारत में अनुसूचित जाति की व्यवस्था का निर्माण किसी धर्म विशेष को लाभ देने के लिए नहीं किया गया था, बल्कि उन सामाजिक वर्गों को संरक्षण और अवसर देने के लिए किया गया था, जो सदियों से सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता और सामाजिक बहिष्कार का सामना करते रहे थे। संविधान निर्माताओं ने यह माना था कि समाज में जो ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक असमानता रही है, उसे दूर किए बिना वास्तविक समानता स्थापित नहीं की जा सकती। इसी कारण आरक्षण और विशेष कानूनी संरक्षण की व्यवस्था की गई। यह व्यवस्था मूलतः सामाजिक भेदभाव पर आधारित थी, आर्थिक आधार पर नहीं। इसलिए अनुसूचित जाति का प्रश्न धर्म से अधिक सामाजिक संरचना से जुड़ा हुआ था।

जब कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर ऐसे धर्म को स्वीकार करता है, जहां जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं दी जाती, तो फिर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या उसे उसी आधार पर अनुसूचित जाति के लाभ मिलते रहने चाहिए। इसी प्रश्न को लेकर वर्षों से देश में बहस चलती रही है। कई मामलों में यह देखा गया कि व्यक्ति ने धर्म परिवर्तन कर लिया, वह दूसरे धर्म की धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था में सक्रिय भी हो गया, लेकिन वह अनुसूचित जाति के आरक्षण, छात्रवृत्ति, नौकरी में आरक्षण और एससी/एसटी एक्ट जैसे कानूनों का लाभ लेना चाहता था। इससे एक प्रकार की कानूनी और सामाजिक विसंगति उत्पन्न हो रही थी। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसी विसंगति को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और यह स्पष्ट करता है कि संविधान द्वारा दी गई सुविधाओं का उपयोग उसी सामाजिक संदर्भ में किया जा सकता है, जिसके लिए वे बनाई गई थीं।

  • धर्मांतरण का प्रश्न भारत में केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं रहा है, बल्कि कई बार यह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और जनसंख्या संतुलन से भी जुड़ जाता है।

 

देश के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषकर गरीब, वंचित और अनुसूचित जाति तथा जनजाति वर्गों में धर्मांतरण की घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। कई बार धर्मांतरण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सहायता के माध्यम से हुआ, तो कई बार लालच, प्रलोभन, दबाव या सामाजिक परिस्थितियों के कारण भी धर्म परिवर्तन के आरोप लगे। इसी कारण कई राज्यों ने धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाए, ताकि बल, प्रलोभन या धोखे से होने वाले धर्म परिवर्तन को रोका जा सके, लेकिन इन कानूनों का प्रभाव उतना व्यापक नहीं हो पाया जितनी अपेक्षा थी।
जब किसी विशेष सामाजिक वर्ग का बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन होता है, तो उसका प्रभाव केवल धर्म पर ही नहीं पड़ता, बल्कि जातीय संरचना, सामाजिक संतुलन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ता है। धीरे-धीरे यह स्थिति सामाजिक और धार्मिक संतुलन को प्रभावित करने लगती है। भारत जैसे बहुधर्मी और बहुजातीय देश में सामाजिक और धार्मिक संतुलन का बने रहना राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज लगातार जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर बदलता और विभाजित होता रहेगा, तो इसका प्रभाव सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता पर पड़ना स्वाभाविक है। इस दृष्टि से धर्मांतरण का प्रश्न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह सामाजिक और राष्ट्रीय संतुलन का भी प्रश्न बन जाता है।
आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य भी यही था कि जो लोग सामाजिक रूप से वंचित हैं, उन्हें शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान के क्षेत्र में अवसर मिल सके। लेकिन यदि धर्म परिवर्तन के बाद भी लोग आरक्षण का लाभ लेते रहेंगे, तो इससे आरक्षण व्यवस्था का मूल उद्देश्य प्रभावित होगा और वास्तविक जरूरतमंद लोगों के अधिकारों पर भी प्रभाव पड़ेगा। इससे समाज में असंतोष और असंतुलन भी उत्पन्न हो सकता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय आरक्षण व्यवस्था को अधिक न्यायसंगत, पारदर्शी और उद्देश्यपूर्ण बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि संविधान की सुविधाएँ अधिकार हैं, लेकिन उनका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता में एकता है। यहां अनेक धर्म, जातियां, भाषाएं और संस्कृतियां होते हुए भी देश एक है। लेकिन यदि धर्म, जाति और जनसंख्या संतुलन को लेकर लगातार राजनीतिक और सामाजिक प्रयोग होते रहेंगे, तो इससे राष्ट्रीय एकता प्रभावित हो सकती है। धर्मांतरण यदि पूरी तरह से व्यक्तिगत आस्था और विचार की स्वतंत्रता के आधार पर हो तो वह व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन यदि वह लालच, भय, दबाव, सामाजिक अलगाव या राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हो, तो वह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय संतुलन को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया बन जाता है। इसलिए इस विषय पर संतुलित, संवेदनशील और राष्ट्रीय दृष्टि से विचार करना आवश्यक है।

स्वामी जी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण है। यह निर्णय केवल यह नहीं कहता कि धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाएगा, बल्कि यह निर्णय संविधान की मूल भावना को भी स्पष्ट करता है कि सामाजिक न्याय का आधार सामाजिक वास्तविकता है, न कि केवल कानूनी तकनीक। यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि संविधान द्वारा दी गई सुविधाओं का उद्देश्य समाज में समानता और न्याय स्थापित करना है, न कि कानूनी व्यवस्था का दुरुपयोग होने देना।
आज भारत एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां कानून, संविधान और न्याय व्यवस्था केवल तकनीकी व्याख्याओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सामाजिक वास्तविकता, राष्ट्रीय हित और सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखकर निर्णय दिए जा रहे हैं।

इस दृष्टि से यह निर्णय नए भारत की कानूनी सोच और संवैधानिक दृष्टि का प्रतीक भी कहा जा सकता है। यह निर्णय यह संदेश देता है कि सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता दोनों साथ-साथ चल सकते हैं और संविधान दोनों की रक्षा करने में सक्षम है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि धर्म, जाति, आरक्षण और धर्मांतरण का प्रश्न भारत में लंबे समय से विवाद और बहस का विषय रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस जटिल विषय को स्पष्ट करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम है। इससे न केवल आरक्षण व्यवस्था अधिक स्पष्ट और न्यायसंगत बनेगी, बल्कि धर्मांतरण और कानूनी लाभ के बीच जो विसंगतियाँ थीं, वे भी काफी हद तक समाप्त होंगी। यह निर्णय सामाजिक संतुलन, कानूनी स्पष्टता और राष्ट्रीय एकता-तीनों को मजबूत करने वाला निर्णय है। इसलिए यह कहना उचित होगा कि यह निर्णय केवल एक न्यायालय का फैसला नहीं, बल्कि नए भारत, सशक्त भारत और संगठित भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ के रूप में देखा जाना चाहिए।

 

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सत्ता पर व्यंग्य:- राजनीति के खोखलेपन, नेताओं के दोहरे चरित्र https://www.rashtratak.com/satire-on-power-hollowness-of-politics/ Sun, 22 Mar 2026 22:21:22 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1949 सत्ता पर व्यंग्य राजनीति के खोखलेपन, नेताओं के दोहरे चरित्र, भ्रष्टाचार और आम आदमी की बेबसी को उजागर

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सत्ता पर व्यंग्य राजनीति के खोखलेपन, नेताओं के दोहरे चरित्र, भ्रष्टाचार और आम आदमी की बेबसी को उजागर करता है। यह काजू-विस्की के शौकीन नेताओं और फुटपाथ पर रहने वाली जनता के बीच की खाई को दिखाता है

, जहाँ चुनाव के बाद वादे वाष्प बन जाते हैं और जनता के पास केवल ‘जयकार’ लगाने का विकल्प बचता है।

सत्ता और राजनीति पर व्यंग्य के कुछ मुख्य बिंदु:
    • कुर्सी का नशा:
      सत्ताधीश अपनी मेज की थाली में पृथ्वी को सजाकर खाना चाहते हैं, अर्थात सत्ता की भूख कभी खत्म नहीं होती।
  • समाजवाद के लिबास में तस्कर: खादी के उजले लिबास में डकैत और तस्कर समाजवादी बन जाते हैं, और रामराज विधायक निवास में उतरता है।
  • आम आदमी की बेबसी: लोकतंत्र में जनता (भेड़ें) खुद ही भेड़िये (नेता) को अपना रक्षक चुन लेती हैं, जब सियार (दलाल) उन्हें बहकाते हैं।
  • विकास का ढोंग: विकास के नाम पर चने की खूँट जैसी ज़िद को पूरा करने के लिए जनता की श्वाँस घोंटी जाती है।
  • चुनाव का सच: चुनाव में जीत किसी की भी हो, अंततः हार जनता की ही होती है।
“काजू भुने प्लेट में, विस्की गिलास में, उतरा है रामराज विधायक निवास में।” – अदम गोंडवी
यह व्यंग्य यह भी दिखाता है कि कैसे जनता के टैक्स के पैसे से ही व्यवस्थाएं बनती हैं, फिर उन्हीं व्यवस्थाओं के नाम पर जनता को ठगा जाता है।

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मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ यौन उत्पीड़न और महिलाओं की गरिमा को ठेस पहंचाने वाली टिप्पणी करने के लिए कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए : कौर https://www.rashtratak.com/strict-action-should-be-taken-against-chief-minister-bhagwant-mann-for-sexual-harassment-and-remarks-that-hurt-the-dignity-of-women-kaur/ Wed, 18 Mar 2026 15:52:03 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1868 दिल्ली/17मार्च: शिरोमणी अकाली दल की वरिष्ठ नेता और बठिंडा सांसद बीबा हरसिमरत कौर बादल ने आज राष्ट्रीय महिला

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दिल्ली/17मार्च: शिरोमणी अकाली दल की वरिष्ठ नेता और बठिंडा सांसद बीबा हरसिमरत कौर बादल ने आज राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया राहटकर से लुधियाना में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित एक समारोह में महिलाओं के खिलाफ गलत बयान, अपमानजनक और यौन रूप से आपत्तिजनक टिप्पणी करने के लिए मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का आग्रह किया है।

बठिंडा सांसद ने कल शाम राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष से मुलाकात कर उन्हे अवगत कराया कि मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में यौन उत्पीड़न और महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणी की है इसीलिए उनके खिलाफ मामला दर्ज किया जाना चाहिए। बीबा हरसिमरत कौर बादल ने आयोग की अध्यक्ष से कहा कि यह बेहद जरूरी है ताकि एक कड़ा संदेश दिया जा सके कि महिलाओं को इस तरह वस्तु की तरह न देखा जा सकता।

इस बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बीबा बादल ने कहा कि मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन के दौरान विस्तार से बताया कि कैसे उन्होने अपने दोस्तों के सामने एक लड़की के साथ रिश्ते का झूठा दावा किया था। उन्होने बताया कि मुख्यमंत्री ने उस लड़की को उसके कपड़ों के आधर पर ‘‘ पीली ततैया’, ‘‘ पाकिस्तान का झंडा’’ ‘‘बाम्ब शेल’’ जैसे शब्दों से संबोधित करके उसका अपमान भी किया।

सांसद ने कहा कि इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री ने आगे बताया कि काॅलेज के दिनों में उनके प्रस्ताव को ठुकराने वाली लड़कियों में से एक काॅलेज के समारोह में स्वागत के लिए खड़ी थी, जहां उन्होने पढ़ाई की थी और उन्हें मंच कलाकार बनने के बाद मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था।  बीबा बादल ने कहा कि जिस तरह से यह किस्सा सुनाया गया, उससे उस महिला के साहस के बारे में बताते हुए कहा कि कैसे एक महिला जिसने उनके प्रस्तावों को अस्वीकार करने का साहस किया था उसे बाद में अपनी शक्ति और अधिकार का प्रदर्शन करने के लिए आधिकारिक समारोह में औपचारिक रूप में उनका स्वागत करने के लिए कहा गया।

बठिंडा सांसद ने एनसीडब्ल्यू अध्यक्ष से कहा कि जब किसी राज्य का सर्वोच्च अधिकारी सार्वजनिक रूप से संवेदनशील लोगों की सभा में महिलाओं के बारे इस तरह की बात करना कितना आपत्तिजनक है- और इसने एक खतरनाक संदेश दिया कि सार्वजनिक मनोरंजन और सस्ते रोमांच के लिए महिलाओं की गरिमा को कम किया जा सकता है और उनकी पहचान को केवल उनकी उपस्थिति तक सीमित कर दिया जा सकता है।

बीबा बादल ने कहा कि इस तरहे के कार्यों ने समानता, सम्मान की संस्कृति बनाने के लिए प्रयास करने वाले संस्थानों , नागरिक संगठनों और अनगिनत व्यक्तियों द्वारा सालों से किए गए काम को भी कमजोर कर दिया है। उन्होने कहा,‘‘ इस तरह की कार्रवाई ने महिलाओं और उनकी सुरक्षा को बड़े खतरे में डाला है।

बजट सत्र सफलतापूर्वक संपन्न, 55 घंटे चली सार्थक चर्चा : मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी


 

बठिंडा सांसद ने मुख्यमंत्री के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए कहा,‘‘ यह महिलाओं के प्रति नफरत को सामान्य बनाकर और यौन उत्पीड़न को वैध ठहराकर बहुत बड़ा खतरा पैदा किया जा रहा है।’’ 

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गॉव के विकास के लिए ग्राम प्रधान कैसा होना चाहिए? https://www.rashtratak.com/what-kind-of-head-should-there-be-for-the-development-of-the-village/ Wed, 11 Mar 2026 15:03:50 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1785 गांव के समग्र विकास के लिए एक सक्रिय, ईमानदार, शिक्षित और दूरदर्शी प्रधान का होना आवश्यक है जो

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गांव के समग्र विकास के लिए एक सक्रिय, ईमानदार, शिक्षित और दूरदर्शी प्रधान का होना आवश्यक है जो सहभागी योजना (GPDP) के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, रोजगार और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दे। एक आदर्श प्रधान को पारदर्शी शासन, समावेशी विकास, और समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
एक आदर्श ग्राम प्रधान के गुण और कार्य:
  • सक्रिय और जागरूक: प्रधान को अपनी ग्राम पंचायत की आवश्यकताओं का ज्ञान होना चाहिए और सरकारी योजनाओं को धरातल पर लागू करने के लिए दृढ़ संकल्प होना चाहिए।

पारदर्शी और ईमानदार: प्रधान को विकास कार्यों में पारदर्शिता रखनी चाहिए और संसाधनों का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना चाहिए, जैसा कि मिनिस्ट्री ऑफ़  पंचायती राज  फ़ेसबुक पेज पर उल्लिखित है।

  • समावेशी और न्यायसंगत: विकास कार्य में सभी वर्गों, विशेषकर महिलाओं और कमजोर वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए, पीआई बी विहार न्यूज़ के अनुसार।
  • क्षेत्रीय विकास पर ध्यान: कृषि, आवास, स्वास्थ्य, और शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए काम करना, जैसा कि यूनिवर्सिटी ऑफ़  लखनऊ  के डॉक्यूमेंट  में बताया गया है।
  • संसाधनों का सही प्रबंधन: ग्राम पंचायतों की विकास योजनाओं के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक विकास सुनिश्चित करना।
एक आदर्श प्रधान को केवल सड़कों का निर्माण ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सशक्तीकरण के माध्यम से गाँव को आत्मनिर्भर बनाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधान चुनाव न केवल गाँव के विकास को गति देते हैं, बल्कि यह स्थानीय लोगों को अपने प्रतिनिधित्व चुनने का अधिकार भी प्रधान करते हैं।यह चुनाव, सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने के साथ-साथ एक मजबूत और जिम्मेदार स्थानीय शासन प्रणाली का निर्माण करते हैं।
प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर भले ही समय से चुनाव कराने का दावा कर रहे हैं, लेकिन स्थिति देखकर ऐसा नहीं लग रहा है कि चुनाव समय से हो सकेंगे। ऐसे में चुनाव की तैयारियों में लगे संभावित प्रत्याशियों के चेहरों पर मायूसी है।
मौजूदा ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने में अब सिर्फ दो महीने का समय बचा है, लेकिन अभी तक चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं हुआ है। ऐसे में प्रशासन पंचायतों के संचालन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारी में जुट गया है। संभावना जताई जा रही है कि यदि समय रहते चुनाव नहीं कराए गए तो पंचायतों में प्रशासक नियुक्त किए जा सकते हैं।

वर्तमान में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल मई 2026 के पहले सप्ताह में समाप्त हो जाएगा। पंचायत स्तर पर अधिकांश सरकारी योजनाएं, विकास कार्य और वित्तीय निर्णय ग्राम प्रधानों के माध्यम से ही संचालित होते हैं। ऐसे में यदि चुनाव समय पर नहीं होते हैं तो पंचायतों के नियमित कार्य प्रभावित होने की आशंका है।

पंचायती राज विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस स्थिति को देखते हुए पंचायतों के संचालन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार शुरू कर दिया है। यदि चुनाव कार्यक्रम घोषित होने में देरी होती है तो पंचायतों के कामकाज को जारी रखने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जा सकता है। इससे पंचायतों में विकास कार्य और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर नहीं पड़ेगा।

 

विद्यामणि त्रिपाठी – सामाजिक कार्यकर्ता

 

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विकास का संकल्प : ट्रिपल इंजन से बदलेगी दिल्ली की तस्वीर https://www.rashtratak.com/the-resolution-of-development-will-change-the-picture-of-delhi-with-the-triple-engine/ Thu, 19 Feb 2026 04:00:53 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1692 वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में दिल्ली के लिए 70 हजार करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि का

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वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में दिल्ली के लिए 70 हजार करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि का प्रावधान केवल एक आर्थिक घोषणा नहीं, बल्कि राजधानी के भविष्य की रूपरेखा है। सड़क, रेल परिवहन, मेट्रो विस्तार, जल आपूर्ति, स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और पुलिस व्यवस्था जैसे बुनियादी क्षेत्रों पर विशेष ध्यान यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार दिल्ली को एक सुव्यवस्थित, आधुनिक और आदर्श महानगर के रूप में विकसित करना चाहती है। ऐसे समय में जब दिल्ली की भाजपा सरकार अपना एक वर्ष पूर्ण कर रही है, यह स्वाभाविक है कि बीते वर्ष के कामकाज का मूल्यांकन किया जाए और देखा जाए कि तथाकथित “ट्रिपल इंजन सरकार” का लाभ दिल्लीवासियों को कितना और कैसे मिला है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपने कार्यकाल के एक वर्ष पूर्ण होने पर सरकार की उपलब्धियों और आगामी संकल्पों का उल्लेख करते हुए दावा किया कि उनकी सरकार ने न केवल नई योजनाओं की शुरुआत की, बल्कि पूर्ववर्ती सरकारों की लंबित और अधूरी परियोजनाओं को भी गति दी है। ‘दिल्ली लखपति बिटिया योजना’, मुफ्त एलपीजी सिलेंडर, अधूरी पड़ी आधारभूत परियोजनाओं को पूरा करने की पहल, तथा महिलाओं और छात्रों के लिए नई राहतकारी योजनाओं का खाका-ये सब उनके पहले वर्ष के प्रमुख बिंदु रहे। उनका यह भी कहना है कि ट्रिपल इंजन की व्यवस्था-अर्थात केंद्र, राज्य और नगर निकाय में एक ही राजनीतिक नेतृत्व के कारण विकास कार्यों में समन्वय और गति दोनों आई है।
ट्रिपल इंजन सरकार की अवधारणा का सबसे बड़ा लाभ वित्तीय समन्वय के रूप में सामने आया है। दिल्ली सरकार को अब पूंजीगत व्यय के लिए ऋण अपेक्षाकृत कम ब्याज दर पर उपलब्ध हो रहा है। पहले जहां ब्याज दर 13-14 प्रतिशत तक पहुंच जाती थी, वहीं अब लगभग सात प्रतिशत पर ऋण मिलना संभव हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा 21 हजार करोड़ रुपये तक की ऋण सीमा निर्धारित किए जाने से आधारभूत ढांचे के विकास में धनाभाव की आशंका कम हुई है। यही नहीं, प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन तथा पीएम भीम योजना जैसी केंद्रीय योजनाओं की समयावधि बढ़वाने में भी दिल्ली सरकार को सफलता मिली है। आयुष्मान भारत जैसी जनकल्याणकारी योजना का लाभ अब राजधानी के अधिक से अधिक नागरिकों तक पहुंच रहा है, जिससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा की ठोस गारंटी मिल रही है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार के संकेत अवश्य दिखाई दिए हैं। मोहल्ला क्लीनिक मॉडल पर उठे प्रश्नों और अधूरी स्वास्थ्य परियोजनाओं के बीच नई सरकार ने अस्पतालों के आधुनिकीकरण, बेड क्षमता बढ़ाने और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। यदि यह प्रयास निरंतरता से जारी रहा तो दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी के अनुरूप विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी पारदर्शिता और गुणवत्ता सुधार का दावा किया गया है। पिछले वर्षों में शिक्षा मॉडल को लेकर जहां एक ओर प्रशंसा हुई, वहीं भवनों की गुणवत्ता, संसाधनों के उपयोग और परिणामों पर सवाल भी उठे। नई सरकार के लिए यह चुनौती है कि वह शिक्षा को राजनीतिक विमर्श से ऊपर उठाकर वास्तविक गुणवत्ता सुधार की दिशा में कार्य करे।
परिवहन और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी गति लाने का प्रयास हुआ है। मेट्रो नेटवर्क के विस्तार, बस बेड़े के आधुनिकीकरण और सड़कों के सुधार की योजनाएं केंद्र और राज्य के समन्वय से आगे बढ़ रही हैं। दिल्ली मेट्रो पहले से ही राजधानी की जीवनरेखा रही है, अब किराए में राहत या छात्रों के लिए विशेष प्रावधान जैसे कदम यदि लागू होते हैं तो इससे आम जनता को सीधा लाभ मिलेगा। यातायात जाम की समस्या के समाधान के लिए फ्लाईओवर, अंडरपास और स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन प्रणाली पर ध्यान देना आवश्यक है। एक वर्ष में कुछ परियोजनाओं को गति मिली है, किंतु राजधानी जैसे विशाल महानगर में ठोस परिणामों के लिए निरंतर प्रयास अपेक्षित हैं।
सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण और वायु प्रदूषण की है। बीते दशक में दिल्ली विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में गिनी जाने लगी। यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का संकट है। मुख्यमंत्री ने वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस योजनाओं का उल्लेख किया है-जैसे हरित आवरण बढ़ाना, निर्माण कार्यों पर निगरानी, सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन और पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय। परंतु यह भी सत्य है कि प्रदूषण जैसी जटिल समस्या का समाधान केवल घोषणाओं से संभव नहीं, इसके लिए कठोर क्रियान्वयन, क्षेत्रीय सहयोग और जनसहभागिता की आवश्यकता होगी। यमुना की सफाई भी दिल्ली की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न है। वर्षों से यमुना शुद्धिकरण के नाम पर योजनाएं बनती रहीं, बजट खर्च होता रहा, पर परिणाम संतोषजनक नहीं रहे। वर्तमान सरकार ने यमुना को स्वच्छ और पर्यटन योग्य बनाने का संकल्प दोहराया है। यदि सीवेज प्रबंधन, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण और नदी तट के पुनर्विकास की योजनाएं समयबद्ध तरीके से लागू होती हैं, तो यह दिल्ली की छवि को नया आयाम दे सकती हैं। यमुना का पुनर्जीवन केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक पुनरुत्थान का भी अवसर है।
महिलाओं और बेटियों के लिए घोषित योजनाएं-जैसे ‘लखपति बिटिया योजना’-सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में सकारात्मक कदम मानी जा सकती हैं। यदि इन योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्रों तक पारदर्शिता से पहुंचता है, तो यह परिवारों की आर्थिक सुरक्षा और शिक्षा के अवसरों को बढ़ा सकता है। मुफ्त एलपीजी सिलेंडर जैसी पहल घरेलू अर्थव्यवस्था में राहत देती है, विशेषकर निम्न आय वर्ग के लिए। किंतु इन योजनाओं की सफलता क्रियान्वयन की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी। एक वर्ष की अवधि किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी नहीं होती, विशेषकर तब जब उसे पिछली सरकारों की अधूरी परियोजनाओं और व्यवस्थागत खामियों को भी दुरुस्त करना हो। यह भी सच है कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच विकास का वास्तविक आकलन कठिन हो जाता है। नई सरकार ने पूर्ववर्ती शासन की कमियों-जैसे कथित भ्रष्टाचार, अधूरी इमारतें, प्रदूषण नियंत्रण में विफलता को सुधारने का दावा किया है। किंतु जनता अब केवल आरोप नहीं, परिणाम देखना चाहती है। आने वाले वर्षों के लिए सरकार के सामने स्पष्ट लक्ष्य होने चाहिए-स्वच्छ वायु, स्वच्छ यमुना, सुगम यातायात, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य और पारदर्शी प्रशासन। राजधानी होने के नाते दिल्ली को केवल भारत का प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि आदर्श शहरी मॉडल बनना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि बजट में आवंटित राशि का पूर्ण और पारदर्शी उपयोग हो, परियोजनाएं समयबद्ध पूरी हों और जनभागीदारी को प्रोत्साहन मिले।
ट्रिपल इंजन सरकार का वास्तविक अर्थ तभी सिद्ध होगा जब समन्वय का लाभ जमीन पर दिखाई दे। केंद्र और राज्य के बीच टकराव की राजनीति के स्थान पर सहयोग की भावना यदि कायम रहती है, तो दिल्ली विकास की नई ऊंचाइयों को छू सकती है। एक वर्ष में कुछ सकारात्मक संकेत अवश्य मिले हैं, परंतु अभी लंबी यात्रा शेष है। सरकार को अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने के साथ-साथ कमियों का ईमानदार आत्ममंथन भी करना होगा। दिल्ली की जनता जागरूक है और अपेक्षाएं भी बड़ी हैं। वह केवल वादों से संतुष्ट नहीं होगी, उसे परिणाम चाहिए। यदि रेखा गुप्ता सरकार अपने संकल्पों को धरातल पर उतारने में सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में दिल्ली सचमुच एक स्वच्छ, स्वस्थ, सुरक्षित और आधुनिक महानगर के रूप में उभर सकती है। यही समय है जब बजट की घोषणाओं को विकास की वास्तविक कहानी में बदला जाए और राजधानी को समस्याओं के प्रतीक से समाधान के मॉडल में परिवर्तित किया जाए।

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बंगाल का भविष्यः धर्म की लहर या प्रगति की राह? https://www.rashtratak.com/future-of-bengal-wave-of-religion-or-path-of-progress/ Mon, 16 Feb 2026 07:50:48 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1672 पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, पर राजनीतिक रणभेरी बज चुकी है।

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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, पर राजनीतिक रणभेरी बज चुकी है। इस बार संकेत साफ हैं-चुनाव विकास बनाम विकास के दावे पर नहीं, बल्कि पहचान, अस्मिता और धर्म की ध्वजा के इर्द-गिर्द घूम सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर राज्य भर में प्रस्तावित हिंदू सम्मेलनों को भारतीय जनता पार्टी एक वैचारिक उत्सव भर नहीं, बल्कि चुनावी अवसर में बदलने की रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही है। दूसरी ओर ममता बनर्जी ने भी यह समझ लिया है कि यदि चुनाव की जमीन धार्मिक विमर्श पर खिसकती है तो उसे खाली नहीं छोड़ा जा सकता। कोलकाता के न्यू टाउन में ‘दुर्गा आंगन’ का शिलान्यास और उसे बंगाली अस्मिता से जोड़ने का प्रयास इसी रणनीतिक सजगता का हिस्सा है।
बंगाल की राजनीति लंबे समय तक वर्ग-संघर्ष, वाम वैचारिकी और सामाजिक न्याय के नारों के इर्द-गिर्द घूमती रही। लगभग तीन दशक तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में रहा। उससे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रभुत्व था। किंतु 2011 में सत्ता परिवर्तन के साथ एक नई धुरी बनी-तृणमूल बनाम भाजपा। आज स्थिति यह है कि वाम और कांग्रेस हाशिए पर हैं और मुकाबला दो धू्रवों के बीच सिमट चुका है। यही द्विधू्रवीयता चुनाव को अधिक तीखा और अधिक पहचान-केन्द्रित बना रही है। भाजपा का अभियान चार प्रमुख सूत्रों पर टिका है-बंगाल में हिंदू खतरे में है, बांग्लादेशी घुसपैठ, महिलाओं की असुरक्षा और भ्रष्टाचार। सीमावर्ती जिलों का उदाहरण देकर यह संदेश गढ़ा जा रहा है कि जनसांख्यिकीय संतुलन बदल रहा है। अवैध घुसपैठ का प्रश्न नया नहीं है, पर उसे इस समय राजनीतिक ऊर्जा के साथ जोड़ा जा रहा है। आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की घटना, शिक्षक भर्ती घोटाले, हिन्दुओं पर बढ़ते अत्याचार एवं भ्रष्टाचार जैसे प्रसंगों को शासन की विफलता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। भाजपा का लक्ष्य स्पष्ट है-70 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं में एक साझा असुरक्षा-बोध निर्मित करना, हिन्दुओं को जागृत करना और उसे मतदान व्यवहार में रूपांतरित करना। आज बंगाल में विकास की सबसे बड़ी बाधा घुसपैठियों का बढ़ना है। घुसपैठियों पर विराम लगाना चाहिए न कि इस मुद्दे पर राजनीति हो।
ममता बनर्जी की चुनौती दोहरी है। एक ओर उन्हें यह संदेश देना है कि वे अल्पसंख्यकों की संरक्षक हैं, दूसरी ओर हिंदू मतदाताओं को यह विश्वास भी दिलाना है कि उनकी आस्था और अस्मिता सुरक्षित है। 2021 के चुनाव में जब भाजपा ने ‘जय श्रीराम’ के नारे को आक्रामक रूप से उछाला, तब ममता ने ‘जय मां दुर्गा’ और ‘चंडी पाठ’ के माध्यम से एक सांस्कृतिक प्रत्युत्तर दिया था। इस बार वे दुर्गा आंगन जैसे प्रतीकों के जरिए यह संकेत दे रही हैं कि बंगाली हिंदू पहचान भाजपा की बपौती नहीं है। वे धर्म को राष्ट्रवाद की बजाय क्षेत्रीय अस्मिता के साथ जोड़ती हैं-“बंगाल अपनी संस्कृति से हिंदू है, पर उसकी राजनीति बहुलतावादी है”-यह उनका अंतर्निहित संदेश है। इसी बीच मुर्शिदाबाद में पूर्व तृणमूल नेता हुमायूं कबीर द्वारा ‘बाबरी मस्जिद’ के शिलान्यास की पहल ने नई जटिलता जोड़ दी है। इससे मुस्लिम मतदाताओं के भीतर एक अलग धू्रवीकरण की संभावना पैदा हुई है। यदि मुस्लिम वोटों का बंटवारा होता है, तो तृणमूल का गणित प्रभावित हो सकती है। 2021 में उसे लगभग 48 प्रतिशत वोट और 223 सीटें मिली थीं-जिसमें मुस्लिम मतों का एकमुश्त समर्थन निर्णायक था। भाजपा 38 प्रतिशत वोट के साथ 65 सीटें जीतकर मुख्य विपक्ष बनी। ऐसे में यदि मुस्लिम मत 5-10 प्रतिशत भी इधर-उधर खिसकते हैं, तो कई सीटों का परिणाम बदल सकता है और भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ सकती है।
यहां प्रश्न केवल गणित का नहीं, राजनीति के चरित्र का भी है। क्या बंगाल का चुनाव धार्मिक पहचान के उभार का प्रयोगशाला बनेगा? या यह प्रयोग अंततः विकास, रोजगार और बुनियादी ढांचे के प्रश्नों पर लौटेगा? विडंबना यह है कि जिस बंगाल को कभी देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता था-जहां से उद्योग, शिक्षा और सांस्कृतिक नवजागरण की रोशनी फैलती थी, वह आज अधूरे प्रोजेक्ट्स, धीमी औद्योगिक गति और रोजगार के पलायन से जूझ रहा है। कोलकाता की सड़कों पर अधूरी मेट्रो लाइनें और बंद कारखानों की चुप्पी विकास की उस कहानी को बयान करती हैं, जो राजनीतिक नारों के शोर में दब जाती है। 2011 में टाटा के नैनो प्रोजेक्ट का राज्य से बाहर जाना एक प्रतीकात्मक मोड़ था। भूमि अधिग्रहण के प्रश्न पर जनसमर्थन पाने वाली राजनीति ने उद्योग के प्रति संशय का वातावरण भी बनाया। पंद्रह वर्षों बाद भी बंगाल बड़े निवेश की प्रतीक्षा में है। युवा रोजगार के लिए बाहर जा रहे हैं, और कई राज्यों में उन्हें ‘बांग्लादेशी’ कहकर अपमानित किए जाने की खबरें आती हैं। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, आत्मसम्मान का प्रश्न भी है। किंतु चुनावी विमर्श में यह पीड़ा गौण हो जाती है, और केंद्र में आ जाता है-धर्म, पहचान और भय।
ममता बनर्जी केंद्र सरकार पर वित्तीय भेदभाव का आरोप लगाती हैं; भाजपा राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण का। सी.बी.आई. और ई.डी. की कार्रवाइयों को ममता राजनीतिक प्रतिशोध बताती हैं, जबकि भाजपा उन्हें कानून का पालन। इस टकराव ने प्रशासनिक संवाद को भी राजनीतिक संघर्ष में बदल दिया है। परिणाम यह है कि विकास का एजेंडा आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ जाता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या धर्म-आधारित ध्रूवीकरण स्थायी राजनीतिक समाधान दे सकता है? इतिहास बताता है कि धार्मिक उभार अल्पकालिक ऊर्जा तो देता है, पर दीर्घकालिक शासन-क्षमता की कसौटी पर उसे विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के प्रश्नों से जूझना ही पड़ता है। यदि चुनाव केवल “कौन किसका प्रतिनिधि है” तक सीमित रह गया, तो “कौन क्या करेगा” का प्रश्न अनुत्तरित रह जाएगा।
बंगाल की आत्मा बहुलतावाद में रही है-रामकृष्ण परमहंस से लेकर रवींद्रनाथ तक, यह भूमि विविध आस्थाओं और विचारों का संगम रही है। यहां दुर्गा पूजा और मुहर्रम दोनों सामाजिक उत्सव का रूप लेते रहे हैं। यदि राजनीति इस सामाजिक ताने-बाने को चुनावी अंकगणित में बदल देगी, तो समाज की संवेदनशीलता पर चोट पहुंचेगी। दूसरी ओर, यदि धार्मिक प्रतीकों का उपयोग सांस्कृतिक आत्मगौरव के साथ विकास-प्रतिबद्धता को जोड़ने में किया जाए, तो वह सकारात्मक भी हो सकता है। इस चुनाव में भाजपा की रणनीति हिंदू मतों का अधिकतम ध्रूवीकरण है; ममता की रणनीति हिंदू पहचान को बंगाली अस्मिता के साथ समाहित कर अल्पसंख्यकों के विश्वास को बनाए रखना है। मुस्लिम दलों की सक्रियता तृणमूल के लिए चुनौती है, पर वह भाजपा के लिए अवसर भी है। यह त्रिकोणीय-संभावना चुनाव को जटिल बनाती है। परंतु अंततः लोकतंत्र की परिपक्वता मतदाता तय करता है। यदि बंगाल का मतदाता विकास, रोजगार और सुशासन को प्राथमिकता देता है, तो राजनीतिक दलों को अपना विमर्श बदलना होगा। यदि वह पहचान की राजनीति को स्वीकार करता है, तो वही भविष्य की दिशा बनेगी। प्रश्न केवल यह नहीं कि कौन जीतेगा; प्रश्न यह है कि जीत का एजेंडा क्या होगा?


क्या धर्म के आधार पर लड़ा गया चुनाव सार्थक मूल्य स्थापित कर पाएगा? या यह राज्य को और अधिक वैचारिक खाइयों में धकेल देगा? बंगाल की धरती ने अनेक बार भारत को नई वैचारिक दिशा दी है। आज फिर अवसर है-या तो वह धर्म बनाम धर्म की बहस में उलझे, या धर्म को नैतिकता और विकास की प्रेरणा बनाकर नई राजनीति की राह खोले। चुनाव परिणाम चाहे जो हो, असली कसौटी यही होगी कि क्या बंगाल अपनी आर्थिक ऊर्जा, सांस्कृतिक उदारता और सामाजिक समरसता को पुनः प्राप्त कर पाता है। यदि नहीं, तो धर्म की ध्वजा चाहे जितनी ऊंची फहराई जाए, विकास का शून्य अंततः सबको दिखाई देगा।

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महाराष्ट्र में भाजपा के विकास एवं विश्वास की निर्णायक जीत https://www.rashtratak.com/decisive-victory-of-development-and-confidence-of-bjp-in-maharashtra/ Sun, 18 Jan 2026 14:22:00 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1448 महाराष्ट्र में हाल ही में संपन्न शहरी निकाय चुनाव राज्य की राजनीति की दिशा, प्रवृत्ति और भविष्य का

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महाराष्ट्र में हाल ही में संपन्न शहरी निकाय चुनाव राज्य की राजनीति की दिशा, प्रवृत्ति और भविष्य का संकेत देने वाला एक बड़ा जनादेश बनकर सामने आए हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में महायुति गठबंधन की ऐतिहासिक सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यह बदलाव केवल सत्ता के हस्तांतरण तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक सोच, जन अपेक्षाओं और लोकतांत्रिक व्यवहार में गहरे परिवर्तन का द्योतक है। इन चुनावों ने जहां भगवा राजनीति की वैचारिक और संगठनात्मक शक्ति को नए सिरे से रेखांकित किया है, वही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सकारात्मक सोच एवं विकास की राजनीति को आगे बढ़ाया है। यह सफलता ऐसे समय में मिली है जब विधानसभा चुनावों में विपक्ष को करारी शिकस्त दिए जाने को अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था। इसके बावजूद राज्यव्यापी स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा नीत महायुति गठबंधन का दबदबा यह दर्शाता है कि यह जीत क्षणिक नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ राजनीतिक प्रवाह का परिणाम है। इन परिणामों ने राष्ट्र का ध्यान इसलिए अपनी ओर खींचा, क्योंकि इन चुनावों को मिनी विधानसभा चुनावों की संज्ञा दी गई थी। दशकों तक शिवसेना के वर्चस्व का प्रतीक रहे बृहन्मुंबई नगर निगम, यानी बीएमसी में शिवसेना का दशकों पुराना किला ढ़ह गया, बीएमसी एवं राज्यभर के शहरी निकाय चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना एवं उसका दबदबा कायम होना, एक बड़े राजनीतिक बदलाव का सबसे सशक्त प्रमाण है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की राजनीतिक सोच और कार्यशैली इस पूरे परिदृश्य में एक निर्णायक कारक के रूप में उभरकर सामने आई है। फडणवीस ने महाराष्ट्र की राजनीति को केवल सत्ता संतुलन की सीमाओं में नहीं बांधा, बल्कि उसे दीर्घकालिक विकास दृष्टि से जोड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे व्यापक राष्ट्रीय विकास कार्यक्रमों जैसे बुनियादी ढांचे का विस्तार, डिजिटल गवर्नेंस, पारदर्शिता, निवेश अनुकूल वातावरण और सुशासन को उन्होंने राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप जमीन पर उतारने का प्रयास किया है। उनकी राजनीति भावनात्मक उत्तेजना या तात्कालिक लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि योजनाबद्ध विकास, प्रशासनिक दक्षता और भविष्य की तैयारी पर आधारित रही है। मुंबई से लेकर विदर्भ और मराठवाड़ा तक विकास की समान अवधारणा, शहरी-ग्रामीण संतुलन और रोजगार सृजन पर जोर उनकी सोच को प्रतिबिंबित करता है। इस महाविजय के पीछे फडणवीस की रणनीति के चार प्रमुख स्तंभ रहे हैं- हिंदुत्व और विकास का संतुलन, लोकल मुद्दों पर फोकस, विपक्ष पर प्रभावी जवाब और जनता के साथ जुडाव। यही कारण है कि स्थानीय निकाय चुनावों में जनता ने उन्हें केवल एक प्रशासक के रूप में नहीं, बल्कि एक दूरदृष्टा नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वीकार किया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ की जो राष्ट्रीय अवधारणा गढ़ी गई, देवेंद्र फडणवीस ने उसे महाराष्ट्र की राजनीतिक और प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और यही दृष्टि महायुति की सफलता की वैचारिक रीढ़ बनती दिखाई देती है।
बीएमसी का महत्व केवल राजनीतिक प्रतीकात्मकता तक सीमित नहीं है। यह देश का सबसे धनी नगर निगम है, जिसका 2025-26 का बजट 74,427 करोड़ रुपये का है, जो कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक है। इसीलिये बीएमसी शिवसेना का आर्थिक संबल थी, क्योंकि भ्रष्ट तौर-तरीकों के कारण नगर निकाय का पैसा उसके नेताओं के पास पहुंचता था। बीएमसी के इसी भ्रष्टाचार के कारण मुंबई अंतरराष्ट्रीय शहर के रूप में विकसित नहीं हो पा रही थी। ऐसे में बीएमसी पर नियंत्रण का अर्थ है नीतिगत प्राथमिकताओं, शहरी विकास की दिशा और संसाधनों के उपयोग पर निर्णायक प्रभाव। भाजपा नेतृत्व वाली महायुति की सफलता यह संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में मुंबई का प्रशासनिक और विकासात्मक स्वरूप नए सिरे से गढ़ा जाएगा। मुंबई को खराब सडकों, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण से त्रस्त शहर की छवि से मुक्त करना भाजपा की पहली प्राथमिकता बननी चाहिए। इन चुनावों का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि दो दशक बाद ठाकरे परिवार से जुड़ी पार्टियां एकजुट होकर मैदान में उतरीं, फिर भी वे महायुति की लहर को रोकने में असफल रहीं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की प्रतीकात्मक एकता मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी। इसी तरह शरद पवार और अजीत पवार के नेतृत्व वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गुटों का पूणे में गठबंधन भी बुरी तरह विफल रहा। यह पराजय उन राजनीतिक परिवारों के लिए एक चेतावनी है, जिन्होंने लंबे समय तक राज्य की राजनीति में वर्चस्व बनाए रखा था।
इन परिणामों से यह स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की जनता ने क्षेत्रीय संकीर्णता और पुराने नारों की बजाय विकास, स्थिरता और विश्वास की राजनीति को प्राथमिकता दी है। ‘मराठी मानुष’ जैसे भावनात्मक मुद्दे इस बार ज्यादा प्रभाव नहीं डाल सके। मतदाताओं ने यह संकेत दिया है कि वे अपनी आकांक्षाओं को केवल पहचान की राजनीति में सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि वे बेहतर बुनियादी ढांचे, पारदर्शी प्रशासन और भविष्य की स्पष्ट दृष्टि चाहते हैं। इन स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की हाशिये पर मौजूदगी भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह स्थिति कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का अवसर है। महाराष्ट्र जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य में उसकी कमजोर होती पकड़ यह सवाल उठाती है कि क्या पार्टी बदलते राजनीतिक परिदृश्य को समझने और उसके अनुरूप रणनीति बनाने में विफल हो रही है। महा विकास अघाड़ी गठबंधन के भविष्य पर भी इन परिणामों ने प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इसके घटक दल पहले ही प्रासंगिक बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और यह पराजय उस संघर्ष को और कठिन बना देती है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ठाकरे और पवार जैसे परिवारों को अब अपनी राजनीति का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। केवल विरासत और अतीत की उपलब्धियों के सहारे राजनीति नहीं चलाई जा सकती। जनता अब जवाबदेही, परिणाम और स्पष्ट दिशा चाहती है। इसके विपरीत भाजपा ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह चुनाव जीतने का गणित अच्छी तरह समझ चुकी है।

मजबूत बूथ मैनेजमेंट, कैडर आधारित संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक व सांगठनिक संबल उसकी सफलता की आधारशिला बने हैं। यही कारण है कि भाजपा न केवल अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकली, बल्कि कई स्थानों पर अपने सहयोगियों पर भी भारी पड़ी। इन चुनावों का व्यापक अर्थ केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। यह परिणाम राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी एक संकेत हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास, विकास और आश्वासन की राजनीति को जनता लगातार समर्थन दे रही है। यह राजनीति केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि जमीन पर बदलाव की अनुभूति कराती है। अंधेरों के बीच रोशनी की किरण की तरह यह राजनीति आम नागरिक को यह विश्वास दिलाती है कि उसका भविष्य सुरक्षित हाथों में है। इससे राजनीतिक परिभाषाएं ही नहीं बदलीं, बल्कि इंसान की सोच में भी परिवर्तन आया है। मतदाता अब भावनात्मक उकसावे से अधिक ठोस उपलब्धियों और संभावनाओं को महत्व देने लगा है।
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव इस बदलाव का सशक्त उदाहरण हैं। बड़े-बड़े दावे करने वालों के बोल ध्वस्त हुए हैं और विकास की राजनीति आगे बढ़ी है। जनता देश को एक नई दिशा, एक नए लोकतांत्रिक परिवेश और एक नई राजनीतिक संस्कृति में देखना चाहती है। यह संस्कृति केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि शासन के तौर-तरीकों में बदलाव की मांग करती है। पारदर्शिता, जवाबदेही और परिणामोन्मुखी प्रशासन अब केवल नारे नहीं, बल्कि जन अपेक्षा बन चुके हैं। बीएमसी जैसे शक्तिशाली संस्थान में भाजपा का वर्चस्व न केवल मुंबई की सत्ता संरचना को बदलेगा, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी को भी नए सिरे से परिभाषित करेगा। यह जीत बताती है कि लोकतंत्र में वही राजनीतिक ताकत टिकाऊ होती है, जो समय के साथ खुद को बदलने, जनता की नब्ज पहचानने और विकास को केंद्र में रखने का साहस रखती है। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों ने इसी सच्चाई को एक बार फिर उजागर किया है।

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