27 सितम्बर 1925 को विजयादशमी के पावन दिवस पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ की स्थापना जिन मुख्य उद्देश्यों को लेकर हुई थी, उनमें भारतीय समाज मेंएकता, सद्भावना एवं समरसता का भाव मजबूत करना एवं भारतीय नागरिकों केबीच सनातन संस्कृति के संस्कारों के अनुपालन को बढ़ावा देना भी शामिल हैं।भारतवर्ष में धर्म का अनुसरण करते हुए, अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से धार्मिकसंस्कारों का आचरण करने वाली तपस्वी, त्यागी एवं ज्ञानी विभूतियां एक अखंडपरम्परा के रूप में अवतरित होती आई हैं। इन्हीं महान विभूतियों के चलते हीभारत की एक राष्ट्र के रूप में वास्तविक रक्षा हुई है। अतः हम भारतीय नागरिकोंको यह भली भांति समझना होगा कि भारतीय समाज को समर्थ, धर्मनिष्ठ, प्रतिष्ठित बनाने में हम तभी सफल हो सकेंगे जब हम भारत की प्राचीन परम्पराको युगानुकूल बनाकर एक बार पुनः इसे पुनर्जीवित करेंगे।
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैंऔर यदि हम संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें, तो ध्यान में आता हैकि संघ के स्वयसेवकों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विचार और क्रियाशीलता केस्तर पर सक्रिय योगदान दिया है। वे अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के वाहक भी बनेहैं। प्रारम्भ का सीमित संघ कार्य, समय के साथ व्यापक होता गया है। समाजकी विभिन्न आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवक विविध आयामों में अपनेसहयोगियों के साथ क्रियाशील बने हैं। परिणामतः संघ के उद्देश्य के अनुरूप, देश में हिंदुत्व का जागरण करने की दिशा में विशेष प्रगति हुई है। हिंदुत्व केजागरण से, समाज में जाति, वर्ग, भाषा इत्यादि के आधार पर होने वाले अनेकप्रकार के भेदभाव, धीरे धीरे कम होने लगे हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, अयोध्या मंदिर में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा, कुम्भ जैसे विराट आयोजनइत्यादि अनेक ऐसे अवसर आए हैं – जहां हिंदू समाज का एक संगठित, भव्यऔर उच्च आदर्शों से युक्त स्वरूप सामने आया है। यह दृश्य समाज मेंआत्मविश्वास जगाने वाला बन रहा है। हम सब मिलकर देश के भविष्य कोउज्जवल एवं सुदृढ़ बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एकसकारात्मक वातावरण निर्मित कर सकते हैं। इसलिए ये हमारी राष्ट्रीय एकात्मताको सुदृढ़ करने वाले आयोजन सिद्ध हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्षकेवल इतिहास की उपलब्धियां नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा का संकल्प हैं।
आज, जब हम राष्ट्रीयस्वयं संघ की 100 वर्षों की इस यात्रा को देखते हैं, तोयह भी स्पष्ट होता है कि हिंदुत्व और इसकी परम्पराओं पर लोगों का विश्वासबढ़ा है। समाज के अनेक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर रहे हैं और इसकाअनुभव भी कर रहे हैं। हिंदुत्व की इस जागृति के कारण लोग अब हिंदू होने मेंगर्व का अनुभव कर रहे हैं। एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में हिंदू समाजकी कमियों को ही उजागर किया जाता था, जिससे अनेक लोग हिंदुत्व कीअच्छाईयों को पहचान नहीं पाए, किंतु अब स्थिति बदल रही है। लोग अपनेपूर्वजों के धर्म और परम्पराओं को महत्व
