भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है और हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों काअनुपालन करते हुए ग्रामीण इलाकों में निवास कर रहे नागरिक आपस मेंभाई–चारे के साथ मिलजुलकर रहते आए हैं। इस दृष्टि से देखा जाय तोसहकार की भावना हम भारतीयों के डीएनए में है।
इसी विषय के दृष्टिगत एकबार पुनः आज भारत के प्रत्येक गांव को खुशहाल एवं समृद्ध बनाने की लिएसमस्त गावों को सहकारिता से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। “सहकार सेसमृद्धि” का नारा भी इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर दिया गया है। भारत मेंआज सहकारी समितियों की स्थापना को बढ़ावा दिया जा रहा है क्योंकिं भारतमें सहकारी समतियां, स्व–सहायता, स्व–जिम्मेदारी, लोकतंत्र, समानता, न्यायएवं एकजुटता जैसे भारतीय मूल्यों के आधार पर कार्य करती हुई दिखाई देतीहैं। साथ ही, जिन 7 सिद्धांतों के आधार पर इन समितियों के कार्य करने कीअपेक्षा रहती है, उससे इन समितियों के सफल होने की सम्भावना बढ़ जाती है।यह 7 सिद्धांत हैं – खुली और स्वैच्छिक सदस्यता; लोकतांत्रिक तरीके सेसदस्यों की भागीदारी; सदस्यों की आर्थिक भागीदारी; स्वायत्तता और स्वतंत्रता; शिक्षा, प्रशिक्षण और सूचना: कोआपरेटिव के बीच सहयोग; समुदाय के प्रतिसरोकार।
सहकारिता वह संगठन है जिसके द्वारा दो या दो से अधिक व्यक्ति स्वेच्छापूर्णमिलजुल कर समान स्तर पर आपसी आर्थिक हितों की वृद्धि करते हैं। इसप्रकार सहकारिता उस आर्थिक व्यवस्था को कहते हैं जिसमें मनुष्य किसीआर्थिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिलजुल कर कार्य करते हैं। समृद्धि केवलधन–संपत्ति से कहीं अधिक है, यह तब होती है जब सभी लोगों कोफलने–फूलने का अवसर और स्वतंत्रता प्राप्त होती है। समृद्धि एक समावेशीसमाज पर आधारित होती है, जिसमें एक मजबूत सामाजिक अनुबंध होता हैजो प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा करता है।सहकारिता का मुख्य उद्देश्य सदस्यों के जीवन को बेहतर बनाना औरसामाजिक–आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। यह एक ऐसा संगठन है जोसदस्यों को सशक्त बनाता है और उन्हें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिएएक साथ काम करने का अवसर प्रदान करता है।
भारत में आर्थिक विकास को गति देने के उद्देश्य से सहकारिता आंदोलन कोसफल बनाना बहुत जरूरी है। वैसे तो हमारे देश में सहकारिता आंदोलन कीशुरुआत वर्ष 1904 से हुई है एवं तब से आज तक सहकारी क्षेत्र में लाखोंसमितियों की स्थापना हुई है। कुछ अत्यधिक सफल रही हैं, जैसे अमूल डेयरी, परंतु इस प्रकार की सफलता की कहानियां बहुत कम ही रही हैं। कहा जाता हैकि देश में सहकारिता आंदोलन को जिस तरह से सफल होना चाहिए था, वैसाहुआ नहीं है। बल्कि, भारत में सहकारिता आंदोलन में कई प्रकार की कमियां हीदिखाई दी हैं। देश की अर्थव्यवस्था को शीघ्र ही यदि 5 लाख करोड़ अमेरिकीडालर के आकार का बनाना है तो देश में सहकारिता आंदोलन
