मनोरंजन Archives - Rashtra Tak Hindi Monthly Magazine Sun, 18 Oct 2026 09:23:43 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 https://www.rashtratak.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-cropped-WhatsApp-Image-2025-05-08-at-2.40.25-PM-32x32.jpeg मनोरंजन Archives - Rashtra Tak 32 32 गुरमीत चौधरी और ईशा मालवीय ने दिल्ली में किया ‘तुम मेरे हो’ का प्रमोशन, 23 अक्टूबर को होगी रिलीज https://www.rashtratak.com/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%88%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a5%80/ Sun, 18 Oct 2026 09:23:42 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3178 नई दिल्ली : अभिनेता गुरमीत चौधरी और अभिनेत्री ईशा मालवीय अपनी आगामी रोमांटिक म्यूजिकल फिल्म ‘तुम मेरे हो’

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नई दिल्ली : अभिनेता गुरमीत चौधरी और अभिनेत्री ईशा मालवीय अपनी आगामी रोमांटिक म्यूजिकल फिल्म ‘तुम मेरे हो’ के प्रचार के लिए दिल्ली पहुंचे। इस दौरान राजधानी के बोबाची (शेफ युवराज कोहली) में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों कलाकारों ने मीडिया से बातचीत की और फिल्म की कहानी, अपने किरदारों तथा शूटिंग के अनुभव साझा किए। फिल्म 23 अक्टूबर 2026 को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज होगी। फिल्म ‘तुम मेरे हो’ गुरमीत चौधरी के करियर के लिए खास है, क्योंकि इसके जरिए वह पहली बार निर्माता के रूप में अपनी नई पारी शुरू कर रहे हैं। फिल्म का निर्माण उनके प्रोडक्शन बैनर देब गुरु फिल्म्स और रेवा क्रिएटिव हाउस के सहयोग से किया गया है। वहीं, ईशा मालवीय इस फिल्म के जरिए बॉलीवुड में डेब्यू कर रही हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुरमीत चौधरी ने कहा कि यह फिल्म उनके लिए बेहद खास है। एक अभिनेता के रूप में उन्हें इसमें रोमांस, भावनाओं और एक्शन के अलग-अलग रंग दिखाने का अवसर मिला है। वहीं, निर्माता के तौर पर उनकी कोशिश ऐसी कहानी पेश करने की रही है, जो भव्य होने के साथ दर्शकों से भावनात्मक जुड़ाव भी बनाए। ईशा मालवीय ने अपने बॉलीवुड डेब्यू को लेकर खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि फिल्म की कहानी प्यार, भावनाओं और रिश्तों की गहराई को दर्शाती है। गुरमीत के साथ काम करने का अनुभव शानदार रहा और उन्हें उम्मीद है कि दर्शक फिल्म के किरदारों तथा उनकी प्रेम कहानी से जुड़ाव महसूस करेंगे। निर्देशक आशीष पांडा के निर्देशन में बनी इस फिल्म के ट्रेलर में रोमांस, दिल टूटने का दर्द, जुनून और एक्शन की झलक देखने को मिलती है। फिल्म में गुरमीत चौधरी और ईशा मालवीय मुख्य भूमिकाओं में हैं, जबकि अनुष्का लुहार और शान ग्रोवर भी महत्वपूर्ण किरदार निभा रहे हैं। दोनों मुख्य कलाकारों की ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री को फिल्म के प्रमुख आकर्षणों में शामिल किया जा रहा है। फिल्म का संगीत भी इसकी खासियत है। इसके म्यूजिक एल्बम से मिथुन, विशाल मिश्रा, संजू राठौड़, असीस कौर, मधुर शर्मा, जावेद अली, मोहम्मद फैज और अर्जुन हरजाई सहित कई कलाकार जुड़े हैं। फिल्म का संगीत इसकी रोमांटिक कहानी और भावनात्मक दृश्यों को और प्रभावशाली बनाने में अहम भूमिका निभाएगा। आरती एस और देबिना बनर्जी द्वारा निर्मित तथा रोमांच मेहता और अमन रियास्ती द्वारा सह-निर्मित ‘तुम मेरे हो’ प्रेम, संगीत, भावनाओं और एक्शन से भरपूर सिनेमाई अनुभव पेश करने की तैयारी में है। फिल्म 23 अक्टूबर 2026 को सिनेमाघरों में दस्तक देगी।

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रजनीकांत के स्टारडम के 50 साल, ‘जेलर 2’ से फिर बड़े पर्दे पर धमाका करने की तैयारी https://www.rashtratak.com/%e0%a4%b0%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a1%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%87-50-%e0%a4%b8%e0%a4%be/ Fri, 16 Oct 2026 08:09:22 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3163 नई दिल्ली : भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता रजनीकांत ने अपने शानदार अभिनय, अनोखे अंदाज और दमदार स्क्रीन

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नई दिल्ली : भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता रजनीकांत ने अपने शानदार अभिनय, अनोखे अंदाज और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस के दम पर पांच दशकों से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है। दक्षिण भारतीय सिनेमा से लेकर हिंदी भाषी दर्शकों तक, उनकी लोकप्रियता का दायरा लगातार व्यापक रहा है। अब उनकी बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘जेलर 2’ को लेकर भी सिनेमा प्रेमियों के बीच उत्सुकता बनी हुई है। रजनीकांत का स्टारडम केवल उनकी फिल्मों की सफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका खास स्टाइल, संवाद बोलने का अंदाज और पर्दे पर उनकी मौजूदगी भी प्रशंसकों के बीच बेहद लोकप्रिय है। यही वजह है कि बदलते सिनेमाई दौर और नई पीढ़ी के कलाकारों के आने के बावजूद उनका प्रभाव कायम है। ‘जेलर’ की सफलता के बाद इसके अगले भाग से दर्शकों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। फिल्म में रजनीकांत की वापसी को लेकर प्रशंसक उत्साहित हैं। हालांकि, फिल्म की रिलीज और अन्य विवरणों को लेकर आधिकारिक जानकारी की पुष्टि जरूरी है। पांच दशक का यह सफर रजनीकांत की मेहनत, लोकप्रियता और भारतीय सिनेमा में उनके विशिष्ट योगदान को दर्शाता है। ‘जेलर 2’ एक बार फिर उनके स्टारडम को चर्चा के केंद्र में ला सकती है।

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नाना पाटेकरः अभिनय की आग में तपा असाधारण कलाकार https://www.rashtratak.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%83-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%97-%e0%a4%ae/ Sun, 11 Oct 2026 04:33:40 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3101 भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें केवल अभिनेता कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना

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भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें केवल अभिनेता कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना है। नाना पाटेकर उन्हीं विरल कलाकारों में से एक थे। वे अभिनेता थे, रंगकर्मी थे, निर्देशक थे, लेखक थे, सामाजिक सरोकारों से जुड़े संवेदनशील नागरिक थे और भारतीय सेना के प्रति गहरे सम्मान एवं समर्पण का उदाहरण भी थे। उनकी आवाज में खुरदुरापन था, संवादों में धार थी, आंखों में आक्रोश और चेहरे पर जीवन के संघर्षों की सच्चाई। उन्होंने अभिनय को सजावटी कला नहीं बनाया, बल्कि उसे यथार्थ जीवन के अनुभवों, पीड़ा, संघर्ष, संवेदना और सामाजिक चेतना से जोड़ा। 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने एक ऐसा कलाकार खो दिया, जिसकी कोई दूसरी प्रतिकृति संभव नहीं है। वे अभिनय जगत के लिये एक अपरिहार्य नाम थे और ज्यादातर फिल्मप्रेमियों के लिये अजीज भी थे।


नाना की फिल्म-प्रतिभा हमें चौंकाती रही है, रोमांचित करती रही है, उकसाती रही है, क्योंकि उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे आम लोगों के जीवन की सच्चाई और उनके संघर्षो को प्रामाणिकता एवं जीवंतता के साथ प्रस्तुत करते रहे हैं। भारतीय जिंदगी के रंग बेशुमार हैं, कला-संस्कृति की अविस्मरणीय धाराएं हैं, अनूठा एवं बेजोड़ इतिहास और उसकी कहानियां भी अनंत-अथाह। नाना का फिल्मी-युग भारत की खिड़की से विश्व को देखने एवं विश्व को भारत दिखाने की पहल का एक स्वर्णिम युग है। उन्होंने अपने किरदार से राष्ट्रीयता की भावना को भी सुदृढ़ किया। नाना का सफरनामा पूरी तरह मायूस हो चुके किसी भी इंसान के लिये प्रेरणादायी अध्याय भी है, उत्साह की मिसाल भी है। नाना पाटेकर का वास्तविक नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ। बचपन सामान्य था, लेकिन किशोरावस्था में ही परिवार आर्थिक संकट में घिर गया। पिता का कारोबार डूब गया और महज 13 वर्ष की उम्र में नाना को परिवार की मदद के लिए काम करना पड़ा। वे स्कूल के बाद मुंबई में फिल्म पोस्टर रंगते थे और करीब 35 रुपये महीने कमाते थे। काम पर जाने के लिए उन्हें कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था और बदले में एक वक्त का भोजन भी मिलता था। गरीबी और अभाव ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि भीतर से गढ़ा। बाद में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि भूख और अपमान ने उन्हें जीवन को समझना सिखाया।
कला नाना के जीवन में आरंभ से थी। उन्होंने सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट में शिक्षा ली और व्यावसायिक कलाकार के रूप में काम किया। लेकिन उनका वास्तविक विद्यालय था रंगमंच। मराठी रंगमंच की प्रख्यात निर्देशिका विजया मेहता के मार्गदर्शन में उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं। हमीदाबाईची कोठी जैसे नाटकों ने उन्हें गंभीर रंगकर्मी के रूप में पहचान दी। रंगमंच ने उन्हें संवाद बोलना ही नहीं, बल्कि संवाद के पीछे छिपी भावना को जीना सिखाया। नाना के करियर की शुरूआत फिल्म ‘गमन’ से हुई थी लेकिन इंडस्ट्री में उन्हें फिल्म ‘परिंदा’ से नोटिस किया गया जिसमें उन्होंने खलनायक की भूमिका अदा की थी। इस फिल्म में उनके अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार भी दिया गया। इसके बाद उन्होंने कई अच्छी फिल्मों में काम किया और अपने अभिनय का लोहा मनवाया। क्रांतिवीर, खामोशी, यशवंत, अब तक छप्पन, अपहरण, वेलकम, राजनीति उनकी प्रमुख फिल्मों में से एक हैं। शुरुआती वर्षों की निराशाओं के बावजूद उन्होंने अपनी राह नहीं छोड़ी। अंकुश और सलाम बॉम्बे! जैसी फिल्मों ने उनकी प्रतिभा को पहचान दिलाई।
इसके बाद नाना पाटेकर ने एक के बाद एक ऐसे किरदार निभाए, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में अभिनय की एक अलग भाषा निर्मित की। ‘अंगार’ में उनका नकारात्मक किरदार, ‘तिरंगा’ में देशभक्ति से ओतप्रोत शिवाजी राव वागले, ‘क्रांतिवीर’ में प्रखर और विद्रोही प्रताप नारायण तिलक, ‘अग्निसाक्षी’ में जटिल मानसिकता वाला पात्र और ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में संवेदनशील पिता-हर भूमिका में वे बिल्कुल अलग दिखाई दिए। क्रांतिवीर के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला, जबकि अग्निसाक्षी के लिए फिर राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हुए। इस तरह वे तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाले विशिष्ट अभिनेताओं में शामिल हुए। नाना की अभिनयशैली का सबसे बड़ा गुण था स्वाभाविकता के भीतर तीव्रता। वे संवाद को केवल बोलते नहीं थे, उसे जीते थे। उनकी आवाज कभी धीमी फुसफुसाहट बन जाती तो कभी विस्फोट की तरह फूटती। उनका चेहरा, आंखों की हरकत, हाथों का इस्तेमाल, अचानक आने वाला ठहराव और फिर तेज गति से निकलते संवाद-इन सबका अपना नाटकीय व्याकरण था। उनकी संवाद-अदायगी इतनी विशिष्ट थी कि साधारण वाक्य भी उनके मुंह से निकलकर यादगार बन जाता था। वे संवादों को अभिनय से बड़ा नहीं होने देते थे, बल्कि अभिनय के माध्यम से संवाद को अर्थ देते थे।
नाना की लोकप्रियता का एक अलग अध्याय ‘वेलकम’ है। गंभीर और आक्रामक भूमिकाओं के लिए पहचाने जाने वाले नाना ने उदय शेट्टी के रूप में ऐसी कॉमेडी की कि नई पीढ़ी भी उनकी मुरीद हो गई। उनका “कंट्रोल, उदय, कंट्रोल!” जैसे संवाद और चेहरे के हावभाव आज भी लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा हैं। यह उनकी अभिनय-बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण था कि जो कलाकार परिंदा और क्रांतिवीर में दर्शकों को भीतर तक हिला सकता था, वही वेलकम में उन्हें खुलकर हंसा भी सकता था। 2000 के दशक में ‘अब तक छप्पन’, अपहरण, शक्ति: द पावर, राजनीति जैसी फिल्मों में उन्होंने उम्र और अनुभव के साथ अपने अभिनय को और गहरा किया। अब तक छप्पन के पुलिस अधिकारी का किरदार हो या राजनीति में राजनीतिक संघर्षों के बीच खड़ा चरित्र-नाना हमेशा चरित्र की भीतरी बेचैनी को सामने लाते थे। मराठी सिनेमा में भी उन्होंने अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। ‘नटसम्राट’ (2016) में रंगमंच के दिग्गज कलाकार की भूमिका उनके करियर की सबसे मार्मिक प्रस्तुतियों में गिनी जाती है।
नाना केवल अभिनेता बनकर संतुष्ट नहीं थे। ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन करके उन्होंने यह साबित किया कि उनके भीतर निर्देशक और लेखक भी मौजूद है। इस फिल्म की तैयारी के दौरान उन्होंने सेना का कठोर प्रशिक्षण लिया। आगे चलकर उनका भारतीय सेना से संबंध वास्तविक जीवन का हिस्सा बन गया। वे टेरिटोरियल आर्मी से जुड़े और लेफ्टिनेंट कर्नल के मानद पद तक पहुंचे। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी वे सैनिकों के साथ रहे। पर्दे पर देशभक्ति का अभिनय करने वाले इस कलाकार ने वास्तविक जीवन में भी सैनिकों के बीच जाकर देश के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया। उनकी राष्ट्रीयता किसी नारे की तरह नहीं थी, उसमें कर्तव्य और संवेदना थी। तिरंगा, प्रहार और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों में देश, समाज और नागरिक जिम्मेदारी के प्रश्न दिखाई देते हैं। वे देशभक्ति को केवल सीमा पर लड़ने वाले सैनिक की भावना तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि ईमानदारी से अपना काम करना, कमजोर के साथ खड़ा होना और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी राष्ट्रसेवा का हिस्सा मानते थे। उनके व्यक्तित्व की दूसरी बड़ी विशेषता थी सादगी और सामाजिक प्रतिबद्धता। महाराष्ट्र के किसानों की समस्याओं और ग्रामीण संकट से वे गहराई से जुड़े। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य किसानों और सूखा प्रभावित ग्रामीण परिवारों की सहायता करना था। उन्होंने राहत एवं सामाजिक कार्यों में आर्थिक सहयोग भी किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन पर शोक व्यक्त किया कि वे एक सच्चे ‘क्रांतिवीर’ थे जिन्होंने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी खामोशी उतनी ही असरदार थी जितनी उनकी दमदार आवाज। उन्होंने हमेशा देश-विरोधी तत्वों पर लगाम लगाने की वकालत की।

नाना पाटेकर की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने स्टार बनने की कोशिश नहीं की, कलाकार बने रहे। वे ग्लैमर की दुनिया में रहते हुए भी अपनी जड़ों से कटे नहीं। गरीबी ने उन्हें संवेदनशील बनाया, रंगमंच ने अनुशासन दिया, फिल्मों ने व्यापक पहचान दी, सेना ने राष्ट्रबोध को मजबूत किया और सामाजिक कार्यों ने उनके भीतर के मनुष्य को जीवित रखा। उनके अभिनय की विरासत केवल पुरस्कारों में नहीं, उन पात्रों में है जिन्हें उन्होंने अमर कर दिया। परिंदा का अन्ना, क्रांतिवीर का प्रताप, तिरंगा का शिवाजी राव, अब तक छप्पन का पुलिस अधिकारी, नटसम्राट का गणपत बेलवलकर और वेलकम का उदय शेट्टी-ये सभी नाना के अलग-अलग चेहरे हैं, लेकिन इनके पीछे एक ही कलाकार है, जो अभिनय को दिखाता नहीं था, संवेदनशीलता के साथ जीता था। नाना पाटेकर का जीवन हमें यह संदेश देता है कि प्रतिभा अवसर की मोहताज नहीं होती। जिस किशोर ने कभी 35 रुपये महीने के लिए फिल्म पोस्टर रंगे थे, वही आगे चलकर तीन राष्ट्रीय पुरस्कारों और पद्मश्री से सम्मानित हुआ। भारत ने एक अभिनेता खोया है, लेकिन उसकी कला, आवाज, संवाद, संघर्ष और संवेदनशील नागरिक की छवि लंबे समय तक जीवित रहेगी। नाना पाटेकर की सबसे बड़ी फिल्म शायद उनका अपना जीवन था-संघर्ष से शुरू हुई, संवेदना से समृद्ध हुई और कर्म की सच्चाई पर समाप्त हुई।

 

Maharas

 

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Mrs Asia International, Mrs INDIA 2026–27 Grand Finale आयोजित https://www.rashtratak.com/mrs-asia-international-mrs-india-2026-27-grand-finale-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%a4/ Tue, 06 Oct 2026 10:44:39 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3097 नई दिल्ली : ककरदूमा स्थित Golden Palm Hotel Resort में “Mrs Asia International 2026–27” का भव्य ग्रैंड फिनाले

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नई दिल्ली : ककरदूमा स्थित Golden Palm Hotel Resort में “Mrs Asia International 2026–27” का भव्य ग्रैंड फिनाले आयोजित किया गया, जिसका आयोजन Chirag Chaudhary द्वारा तथा Ritik Chaudhary के सहयोग एवं प्रायोजन में किया गया। इस शानदार आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया और महिलाओं की प्रतिभा, आत्मविश्वास, सौंदर्य एवं सशक्तिकरण का प्रभावशाली प्रदर्शन देखने को मिला। प्रतियोगिता में Dr. Rupali Vashishtha ने Mrs Asia International 2026–27 का प्रतिष्ठित खिताब अपने नाम किया, जबकि Mrs. Neha Chaudhary को Mrs India 2026–27 तथा Mrs. Nazia Sultan को Mrs North India के खिताब से नवाजा गया। Miss Delhi कैटेगरी में Gauri Yadav विजेता रहीं, जबकि Astha Chaudhary ने प्रथम रनर-अप और Neeshu ने द्वितीय रनर-अप का स्थान हासिल किया। Miss Delhi Winner का खिताब Pinkal Swaroop ने जीता तथा Arushi प्रथम रनर-अप रहीं। कार्यक्रम में Tannu Singh ने शोस्टॉपर के रूप में अपनी शानदार प्रस्तुति से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। महिलाओं के सामाजिक योगदान और उपलब्धियों को सम्मानित करते हुए Naari Samman Award से Dr. Rupali Vashishtha, Neha Chaudhary और Mrs. Priyanka Khera को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के Chief Guest Aale Mohammad Iqbal, विधायक, मटिया महल, दिल्ली विधानसभा, ने विजेताओं एवं प्रतिभागियों को शुभकामनाएं देते हुए महिलाओं की उपलब्धियों और सशक्तिकरण की दिशा में ऐसे आयोजनों की सराहना की। प्रतियोगिता में Shivika और Arunima ने निर्णायक की भूमिका निभाई। आयोजन ने सौंदर्य प्रतियोगिता के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण, आत्मविश्वास, सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक सम्मान का संदेश भी दिया। समारोह में विजेताओं को ताज, ट्रॉफी एवं सम्मान प्रदान किए गए और उपस्थित अतिथियों, प्रतिभागियों तथा दर्शकों ने पूरे कार्यक्रम का उत्साहपूर्वक आनंद लिया।

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Hanuman Ansh’ का साउथ कनेक्शन, हिंदी के बाद अब दक्षिण भारत में रिलीज की तैयारी https://www.rashtratak.com/hanuman-ansh-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%89%e0%a4%a5-%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95/ Tue, 15 Sep 2026 07:15:20 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2950 नई दिल्ली :पौराणिक और आध्यात्मिक कथानक पर आधारित फिल्म ‘Hanuman Ansh’ हिंदी दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाने

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नई दिल्ली :पौराणिक और आध्यात्मिक कथानक पर आधारित फिल्म ‘Hanuman Ansh’ हिंदी दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाने के बाद अब दक्षिण भारत के दर्शकों तक पहुंचने की तैयारी में है। हिंदी में रिलीज के बाद फिल्म को मिली प्रतिक्रिया को देखते हुए मेकर्स ने इसे दक्षिण भारतीय बाजार में भी रिलीज करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसके साथ ही फिल्म को पैन-इंडिया स्तर पर ले जाने की तैयारी तेज हो गई है।फिल्म की कहानी भगवान हनुमान से जुड़े आस्था, साहस और भक्ति के पहलुओं को केंद्र में रखती है। निर्माताओं का उद्देश्य भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं से जुड़े इस विषय को देश के अलग-अलग हिस्सों के दर्शकों तक पहुंचाना है। हिंदी के बाद दक्षिण भारतीय भाषाओं में रिलीज से फिल्म की पहुंच और दर्शक वर्ग दोनों के बढ़ने की उम्मीद है।मेकर्स के मुताबिक, दक्षिण भारत में पौराणिक और धार्मिक विषयों पर बनी फिल्मों को दर्शकों का अच्छा समर्थन मिलता रहा है। ऐसे में ‘Hanuman Ansh’ की साउथ रिलीज को लेकर भी उम्मीदें बढ़ गई हैं। फिल्म को स्थानीय दर्शकों के अनुकूल बनाने के लिए भाषा और प्रस्तुति से जुड़े पहलुओं पर भी काम किया जा रहा है।दक्षिण भारत में रिलीज के साथ फिल्म के पैन-इंडिया सफर को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि हिंदी के बाद ‘Hanuman Ansh’ दक्षिण भारतीय बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों के बीच कितना प्रभाव छोड़ पाती है।

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बुरी हूँ तो बुरी ही सही, कम से कम तुम्हारे तरहअंदर से ज़हर और बाहर से गुलाब तो नहीं हूँ। https://www.rashtratak.com/rashtratak-aneeta/ Tue, 25 Aug 2026 01:25:26 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2737 “ बुरी हूं बुरी ही सही”  बुरी हूँ तो बुरी ही सही, कम से कम तुम्हारे तरहअंदर से

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“ बुरी हूं बुरी ही सही” 

बुरी हूँ तो बुरी ही सही, कम से कम तुम्हारे तरहअंदर से ज़हर और बाहर से गुलाब तो नहीं हूँ।

मेरी खामियाँ मेरी हैं, मैं उन्हें छुपाती नहीं, दिल में जो बात हो, ज़ुबाँ पर लाने से घबराती नहीं।

कुछ लोग चेहरे बदल लेते हैं मौसम की तरह,मैं हर हाल में एक सी हूँ, रंग बदलना आता नहीं जो हूं खुली किताब हूं कोई नकाब तो नहीं,

पीठ पीछे वार करूं ऐसा मेरा हिसाब तो नहीं ।
सच कड़वा है तो क्या हुआ झूठ का ख़्वाब तो नहीं ,अपने वसूलों पर जीती हूं किसी की परछाई या जवाब तो नहीं ।

मै जैसे हूं सामने हूं दो चेहरे रखती नहीं ,मतलब निकल जाए तो रिश्ते बदलती नहीं ।
औकात की बात वो करे जो किरदार में साफ हो मै झुक सकती हूं किसी के आगे बिकती नहीं ।

मेरी खामियां मेरी है मै उन्हें छिपाती नहीं ,दिल में जो बात है कहने से घबराती नहीं ।
क़िरदार की खुशबू ही इंसान की पहचान होती हैं अनी “वरना चेहरे वक्त के साथ बदल ही जाते है ।।

 

 

  • डॉ अनीता मिश्रा कवयित्री लोकगायिका
  • लखनऊ उत्तर प्रदेश 226022

 

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`Be Mine` एक समकालीन भावनात्मक प्रेम-कथा है जो कॉलेज कैंपस की दुनिया में सेट है। https://www.rashtratak.com/be-mine-is-a-contemporary-emotional-love-story-set-in-the-world-of-a-college-campus/ Fri, 07 Aug 2026 16:32:06 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2657 *Be Mine: जब दिल लकीरें पार करने लगे* *लेखिका: अनन्या गुप्ता | प्रकाशक: BlueRose ONE* *किताब की कहानी*

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*Be Mine: जब दिल लकीरें पार करने लगे*
*लेखिका: अनन्या गुप्ता | प्रकाशक: BlueRose ONE*

*किताब की कहानी*
`Be Mine` एक समकालीन भावनात्मक प्रेम-कथा है जो कॉलेज कैंपस की दुनिया में सेट है। कहानी की नायिका *अलीशा बिंदल* एक आत्मविश्वासी बायोटेक्नोलॉजी की छात्रा है। उसकी जिंदगी दोस्त *लिया* के साथ हंसी-मजाक और पढ़ाई में बीत रही थी, जब तक कॉलेज में नए प्रोफेसर *रुद्रांश राणा* की एंट्री नहीं होती।

रुद्रांश शांत, इंटेलिजेंट और बेहद आकर्षक हैं। शुरुआत में अलीशा के लिए वो सिर्फ एक “डिस्ट्रैक्शन” थे, पर धीरे-धीरे चुराए गए नज़रे, अनकहे जज्बात और क्लास के बाद की छोटी-छोटी बातें एक गहरे रिश्ते में बदलने लगती हैं। समस्या ये है कि ये रिश्ता सामाजिक और पेशेवर दोनों सीमाओं को पार करता है।

इसी बीच कहानी में *विवान* आता है – एक खुशमिजाज और नेकदिल जूनियर। विवान की मौजूदगी अलीशा की जिंदगी में गर्माहट और सुकून लाती है। वो साबित करता है कि हर लव स्टोरी जटिल नहीं होती, कुछ रिश्ते बस हील करने के लिए बने होते हैं।

अब अलीशा दुविधा में है। एक तरफ वो आकर्षण जो उसे नहीं खींचना चाहिए, दूसरी तरफ वो साथ जो उसे शांति देता है। “क्या प्यार के लिए हर सीमा तोड़ना सही है?” इसी सवाल के इर्द-गिर्द पूरी कहानी घूमती है।

*लेखिका अनन्या गुप्ता की कहानी*

*अनन्या गुप्ता* 24 साल की एक्चुअरी एनालिस्ट हैं। पेशे से वो आंकड़ों और कैलकुलेशन की दुनिया में हैं, पर दिल से किताबों की दीवानी। उन्हें पढ़ने से सुकून मिलता है और रिश्तों को वो बहुत गहराई से समझती हैं।

अनन्या मानती हैं कि दोस्ती और परिवार ही असली ताकत हैं। `Be Mine` उनकी पहली पुस्तक है, जिसमें उन्होंने अपने कॉलेज के अनुभवों, दोस्ती और जवान दिल के उतार-चढ़ाव को शब्द दिए हैं। एक एनालिटिकल माइंड होते हुए भी उन्होंने भावनाओं को बहुत सहजता से लिखा है।

*किताब की खूबियां*
1. *भावनात्मक सहजता:* अनन्या ने पात्रों के डर, इच्छा, असुरक्षा और खुशी को बहुत ईमानदारी से दिखाया है। अलीशा और लिया की दोस्ती में वो अपनापन है जो हर पाठक को अपना लगता है।
2. *भाषा:* भाषा बिल्कुल सरल और फ्लो वाली है। 200-250 पेज की किताब एक-दो बैठकों में खत्म हो जाती है।
3. *संतुलन:* विवान-लिया का सीधा-सादा रिश्ता, अलीशा-रुद्रांश के उलझे रिश्ते के लिए एक अच्छा काउंटर देता है।

*आलोचनात्मक पक्ष*
किताब की सबसे बड़ी ताकत भी इसकी सबसे बड़ी चुनौती है – *छात्र-प्रोफेसर संबंध*। रुद्रांश खुद समझते हैं कि ये रिश्ता खुला तो उनकी नौकरी और अलीशा का करियर खतरे में पड़ सकता है। पर उपन्यास इस “पावर डायनामिक्स” और नैतिक जटिलता की उतनी गहराई से पड़ताल नहीं करता जितनी उम्मीद थी। कई जगह रोमांस, नैतिक सवालों पर भारी पड़ जाता है।

जो पाठक गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण या साहित्यिक भाषा चाहते हैं, उन्हें कुछ हिस्से सीधे लग सकते हैं।

  • *अंतिम निर्णय*
    `Be Mine` एक तेज, भावनात्मक और रिलेटेबल रोमांस है। ये प्रेम, दोस्ती, चुनाव और उनके परिणामों की कहानी है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि ये आपको पात्रों से जोड़ देती है। अगर लेखिका ने केंद्रीय रिश्ते की नैतिक परतों को और खोला होता, तो ये एक और परिपक्व उपन्यास बन सकता था।

कुल मिलाकर: एक बार में पढ़ जाने वाली, दिल को छूने वाली कहानी। उन लोगों के लिए जो “forbidden love” और “healing love” दोनों पढ़ना चाहते हैं।

*रेटिंग: 3.5/5 ⭐

 

 

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सुरों की मल्लिका,आशा का मुंबई में निधन https://www.rashtratak.com/mallika-asha-of-suron-passes-away-in-mumbai/ Sun, 12 Apr 2026 16:24:45 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2107 मशहूर गायिका आशा भोसले का 12 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया।

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मशहूर गायिका आशा भोसले का 12 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया। मल्टीपल ऑर्गन फेलियर उनकी मृत्यु का कारण बताया गया। उन्होंने 800 से अधिक फिल्मों में 12,000 से ज्यादा गाने गाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया।

 

 

नई दिल्ली। “संगीत अगर एक समंदर है, तो आशा भोसले उसकी वो लहर हैं जो हमेशा नई उमंग और खनक के साथ आती हैं।”  मशहूर सिंगर आशा भोसले  का 12 अप्रैल को निधन हो गया। मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में उन्होंने 92 साल की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली। उनके निधन की वजह मल्टीपल ऑर्गन फेलियर बताया जा रहा है।आशा जी की आवाज भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर की वो कड़ी थीं जिनके गानों को नए के साथ पुरानी पीढ़ी के लोग भी पसंद करते थे। आशा ने कई शैलियों के गानें गाए और इनके जरिए दर्शकों के दिलों में अपने लिए एक अलग जगह बनाई। ऐसी बेजोड़ और बहुमुखी प्रतिभा की धन गायिका के करियर पर एक नजर…

आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को एक प्रतिष्ठित परिवार में मुंबई में हुआ था। आशा भोंसले ने करीब 800 से अधिक फिल्मों के लिए 12,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए हैं। इसी के साथ उन्हें गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा संगीत इतिहास में सबसे अधिक गाने रिकॉर्ड करने वाली कलाकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। Asha (9)

आशा के पिता ने ही दी थी संगीत की शिक्षा

महाराष्ट्र के संगीतकार मंगेशकर परिवार में जन्मीं आशा लोकप्रिय गायिका लता मंगेशकर की छोटी बहन हैं। महान गायिका लता मंगेशकर की तरह ही आशा को भी उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई थी। साल 1942 में जब उनके पिता का निधन हुआ, तब आशा जी की उम्र मात्र 9 वर्ष थी। ग़रीब परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए उन्हें और उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर जी ने फिल्मों में गाना शुरू कर दिया।

उन्होंने फिल्म चुनरिया (1948) से अपने करियर की शुरुआत की, लेकिन शीर्ष पर पहुंचने में उन्हें लंबा समय लगा। उस दौर में लता मंगेशकर, शमशाद बेगम और गीता दत्त जैसी बड़ी गायिकाओं का बोलबाला था। शुरुआत में आशा जी को अक्सर वे गाने मिलते थे जिन्हें मुख्य गायिकाएं छोड़ देती थीं या जो वैम्प और साइड किरदारों पर फिल्माए जाते थे।

लेकिन साल 1957 में उन्हें संगीतकार ओ.पी. नैयर के साथ फिल्मों ‘तुमसा नहीं देखा’ और ‘नया दौर’ (1957) में बड़ा ब्रेक मिला। 1958 में उनकी तीन फिल्में रिलीज हुईं ‘लाजवंती’ (1959), ‘हावड़ा ब्रिज’ (1958) और ‘चलती का नाम गाड़ी’ (1958), इन फिल्मों के हिट गानों ने आशा को सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। इसके बाद, वह 1970 के दशक की शुरुआत तक नैयर की पसंदीदा गायिका रहीं। दोनों ने साथ मिलकर संगीत का जादू बिखेरा, खासकर फिल्मों ‘फिर वही दिल लाया हूं’ (1963), ‘मेरे सनम’ (1965), ‘हमसाया’ (1968) और ‘प्राण जाए पर वचन ना जाए’ (1974) में।

आशा ने लता से बिल्कुल अलग कैबरे नंबरों, गजलों, भजनों और पॉप गानों से अपनी अलग पहचान बनाई। ‘दम मारो दम’,’पिया तू अब तो आजा’,’दिल चीज क्या है’,’ये मेरा दिल’ और ‘चुरा लिया है तुमने’ शामिल हैं। साल 1960 के दशक के अंत तक, वह अपनी बहन के बाद दूसरे स्थान पर सबसे पॉपुलर सिंगर्स में से एक थीं। दोनों ही बहनें 1990 के दशक तक प्लेबैक सिंगिंग की क्वीन कहलाईं।

Asha (11)

आशा भोसले ने लता के सेक्रेटरी से  शादी की थी

उन्होंने मशहूर गायिका आशा भोसले का 12 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन16 साल की उम्र में गणपतराव भोसले से शादी की हालांकि बाद में उनका तलाक हो गया। इसके बाद में 1980 में संगीत निर्देशक आर.डी. बर्मन से शादी की और दोनों ने मिलकर जोरदार संगीत तैयार किया। हरे रामा हरे कृष्णा (1971), जवानी दीवानी (1972), प्रोसेशन ऑफ मेमोरीज (1973), और हम किसी से कम नहीं (1977) जैसी उनकी सबसे बड़ी हिट फिल्में थीं।

इसके अलावा एक्टेस को कई पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है। साल 2008 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। साल 2000 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार मिला। इसके अलावा सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका के तौर पर उन्हें 7 फिल्मफेयर पुरस्कार दिए जा चुके हैं।

एन्टरप्रेन्योर भी हैं थी आशा

इसके अलावा आशा एक एन्टरप्रेन्योर के तौर पर भी जानी जाती हैं। संगीत के अलावा आशा जी को कुकिंग से प्यार था। उन्होंने खुद कहा था कि ‘अगर वो गायिका न होतीं तो एक सेफ (chef) होतीं’। उन्होंने ‘Asha’s’ नाम से एक अंतरराष्ट्रीय रेस्टोरेंट चेन की स्थापना की। इसकी शुरुआत 2002 में दुबई के WAFI City Mall से हुई थी और अब इसके आउटलेट मध्य पूर्व (कुवैत, बहरीन) और यूके (बर्मिंघम, मैनचेस्टर) में हैं।  इसके अलावा वो रियलिटी शो में जज के रूप में भी नजर आ चुकी हैं

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सत्ता नहीं, विपक्षियों की देन सारा बवाल अजब माहौल, गज़ब का हाल https://www.rashtratak.com/the-whole-ruckus-is-due-to-the-opposition-not-power/ Sun, 22 Mar 2026 22:31:10 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1953 भीषण मंहगाई के दौर में दाम के लिहाज से मात्र चार अंकों की हद में सिमटे इस सिलेंडर

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भीषण मंहगाई के दौर में दाम के लिहाज से मात्र चार अंकों की हद में सिमटे इस सिलेंडर को तो पहचानते होंगे आप? सुर्ख लाल रंग की होकर भी नीली लौ देने वाली टंकी। जो इन दिनों आम लोगों को लाल पीला कर रही है। साथ ही ख़ास लोगों को अवसर दे रही है काला सफेद करने का। वो भी ऐसे वैसे नहीं घोर आपदा काल में। चलताऊ सोशल मीडिया से बिकाऊ मीडिया तक चर्चाओं में। सियासी सत्यवादियों के चेहरे उजागर करते हुए। बिना किल्लत के ज़िल्लत का सबब बन कर। जानते हैं किसकी वजह से? उसी विपक्ष की वजह से, जो केवल मुद्दे ढूंढता रहता है। जलेबी सी सरल और कुरकुरे सी सीधी हमारी सरकार को घेरने के लिए। बेवजह बदनाम करने की मंशा से। दूध की धुली सरकार, उसके सरदार, सिपहसालार और आलमबरदारों की जगहंसाई कराने के लिए।
जानते हैं आप, क्या किया इस नामुराद खंड खंड विपक्ष ने। अटल, अखंड सरकार के धुर विरोध में..? नहीं जानते ना..? कैसे और क्यों जानेंगे आप…?

गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी जो बैठे हैं बांध कर। लाचार धृतराष्ट्र के प्रेम में दीवाने हो कर। गांधारी कम से कम सुन और बोल तो लेती थी। आपने तो पतिव्रत धर्म में उसे भी कोसों पीछे छोड़ दिया। “बिन फेरे, हम तेरे” की तर्ज पर। कान में रूई नहीं बोतल का कॉर्क ठूंस कर। मुंह के कूंडे में गधैया के दूध का दही जमा कर। न बोलने के रहे, न सुनने के। पता नहीं गगनभेदी नारों की आवाज़ किधर से निकालते हैं आप लोग। वो भी कभी कभी नहीं, अमूमन हर दिन। एकाध दफा नहीं दो चार बार। किसी न किसी बहाने से। पता नहीं कहां से ले आते हो ताली कूटने का दम। इस छाती कूटने के दौर में।
हां हां, वही अच्छे दिन (बुरी रात) वाला दौर, जिसका बेड़ा कमबख्त विपक्ष नेे गर्क कर रखा है। करते रहते हैं कोई न कोई बखेड़ा आए दिन खड़ा। पता नहीं, अक़्ल की घोड़ी किस खेत में छोड़ रखी है चरने के लिए। लगे रहते हैं झूठ फैलाने और भोली भाली जनता को बरगलाने में। नेक नीयत सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए।

यह जानते हुए भी, कि बेचारी चुनाव काल के अलावा ठीक से खड़ा होना तो दूर, बैठ पाने की हालत में भी नहीं। कोई ऐसे ही पसर जाता है क्या, किसी के भी सामने..? वो भी बिना किसी तक़लीफ़ के। साष्टांग दंडवत की स्टाइल में। चाल में लोचा भी तभी होता है साहब, जब पांव में मोचा होता है। ऐसे में क्या तुक बनती है फोकट में गदर मचाने की।
सारे विपक्ष को पता था कि एक के बाद दूसरा घमासान छिड़ चुका है। पूरी दुनिया दम साधे टेक्स फ्री दंगल देखने में जुटी है। ऐसे में क्या ज़रूरत थी किरकिरी का नया मोर्चा खोलने की..? कुलबुला गए ना शैतान खोपड़ी में फितूर के कीड़े। सड़ांध मारती सनक की सतह पर। नहीं कुलबुलाए थे, तो काहे बढ़ा दिए लाल, नीली टंकी के भाव..? काहे लगा दिए छोटे, बड़े नौकरशाह गैस गोदामों को स्टेडियम बना कर फील्डिंग के लिए..? काहे लगा दी बुकिंग और रीफिलिंग पर जबरिया पाबंदी..? काहे शुरू करा दी डिजिटल इंडिया में सर्वर डाउन की मनमानी लीला..? फैला दिया ना “पैनिक” रायते की तरह।

झूठ आदत और नीयत में है, बोलते, मगर सोच तो लेते थोड़ा सा। कुछ बोलने और करने से पहले। मचवा दिया ना बेमतलब का बवाल..?
“आपदा में अवसर” के गुरुमंत्र पर अमल करना था ना गुरुभक्तों..! अपनी और अपनों की खाली बोरियां भरने के लिए..? तो कर लेते थोड़ी बहुत रिहर्सल, “सुर में सुर मिलाने” की। आख़िर क्या सूझ गई अपनी अपनी ढपली, अपना अपना राग करने की..? काहे डाल दिए तुमने सरकार के दरबारियों के श्रीमुख रूपी भाड़ में जुगाड़ रूपी बोल वचन के चने। भटक गए ना बेचारे महाप्रभु के अनन्य उपासक।

कोई दक्षिण को चल दिया, कोई उत्तर को। बिगड़ गई अच्छी खासी नौटंकी। ये काम होता है विपक्ष का..? समझ गई ना जनता सारा खेला..? नहीं समझती तो काहे लगता जगह जगह भीड़ का मेला..?
समझ गई जनता कि सब किया धरा विपक्ष का ही है। सत्ता पक्ष के पास कहां फुर्सत कुछ भी करने धरने की। उन बि(चारों) का तो सारा टाइम सीलिंग और डीलिंग के साथ फीलिंग करने कराने में खोटा हो रहा है।

उन बेचारों को क्या पता तंत्र, मंत्र और षड्यंत्र का। इसमें तो विपक्षी ही पारंगत हैं। तभी तो केंद्र से फुदक कर जा पहुंचा है हाशिए पर। पूरा करने जा रहा है नाकामियों का शतक। शातिर हैं तभी तो जानता है नए नए प्रयोग का हुनर। खोटी चवन्नी चल गई तो नाम धर दिया “अशर्फी।” नहीं चला कोई दांव तो पटक दिए पांव और ले लिया “यू टर्न” एक झटके में। बना दिया थूक को च्यवन प्राश। उसे चाटने को दिलवा दी “वीभत्स” के बजाय “श्रृंगार रस” की मान्यता, सियासत में।
धूर्त विपक्ष ने ही तो सिखाया सारे सिस्टम को खिलवाड़ का ढंग। उसी ने तो बताया आने को आठ आने में बदलने का धांसू फंडा। वरना अबोध तंत्र को कहां से आता “उल्टे उस्तरे” से हर तरह की खोपड़ी सफाचट कर डालने का हुनर।

विपक्ष ने ही सीख दी होगी, कि बढ़ा दो पहले से बेलगाम गैस के दाम। कर डालो उसे सुलभ से दुर्लभ। अपने आप चल जाएगा पता कि कितनी ढीली कराई जा सकती है जनता की जेब। वो भी रातों रात की गई बढ़ोत्तरी से ध्यान हटा कर। विपक्ष का ही तो था सारा मशवरा। वरना, सिस्टम को कैसे पता चलता कि चंद रुपए की वृद्धि से भड़की जनता त्राहिमाम की मुद्रा में आ जाएगी।

मासूम तंत्र कैसे जान पाता कि हज़ार से नीचे बिकने वाला घरेलू सिलेंडर ढाई से तीन हज़ार में भी बिक सकता है। असली खेल तो अब आगे देखना आप। विपक्ष अपने रिमोट से रोबोट स्वरूपा सरकार को चलाएगा तो और क्या भला होगा?
ये भी विपक्ष ने ही तो समझाया कि नीला सिलेंडर काले बाज़ार में कितनी वैल्यू बढ़ा सकता है मिस्टर इंडिया की तरह गायब होने के बाद। विपक्ष ने ही तो लगाया नीली टंकियों की आपूर्ति पर प्रतिबंध। सरकार को तो मालूम ही नहीं था रेहड़ी पटरी से ढाबे और होटल तक को दंडवत मुद्रा में लाने का यह नायाब और कामयाब फार्मूला। विपक्ष न होता तो सत्तानशीनों की मशीनों में कौन डालता कुप्पी लगा कर अकल का तेल। “सूखा बता कर बाढ़ लाओ और देवराज इंद्र कहलाओ” वाला फार्मूला। ये ज्ञान भी विपक्ष ने ही दिया होगा ज़रूर। वरना, समानता का डमरू बजाने वाले उस्ताद के पट्ठे क्यों खेलते असमानता का दांव। शहर को आपूर्ति 25 दिन में तो गांव को 45 दिन में करने की डुग्गी पीट कर।
करा दिया ना “सबका साथ, सबका विकास” वाली थीम का सत्यानाश..? समझा दिया ना भारत और इंडिया के बीच का दशकों पुराना फासला। किस काम का ऐसा विपक्ष, जो सारे सत्यवादियों को झूठ बोलना सिखा दे। एकमुखी को दशमुखी सिद्ध करा दे। कोई भंडार बताते न अघाए तो कोई संयम बरतने का पाठ पढ़ाएं। आपाधापी, मारामारी, तनातनी और सनसनी, खलबली जैसे मंज़र भी विपक्ष ने ही तो उपजा दिए रातों रात। बिचारे सत्ता वाले तो सारे कर्म दिन में करने के पक्षधर हैं। वो भी शुभ मुहूर्त और चौघड़िया देख कर। भूल गए हों तो मोटबंदी और लॉकडाउन को याद कर लो।
अब सारी अफ़वाह भी विपक्ष ही फैला रहा है।

यह बताने के बाद भी अब नियम बदल गया है। सच बोलने का नाम दहशत पैदा करना हो गया है। आशंका जताने का मतलब अफ़वाह फैलाना। विपक्ष ही तो लुटाता है अरबों रुपए मीडियाई मुर्गों पर। जी हां, उन्हीं विरदावली गायकों पर, जो नज़ारे दिखा रहे हैं कोहराम के और भाषण सुनवा रहे हैं इंतज़ाम के। पता ही नहीं चल रहा कि सच क्या है और झूठ क्या..? एलपीजी के लिए देश लाइन में लगा नहीं है, लगवाया गया है। ये भी विपक्ष की ही करतूत है शायद।

उसी ने तो खड़ा किया था पहले भी बैंकों के बाहर लोकतंत्र के देवी देवताओं को। बेचारी सेवक सरकार क्यों करेगी ऐसे सितम..? हो सकता है कि जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वो सब झूठे और मनगढंत हों। हो सकता है भीषण गर्मी में एक अदद सिलेंडर के लिए पसीना बहाने वाले पगला गए हों। रामराज्य के सुंदर कांड में अरण्य कांड का मज़ा ले रहे हों। जंगल सफारी के शौक को पूरा करने के लिए।
हो सकता है लोगों को ही बैठे ठाले शौक चर्राया हो शादी, ब्याह में लकड़ी की पुरानी भट्टी जलवाने का। होटल, ढाबे वालों को इंडेक्शन, हीटर जैसे विकल्प अपनाने का। ज़रूर विपक्ष ने ही रोका होगा महान नुस्खे पर अमल करने से। वरना, देश में क्या कमी है गैस का विपुल उत्पादन करने वाले नालों की। जिनकी पावन गैस से चाय जैसा दिव्य और अमृत तुल्य पेय बन सकता है, उससे भोजन, व्यंजन और पकवान नहीं बन सकते क्या? विपक्ष के उकसावे पर लगे पड़े हैं ब्लैक में रेड सिलेंडर हासिल करने की होड़ में। मेक इन इंडिया और स्किल डेवलपमेंट की पिटवा दी ना भद्द इस मरे विपक्ष ने।
सरकार को क्या पड़ी है कि सस्ती गैस गायब कर मंहगी बिजली की खपत बढ़वाए। बिजली के उपकरण खरीदने पर लोगों को बाध्य करे। उसे कोई चंदा या कमीशन तो दे नहीं रहे यह सब बनाने वाले उद्योगपति। लखपति से अरबपति बने विपक्ष के चहेते और भाई भतीजे। लगता है इसमें भी मिलीभगत विपक्ष की ही है। उसे ही चस्का लगा हुआ है चंदाखोरी व चिंदीचोरी का। विपक्ष का ही तो खज़ाना लबालब हुआ है इलेक्टोरल बॉन्ड्स से।

वही तो बेच रहा है देश की संपदा गिने चुने घरानों को, याराना बनाए रखने के लिए। टाटा, बिड़ला की विरासत वाले देश को अडानी, अंबानी की मिल्कियत व सल्तनत बनाने का ताना बाना भी विपक्ष ही तो बुन रहा है। हर नाकामी से औरों की नाकामी को बड़ा बताने वाले चिंटू, पिंटू भी विपक्ष ने ही बैठा रखे हैं चैनलों पर। विश्लेषक और विशेषज्ञ के रूप में दिहाड़ी पर।
बेशक़, सारा बवंडर विपक्ष का ही उठाया हुआ है। वही तो पढ़ाता है सीधे सादे हुक्मरानों को उल्टी पट्टी। टी/20 वर्ल्ड कप की जीत के जश्न में डूबे थे लोग। त्यौहारी सीज़न में एक्टीवेट था सरकारी इवेंट मोड। पता नहीं, क्या सूझा नाकारा विपक्ष को। कर दिया आवश्यक सेवा क़ानून का फ़रमान जारी। हड़कंप तो मचना ही था, नहीं तो खाया पिया कैसे पचता..? खैरात की तरह एक सिलेंडर मांगने पर मजबूर विपक्ष ने ही तो किया जनता को। ताकि गोदामों में उपलब्ध भंडार को सौगात के रूप में बांट कर वाहवाही बटोरी जा सके। यही तो काम आनी थी इस साल बंगाल में और अगले साल यूपी में।
जनता भी बदमाशी में विपक्ष से कुछ कम नहीं। अच्छा मौका अता किया था ऊपर वाले ने, नमक हलाली का। प्रखर राष्ट्रवाद के भरपूर प्रदर्शन का। गच्चा खाते आ ही रहे थे बरसों से। थोड़े दिन कच्चा खा लेते, गैस नहीं मिलती तो। हाज़मा नेताओं सरीखा दुरुस्त होता और दांत व दाढ़ मज़बूत। क्या बिगड़ जाता अगर 2047 के (आदमी) दौर में पहुंचने से पहले कुछ महीने ईसा पूर्व 247 के (आदम) युग में जी लेते। लता, पत्ते, साग, सब्ज़ी, फल, फूल और कंद मूल खा कर। पेट ही तो भरना था, खाली करने के लिए। बट्टा तो न लगता कम्प्यूटर से भी तेज़ दिमाग़ वाले “चच्चा चौधरी” की साख पर। लानत तो न बरसती उनके अनन्य प्रिय दमदार “साबू” और असंख्य दुमदार “रॉकेटों” की शान पर।
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है भक्तजनों! सुधर जाओ थोड़ा बहुत। विश्वगुरु की आबरू का दुश्मन विपक्ष बर्बाद न कर डाले तुम्हें। जिस धरती पर आत्माएं तक आती जाती रहती हैं, वहां गैस के न आने जाने का मलाल क्यों? गैस सिलेंडर आना “बंद” न होगा तो “चालू” कैसे होगा..? एक नए उत्सव का क्या आनंद, अगर घोड़ा मातम न हो।

विपक्ष की बात पर कान न करें। वैसे भी “पकाने” के लिए गैस ही ज़रूरी नहीं। जब गैस नहीं थी तब भी पक ही रहा था ना खाना। “खयाली पुलाव” बहुत ठूंस चुके। कुछ दिन “दिमागी खिचड़ी” का ज़ायका ले लो। काम नहीं कर पा रहे तो आराम कर लो। राम जी का प्रसाद मान कर।
कुल मिला कर विपक्ष के हाथी, घोड़े, ऊंट मत बनो। सियासत की चौसर पर सत्ता के बादशाह के पिद्दी (प्यादे) बने रहने का अपना मज़ा है। वज़ीर को बचाओगे तो नज़ीर बनाओगे। पकाने को गैस नहीं तो ना सही।

नेता और चैनल वाले हैं ना पकाने के लिए। कुछ दिन दाल फ्राई की जगह “भेजा फ्राय” का लुत्फ़ लेकर भी देखो। एआई का ज़माना है और इमेजिन का समय। असली सूरत की जगह इमोजी से काम चलाते हो ना..? एकाध महीने सिलेंडर की जगह उसकी तस्वीर से मन बहला लो। खाना सदियों से पका ही रहे हो। कुछ दिन ख़ुद पक लोगे तो कौन सा आसमान फट जाएगा। फिलहाल, तेल देखो तेल की धार देखो और आने वाले त्यौहार देखो। तुम केवल उत्सव मनाने को पैदा हुए हो, टसुए बहाने के लिए नहीं। ठहाके लगाओ कि “इंडिया” में हो।।

 

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“पूल में मगरमच्छ का जोड़ा… सर्वाइवल थ्रिलर फिल्म” https://www.rashtratak.com/crocodile-pair-in-poolsurvival-thriller-film/ Sun, 15 Mar 2026 04:30:32 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=1835 यह एक सर्वाइवल थ्रिलर फिल्म है जो एक मगरमच्छ के एक जोड़े से भरे पूल में कहानी दिखाती

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यह एक सर्वाइवल थ्रिलर फिल्म है जो एक मगरमच्छ के एक जोड़े से भरे पूल में कहानी दिखाती है. फिल्म 2018 में आई थाई हौरर फिल्म ‘द पूल’ से प्रेरित है. वैसे तो यह एक लवस्टोरी है लेकिन निर्देशक ने इस में मगरमच्छ वाला जो ट्विस्ट डाला है, उस की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी. लव से शुरू हुई यह कहानी एक गहरे खौफ पर खत्म होती है दर्शक सांसें थामे रहते हैं कि आगे क्या होगा. फिल्म का रिव्यू पढ़ने के बाद डरने या घबराने की जरूरत नहीं है. वैलेंटाइन वीक प्यार की फुहार वाली यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है.

बौलीवुड में सर्वाइवल थ्रिलर फिल्में कम ही बनी हैं. टाइटल देख कर और शनाया कपूर का नाम पढ़ कर दर्शकों ने एक रैगुलर लवस्टोरी की उम्मीद की थी, मगर निर्देशक ने रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी डाल कर दर्शकों की धारणा को बदल डाला है. इस फिल्म को देखते वक्त ज्यादा लौजिक ढूंढ़ने की कोशिश न करें. ढाई घंटे की यह फिल्म आप के धैर्य की परीक्षा लेती नजर आती है.

फिल्म की कहानी मुंबई में रहने वाली सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अवनि शाह उर्फ मिस वैनिटी ( शनाया कपूर) और नालासोपारा के युवा मारुति कदम उर्फ फ्लोपारा (आदर्श गौरव) के इर्दगिर्द बुनी गई है. सोशल मीडिया के लिए रील्स बनाते वक्त दोनों करीब आते हैं और एकदूसरे से प्यार करने लगते हैं. अवनि के 20 लाख फॉलोअर्स हैं जबकि मारुति आर्थिक तंगी से गुजर रहा है. उस के फौलोअर्स भी ज्यादा नहीं हैं.

हालात से तंग आ कर दोनों गोवा जाने का फैसला करते हैं. रास्ते में उन की मोटरसाइकिल खराब हो जाती है और एक सुनसान जगह में बंद पड़े स्कूबा डाइविंग सैंटर में डाइविंग करते हैं. यहीं से कहानी में ट्विस्ट आता है दोनों लगभग एक 20 फुट गहरे स्विमिंग पूल में ज्यादा फंस जाते हैं पूल में ज्यादा पानी नहीं है और बाहर निकलने का रास्ता भी नहीं है. अचानक एक मगरमच्छ उस पूल में घुस आता है. उन की जान पर बन आती है.

इस के बाद पूरी फिल्म सर्वाइवल थ्रिलर में बदल जाती है मगरमच्छ के साथ फंसी अवनि और मारुति अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष करते हैं. मगरमच्छ का सामना करते हुए उन का कुत्ता मारा जाता है और मदद के लिए आया इंस्पैक्टर भी मगरमच्छ का शिकार बनता है. अवनि एक मगरमच्छ को गोली मार देती है मगरमच्छ के काटने से घायल मारुति तैरने में असमर्थ हो जाता है लेकिन अवनि उसे तैर कर पूल से बाहर निकलने में मदद करती है आखिरकार दोनों बच जाते हैं।

फिल्म में रोमांचक सीन दर्शकों को निश्चित रूप से भयभीत कर देते हैं।

थाई फिल्म ‘द पूल’ से प्रेरित इस फिल्म की कहानी में निर्देशक ने टेंशन बनाए रखी है. फिल्म सैकंड हाफ में कई जगह सांसें थामने पर मजबूर कर देती है. अवनि और मारुति का रोमांस लंबा लगता है. फिर भी तकनीकी रूप में फिल्म काफी मजबूत है.

मध्यांतर के बाद के संवाद कसावट लिए हैं. मगरमच्छ के साथ टकराव वाले दृश्य रोमांच पैदा करते हैं. पटकथा में कुछ तार्किक कमियां हैं. मोबाइल का पानी में तैरना और उस की घंटी बजना अविश्वसनीय लगता है. मगरमच्छ फिल्म का अहम हिस्सा है, मगर यह पहचान पाना मुश्किल लगता है कि वह असली है या नकली.

अभिनय की दृष्टि से आदर्श गौरव और शनाया कपूर ने पूरी फिल्म को संभाले रखा है. शनाया कपूर इन्फ्लुएंसर के रूप में आत्मविश्वासी नजर आती है. यह उस की दूसरी फिल्म है. अन्य कलाकार अपनी अपनी भूमिकाओं में फिट हैं. बीचबीच में फिल्म की रफ्तार धीमी पड़ जाती है. कुछ सीन दोहराव लिए हैं. सस्पेंस को लंबा खींचा गया लगता है.

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी शानदार है. वीएफ एक्स और मगरमच्छ को क्रिएट करने वाले तकनीकी कलाकारों का काम अच्छा है. बैकग्राउंड म्यूजिक भी अच्छा है जो ‘आंखें चार…’ या ‘तुम ही प्यारी मंजिल हो माई लव…’ गीतों को गुनगुनाने का काम करता है. फिल्म का निर्देशन ठीकठाक है. संपादन में और ज्यादा कसावट होती, तो अच्छा था.

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