Rashtra Tak Hindi Monthly Magazine Tue, 03 Mar 2026 21:45:15 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://www.rashtratak.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-cropped-WhatsApp-Image-2025-05-08-at-2.40.25-PM-32x32.jpeg Rashtra Tak 32 32 होली, बदलता समाज और मर्यादा की नई परिभाषाएँ https://www.rashtratak.com/holi-changing-society-and-new-definitions-of-decorum/ Tue, 03 Mar 2026 11:30:47 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1760 होली केवल एक त्योहार नहीं, भारतीय समाज की सामूहिक चेतना का उत्सव है। यह रंगों का, उल्लास का,

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होली केवल एक त्योहार नहीं, भारतीय समाज की सामूहिक चेतना का उत्सव है। यह रंगों का, उल्लास का, मन की गांठें खोलने का और रिश्तों में जमी धूल झाड़ने का अवसर है। किंतु समय के साथ हर परंपरा नए प्रश्नों के घेरे में आती है। आज जब विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर होली के आयोजन का स्वरूप बदल रहा है, तब समाज का एक वर्ग उत्साहित है तो दूसरा वर्ग चिंतित। यही द्वंद्व इस चर्चा को गंभीर बनाता है।
परंपरागत रूप से होली को पारिवारिक और सामुदायिक दायरे में मनाया जाता रहा है। गाँवों में चौपाल, मोहल्लों में आँगन, घरों की छतें—ये सब उत्सव के स्वाभाविक मंच होते थे। रिश्तों की परिभाषाएँ स्पष्ट थीं; देवर-भाभी की हँसी-ठिठोली, ननद-भाभी की चुहल, मित्रों का रंग-अबीर। इन सबमें एक सांस्कृतिक मर्यादा और सामाजिक संदर्भ निहित रहता था। त्योहार का आनंद सामूहिक था, पर सीमाएँ भी स्पष्ट थीं।
आज दृश्य बदल चुका है। सहशिक्षा वाले विश्वविद्यालयों में छात्र-छात्राएँ साथ पढ़ते हैं, साथ कार्यक्रम आयोजित करते हैं और साथ ही उत्सव भी मनाते हैं। सोशल मीडिया के दौर में उत्सव केवल निजी अनुभव नहीं रह गया, वह सार्वजनिक प्रदर्शन का रूप ले लेता है। रंग, संगीत, नृत्य और भीड़—ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल रचते हैं जो पारंपरिक होली से भिन्न दिखाई देता है। यही बदलाव समाज के एक हिस्से को असहज करता है।
मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि लड़कियाँ होली क्यों खेल रही हैं या लड़के क्यों साथ हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या उत्सव की आड़ में मर्यादा और गरिमा सुरक्षित है? क्या स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता को स्थान मिल रहा है? क्या भीड़ के उत्साह में व्यक्तिगत सीमाएँ टूट रही हैं?
यहाँ “लड़की” और “स्त्री” के बीच का अंतर भी चर्चा में आता है। समाज अक्सर बेटियों को बचपन से ही मर्यादा का पाठ पढ़ाता है, जबकि बेटों को अधिक खुली छूट मिलती रही है। जब बेटियाँ सार्वजनिक रूप से उत्सव में भाग लेती हैं, तो उसे परंपरा से विचलन मान लिया जाता है। पर क्या यह दृष्टिकोण न्यायसंगत है? यदि शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में समान अवसर स्वीकार हैं, तो सांस्कृतिक आयोजनों में समान भागीदारी क्यों नहीं?
दूसरी ओर, यह भी उतना ही सत्य है कि भीड़ का व्यवहार हमेशा संयमित नहीं होता। होली के अवसर पर छेड़छाड़, जबरदस्ती रंग लगाने, अभद्र टिप्पणियों जैसी घटनाएँ वर्षों से समाज की चिंता का विषय रही हैं। ऐसे में अभिभावकों की आशंका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। उनकी चिंता केवल परंपरा की रक्षा की नहीं, बल्कि बेटियों की सुरक्षा और गरिमा की भी होती है।
यहाँ “सहमति” की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। आधुनिक समाज में किसी भी सामाजिक संपर्क का आधार स्पष्ट सहमति है। यदि कोई छात्रा या छात्र अपनी इच्छा से, सुरक्षित वातावरण में उत्सव का हिस्सा बनता है, तो उसे केवल इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता कि वह परंपरागत ढाँचे से अलग है। लेकिन यदि आयोजन में सुरक्षा, निगरानी और स्पष्ट आचार-संहिता का अभाव है, तो चिंता स्वाभाविक है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका यहाँ निर्णायक हो जाती है। किसी भी सामूहिक आयोजन में सुरक्षा व्यवस्था, शिकायत तंत्र और स्पष्ट दिशा-निर्देश अनिवार्य होने चाहिए। यह सुनिश्चित करना प्रशासन का दायित्व है कि कोई भी छात्र या छात्रा असहज महसूस न करे। “नो मींस नो” जैसी स्पष्ट नीति और उसकी सख्ती से पालना उत्सव को स्वस्थ बनाए रख सकती है।
समाज को भी आत्ममंथन की आवश्यकता है। क्या हम बेटियों को केवल घर की मर्यादा से जोड़कर देखते हैं? क्या हम यह मान बैठे हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर उनका सक्रिय होना स्वभावतः अनुचित है? यदि बेटियाँ शिक्षा, खेल, राजनीति और व्यवसाय के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, तो सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी उपस्थिति को अलग कसौटी पर क्यों परखा जाए?
परंपरा स्थिर नहीं होती; वह समय के साथ बदलती है। जो आज “नया” प्रतीत हो रहा है, वह कल सामान्य बन सकता है। किंतु परिवर्तन का अर्थ मूल्यों का परित्याग नहीं है। मर्यादा, सम्मान और सुरक्षा—ये मूल्य शाश्वत हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम इन मूल्यों को नए परिवेश में लागू करने के लिए तैयार हैं?
होली का मूल संदेश सामाजिक भेद मिटाना है। यह वह दिन है जब रंग सबको एक कर देते हैं—जाति, वर्ग, आयु, लिंग के भेद पीछे छूट जाते हैं। यदि हम इस मूल भावना को स्वीकार करते हैं, तो हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि बेटियाँ और बेटे दोनों समान रूप से इस उत्सव का हिस्सा हैं।
फिर भी, उत्सव को प्रदर्शन में बदल देना चिंता का विषय है। सोशल मीडिया पर लाइक और व्यूज़ की दौड़ में निजी क्षणों का सार्वजनिक प्रदर्शन कई बार गरिमा की सीमा लांघ देता है। युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि आत्मविश्वास और आत्मप्रदर्शन में अंतर होता है। आनंद का अर्थ यह नहीं कि हर क्षण कैमरे के लिए जिया जाए।
अभिभावकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। केवल रोक-टोक समाधान नहीं है। संवाद, विश्वास और जागरूकता अधिक प्रभावी साधन हैं। यदि बेटियों को बचपन से ही आत्मसम्मान, आत्मरक्षा और स्पष्ट सीमाएँ तय करने का संस्कार दिया जाए, तो वे किसी भी वातावरण में स्वयं की गरिमा की रक्षा कर सकती हैं। उसी प्रकार बेटों को भी यह सिखाया जाना चाहिए कि उत्सव का आनंद दूसरों की असुविधा पर आधारित नहीं हो सकता।
समाज को यह स्वीकार करना होगा कि नई पीढ़ी अलग सामाजिक संरचना में जी रही है। सहशिक्षा, डिजिटल मीडिया और वैश्विक प्रभावों ने उनके अनुभवों को व्यापक बना दिया है। ऐसे में पुरानी परिभाषाओं को ज्यों-का-त्यों लागू करना संभव नहीं। परंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि नई पीढ़ी परंपरा की जड़ों से जुड़ी रहे।
संतुलन ही समाधान है। न अंधानुकरण, न अंधविरोध। यदि विश्वविद्यालयों में होली का आयोजन होता है, तो उसे सुरक्षित, गरिमापूर्ण और स्वैच्छिक बनाया जाए। यदि कोई छात्र या छात्रा भाग नहीं लेना चाहता, तो उस पर दबाव न डाला जाए। यदि कोई भाग लेना चाहता है, तो उसकी स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए।
अंततः प्रश्न केवल होली का नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता का है। क्या हम स्वतंत्रता को संदेह की दृष्टि से देखेंगे, या उसे जिम्मेदारी के साथ स्वीकार करेंगे? क्या हम बेटियों को केवल संरक्षण की वस्तु मानेंगे, या उन्हें सक्षम और सजग नागरिक के रूप में देखेंगे?
होली का रंग तभी स्थायी होगा जब उसमें विश्वास और सम्मान की खुशबू हो। परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष तब समाप्त होगा जब हम समझेंगे कि दोनों का उद्देश्य समाज को बेहतर बनाना है।
त्योहारों का अर्थ केवल रस्में निभाना नहीं, बल्कि समय के साथ स्वयं को परखना भी है। यदि हम मर्यादा, गरिमा और सहमति को केंद्र में रखकर उत्सव मनाएँ, तो न तो परंपरा आहत होगी और न आधुनिकता।
समाज की प्रगति इसी में है कि वह अपनी जड़ों को संभालते हुए नई शाखाओं को फैलने दे। रंगों का यह पर्व हमें यही सिखाता है कि विविधता में भी समरसता संभव है—बस दृष्टिकोण संतुलित होना चाहिए।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)

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आरईसी लिमिटेड को नेशनल लीडरशिप समिट और अवार्ड्स 2026 में 2 अवार्ड मिले https://www.rashtratak.com/rec-limited-receives-2-awards-at-national-leadership-summit-and-awards-2026/ Tue, 03 Mar 2026 11:01:30 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1757 आरईसी लिमिटेड, विद्युत मंत्रालय के तहत महारत्न सीपीएसई और एक बड़ी एनबीएफसी कंपनी है, ने 27 फरवरी 2026 को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, मुंबई में

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आरईसी लिमिटेडविद्युत मंत्रालय के तहत महारत्न सीपीएसई और एक बड़ी एनबीएफसी कंपनी हैने 27 फरवरी 2026 को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंजमुंबई में हुए नेशनल लीडरशिप समिट और अवार्ड्स 2026 में दो बड़े नेशनल सम्मान पाकर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की।

आरईसी लिमिटेड के पूर्व डायरेक्टर (फाइनेंस) और सीएफओ श्री हर्ष बावेजा को मशहूर “इंडियाज़ मोस्ट इन्फ्लुएंशियल सीएफओ 2026” अवॉर्ड दिया गया। यह सम्मान मई 2024 से जनवरी 2026 तक डायरेक्टर (फाइनेंस) और चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान उनकी शानदार लीडरशिप और शानदार योगदान को पहचान देता है। श्री हर्ष बावेजा ने समारोह में खुद अवॉर्ड स्वीकार किया।

इसके अलावाआरईसी लिमिटेड को हेल्थकेयर एक्सेस के लिए सीएसआर में एक्सीलेंस के लिए इंडिया सीएसआर इनिशिएटिव्स एंड सोशल इम्पैक्ट अवार्ड से सम्मानित किया गयाजिससे इनक्लूसिव ग्रोथ और असरदार सोशल डेवलपमेंट के लिए ऑर्गनाइज़ेशन के मज़बूत कमिटमेंट की पुष्टि होती है। यह अवार्ड आरईसी की ओर से श्री आलोक सिंहचीफ प्रोग्राम मैनेजररीजनल ऑफिस – मुंबई ने लिया।

ये सम्मान आरईसी लिमिटेड की वित्तीय उत्कृष्टता में अग्रणी भूमिका और देश भर में सार्थक सामाजिक प्रभाव डालने की उसकी लगातार कोशिशों को रेखांकित करती हैं।

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आधुनिक संदर्भों पिता-पुत्र संस्कृति को नया आयाम दे https://www.rashtratak.com/modern-contexts-give-new-dimension-to-father-son-culture/ Tue, 03 Mar 2026 10:53:02 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1754 राष्ट्रीय पुत्र दिवस, जो प्रतिवर्ष 4 मार्च को मनाया जाता है, केवल एक पिता-पुत्र संस्कृति को जीवंतता देने

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राष्ट्रीय पुत्र दिवस, जो प्रतिवर्ष 4 मार्च को मनाया जाता है, केवल एक पिता-पुत्र संस्कृति को जीवंतता देने का ही उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था की आत्मा को स्पर्श करने वाला अवसर है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि पुत्र केवल परिवार की वंश परंपरा का वाहक नहीं, बल्कि संस्कारों, उत्तरदायित्वों और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतिनिधि है। आधुनिक समय में जब संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं, पीढ़ियों के बीच संवाद कम हो रहा है और विशेष रूप से पिता और पुत्र के बीच मानसिक दूरी बढ़ती जा रही है, तब यह दिवस एक गहन आत्ममंथन का अवसर बन जाता है। भारतीय चिंतन में पुत्र का अर्थ केवल जन्म से जुड़ा नहीं है। शास्त्रों में कहा गया है-“पुंनाम्नो नरकाद् यः त्रायते सः पुत्रः” अर्थात जो कुल और संस्कृति को पतन से बचाए वही सच्चा पुत्र है। इस परिभाषा में पुत्र को एक उत्तरदायी व्यक्तित्व के रूप में देखा गया है, जो अपने आचरण से परिवार की मर्यादा और मूल्यों की रक्षा करता है।
हमारे इतिहास और पुराणों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने पुत्र धर्म को सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्थापित किया। भगवान श्रीराम का जीवन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। जब राजा दशरथ ने परिस्थितिवश उन्हें चौदह वर्ष का वनवास दिया, तब श्रीराम ने बिना किसी विरोध, बिना किसी आक्रोश के पिता की आज्ञा को धर्म मानकर स्वीकार किया। यह केवल आज्ञापालन नहीं था, बल्कि परिवार और वचन की मर्यादा को सर्वोपरि रखने का संदेश था। श्रीराम ने यह सिद्ध किया कि अधिकारों से पहले कर्तव्य आते हैं और व्यक्तिगत सुख से ऊपर परिवार की प्रतिष्ठा होती है। आज का युग अधिकारों की चर्चा करता है, परंतु कर्तव्यों का स्मरण कम होता है। यही कारण है कि पिता-पुत्र संबंधों में संवाद का अभाव दिखाई देता है। पिता अक्सर अपने उत्तरदायित्वों की दौड़ में व्यस्त है और पुत्र प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के दबाव में उलझा हुआ है। दोनों के बीच भावनाओं का पुल कमजोर होता जा रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय पुत्र दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम इस दूरी को कम करें। पुत्र को केवल आर्थिक साधन या भौतिक सुविधाएँ नहीं चाहिए, उसे चाहिए समय, स्नेह और समझ। जब पिता अपने पुत्र के साथ बैठकर उसके सपनों, उसके डर, उसकी असफलताओं और उसकी आकांक्षाओं पर खुलकर बात करता है, तब संबंधों में विश्वास का संचार होता है। यही विश्वास भविष्य की मजबूत नींव बनता है।
आधुनिक संदर्भ में पुत्र के सामने चुनौतियाँ भी नई हैं। करियर की अनिश्चितता, सोशल मीडिया का प्रभाव, मानसिक तनाव और मूल्य भ्रम उसे अक्सर द्वंद्व में डाल देते हैं। समाज ने लड़कों से अपेक्षा की है कि वे कठोर बनें, अपनी भावनाएँ न प्रकट करें, हर परिस्थिति में मजबूत दिखें। परिणामस्वरूप कई बार वे भीतर से अकेले और दबावग्रस्त हो जाते हैं। राष्ट्रीय पुत्र दिवस इस मानसिक स्वास्थ्य के विषय को भी छूता है। यह माता-पिता को प्रेरित करता है कि वे अपने पुत्र से पूछें-“तुम सच में कैसा महसूस कर रहे हो?” यह एक साधारण प्रश्न नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की शुरुआत है। जब पुत्र को यह अनुभव होता है कि वह सुना जा रहा है, समझा जा रहा है, तब उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। भारतीय संस्कृति में पिता केवल अनुशासन का प्रतीक नहीं, बल्कि आदर्श का आधार रहा है। पुत्र वही सीखता है जो वह अपने पिता के आचरण में देखता है। यदि पिता सत्यनिष्ठ है, तो पुत्र में भी सत्य के प्रति सम्मान विकसित होगा। यदि पिता संयमी और धैर्यवान है, तो पुत्र भी वही गुण आत्मसात करेगा। इसलिए पिता की भूमिका केवल निर्देश देने की नहीं, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करने की है। श्रीराम ने केवल दशरथ की आज्ञा का पालन नहीं किया, बल्कि रघुकुल की उस परंपरा को जीवित रखा जिसमें वचन और मर्यादा सर्वोपरि मानी जाती थी। यह परंपरा केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता है।
भारतीय लोक-स्मृति में श्रवण कुमार पुत्र धर्म के सर्वाेच्च प्रतीक माने जाते हैं। उन्होंने अपने नेत्रहीन माता-पिता को कंधों पर बिठाकर तीर्थयात्रा कराते हुए यह सिद्ध किया कि सेवा केवल कर्तव्य नहीं, प्रेम का उत्कर्ष है। आधुनिक युग में यद्यपि परिस्थितियाँ बदल गई हैं, जीवन की गति तेज हो गई है और करियर की चुनौतियाँ अधिक जटिल हो गई हैं, फिर भी श्रवण का आदर्श अप्रासंगिक नहीं हुआ; बल्कि वह और अधिक आवश्यक हो गया है। आज के पुत्र का दायित्व है कि वह माता-पिता के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा रहे, उनसे संवाद बनाए रखे और उनकी आवश्यकताओं को समझे। सेवा का अर्थ अब केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि समय देना, उनकी बात सुनना, उनके एकाकीपन को समझना और उनके आत्मसम्मान की रक्षा करना है। भौतिक आकांक्षाओं की अंधी दौड़ में यदि माता-पिता उपेक्षित हो जाएँ, तो सफलता खोखली हो जाती है। त्याग का अर्थ यह नहीं कि करियर छोड़ दिया जाए, बल्कि यह है कि प्राथमिकताओं में परिवार को स्थान दिया जाए-व्यस्त दिनचर्या में भी नियमित संवाद, स्वास्थ्य का ध्यान, आवश्यक सहयोग और निर्णयों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। आधुनिक पुत्र अपने पेशेवर जीवन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए भी पारिवारिक जिम्मेदारियों का संतुलित निर्वाह कर सकता है, यदि वह अपने भीतर यह भाव जागृत रखे कि माता-पिता उसके अस्तित्व की जड़ हैं। जब करियर और कर्तव्य के बीच संतुलन स्थापित होता है, तब श्रवण की सेवा-भावना आधुनिक जीवन में जीवंत हो उठती है और पुत्र धर्म केवल कथा नहीं, व्यवहार बन जाता है।
पुत्र की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आधुनिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि वह परिवार से विमुख हो जाए। सच्ची स्वतंत्रता वही है जिसमें व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और अपने मूल्यों का सम्मान करे। पुत्र यदि अपने करियर में सफल होता है परंतु परिवार से दूर हो जाता है, तो वह सफलता अधूरी रह जाती है। परिवार की शक्ति केवल आर्थिक समृद्धि में नहीं, बल्कि भावनात्मक एकता में है। जब पुत्र अपने माता-पिता के त्याग और संघर्ष को समझता है, उनका सम्मान करता है और वृद्धावस्था में उनका सहारा बनता है, तब वह पुत्र धर्म का वास्तविक निर्वाह करता है। पुत्र केवल परिवार की आशा नहीं, राष्ट्र की संभावना भी है। इतिहास गवाह है कि जब-जब युवाओं ने अपने कर्तव्यों को पहचाना, तब-तब समाज में परिवर्तन आया। आज आवश्यकता है कि पुत्र संस्कृति को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा जाए। एक संस्कारवान पुत्र ही आदर्श नागरिक बन सकता है। यदि परिवार में सत्य, सेवा और संयम के मूल्य विकसित होंगे, तो वही मूल्य समाज में भी प्रसारित होंगे। इस प्रकार पुत्र का निर्माण केवल निजी विषय नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व भी है।
आज जब वैश्वीकरण और भौतिकता का प्रभाव बढ़ रहा है, तब परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन आवश्यक है। पुत्र को आधुनिक ज्ञान, तकनीकी दक्षता और वैश्विक दृष्टि मिलनी चाहिए, परंतु उसके भीतर भारतीयता की जड़ें भी गहरी हों। यदि वह विज्ञान में आगे बढ़े परंतु संस्कृति से कट जाए, तो विकास अधूरा रहेगा। यदि वह परंपरा में बंधा रहे और नवीनता को अस्वीकार करे, तो प्रगति रुक जाएगी। इसलिए संतुलन ही समाधान है। यही संतुलन पुत्र संस्कृति को नया आयाम दे सकता है। राष्ट्रीय पुत्र दिवस को संवाद और संकल्प का दिवस बनाएं। जब पिता का अनुभव और पुत्र का उत्साह मिलते हैं, तब परिवार सशक्त होता है। सशक्त परिवार ही सशक्त समाज और सशक्त राष्ट्र की आधारशिला है। हम अपने पुत्रों को केवल सफल नहीं, सार्थक बनाएं। उन्हें केवल ऊँचाई न दें, गहराई भी दें, केवल स्वतंत्रता न दें, उत्तरदायित्व भी दें, केवल संसाधन न दें, संस्कार भी दें। यदि हम श्रीराम की मर्यादा, श्रवण की सेवा भावना और आधुनिक युग की वैज्ञानिक दृष्टि को एक सूत्र में पिरो दें, तो ऐसा पुत्र तैयार होगा जो परंपरा का रक्षक और भविष्य का निर्माता दोनों होगा। यही पुत्र संस्कृति का नवोदय है, यही भारतीय परिवार व्यवस्था की शक्ति है और यही राष्ट्रीय पुत्र दिवस का सच्चा संदेश है।

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इसराजी देवी पब्लिक स्कूल में बच्चों के साथ रंगो का त्यौहार मनाया https://www.rashtratak.com/celebrated-the-festival-of-colors-with-children-at-israji-devi-public-school/ Sun, 01 Mar 2026 11:46:35 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1741 प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी इसराजी देवी पब्लिक स्कूल में बच्चों के साथ रंगो का त्यौहार

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प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी इसराजी देवी पब्लिक स्कूल में बच्चों के साथ रंगो का त्यौहार मनाया गया, *बच्चों ने इस मौके पर फूलों की होली खेले तथा गुलाल लगाकर एक दूसरे के साथ गले मिले,जहां बच्चों को इस त्यौहार के महत्व के बारे में शिक्षकों तथा स्कूल की विभागाध्यक्ष श्रीमती प्रियंका मैम द्वारा बताया गया।

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Puneet Mishra

 

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सेशेल्स गणराज्य के उपराष्ट्रपति, महामहिम श्री सेबेस्टियन पिल्लै ने एनबीसीसी के निगमित कार्यालय का दौरा किया। https://www.rashtratak.com/his-excellency-mr-sebastian-pillay-vice-president-of-the-republic-of-seychelles-visited-the-corporate-office-of-nbcc/ Tue, 24 Feb 2026 01:28:36 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1734 सेशेल्स में द्वीपीय अवसंरचना विकास पर विशेष ध्यान सेशेल्स गणराज्य के उपराष्ट्रपति, महामहिम श्री सेबेस्टियन पिल्लै ने एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल का

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सेशेल्स में द्वीपीय अवसंरचना विकास पर विशेष ध्यान

सेशेल्स गणराज्य के उपराष्ट्रपति, महामहिम श्री सेबेस्टियन पिल्लै ने एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए नई दिल्ली में एनबीसीसी (इंडिया) लिमिटेड के निगमित कार्यालय का दौरा किया। सेशेल्स प्रतिनिधिमंडल ने श्री के. पी. महादेवास्वामी, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, एनबीसीसी और कंपनी के अन्य वरिष्ठ अधिकारिगणों के साथ सेशेल्स की परियोजनाओं के बारे में विस्तृत विचार-विमर्श किया।

बैठक के दौरान, प्रतिनिधिमंडल को द्वीप के लगभग 139 एकड़ क्षेत्रफल के लिए अवसंरचना विकास की रूपरेखा प्रस्तुतीकरण में व्यापक प्रस्तुतियां दी गईं। प्रस्तावित विकास परियोजना में किफायती सामाजिक आवासमनोरंजन एवं आतिथ्य सत्कारप्रीमियम विला, खेल मैदान एवं सामाजिक अवसंरचना आदि शामिल होंगे। यह दौरा, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, एनबीसीसी द्वारा इस वर्ष जनवरी में सेशेल्स की अपनी यात्रा के दौरान सेशेल्स सरकार के साथ पूर्ववर्ती उच्च-स्तरीय विचार-विमर्श पर आधारित है। प्रतिनिधिमंडल को एनबीसीसी द्वारा हुलहुमाले, मालदीव्स में 2000 सामाजिक आवास परियोजना के सफल निष्पादन को दिखाकर एनबीसीसी की क्षमताओं से भी अवगत कराया गया। यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि परियोजना को पूर्ण करने में भारत से प्राप्त कुशल कार्यबल और निर्माण सामग्री ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। उपराष्ट्रपति और प्रतिनिधिमंडल ने एनबीसीसी की क्षमताओं पर अपना विश्वास व्यक्त किया तथा बैठक के दौरान प्रस्तुतीकरण में प्रदर्शित किए गए प्रयासों की सराहना की,

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अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस-डिजिटल युग में मातृभाषाओं को बचाना बड़ी चुनौती https://www.rashtratak.com/international-mother-language-day-saving-mother-tongues-in-the-digital-age-is-a-big-challenge/ Mon, 23 Feb 2026 02:18:24 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1731 21 फरवरी को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस केवल मातृभाषा संस्कृति को बचाने का अनुष्ठान ही नहीं,

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21 फरवरी को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस केवल मातृभाषा संस्कृति को बचाने का अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि मानवता की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव है। वर्ष 2026 में इसकी मुख्य थीम “बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की आवाज़” है, जो यह संकेत देती है कि भविष्य की भाषाई दिशा युवा पीढ़ी तय करेगी। यह वर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस दिवस की 25वीं वर्षगांठ-रजत जयंती का प्रतीक है। वर्ष 1999 में यूनेस्को द्वारा इसकी घोषणा की गई और 2000 से इसे वैश्विक स्तर पर मनाया जा रहा है। इस वर्ष का फोकस 13 से 18 वर्ष के युवाओं को भाषाई विविधता के संरक्षण, मातृभाषा में शिक्षा के विस्तार और डिजिटल युग में भाषाओं की भूमिका पर सक्रिय संवाद के लिए प्रेरित करना है। मातृभाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती, वह मनुष्य के मन, मस्तिष्क और संवेदनाओं की प्रथम अभिव्यक्ति है। बच्चा जब जन्म लेता है तो वह किसी औपचारिक शिक्षा से पहले अपनी माँ की ध्वनियों, लोरियों और संवादों के माध्यम से भाषा का संस्कार ग्रहण करता है। यही भाषा उसकी सोच, उसकी रचनात्मकता और उसकी पहचान का आधार बनती है। शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने पर बच्चों की समझ, विश्लेषण क्षमता और आत्मविश्वास में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। फिर भी वैश्विक स्तर पर लगभग 40 प्रतिशत बच्चों को उस भाषा में शिक्षा नहीं मिलती जिसे वे बोलते या समझते हैं।
इस दिवस का ऐतिहासिक संदर्भ हमें 21 फरवरी 1952 की उस त्रासदी की याद दिलाता है जब पूर्वी पाकिस्तान में अपनी मातृभाषा बांग्ला के सम्मान के लिए छात्रों ने आंदोलन किया और गोलीबारी में अनेक युवा शहीद हो गए। बाद में यही पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र होकर बांग्लादेश बना। उन शहीदों की स्मृति में यह दिवस भाषाई अधिकारों और अस्मिता का प्रतीक बन गया। यह हमें सिखाता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता का आधार है। वर्ष 2026 की थीम युवाओं की भागीदारी को केंद्र में रखती है। आज का युवा डिजिटल संसार में जी रहा है। सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऑनलाइन शिक्षा उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मातृभाषाओं के लिए पर्याप्त स्थान है? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक ओर तो विलुप्तप्राय भाषाओं के शब्दकोश, ध्वनि-संग्रह और अनुवाद प्रणाली विकसित कर उन्हें पुनर्जीवित कर सकता है, वहीं दूसरी ओर यदि तकनीक कुछ सीमित भाषाओं तक सिमट जाए तो भाषाई असमानता और गहरी हो सकती है। इसलिए युवाओं को तकनीक का उपयोग मातृभाषा सशक्तिकरण के लिए करना होगा-ऐप, ब्लॉग, पॉडकास्ट, यूट्यूब चैनल और डिजिटल पुस्तकालयों के माध्यम से अपनी भाषाओं को वैश्विक मंच देना होगा।
यूनेस्को का मानना है कि स्थायी समाज के लिए सांस्कृतिक और भाषाई विविधता बहुत जरूरी है। शांति के लिए अपने जनादेश के तहत यह संस्कृतियों और भाषाओं में अंतर को बनाए रखने के लिए काम करता है जो दूसरों के लिए सहिष्णुता और सम्मान को बढ़ावा देते हैं। बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक समाज अपनी भाषाओं के माध्यम से अस्तित्व में रहते हैं जो पारंपरिक ज्ञान और संस्कृतियों को स्थायी तरीके से प्रसारित और संरक्षित करते हैं। भाषाई विविधता लगातार खतरे में पड़ती जा रही है क्योंकि अधिकाधिक भाषाएं लुप्त होती जा रही हैं। मातृभाषा जीवन का आधार है, यह एक ऐसी भाषा होती है जिसे सीखने के लिए उसे किसी कक्षा की जरूरत नहीं पड़ती। जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं, वही व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है। लेकिन मानव समाज में कई दफा हमें मानवाधिकारों के हनन के साथ-साथ मातृभाषा के उपयोग को गलत भी बताया जाता रहा है।
भारत जैसे बहुभाषी देश में यह चुनौती और अवसर दोनों है। पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार पिछले कुछ दशकों में सैकड़ों भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। यह केवल शब्दों का खो जाना नहीं, बल्कि परंपराओं, लोककथाओं, लोकगीतों और जीवनदृष्टि का विलुप्त होना है। यदि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से विमुख हो जाएगी तो सांस्कृतिक जड़ों से उसका संबंध कमजोर हो जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहन मिले, स्थानीय साहित्य और लोकसंस्कृति को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाए, और युवाओं को अपनी भाषा में अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान किए जाएँ। आज एक बड़ा भ्रम यह है कि केवल विदेशी भाषा ही विकास का मार्ग है। निस्संदेह वैश्विक संपर्क के लिए अन्य भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी मातृभाषा की उपेक्षा करें।

मातृभाषा में शिक्षा से ही मौलिक चिंतन और नवाचार संभव है। भारत की नई शिक्षा नीति 2020 ने भी प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने पर बल दिया है। यह निर्णय वैज्ञानिक दृष्टि से भी उचित है, क्योंकि जब विद्यार्थी अपनी सहज भाषा में सीखता है तो वह केवल जानकारी ग्रहण नहीं करता, बल्कि उसे आत्मसात करता है।
हमारे देश में मातृभाषाओं के प्रति अनेक प्रकार के भ्रम फैले हैं, जिनमें एक भ्रम है कि अंग्रेजी विकास और ज्ञान की भाषा है। जबकि इस बात से यूनेस्को सहित अनेक संस्थानों के अनुसंधान यह सिद्ध कर चुके हैं कि अपनी भाषा में शिक्षा से ही बच्चे का सही एवं सर्वांगीण मायने में विकास हो पाता है। इस दृष्टि से मातृभाषा में शिक्षा पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। युवाओं में मातृभाषा के प्रति आकर्षण कैसे बढ़ाया जाए? पहला उपाय है-भाषा को बोझ नहीं, गौरव के रूप में प्रस्तुत करना। जब हम अपने साहित्यकारों, वैज्ञानिकों और महापुरुषों की उपलब्धियों को मातृभाषा से जोड़कर बताते हैं, तो युवाओं में स्वाभिमान जागृत होता है। दूसरा उपाय है-रचनात्मक मंच उपलब्ध कराना। कविता-पाठ, नाटक, वाद-विवाद, ब्लॉग लेखन और डिजिटल कंटेंट निर्माण के माध्यम से युवा अपनी भाषा में सृजन करें। तीसरा उपाय है-परिवार की भूमिका। घर में यदि संवाद मातृभाषा में होगा तो बच्चे में स्वाभाविक अनुराग उत्पन्न होगा। भाषाई विविधता के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। भारत में सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ हैं; प्रत्येक भाषा अपने साथ एक विशिष्ट जीवनदर्शन लेकर आती है। हमें यह समझाना होगा कि किसी भी भाषा को छोटा या बड़ा कहना अनुचित है। सभी भाषाएँ समान रूप से सम्माननीय हैं। हिन्दी राजभाषा है, परंतु अन्य भारतीय भाषाएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। संस्कृत हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपरा की धरोहर है, तो तमिल, बांग्ला, मराठी, गुजराती, उड़िया, असमिया, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी, कश्मीरी और अन्य भाषाएँ अपनी-अपनी सांस्कृतिक संपदा से राष्ट्र को समृद्ध करती हैं।
डिजिटल युग में युवाओं को यह संकल्प लेना चाहिए कि वे अपनी मातृभाषा में कम से कम एक रचनात्मक कार्य अवश्य करेंगे-चाहे वह एक ब्लॉग हो, एक कहानी, एक गीत या एक शैक्षिक वीडियो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद उपकरणों और भाषा मॉडल्स का उपयोग करके वे अपनी भाषा की सामग्री को वैश्विक पाठकों तक पहुँचा सकते हैं। इससे न केवल भाषा का संरक्षण होगा, बल्कि आर्थिक अवसर भी बढ़ेंगे। स्थानीय भाषाओं में स्टार्टअप, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल प्रकाशन नए रोजगार के द्वार खोल सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026 हमें यह संदेश देता है कि भाषाई विविधता ही मानवता की वास्तविक समृद्धि है। यदि हम सतत विकास का लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं तो समावेशी शिक्षा आवश्यक है, और समावेशी शिक्षा का आधार मातृभाषा है।

RS_January_2026__Page_01युवाओं की आवाज़ जब बहुभाषी शिक्षा के समर्थन में उठेगी, तभी समाज में व्यापक परिवर्तन संभव होगा। आज आवश्यकता है एक सामूहिक संकल्प की-हम अपनी मातृभाषा का सम्मान करेंगे, उसे डिजिटल मंचों पर प्रतिष्ठित करेंगे और आने वाली पीढ़ियों तक उसकी विरासत पहुँचाएँगे। भाषा हमारी आत्मा है; उसे जीवित रखना हमारा दायित्व है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर यही संदेश गूंजना चाहिए कि युवा ही भाषाई भविष्य के प्रहरी हैं। जब युवा अपनी जड़ों से जुड़ेंगे, तभी विश्व अधिक समावेशी, सहिष्णु और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनेगा।

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आकर्षक विज्ञापन, चमकदार पैकेजिंग और भ्रामक दावे https://www.rashtratak.com/attractive-advertising-shiny-packaging-and-misleading-claims/ Mon, 23 Feb 2026 02:13:46 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1727 भारत का पोषण परिदृश्य तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। लंबे समय तक सार्वजनिक नीति का

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भारत का पोषण परिदृश्य तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। लंबे समय तक सार्वजनिक नीति का केंद्र भूख, कुपोषण और खाद्य उपलब्धता रहा, परंतु आज देश दोहरे पोषण संकट का सामना कर रहा है। एक ओर बच्चों और महिलाओं में अल्पपोषण, रक्ताल्पता और अवरुद्ध वृद्धि जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं, तो दूसरी ओर मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी असंचारी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मानवीय विकास से भी जुड़ी हुई है।
इस परिवर्तन के पीछे खाद्य उपभोग की आदतों में आया बदलाव एक महत्त्वपूर्ण कारण है। पारंपरिक घरेलू भोजन की जगह अब डिब्बाबंद, पैकेटबंद और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ी है। इन उत्पादों में प्रायः शर्करा, नमक और संतृप्त वसा की मात्रा अधिक होती है। आकर्षक विज्ञापन, चमकदार पैकेजिंग और भ्रामक दावे उपभोक्ताओं को यह विश्वास दिलाते हैं कि ये उत्पाद सुरक्षित या स्वास्थ्यवर्धक हैं। परिणामस्वरूप उपभोक्ता वास्तविक पोषण मूल्य को समझे बिना निर्णय ले लेते हैं।
ऐसे परिवेश में पैकेज के अग्रभाग पर स्पष्ट और सरल लेबलिंग की आवश्यकता उभरकर सामने आती है। पारंपरिक पोषण तालिकाएँ प्रायः पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में दी जाती हैं, जिन्हें समझना सामान्य उपभोक्ता के लिए कठिन होता है। इसके विपरीत, पैकेज के सामने बड़े और स्पष्ट संकेत—जैसे “उच्च शर्करा”, “उच्च नमक” या “उच्च वसा”—उपभोक्ता को तुरंत सचेत कर सकते हैं। यह व्यवस्था सूचना को जटिलता से निकालकर व्यवहारिक स्तर पर उपलब्ध कराती है।
सूचित विकल्प का अधिकार उपभोक्ता संरक्षण का मूल आधार है। किंतु भोजन के संदर्भ में यह अधिकार केवल बाज़ार संबंधी नहीं, बल्कि जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ा हुआ है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसकी न्यायिक व्याख्या में स्वास्थ्य का अधिकार भी सम्मिलित है। यदि नागरिक को यह जानकारी ही उपलब्ध न हो कि कोई खाद्य पदार्थ उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है या नहीं, तो जीवन के अधिकार की सार्थकता अधूरी रह जाती है। अतः स्पष्ट लेबलिंग स्वास्थ्य के संवैधानिक अधिकार को व्यावहारिक रूप देने का साधन बन सकती है।
बाज़ार व्यवस्था में उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सूचना का असंतुलन एक सामान्य स्थिति है। उत्पादक को अपने उत्पाद की संरचना, अवयवों और संभावित प्रभावों की पूरी जानकारी होती है, जबकि उपभोक्ता सीमित जानकारी के आधार पर निर्णय लेता है। पैकेज के अग्रभाग पर लेबलिंग इस असंतुलन को कम करने का प्रयास करती है। जब जानकारी सरल, प्रत्यक्ष और चेतावनी के रूप में दी जाती है, तो उपभोक्ता अधिक सजग होकर चयन करता है।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव इस दृष्टिकोण की प्रभावशीलता को प्रमाणित करते हैं। उदाहरण के लिए, चिली में लागू स्पष्ट चेतावनी लेबलों के बाद उच्च शर्करा और उच्च वसा वाले उत्पादों की खपत में कमी देखी गई। इससे यह सिद्ध होता है कि यदि जानकारी सुलभ और स्पष्ट हो, तो उपभोक्ता व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
निवारक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह व्यवस्था अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। असंचारी बीमारियों के उपचार पर होने वाला व्यय परिवारों और सरकार दोनों के लिए भारी पड़ता है। यदि आहार संबंधी जोखिम कारकों को प्रारंभिक स्तर पर ही नियंत्रित किया जाए, तो दीर्घकाल में रोग-भार कम किया जा सकता है। सरल लेबलिंग उपभोक्ता को दैनिक जीवन के छोटे निर्णयों में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का अवसर देती है। यह उपचार के बजाय रोकथाम पर बल देने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को सुदृढ़ करती है।
विश्व स्तर पर भी स्पष्ट और व्याख्यात्मक लेबलिंग प्रणालियों को प्रभावी माना गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह रेखांकित किया है कि विशेषकर विकासशील देशों में सरल और चेतावनी-आधारित संकेत उपभोक्ता समझ को बढ़ाते हैं तथा आहार संबंधी व्यवहार में परिवर्तन लाने में सहायक होते हैं। यह केवल उपभोक्ता को ही नहीं, बल्कि उत्पाद निर्माताओं को भी अपने उत्पादों की संरचना में सुधार के लिए प्रेरित करता है।
उद्योग जगत का एक वर्ग यह तर्क देता है कि कठोर लेबलिंग से बिक्री घट सकती है और छोटे उत्पादक प्रभावित हो सकते हैं। किंतु अनुभव यह दर्शाता है कि जब स्पष्ट मानक निर्धारित होते हैं, तो उद्योग नवाचार और पुनर्संरचना के माध्यम से स्वयं को अनुकूलित कर लेता है। यदि उपभोक्ता उच्च शर्करा या नमक वाले उत्पादों से बचने लगते हैं, तो उत्पादक स्वाभाविक रूप से उनके स्तर को कम करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार लेबलिंग स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती है।
भारतीय संदर्भ में खाद्य नियमन का दायित्व भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के पास है। साथ ही, भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने भी जनस्वास्थ्य से जुड़े विषयों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व पर बल दिया है। यह स्पष्ट संकेत है कि खाद्य लेबलिंग केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यापक सार्वजनिक हित का विषय है।
फिर भी इस व्यवस्था के क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ हैं। पहली चुनौती उद्योग का प्रतिरोध है, जो इसे आर्थिक दृष्टि से हानिकारक मानता है। दूसरी चुनौती लेबलिंग के स्वरूप को लेकर मतभेद है—क्या चेतावनी आधारित मॉडल अपनाया जाए या किसी प्रकार की श्रेणीकरण प्रणाली। तीसरी चुनौती प्रवर्तन और निगरानी की है, क्योंकि देश में लाखों खाद्य उत्पाद उपलब्ध हैं। चौथी चुनौती उपभोक्ता साक्षरता की है, विशेषकर ग्रामीण और निम्न आय वर्गों में, जहाँ पोषण संबंधी जागरूकता सीमित है।
इन चुनौतियों का समाधान संतुलित और चरणबद्ध नीति के माध्यम से संभव है। व्यापक जन-जागरूकता अभियान, सरल प्रतीकों का प्रयोग और कठोर प्रवर्तन तंत्र इस दिशा में सहायक हो सकते हैं। विद्यालयों और सामुदायिक स्तर पर पोषण शिक्षा को सुदृढ़ करना भी आवश्यक है, ताकि लेबलिंग का संदेश प्रभावी ढंग से समझा जा सके।
अंततः, पैकेज के अग्रभाग पर लेबलिंग बदलते पोषण परिदृश्य में सूचित विकल्प के अधिकार को सशक्त बनाने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। यह उपभोक्ता को निष्क्रिय खरीदार से सक्रिय और जागरूक नागरिक में रूपांतरित करती है। पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और निवारक स्वास्थ्य के सिद्धांतों पर आधारित यह व्यवस्था भारत को उपचार-केंद्रित दृष्टिकोण से हटाकर स्वास्थ्य-उन्मुख खाद्य प्रणाली की ओर अग्रसर कर सकती है। यदि इसे दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक आधार और सामाजिक सहभागिता के साथ लागू किया जाए, तो यह एक स्वस्थ, सक्षम और जागरूक भारत की दिशा में निर्णायक कदम सिद्ध हो सकती है।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)

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शादी की बदलती तस्वीर: दिखावे, अहंकार और टूटते रिश्ते https://www.rashtratak.com/changing-picture-of-marriage-ego-and-broken-relationships/ Mon, 23 Feb 2026 02:08:51 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1724 भारतीय समाज में शादी केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रही है, बल्कि इसे हमेशा से परिवार, समाज

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भारतीय समाज में शादी केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रही है, बल्कि इसे हमेशा से परिवार, समाज और संस्कारों से जुड़ी एक पवित्र संस्था माना गया है। विवाह को जीवनभर का साथ, सुख-दुख में एक-दूसरे का संबल और सामाजिक स्थिरता की आधारशिला समझा जाता रहा है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस संस्था की तस्वीर तेजी से बदली है। आज शादी का मतलब साथ निभाने का संकल्प कम और सामाजिक प्रदर्शन अधिक होता जा रहा है। परिणामस्वरूप रिश्ते कमजोर हो रहे हैं और तलाक या अलगाव के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
आज यह एक कड़वी सच्चाई है कि लोग शादी पर 20–25 लाख रुपये या उससे भी अधिक खर्च कर रहे हैं, लेकिन उसी शादी के कुछ महीनों या दिनों तक चलने की कोई गारंटी नहीं रह गई है। आंकड़े बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में लगभग 40 से 50 प्रतिशत वैवाहिक रिश्ते टूटने की कगार पर हैं या पहले ही टूट चुके हैं। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समस्या का संकेत है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आने वाले समय में भारी पड़ सकता है।
इस संकट का सबसे बड़ा कारण है दिखावे की संस्कृति। शादी अब एक निजी निर्णय नहीं, बल्कि एक भव्य इवेंट बन चुकी है, जिसमें होटल, डेस्टिनेशन वेडिंग, महंगे कपड़े, फोटोशूट और सोशल मीडिया पोस्ट सबसे अहम हो गए हैं। लोग यह सोचने में अधिक समय लगाते हैं कि मेहमान क्या कहेंगे, रिश्तेदार कितने प्रभावित होंगे और इंस्टाग्राम पर तस्वीरें कैसी दिखेंगी। लेकिन यह सोचने का समय नहीं निकालते कि जिस इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी बितानी है, उसके विचार, स्वभाव, सहनशीलता और जीवन के प्रति दृष्टिकोण क्या हैं।
सोशल मीडिया ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। हर व्यक्ति खुद को बेहतर दिखाने की कोशिश में अपनी वास्तविकता छिपा रहा है। शादी से पहले बनाई गई यह “परफेक्ट इमेज” शादी के बाद धीरे-धीरे टूटती है और जब सच्चाई सामने आती है, तब निराशा, टकराव और असंतोष जन्म लेता है। लोग समझ पाते हैं कि वे जिस इंसान से शादी कर बैठे हैं, वह वैसा नहीं है जैसा उन्होंने कल्पना की थी।
दूसरा बड़ा कारण है धैर्य की कमी और अहंकार की अधिकता। आज के समय में लोगों का पेशेंस लेवल लगभग शून्य पर आ गया है, जबकि ईगो का स्तर सौ पर पहुंच चुका है। छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों में दरार आ जाती है। संवाद करने, समझाने और समझने की जगह लोग तुरंत निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि यह रिश्ता काम नहीं करेगा। “मैं क्यों समझौता करूँ?” और “मेरी खुशी सबसे ऊपर है” जैसी सोच रिश्तों को खोखला कर रही है।
पहले रिश्तों में समस्याएं आती थीं, लेकिन उन्हें सुलझाने की कोशिश की जाती थी। आज समस्याएं आते ही लोग अलग होने को सबसे आसान समाधान मान लेते हैं। रिश्तों को निभाने की जगह उन्हें बदल देने की मानसिकता बढ़ती जा रही है। यह उपभोक्तावादी सोच केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब रिश्तों में भी प्रवेश कर चुकी है।
एक और महत्वपूर्ण कारण है संयुक्त परिवार प्रणाली का टूटना और एकल परिवारों का बढ़ना। संयुक्त परिवारों में बच्चे बचपन से ही बड़ों को देखकर सहनशीलता, त्याग, जिम्मेदारी और रिश्तों को निभाने की कला सीखते थे। मतभेद होते थे, लेकिन उन्हें बातचीत और समझदारी से सुलझाया जाता था। आज एकल परिवारों में पले-बढ़े बच्चों को यह व्यवहारिक प्रशिक्षण बहुत कम मिल पाता है।
इसका मतलब यह नहीं कि एकल परिवार गलत हैं, लेकिन यह सच है कि उनमें सामूहिक जीवन का अनुभव सीमित होता है। परिणामस्वरूप जब युवा शादी के बाद नए रिश्तों और नई जिम्मेदारियों का सामना करते हैं, तो वे मानसिक रूप से उसके लिए तैयार नहीं होते। थोड़ी-सी असहमति भी उन्हें असहनीय लगने लगती है।
इसके साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता और बदलती सामाजिक भूमिका भी रिश्तों पर असर डाल रही है। आज महिलाएं आत्मनिर्भर हैं, जो एक सकारात्मक बदलाव है, लेकिन इसके साथ ही अपेक्षाओं का टकराव भी बढ़ा है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों को लेकर अधिक सजग हैं, जो सही भी है, लेकिन जब यह आपसी सम्मान और संवाद के बिना होता है, तब टकराव की स्थिति बन जाती है। बराबरी का अर्थ सहयोग होना चाहिए, न कि प्रतिस्पर्धा।
एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि आज की पीढ़ी लंबे समय तक किसी एक निर्णय पर टिके रहने से डरती है। करियर हो, शहर हो या रिश्ता—हर जगह “अगर बेहतर विकल्प मिल जाए” वाली सोच हावी है। यही सोच शादी जैसे स्थायी संबंध को अस्थिर बना रही है। जब हर समय यह भावना बनी रहे कि इससे बेहतर कुछ और मिल सकता है, तो किसी भी रिश्ते में संतोष और स्थिरता संभव नहीं रह जाती।
इन सभी कारणों के चलते यह आशंका बढ़ रही है कि आने वाले समय में लोग शादी जैसी संस्था से ही दूरी बनाने लगेंगे। कुछ लोग पहले ही विवाह को बोझ या जोखिम के रूप में देखने लगे हैं। यदि यह प्रवृत्ति यूँ ही बढ़ती रही, तो इसका असर केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक ढांचे पर भी पड़ेगा। परिवार, जो समाज की सबसे छोटी इकाई है, यदि कमजोर होगा तो समाज की स्थिरता भी खतरे में पड़ जाएगी।
हालांकि, यह कहना गलत होगा कि समस्या का कोई समाधान नहीं है। असल समस्या शादी में नहीं, बल्कि शादी के प्रति हमारी सोच और प्राथमिकताओं में है। जरूरत है दिखावे और फिजूलखर्ची को कम कर, आपसी समझ, संवाद और भावनात्मक जुड़ाव को प्राथमिकता देने की। शादी से पहले एक-दूसरे को समय देना, खुलकर बातचीत करना और अपेक्षाओं को स्पष्ट रखना बेहद जरूरी है।
इसके साथ ही समाज और परिवारों को भी यह समझना होगा कि शादी केवल रस्मों और परंपराओं का पालन नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों को मानसिक रूप से जोड़ने की प्रक्रिया है। युवाओं को यह सिखाने की आवश्यकता है कि रिश्ते परफेक्ट नहीं होते, उन्हें धैर्य, सम्मान और समझदारी से मजबूत बनाया जाता है।
अंततः यह समय आत्ममंथन का है। यदि हम आज भी केवल दिखावे, अहंकार और जल्दबाजी को ही प्राथमिकता देते रहे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए रिश्ते केवल अस्थायी समझौते बनकर रह जाएंगे। लेकिन यदि हम समय रहते अपनी सोच बदले, तो शादी जैसी संस्था को फिर से विश्वास, स्थिरता और सम्मान का आधार बनाया जा सकता है। समाज का भविष्य इसी संतुलन पर निर्भर करता है।
  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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भारत का एआई नेतृत्व तकनीक एवं मानवीय मूल्यों का संगम बने https://www.rashtratak.com/indias-ai-leadership-should-be-a-confluence-of-technology-and-human-values/ Sun, 22 Feb 2026 03:10:55 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1718 दिल्ली इन दिनों केवल भारत की राजनीतिक राजधानी भर नहीं, बल्कि उभरती तकनीकी चेतना का वैश्विक केंद्र बनी

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दिल्ली इन दिनों केवल भारत की राजनीतिक राजधानी भर नहीं, बल्कि उभरती तकनीकी चेतना का वैश्विक केंद्र बनी हुई है। ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब प्रयोगशालाओं या कॉरपोरेट दफ्तरों तक सीमित तकनीक नहीं रही, बल्कि वह विकास की नई परिभाषा गढ़ने की दिशा में अग्रसर है। दुनिया के विभिन्न देशों, तकनीकी कंपनियों, शोध संस्थानों और नीति-निर्माताओं की उपस्थिति ने इस सम्मेलन को वैश्विक विमर्श का मंच बना दिया है। यह आयोजन इस तथ्य का उद्घोष है कि भारत केवल उपभोक्ता राष्ट्र नहीं, बल्कि एआई युग का नेतृत्वकर्ता बनने की तैयारी में है। आज विश्व जिस तकनीकी संक्रमण से गुजर रहा है, उसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता निर्णायक भूमिका निभा रही है। स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, व्यापार, प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन, शासन और आर्थिक विकास-हर क्षेत्र में एआई समाधान की नई संभावनाएँ खोल रहा है। ऐसे समय में भारत का दृष्टिकोण केवल तकनीकी उन्नति तक सीमित नहीं, बल्कि वह इसे मानव-केंद्रित विकास के साथ जोड़ने का प्रयास कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि तकनीक का अंतिम लक्ष्य मानवता की सेवा होना चाहिए, न कि केवल लाभ और वर्चस्व की दौड़।

 


भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। यदि इस ऊर्जा को गणित, भौतिकी, कंप्यूटर विज्ञान और डाटा विज्ञान जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाए तो भारत एआई अनुसंधान और नवाचार में विश्व की अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो सकता है। विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। हमें ऐसे संस्थानों की आवश्यकता है जो वास्तविक शोध और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दें, न कि केवल झूठे दावों और विज्ञापन के बल पर प्रतिष्ठा अर्जित करने का प्रयास करें। शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता ही उस आधारशिला को मजबूत करेगी जिस पर भारत का एआई भविष्य खड़ा होगा। यह सवाल उठाया जा रहा है कि भारत आज व्यवहार में एआई व रोबोटिक्स के अनुसंधान में कहां खड़ा है? आखिर गलगोटिया यूनिवर्सिटी के नीति-नियंताओं ने यह क्यों नहीं सोचा कि चीन निर्मित एक रोबोट को अपनी उपलब्धि बताने से देश की प्रतिष्ठा को आंच आएगी? अब यूनिवर्सिटी की तरफ से सफाई दी जा रही है कि उसने रोबोट के निर्माण का दावा नहीं किया। वहीं दूसरी ओर उन सरकारी अधिकारियों की भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए, जिन्होंने बिना जांच-पड़ताल के विश्वविद्यालय को एआई समिट में स्टॉल लगाने की अनुमति क्यों दी। निश्चित रूप से भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीक व रोबोटिक उत्पादन के क्षेत्र में ऊंची छलांग लगाई है। युवा शक्ति के देश भारत ने एआई के क्षेत्र में अमेरिका व चीन के बाद अपना तीसरा स्थान बनाया है। जिसकी पुष्टि अंतर्राष्ट्रीय मानक संस्थाओं ने भी की है। लेकिन एक विरोधाभासी हकीकत यह है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ी आबादी का देश है, जहां श्रम शक्ति प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई की भूमिका क्रांतिकारी सिद्ध हो सकती है। रोगों की प्रारंभिक पहचान, सटीक निदान, दवाओं के शोध और ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीमेडिसिन सेवाओं के विस्तार में एआई नई संभावनाएँ लेकर आया है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जहाँ स्वास्थ्य संसाधनों का असमान वितरण है, वहाँ एआई आधारित समाधान दूरस्थ क्षेत्रों तक बेहतर सेवाएँ पहुँचाने में सहायक हो सकते हैं। इसी प्रकार कृषि क्षेत्र में मौसम पूर्वानुमान, मृदा विश्लेषण, फसल प्रबंधन और आपूर्ति श्रृंखला के अनुकूलन में एआई किसानों की आय बढ़ाने और जोखिम कम करने का माध्यम बन सकता है। जलवायु परिवर्तन की चुनौती भी आज मानवता के सामने विकराल रूप में उपस्थित है। चरम मौसम की घटनाएँ, जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन विकास की गति को प्रभावित कर रहे हैं। एआई आधारित मॉडलिंग और डेटा विश्लेषण से प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान, संसाधनों का बेहतर प्रबंधन और टिकाऊ नीतियों का निर्माण संभव है। यदि भारत इन क्षेत्रों में एआई का प्रभावी उपयोग करता है तो वह वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए एक मार्गदर्शक मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
शासन और आर्थिक विकास के क्षेत्र में भी एआई पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। सार्वजनिक सेवाओं के डिजिटलीकरण, भ्रष्टाचार पर अंकुश, नीति निर्माण में डेटा-आधारित निर्णय और वित्तीय समावेशन के विस्तार में एआई की महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे न केवल प्रशासनिक प्रक्रियाएँ सरल होंगी, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी मजबूत होगा। आर्थिक दृष्टि से एआई नवाचार, स्टार्टअप संस्कृति और विनिर्माण क्षेत्र में नई ऊर्जा भर सकता है, जिससे रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। किन्तु इस उजाले के साथ कुछ गहरी छायाएँ भी हैं। एआई के बढ़ते प्रभाव से रोजगार संरचना में परिवर्तन स्वाभाविक है। अनेक पारंपरिक नौकरियाँ समाप्त हो सकती हैं और नई कौशल-आधारित नौकरियों की माँग बढ़ेगी। यदि कौशल विकास और पुनर्प्रशिक्षण पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो असमानता और बेरोजगारी की समस्या गहरा सकती है। इसी प्रकार डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा, डीपफेक और निगरानी जैसे प्रश्न लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चुनौती बन सकते हैं। तकनीक का दुरुपयोग सामाजिक विभाजन और सूचना के दुष्प्रचार को बढ़ा सकता है।
इसलिए आवश्यक है कि एआई के विकास के साथ नैतिक ढाँचे और नियामक व्यवस्था भी सुदृढ़ हो। भारत को ऐसा मॉडल विकसित करना होगा जिसमें नवाचार की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन बना रहे। “मानवता केंद्र में” का सिद्धांत केवल नारा न बने, बल्कि नीति और व्यवहार में परिलक्षित हो। एआई का उपयोग यदि समावेशी विकास, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के लिए किया जाए तो यह तकनीक समाज के कमजोर वर्गों के लिए अवसरों का द्वार खोल सकती है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो चीन और अमेरिका एआई के क्षेत्र में तीव्र प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। भारत के सामने चुनौती है कि वह इस दौड़ में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए। भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा, विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और विशाल बाजार उसे एक अलग सामर्थ्य प्रदान करते हैं। यदि वह अनुसंधान में निवेश, स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के सुदृढ़ीकरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राथमिकता दे तो वह एआई के क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए सस्ती, सुलभ और मानव-केंद्रित तकनीक उपलब्ध कराकर भारत एक नैतिक नेतृत्व स्थापित कर सकता है।


‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह सम्मेलन केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि भविष्य की संरचना का प्रारूप है। यहाँ से निकले संकल्प यदि नीति और क्रियान्वयन में रूपांतरित होते हैं तो भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम बढ़ा सकेगा। यह अवसर है कि हम एआई को केवल आर्थिक लाभ का साधन न मानें, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन और मानव कल्याण के माध्यम के रूप में देखें। आज जब दुनिया में मानवीय मूल्यों का क्षरण चिंता का विषय है, तब भारत के पास अवसर है कि वह तकनीक और नैतिकता के समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत करे। एआई का विकास यदि करुणा, समावेशन और सतत विकास के आदर्शों के साथ हो तो यह मानवता के लिए वरदान सिद्ध होगा। भारत को अपने युवाओं, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के माध्यम से यह सुनिश्चित करना होगा कि एआई की यात्रा मानवता के उत्थान की यात्रा बने, न कि केवल प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की।
निस्संदेह, ऐसे वक्त में जब कृषि से लेकर चिकित्सा तक और उत्पादन के क्षेत्र में एआई व रोबोटिक्स की दखल बढ़ रही है, प्रचुर श्रमशक्ति की उपलब्धता के बावजूद भारत को समय के साथ कदमताल करनी होगी। हमें एआई व रोबोटिक्स को अपनाना ही होगा। लेकिन सावधानी के साथ ताकि यह नौकरी खाने वाला बनने के बजाय नौकरी देने वाला बने। समय की पुकार है कि हम तकनीकी प्रगति को राष्ट्रीय संकल्प में बदलें। शिक्षा, अनुसंधान, कौशल विकास और नैतिक नेतृत्व के सहारे भारत एआई युग में एक नई पहचान गढ़ सकता है। यदि हम चुनौतियों को स्वीकार कर दूरदर्शिता से आगे बढ़ें तो यह युग भारत के लिए केवल तकनीकी उन्नति का नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व और मानवीय पुनर्जागरण का युग सिद्ध हो सकता है।

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तकनीकी यात्रा में मील का पत्थर” चिप्स “की जंग में भारत की एंट्री https://www.rashtratak.com/milestone-in-technological-journey-indias-entry-in-the-war-of-chips/ Sun, 22 Feb 2026 03:01:26 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1715 (सेमीकंडक्टर सहयोग और बदलती वैश्विक रणनीति) डॉ. प्रियंका सौरभ भारत और अमेरिका के बीच सेमीकंडक्टर तथा उन्नत तकनीकी

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(सेमीकंडक्टर सहयोग और बदलती वैश्विक रणनीति)
डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत और अमेरिका के बीच सेमीकंडक्टर तथा उन्नत तकनीकी सहयोग को लेकर हुआ हालिया करार केवल एक द्विपक्षीय समझौता नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन, तकनीकी प्रभुत्व और आर्थिक सुरक्षा की दिशा में एक निर्णायक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। इक्कीसवीं सदी में जिस तरह तेल को बीसवीं सदी की सबसे रणनीतिक वस्तु माना गया था, उसी तरह आज सेमीकंडक्टर को आधुनिक दुनिया की रीढ़ कहा जा सकता है। मोबाइल फोन से लेकर मिसाइल प्रणाली, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर ऑटोमोबाइल उद्योग तक—हर क्षेत्र में चिप्स की अनिवार्यता ने इसे भू-राजनीति का केंद्र बना दिया है। ऐसे में भारत का पैक्स सिलिका जैसे ढांचों में शामिल होना और अमेरिका के साथ गहरा सहयोग स्थापित करना दूरगामी महत्व रखता है।RS_January_2026__Page_01
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला की कमजोरियां खुलकर सामने आई हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान चिप संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि कुछ गिने-चुने देशों और कंपनियों पर अत्यधिक निर्भरता पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकती है। इस निर्भरता का सबसे बड़ा केंद्र चीन और ताइवान क्षेत्र रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने इसे केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के रूप में देखा है। इसी पृष्ठभूमि में भारत जैसे लोकतांत्रिक, स्थिर और तेजी से उभरते बाजार वाले देश की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत लंबे समय तक सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में एक सीमित भूमिका निभाता रहा है, जहां उसका योगदान मुख्यतः चिप डिजाइन और आईटी सेवाओं तक सीमित था। हालांकि निर्माण, कच्चे माल की शुद्धता, और अत्याधुनिक फैब्रिकेशन जैसी क्षमताओं में देश पीछे रहा। हालिया समझौते इस कमी को दूर करने की दिशा में संकेत देते हैं। अमेरिका के साथ साझेदारी भारत को न केवल तकनीकी ज्ञान और निवेश उपलब्ध कराएगी, बल्कि वैश्विक मानकों के अनुरूप एक मजबूत और भरोसेमंद सप्लाई चेन का हिस्सा भी बनाएगी।
इस सहयोग का एक महत्वपूर्ण पहलू दुर्लभ खनिजों और उच्च गुणवत्ता वाले सिलिकॉन जैसे कच्चे माल से जुड़ा है। सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है, उनमें से कई का वैश्विक नियंत्रण चीन के पास है। यह स्थिति रणनीतिक जोखिम पैदा करती है। भारत-अमेरिका सहयोग इस निर्भरता को कम करने और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने की दिशा में अहम कदम है। भारत के पास खनिज संसाधनों की संभावनाएं हैं, जिन्हें तकनीक और निवेश के माध्यम से वैश्विक आपूर्ति शृंखला से जोड़ा जा सकता है।
आर्थिक दृष्टि से यह करार भारत के लिए बड़े अवसर खोलता है। सेमीकंडक्टर उद्योग पूंजी-प्रधान होने के साथ-साथ रोजगार सृजन की अपार क्षमता रखता है। एक फैब्रिकेशन यूनिट के आसपास पूरा एक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होता है, जिसमें आपूर्तिकर्ता, अनुसंधान संस्थान, स्टार्टअप्स और कुशल मानव संसाधन शामिल होते हैं। इससे न केवल प्रत्यक्ष रोजगार बढ़ेगा, बल्कि उच्च तकनीकी कौशल वाले युवाओं के लिए नए रास्ते खुलेंगे। यह भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश को वास्तविक आर्थिक शक्ति में बदलने में सहायक हो सकता है।
रणनीतिक स्तर पर यह साझेदारी भारत की विदेश नीति में भी एक नया आयाम जोड़ती है। भारत लंबे समय से “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति का पालन करता आया है, जहां वह किसी एक शक्ति गुट पर निर्भर न रहते हुए अपने हितों के अनुसार सहयोग करता है। अमेरिका के साथ यह तकनीकी सहयोग उसी संतुलन का उदाहरण है। यह भारत को पश्चिमी देशों के साथ निकटता तो देता है, लेकिन साथ ही उसे वैश्विक आपूर्ति शृंखला में एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में स्थापित करता है। इससे भारत की वैश्विक सौदेबाजी क्षमता भी मजबूत होती है।
हालांकि इस पूरे परिदृश्य में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सेमीकंडक्टर निर्माण अत्यंत जटिल और लागत-भारी प्रक्रिया है, जिसमें निरंतर नवाचार, स्थिर नीतिगत समर्थन और दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता होती है। भारत में बुनियादी ढांचे, बिजली की गुणवत्ता, जल उपलब्धता और कुशल श्रमबल जैसी समस्याओं को हल किए बिना इस उद्योग में वैश्विक प्रतिस्पर्धा संभव नहीं है। इसके अलावा, तकनीकी हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा अधिकारों से जुड़े मुद्दे भी संवेदनशील हैं, जिनका संतुलित समाधान आवश्यक होगा।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत इस सहयोग को केवल आयात-प्रतिस्थापन तक सीमित रखेगा या इसे नवाचार-आधारित आत्मनिर्भरता में बदल पाएगा। यदि भारत केवल विदेशी कंपनियों के लिए एक उत्पादन स्थल बनकर रह जाता है, तो दीर्घकालिक लाभ सीमित होंगे। आवश्यकता इस बात की है कि देश में अनुसंधान और विकास को समानांतर रूप से बढ़ावा दिया जाए, विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच गहरा तालमेल बने, और घरेलू स्टार्टअप्स को इस पारिस्थितिकी तंत्र में स्थान मिले। तभी भारत वास्तव में सेमीकंडक्टर क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ सकता है।
भू-राजनीतिक संदर्भ में यह करार एक स्पष्ट संदेश भी देता है। यह संदेश केवल चीन को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को है कि लोकतांत्रिक देश मिलकर तकनीकी आपूर्ति शृंखला को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और विविधतापूर्ण बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वह किसी नए ध्रुवीकरण का मोहरा न बने, बल्कि अपनी विकासात्मक प्राथमिकताओं को केंद्र में रखे।
अंततः, भारत और अमेरिका के बीच सेमीकंडक्टर सहयोग भविष्य की उस दुनिया की झलक देता है जहां तकनीक, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा आपस में गहराई से जुड़ी होंगी। यह भारत के लिए एक अवसर है कि वह खुद को केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में स्थापित करे। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नीतिगत इच्छाशक्ति, संस्थागत क्षमता और दीर्घकालिक दृष्टि को किस हद तक व्यवहार में उतारा जाता है। यदि यह संतुलन साध लिया गया, तो यह करार भारत की तकनीकी यात्रा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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