राजनेताओं क गलतयां देश को बहुत रूलाती है
15 अगस्त 1947 को विभाजन के साथ देश को आजादी मिली । अंग्रेज आजादी देते समय भारत जैसे महान देश को दो टुकड़ म बांटकर गये। वभाजन के बाद से एक को हन्दुस्तान तथा
दूसरे को पाकस्तान के नाम से जाना जाता है,अंग्रेज आजादी देते समय भारत जैसे महान देश को दो टुकडे में बांटकर गये। वि भाजन के बाद से एक को हन्दुस्तान तथा दूसरे को पाकि स्तान के नाम से जाना जाता है, जिसे धर्म आधार पर बांटा गयाथा। देश के वभाजन के पीछे का कारण मो० जिन्ना की जिद्द , महात्मा गाँधी और जवाहर
लाल नेहरु के महत्वाकांक्षा तथा अंग्रेज के ‘’फूट डालो शासन करो’ की नीत को प्रमुख रूप सेउरदायी माना जाता है। मो. जी न्ना भारत से अलग पाकस्तान के मांग पर अड़ा हुआ था, जीजसे
धमर् के नाम पर अलग देश पाकस्तान के अलावा कुछ भी मंजूर नहं था।हालांक वभाजन के बाद गांधी और पंडत नेहरू दोन को भार वरोध एवं आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था,
क्यक महात्मा गांधी ने स्वयं कहा था “कसी भी शतर् पर हम भारत का वभाजन स्वीकार नहं,
वभाजन होगा तो हमार लाश पर होगा।“ इसके बावजूद भी वभाजन को िजन्ना क िजद और
ब्रटश सरकार क वभाजनकार नीतय के आगे झुकना पड़ा और देश को वभाजन के लए तैयार
होना पड़ा।
देश के लए वह एक बहुत बड़ी त्रासद थी। वभाजन क उस त्रासद के साथ-साथ सरकार
के सामने चुनौतयां भी कम नहं थी। एक ओर देश म चल रहे साम्प्रदायक तनाव को रोकना,
हन्दू समाज म असंख्य जातय के बीच सामन्जस्य स्थापत करना, दूसर ओर देश क एकता-
अखण्डता के लए देशी रयासत का भारत संघ म वलय कराना तो चुनौतयां थीं ह, उसके साथ
ह गरबी, नररता, आथर्क संकट, सामािजक बषमताय, राजनीतक अिस्थरता जैसी समस्याएं
भी एक वशाल पहाड़ क तरह खड़ी थीं िजनका समाधान करना भी सरकार के सामने एक बड़ी
चुनौती थी।
उन चुनौतय म 562 देसी रयासत को भारत म वलय कराना सबसे बड़ी चुनौती थी।
अंग्रेज देश छोड़ते समय देशी रयासत को इस शतर् पर स्वायतता देकर गये थे क ये रयासत
चाह तो अलग से स्वतंत्र रह सकती ह अथवा भारत या पाकस्तान म अपनी स्वेच्छा से वलय
कर सकती ह। उन्ह भारत संघ म वलय कराना भी उस समय के सरकार के सम आसान कायर्
नहं था बिल्क एक बहुत बड़ी चुनौती थी।ऐसा मानना है क इन सबके बावजूद उनम से अधकतर
रयासत भारत संघ म वलय करने के प म थी लेकन उनम से दो जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ औरहैदराबाद रयासत बहुत आसानी से वलय करने को तैयार नहं थी। बताया जाता है क उस समयके गृहमंत्री सरदार पटेल क इच्छा-शिक्त एवं उनक राजनीतक सूझ-बूझ के कारण जम्मू-कश्मीरको छोड़कर हैदराबाद व जूनागढ़ सहत सभी रयासत का वलय भारत संघ म करा लया गया।
जम्मू-कश्मीर भी एक स्वतंत्र रयासत थी, िजसका भारत संघ म वलय करने का फैसला
वहां तत्कालन राजा हर संह को लेना था, िजसपर पाकस्तान क भी नजर थी।कुछ दन बाद
पाकस्तान अपने नापाक इरादे से कबलाई आक्रमण जम्मू कश्मीर पर कर दया। उस कबलाई
हमले के बाद राजा हर संह ने भारत से मदद मांगी तथा बदले म भारत संघ म वलय करने के
पत्र पर हस्तार भी कर दए लेकन भारत ने उनक मदद न करके मामले को नेहरु के कहने पर
संयुक्त राष्ट्र संघ म ले जाने का फैसला कया। जबक नेहेरू के उस फैसले से सरदार पटेल खुश
नहं थे। कुछ प का कहना है क यद सरदार पटेल क चल होती तो जम्मू-कश्मीर आज
अंतरार्ष्ट्रय मुद्दा नहं बना होता बिल्क अन्य रयासत क तरह इसे भी भारत म वलय करा
लया गया होता। यह मुद्दा ज्योहं संयुक्त राष्ट्र संघ म पहुंचा तो उसने भी शीघ्र जनमत संग्रह
कराने का सुझाव दे दया। बताया जाता है क इस मुद्दे पर नेहरू क चुप्पी साधने एवं उनक
तुष्टकरण तथा लाडर् माउंटबेटन क फूट डालो नीत के कारण ह ऐसा हुआ िजसक सजा पूरा देश
भुगता रहा है। पाकस्तान भी कश्मीर मुद्दे को लगातार जार रखे हुए है और इतना ह नहं बिल्क
अंतरार्ष्ट्रय मंच पर हमेशा के लए इस मुद्दे को अपने राजनीतक एजडे का भी हस्सा बना लया
है। आज भी पाकस्तान कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ म उठाता रहता है तथा जम्मू कश्मीर
के साथ-साथ पूरे भारत म अपने पोषत आतंकवादय को भेजकर उर, पुलवामा और पहलगाम जैसे
हंसा एवं आतंकवाद घटनाएं करवाने का भी साहस करता रहता है। कुछ आलोचक इस मुद्दा को
संयुक्त राष्ट्र संघ म ले जाने, इस समस्या का स्थाई समाधान न ढूंढ पाने व इसके प्रत ढूल-मूल
रवैया अपनाने के लए पंडत नेहरु को िजम्मेदार ठहराते ह। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने
के बाद से ह अब जम्मू-कश्मीर देश का अभन्न अंग बन गया है। परन्तु अनुच्छेद 35-A के
कारण जम्मू-कश्मीर म कुछ समस्याएँ आज भी बनी हुई है, लेकन वतर्मान म क द्र क मोद
सरकार ने 370 क तरह इस 35-A को भी हटाने के लए कई मंच से अपनी इच्छा जाहर कर
चुक है।
लेकन यह सबकुछ होते हुए कश्मीर समस्या परिस्थतय क देन है।इसके लए कसी एक
को दोषी नहं ठराया जा सकता है क्यक जब देश आजाद हुआ था तो उस समय परिस्थतयां
हर दृिष्ट से प्रतकूल थी। उस समय क सरकार सामने अनगनत चुनौतयां पहाड़ क तरह मुसीबत
बनकर खड़ी थी। उन चुनौतय का सरकार ने न के वल सामना कया बिल्क समाधान करने का
भी हर संभव प्रयास कया।

पंडत जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री तो बने लेकन उनक सरकार के सम जो चुनौतयां
थी िजसे इस प्रकार से दशार्या जा सकता है।
देश पर लगभग 200 वषर् अंग्रेज का शासन रहा, बहुत संघषर्, आंदोलन एवं कुबार्नयां देने के
बाद हम देश को आजाद करा पाये और अंग्रेज को हमेशा के लए भगाने म सफल रहे। देश कोआजाद वभाजन जैसे त्रासद के साथ मल थी,िजसके कारण बड़े स्तर पर साम्प्रदायक हंसा हुई,
लाख लोग उस हंसा के शकार हुए। अनेक जान गवानी पड़ी िजसके कारण लाख लोग वस्थापत
हुए, क्यक साम्प्रदायका के आधार पर ह देश का वभाजन हुआ था। सब कुछ प्रतकूल था, िजसके
कारण नेहरु सरकार के सामने हंसा रोकना, सबके बीच समरसता,भाई–चारा स्थापत करना सबसे
प्रमुख चुनौती थी।
1947 म वभाजन समझौते क यह शतर् थी क तथाकथत पकस्तानी ेत्र म रहने वाले
हन्दु भारत आयगे और भारत म रहने वाले मुसलमान पाकस्तान जायगे। लेकन गांधी ने
मुसलमान को भारत म ह बसने दया, नेहरू ने इसक पुिष्ट क। तब से उनक जनसंख्या नरंतर
बढ़ रह है। 2050 तक उनक संख्या हन्दुओं से ज्यादा हो जायेगी। और वे लोकतन्त्रीय तरके से
ह वोट बढ़ जाने के कारण भारत पर राज करगे। गांधी ने पाकस्तान पर 60 करोड़ का कजार् भी
माफ कर दया। यह दो बहुत बड़ी गलतयां क, िजनका भुगतान आने वाल हन्दु संतान भुगतगी।
जब देश को आजाद मल तो उस समय देश म लगभग कुल 562 रयासत थी। उन रयासत को
भारतसंघ म शामल करना एक बड़ी चुनौती थी। कहा जाता है क उस समय के गृहमंत्री सरदार
पटेल क इच्छा शिक्त एवं उनके दृढ़ संकल्प से ह उन रयासत को भारत संघ म शामल कराया
जा सका।
देश म लम्बे समय से जात प्रथा के कारण उनके बीच ऊँ च-नीच,अगड़े–पछड़े जैसी बषमताय
थीं िजसका समाधान सरकार ने अपने स्तर से करने का हर संभव प्रयास कया।
जब देश आजाद हुआ तो उस समय देश क आथर्क िस्थत बहुत ह दयनीय थी िजसे
ब्रटश सरकार ने कमजोर कर वरासत म दया था।
आजाद मलने के बाद देश म गरबी तथा सारता दर म कमी ये दोन ब्रटश सरकार से
बड़े पैमाने पर वरासत के रूप म मल थी, िजसका समाधान करना बहुत आवश्यक था। उसके
नदान के लए सरकार ने स्कूल, कॉलेज एवं वश्व वद्यालय जैसे शण-संस्थान क स्थापना
क।
आजाद के बाद नेहरु के नेतृत्व म सरकार तो बनी लेकन वह प्रजातांत्रक तरके सेचुनी हुई
सरकार नहं बिल्क अंतरम सरकार थी।उस समय देश म वशुद्ध प्रजातंत्र क स्थापना करना
सरकार के सम एक बड़ी चुनौती थी।
आजाद के बाद भारत म जो मुसलमान रह गए थे उनके साथ तो कोई अन्याय, अत्यचार
नहं हुए लेकन पाकस्तान म जो गैर मुिस्लम वशेषकर हन्दू थे उनके साथ बड़े पैमाने पर
अत्यचार हुए। अंत म उन्ह मजबूर होकर भारत आना पड़ा,उनके लए पुनवार्स क व्यवस्था करनाभी बहुत बड़ी चुनौती थी। पाकस्तान से आये हुए शरणाथर्य िजन्ह लम्बे दन तक शवर म
रहना पड़ा था, उन्ह बसाना, स्थापत करने जैसी चुनौती थी।
उपयुर्क्त चुनौतय को ध्यान म रखते हुए पंडत नेहरु क देश के प्रत योगदान को
नकारा नहं जा सकता है।पंडत नेहरु देश क आजाद के पूवर् से लेकर अपने प्रधानमंत्रत्व काल
तक कुछ सराहनीय कायर् भी कये ह जो इस प्रकार है। जब देश म आजाद के लए आन्दोलन
चल रहे थे तो उस समय पंडतनेहरु ने न के वल बढ़ चढ़कर हस्सा लए बिल्क-
1. 1929 म कांग्रेस के लाहौर अधवेशन म पूणर् स्वराज क मांग भी क थी।
2. राष्ट्र के नमार्ण एवं एककरण म भी उनक भूमका को नकारा नहं जा सकता। और िजस
समय देश को आजाद मल थी, उस समय देश म शा का स्तर बहुत ह नीचे था, उस स्तर
को ऊँ चा उठाने के लए उनक सरकार ने बड़े पैमाने पर
3. स्कूल, कॉलेज, वश्ववद्यालय जैसे शण-संस्थान,तकनीक संस्थान तथा वानं एवं
प्रौद्योगक जैसे -संस्थान क स्थापना क।
4. मधुर अंतराष्ट्रय सम्बन्ध
5. गुटनरपेता क नीत
6. सामिजक सुधार आद जैसे कायर् कये ।
इन सबके बावजूद कुछ बन्दुओं पर पंडत नेहरु क सरकार ने कुछ ऐसे फैसले लए िजसक
आलोचना आज भी होती है। उनके आलोचक द्वारा जो मुद्दा उठाया जाता है वह राष्ट्रहत का
मुद्दा है। कहते ह क पंडत नेहरु और महात्मा गाँधी के सम्बन्ध बहुत मधुर थे तथा दोन का
तानाशाहपूणर् रवैया था। िजस समय देश आजाद हुआ था,प्रधानमंत्री बनने के लए पंडत नेहरु के
प म बहुमत नहं था बिल्क अधकतर सदस्य सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के प म थे
फर भी महात्मा गाँधी ने सबके सुझाव एवं प्रस्ताव को दरकनार करते हुए पंडत नेहरु को
प्रधानमंत्री बनाया िजसका खामयाजा कश्मीर समस्या के रूप म आज भी देश क जनता भुगत
रह है। जैसे-
जल संधु समझौता 1960- इस समझौते के कारण भारत को बहुत बड़ा नुकसान हुआ िजसके लए
पंडत नेहरू क गलत नीतयां और उनके नजी फैसले ने देश को समस्या म हमेशा के लए उलझा
दया, िजसके कारण आज भी दोन देश के बीच संघषर् क िस्थत बनी रहती है।
यह संधु जल समझौता 19 सतंबर, 1960 को भारत और पाकस्तान के बीच पाकस्तान के
मुख्य शहर कराची म हुआ था। इस संध पर पाकस्तान के राष्ट्रपत अयूब खान और भारत केउस समय के प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने हस्तार कये थे िजसक मध्यस्थता वश्व बक
ने क थी।
तो आइये! हम इस संध के उद्देश्य के बारे म वस्तार से जानने का प्रयास करते ह।
देशवासय को यह बताया गया है क “इस संध का मुख्य उद्देश्य संधु नद एवं उसक सहायक
नदय के पानी का दोन देश के बीच वतरण करना था, िजसम पूव नदय (सतलज, व्यास एवं
रावी) पर भारत का पूणर् अधकार है तथा पिश्चमी नदय (झेलम, संधु एवं चनाब) के पानी का
मुख्य रूप से पाकस्तान को अधकार है। आगे गौर करने वाल बात है। इस समझौते के तहत
भारत को संधु नद के कुल पानी का लगभग 20 प्रतशत हस्सा ह उपयोग करने का अधकार
है, जबक पाकस्तान को इन नदय के कुल पानी का लगभग 80 प्रतशत हस्सा उपयोग करने
का अधकार है।
इस जल संध के कारण भारत पिश्चमी नदय के पानी का कुछ हस्सा ह बजल उत्पादन
एवं कृष संचाई जैसे जरूरत के लए उपयोग कर सकता है लेकन इसके लए भी भारत को बहुत
सारे दशा नदश एवं बाधाओं का सामना करना पड़ता है। पिश्चमी नदय म संधु नद सबसे
महत्वपूणर् है, िजसके कुल पानी का 20 प्रतशत भाग ह भारत को मल पाता है। यह समझौता
भारत को बजल उत्पादन एवं कृष काय के लए बहुत सीमत अधकार देता है।
वास्तव म यद गहराई एवं वस्तार से इस पर वचार कया जाय तो हम इस नष्कषर् पर
पहुंचते ह क इस संधु जल समझौते से भारत को बहुत बड़ा नुकसान हुआ है िजसके कारण प.
जवाहर लाल नेहरू क नजी महत्वकांा एवं उनक सरकार क गलत वदेश नीत के साथ-साथ
उनक तुिष्टकरण क नीत मुख्य रूप से िजम्मेदार है।यद नेहरू के बाद आगे क कांग्रेस सरकार
क भी नीतयां एवं उसक कायर्शैलय का गहराई से अवलोकन कया जाय तो यह तस्वीर सामने
आती है क बीच म लाल बहादुर शास्त्री के संप्त कायर्काल को छोड़कर इंदरा गांधी, राजीव
गांधी, मन मोहन संह सहत सभी प्रधानमंत्री कांग्रेस पाट से थे और सभी ने एक धमर् के वशेष
के लोग का चुनाव म समथर्न (वोट) लेने के लए उन्ह खुश करने के साथ-साथ तुिष्टकरण क
नीत को बढ़ावा दया।
बहुत से प का मानना है क गांधी और पंडत नेहरु क गलत नीतय के कारण आजाद
के तुरंत बाद ह देश म बड़े पैमाने पर साम्प्रदायक दंगे हुए िजसके कारण बड़े पैमाने पर पाकस्तान
म रहनेवाले गैर मुिस्लम धमर् के लोग के ऊपर अत्याचार हुए, जो मजबूर होकर वस्थापत हुए
और उन्ह शरणाथ के रूप म भारत आना पड़ा। ये सब होने के बाद भी महत्मा गाँधी और पंडत
नेहरु पाकस्तान के खलाफ एक शब्द आवाज नहं उठाये जबक उस समय भारत म रहनेवाले
मुसलमान के प्रत सहानुभूत, संवेदना एवं भाई चारा क भावना रखने के लए शांत और धमर्
नरपेता का पाठ पढ़ा रहे थे। ऐसे तो महात्मा गांधी को राष्ट्र पता क संा द गई है और हमभी कहने म कोई दक्कत नहं है लेकन उनके िजन नजी गलत फैसल के कारण देश को जो
नुकसान हुआ है उसका भी िजक्र करना, देशवासय तक पहुंचाना हमारा परम कतर्व्य है ताक
वतर्मान पीढ़ को भी गाँधी, नेहरु एवं उनके कांग्रेस के पाप से अवगत कराया जा सके।
खलाफत आंदोलन देश को बांटने वाला आंदोलन था। वह मुसलामान का आंदोलन था, जो
पूणर्रूप से साम्प्रदायक था। सब कुछ जानते हुए भी महात्मा गांधी ने उस आंदोलन का समथर्न
कया साथ ह आजाद के लए देश म चल रहे राष्ट्रय आंदोलन,उसम भी मुसलमान को शामल
कर लया, िजसके कारण आन्दोलन कुछ समय के लए कमजोर पड़ गया और बहुत बड़ा नुकसान
भी पहुंचा।
1931 म महात्मा गांधी और लाडर् इरवन के बीच समझौता हुआ था, िजसे गांधी इरवन
समझौता के नाम से भी जाना जाता है। देश के आंदोलन म भाग लेने वाले सभी नेताओं के द्वारा
महात्मा गांधी के माध्यम से लाडर् इरवन के सम सरदार भगत संह क फांसी पर रोक लगवाने
व उसे माफ करने क मांग जैसी शतर् रखी गई थी। कहा जाता है क गांधी ने लाडर् इरवन के
सम अपनी सभी मांग रखी लेकन सरदार भगत संह के फांसी क सजा को माफ करने क मांग
राखी ह नहं। इस बात का िजक्र उस समय के जाने-माने पत्रकार डॉ. डी. डी. बसु ने अपने पुस्तक
म कया है। उन्हने अपनी पुस्तक म लखा है “जब म महात्मा गांधी से पूछा क भगत संह के
फांसी क माफ के बारे म क्या हुआ? तो उन्हने हंसते हुए कहा क इरवन ने भगत संह क
फांसी क सजा को माफ करने क शतर् को छोड़कर बाक सभी शत मान ल।
आगे डी. डी.बसु लखते ह क “जब यह बात मैने लाडर् इरवन से पूछ तो उसने कहा क
गांधी क सार मांगे मैन मान ल। “रह बात भगत संह के फांसी को माफ करने क बात“ गांधी
ने इस तरह क हमारे सामने मांग रखी ह नहं। आगे इरवन ने बसु के प्रश्न के जवाब म यह
भी कहा “ यद गांधी ने मेरे सामने भगत संह के फांसी क सजा को माफ़ करने क मांग रखी
होती तो कुछ शत के साथ म उसे भी स्वीकार लया लेता। “ इससे साबत होता है क महात्मा
गांधी स्वयं भगत संह क फांसी चाहते थे क्यक भगत संह क लोकप्रयता से वे घबराये हुए थे
और आजाद का श्रेय स्वयं लेना चाहते थे।
उस समय के वद्वानजन का मानना है क िजस तरह सुभाष चन्द्र बोस अंग्रेज के बीच डर
पैदा कये हुए थे यद उनके साथ महात्मा गांधी दुव्यर्वहार नहं करते बिल्क उन्ह पूर छूट दे देते
तो शायद देश बहुत पहले आजाद हो गया होता। सुभाष चन्द्र बोस को मजबूर होकर आजाद हंद
फौज क स्थापना करनी पड़ी थी। िजनका नारा था `’तुम मुझे खून दो म तुम्ह आजाद दूंगा“।
कुल मलाकर यह कहा जा सकता है क एक तरफ महात्मा गांधी ने आजाद के लए
आंदोलन चलाया िजसक जरूरत थी लेकन दूसर ओर उनके फैसले से देश को बहुत बड़ा नुकसान हुआ जिसका खामयाजा पूरा देश भुगत रहा है। जैसे सरदार पटेल के पास समथर्न होने के बावजूदभी उन्ह प्रधानमंत्री न बनने देना और उनक जगह नेहरू का समथर्न करके उन्हने देश और
लोकतंत्र दोन को कमजोर कर दया। तुिष्टकरण क नींव रखना, अपनी लोकप्रयता बढ़ाने के लए
उस समय के युवाओं को आंदोलन क आग म झकना तथा लाडर् माउंट बेटन के साथ मलकर
भारत का वभाजन कराना जैसे अपराध के लए िजम्मेदार महात्मा गांधी को ह माना जाता है।
प्रधानमंत्री इिन्दरा गांधी ने बंगलादेश जीतकर बंगलादेशियो को शोप दिया । 93000पाकस्तानी सिपाहियों ने ल. जनरल अरोड़ा के सामने आत्मसमपर्ण किया और वे सिपाही पाकस्तान कों सौप दिए गए, कन्तु पाकस्तानी जेल म बंद 58 भारतीय के वापसी प्रधानमंत्री ने नही मांगी।भारत का कुछ क्षेत्र भी पाकस्तान को दे दया। यह बंगलादेशी आज हमारा शत्रु है, जहां हन्दुओं
का नर संहार हो रहा है। इिन्दरा ने ओप्रेशन ब्लूस्टार के बाद भी अपने सुरागाड म सख कोह रखा, जो उनक मृत्यु का कारण बना। कांग्रेस के 65 वषर् के शासनकाल म पकस्तान ने भारतको कतनी बार धोखा कया, वहां हन्दुओं का नरंतर नर संहार होता रहा, लेकन उनसे संबंध सामान्य ह बनाये रखे। मोद ने 22 अप्रैल 2025 को पुलवामामें हुई घटना के बाद पाकस्तान से संबंध तोड़ लिया था ।सब कुछ झेलने के बाद आज देश के लिए संतोष की बात यह है क 2014 म केन्द्र म एकऐसे वचारधारा क सरकार नरद्र मोद के नेतृत्व में बनी, जीसने अपने दूसरे कायर्काल क शुरुआतम ह अगस्त 2019 म धारा (370) को भारत क संसद से पारत कराकर हमेशा के लए नरस्त कि या, जो हम अभशाप के रूप पिण्डत नेहरु क सरकार से वरासत मेमिली थी। आज पहले जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन है, उद्योग धंधे भी स्थापत हो रहे है तथा अब हर कसी व्यिक्त को जम्मू-कश्मीर म बसने-रहने का अधकार प्राप्त है।ये सब मोदी सरकार की इक्छा-शिक्त के कारण ही संभव हो पाया है। मोद सरकार ने इसके अलावा भारतीय संस्कृत, के साथ-साथ देश क आथर्क, सामाजिक एवं राजनीतक दृष्टि से देश को मजबूती प्रदान क है। आज भारत एवं भारत क प्राचीन ऋष परम्पराओं, सनातन संस्कृत का पूरे वश्व म डंका बज रहा है। आज का भारत वो भारत है जो पूरे अन्तरार्ष्ट्रय समुदाय को अपना लोहा मनवा रहा है,यह कारण है क आज पूरा वश्व भारत को सम्मान क दृष्टि से देखता है। ये सब मोद सरकार क दृढ इच्छा-शिक्त से ह संभव हो पाया है।
-डॉ. नरेन्द्र मदान
