(संस्थापक एवं संचालक, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान)
पूनो की इस रात्रि को जो भी साधक ब्रह्मज्ञान की ध्यान-साधना करते हुए जागृत रहते हैं,उनको माँ लक्ष्मी आध्यात्मिक एवं भौतिक ‘श्री’ का वरदान देती हैं।
प्रिय पाठकगणों, आप सभी ने अपने जीवन में खीर खाने का आनंद तो अवश्य ही उठाया होगा। और साल में एक ऐसा दिन भी आया होगा, जब पकाई गई खीर को रात भर चंद्रमा की रोशनी में रखने के बाद ही खाया होगा। यह पावन दिवस प्रति वर्ष आश्विन मास कीपूर्णिमा को आता है। इस दिन को हम सभी ‘शरद पूर्णिमा’ या ‘कोजागरी व्रत’ के नाम से जानते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिवस की चाँदनी से स्निग्ध हुई खीर के औषधीय गुण बहुत बढ़ जाते हैं। इसलिए उसके सेवन से सिर्फ जिह्वा को स्वाद नहीं,अपितु हमारे पूरे शरीर को फायदा पहुंचता है। यूँ तो हम सभी के लिए इस दिन की बस यही विशेषता है। पर वैदिक ऋषियों व आचार्यों ने शरद ऋतु की इस पूर्णिमा के अनेक पक्षों पर प्रकाश डाला। आइए, इस लेख द्वारा हम उन सभी पक्षों से परिचित होते हैं, ताकि इस पर्व का पूरा लाभ व आनंद पा सकें।
‘पित्त-शामक’ शरद पूर्णिमा
सदियों से इस पर्व के दिन खीर, पोहा (चिवड़ा) व मुरमुरे खाने की प्रथा रही है। इन सभी को चंद्रमा की रोशनी में भीगने के लिए रात भर छोड़ दिया जाता है। फिर अगली सुबह हीइनका सेवन करने की रीत है। इस पर्व को सिर्फ पारिवारिक स्तर पर ही नहीं मनाया जाता। बल्कि जन-कल्याण हेतु इस दिन कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ विशेष शिविरों का आयोजन करती हैं। इन शिविरों में प्रतिभागियों को चाँदनी में भीगी खीर के साथ आयुर्वेदिक दवाइयों का सेवन कराया जाता है। इससे पुरानी खाँसी, दमा, जुकाम के रोगियों को काफी राहत मिलती है।
असल में, आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार हमारे शरीर में स्थित तीन पदार्थ शरीर की सभी उपापचयी क्रियाओं का संचालन करते हैं। ये हैं- ‘वात’, ‘पित्त’ और ‘कफ’। इन तीनों केस्तर में मौसम और खान-पान से बदलाव आता है, जिसका सीधा और गहरा असर हमारे शरीर और मन पर पड़ता है। शरद ऋतु में अक्सर ‘पित्त’ का स्तर ‘वात’ और ‘कफ’ की तुलना में बढ़ जाता है। पित्त की इस असंतुलित बढ़ी मात्रा को एलोपैथी में ‘स्ट्रांग मेटाबॉलिज़्म’ से जाना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार इसको शांत करने का उपाय ठंडी तासीर के खाद्य पदार्थों का सेवन होता है। और आपको बता दें कि ऐसे में चावल और दूध अत्यंत लाभकारी साबित होते हैं, क्योंकि इन दोनों की तासीर ठंडी होती है। ऋषि-मुनियों ने इसी तथ्य को ध्यान में रखकर शरद पूर्णिमा के दिन खीर खाने की प्रथा बनाई ताकि शरीर में इन तीनों ऊर्जाओं की मात्रा संतुलित रहे और हम पूर्ण रूप से स्वस्थ रहें।
भारतीय पुराणों में चंद्रमा को ‘सोम’ अर्थात् ‘पौधों-वनस्पतियों का देव’ माना गया है। शरद पूर्णिमा के दिन चाँद अन्य दिनों की तुलना में धरती के ज़्यादा नजदीक होता है। तोजाहिर सी बात है कि इस दिन चाँद की किरणों का प्रभाव भी खाद्य पदार्थों पर ज़्यादा और गहरा होता होगा। ऐसे में, खीर को चाँद की रोशनी में, मिट्टी के पात्रों में पकाने पर खीर की औषधीय गुणवत्ता का अधिक हो जाना स्वाभाविक ही है। ‘साधारण’ खीर से ‘बहुमूल्य औषधि’ में परिवर्तित हुई यह खीर इंसान के शरीर को सर्दी के मौसम में होने वाली बीमारियों से लड़ने के लिए तैयार तो करती ही है; साथ ही, ऐसी खीर के साथ विशेष रूप से निर्मित आयुर्वेदिक दवाई लेने पर कई पुरानी बीमारियों का इलाज होना भी संभव होता है।
‘ध्यान-अनुकूल’ शरद पूर्णिमा
खगोल-भौतिकी (ऐस्ट्रोफिज़िक्स) के अनुसार धरती के चारों तरफ चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटिक फील्ड) है। सौर वायु के कारण इस चुंबकीय क्षेत्र का आकार विकृत हो जाता है। इस कारण से भूगोलीय चुंबक-क्षेत्र का वर्ग सूर्य की उलट दिशा में फैल जाता है। वैज्ञानिक इस फैलाव को ‘मैग्नेटो-टेल’ से संबोधित करते हैं।
इस संदर्भ में, अमरीका के मैरीलैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ता ‘डॉ. टिम स्टब्स’ कहते हैं- ‘महीने में एक बार ऐसा होता है, जब चाँद धरती के चारों तरफ घूमते हुए मैग्नेटो-टेल के संपर्क में आता है। जब ऐसा होता है, तो समझ लेना चाहिए कि वह पूर्णमासी का दिन है।’ आगे वे बताते हैं- ‘तब चंद्रमा पर भूगोलीय चुंबक-क्षेत्र के चार्ज्ड अणुओं (इलेक्ट्रॉन्स और प्रोटोन्स) का सीधा और गहरा असर देखा जाता है। इस कारण रात्रि के समय पूनो के चाँद की सतह की वोल्टेज में भारी बदलाव आता है।’ यह –200 की औसतन वोल्टेज से उछलकर –1000 वोल्टेज तक पहुँच जाती है। वहीं धरती की सतह को विज्ञान के अनुसार न्यूट्रल (0 वोल्ट) माना गया है। भौतिकी का सिद्धांत कहता है कि जब दो सतहों की वोल्टेज में फर्क होता है, तो उनके बीच ऊर्जा प्रवाहित होती है। यही कारण है कि पूर्णमासी के दिन धरती पर चाँद की ऊर्जा का प्रवाह तीव्र और औसत से अधिक होता है।
पर प्रश्न आता है कि इस अधिक ऊर्जा प्रवाह का हम पर क्या प्रभाव पड़ता है? वैज्ञानिकों द्वारा किए गए कई शोध बताते हैं कि हमारे मस्तिष्क में जो ‘पीनियल ग्लैंड’ है, वह इस विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा के प्रति संवेदनशील होता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ‘पीनियल ग्लैंड’ के सक्रिय होने पर ‘मेलाटोनिन’ नामक हार्मोन का स्राव होता है। इस हार्मोन के प्राकृतिक और उपयुक्त स्राव से इंसान में शारीरिक और मानसिक तौर पर संतुलन बना रहता है। पर विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा के प्रभाव से पीनियल ग्लैंड से होने वाले मेलाटोनिन के स्राव में कमी आती है। इस बात की पुष्टि बेसल विश्वविद्यालय (स्विटज़रलैंड) के मनोरोग चिकित्सा विभाग ने भी की। सन् 2013 की ‘करंट बायोलॉजी’नामक वैज्ञानिक पत्रिका में उनका एक शोध-पत्र छपा। उनके द्वारा किये गये अध्ययन में कुल 31 प्रतिभागियों ने भाग लिया। इन सब की निद्रा, मस्तिष्क-क्रिया और हार्मोन के स्राव को पूर्णमासी और उसके आसपास के दिनों में मापा गया। जाँच के नतीजों से सामने आया कि सभी प्रतिभागी पूर्णिमा की रात्रि लगभग 20 मिनट कम सोये, नींद आने में उन्हें औसत समय से 5 मिनट ज़्यादा लगे। साथ ही, निद्रा कच्ची रही और मेलाटोनिन का स्राव औसत से कम।
अब इस शोध से यह बात प्रमाणित हो गई कि पूनो के चाँद वाली रात मेलाटोनिन का स्राव कम होने से नींद कम और कच्ची आती हे। ब्रह्मज्ञानी साधक इस स्थिति का पूरा लाभ उठा सकते हैं। रात-भर ध्यान में लीन रहकर अपना आत्मिक उत्थान कर सकते हैं। शरद पूर्णिमा की रात्रि आह्वान करती है- ‘हे साधकों! यह रात्रि साधारण नहीं। जागने की रात है! बाहरी आँखें खोलकर नहीं, अपितु भीतरी नेत्र खोलकर!’
‘श्री-प्रदात्री’ शरद पूर्णिमा
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि शरद पूर्णिमा का एक नाम ‘कोजागरी पूजा’ भी है। यह संस्कृत उक्ति ‘को जागृति’ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ हुआ ‘कौन जाग रहाहै?’ भारतीय पुराणों के अनुसार पूनो की इस रात्रि को जो भी साधक ब्रह्मज्ञान की ध्यान-साधना करते हुए जागृत रहते हैं, उनको माँ लक्ष्मी आध्यात्मिक एवं भौतिक ‘श्री’ कावरदान देती हैं। इस पर्व का उल्लेख सनतकुमार संहिता में भी अंकित हैं। वहाँ कोजागरी पूजा के संदर्भ में एक गूढ़ दृष्टांत आता है, जो कि इस प्रकार लोक-कथा के रूप मेंप्रचलित है- मगध देश में वलित नामक आस्थावान व्यक्ति रहता था। उसकी भार्या बहुत झगड़ालू स्वभाव की थी। श्राद्ध के दिन चल रहे थे। सो वलित ने अपने पिता का श्राद्ध करने की सोची। इसमें आटे के पिंड को गंगा में बहाया जाता है। पर बलित की धूर्त भार्या ने आटे के पिंड को गंगा की बजाय नाले में फेंक दिया। इस बात पर उन दोनों के बीच बहस छिड़ गई। देखते-ही-देखते झगड़ा इतना बढ़ गया कि वलित ने घर छोड़ने का फैसला ले लिया। वह गुस्से से तिलमिलाता हुआ जंगल की ओर बढ़ चला। रास्ते में उसका सामना नागकन्याओं से हुआ, जिनके साथ वह काफी समय तक द्युत-क्रीड़ा में लिप्त रहा। इस खेल में वह इतना डूब गया कि उसको अपनी भूख-प्यास तक का भान न रहा। पर अंततः वह इस जुए में सब कुछ हार गया। तब वह विलाप करते हुए प्रभु को पुकारने लगा। संयोगवश, वह अश्विन शुक्ल की पूर्णिमा का दिन था और माँ लक्ष्मी अपने पति श्रीहरि के साथ विहार करती हुईं वहाँ से गुजर रही थीं। उनसे वलित की दशा देखी न गई। अतः माँ लक्ष्मी की करुणा और कृपा से वलित को ‘श्री’ की प्राप्ति हुई।
इस सार-गर्भित कथा के कई पहलू रोचक और गूढ़ हैं। अक्सर यह देखा गया है और तथ्य भी बताते हैं कि पूनो के चाँद का सीधा असर हमारे मन पर पड़ता है। लगभग दो दशक पहले अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल क्लाइमेटोलॉजी में फिलाडेल्फिया पुलिस विभाग का एक शोध पत्र छपा। पत्र का शीर्षक था, ‘इंसानी व्यवहार पर पूर्ण चाँद का असर!’ इस रिपोर्ट में यह साफ लिखा था- ‘पूर्णिमा के दिन मानसिक आवेग में आकर किए गए अपराधों में इजाफा पाया जात है।’ केवल पुलिस विभाग का ही नहीं अपितु डॉक्टरों का भी यही कहना है। मियामी विश्वविद्यालय (अमरीका) के डॉ. आनोंल्ड के अनुसार मानसिक असंतुलन और पूर्ण चाँद के संबंध को झुठलाया नहीं जा सकता है। उनके अनुमान के अनुसार इसके पीछे कारण है- धरती की सतह के समान इंसानी शरीर का भी 60-70% हिस्सा जल होता है। जिस प्रकार पूर्णमासी के दिन समुद्र में ऊँची लहरें उठती हैं, उसी तरह संभव है कि हमारे मन में भी ‘जैविक ज्वार’ उठते हों! जो मानसिक तौर पर कमज़ोर व्यक्ति को अस्थिर बनाने में सक्षम हों।
उपरिलिखित कथा में भी हमने पढ़ा कि पूर्णमासी के दिन वलित के मन में आवेश का उफान आ गया। फिर वह नागकन्याओं के साथ द्युत-क्रीड़ा में संलग्न हो गया। यहाँ नागकन्याएँ हमारी पाशविक वृत्तियों की द्योतक हैं। मद, लोभ, ईर्ष्या, काम, क्रोध आदि सर्प-रूपी वृत्तियाँ निरंतर हमारे विचारों के वन में अपने फन फैलाए बैठी रहती हैं। इनके खेल में मानव ऐसा लिप्त होता है कि अपनी आत्मा की भूख-प्यास को बिसार देता है। फिर उन नागकन्याओं के समक्ष सब कुछ हार जाता है। पर तब भी यदि वह सच्चे हृदय से प्रभु को पुकार ले, तो शरद पूर्णिमा का ऐसा प्रताप है कि परम करुणामयी ईश्वर शीघ्र ही उस पर दया कर देंगे। तृण-भर प्रयास से ही प्रसन्न होकर उसे ‘श्री’ की प्राप्ति करवा देंगे। ‘श्री’ अर्थात् आध्यात्मिक एवं भौतिक सम्पन्नता।
साधकों! शरद पूर्णिमा से जुड़े शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक पक्षों को तो आपने जान लिया। अब बारी है, उनको अपने जीवन में क्रियान्वित करने की। आशा करते हैं कि आप सबको भी माँ लक्ष्मी से इस दिन ‘श्री’ की प्राप्ति हो। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से आप सभी को शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ।
