हर जीवन में कुछ अध्याय ऐसे होते हैं जो खोले नहीं जाते। देवेश की यात्रा भी ऐसी ही है।
युवावस्था से ही संगीत और भजन उनके जीवन की भाषा थे। भजन में उन्हें शांति मिलती थी। फिर नौकरी लगी, विवाह हुआ। लगा जीवन को साथी मिल गया, पर पत्नी के स्वास्थ्य और व्यवहारगत कारणों से घर में तनाव बढ़ने लगा। सम्मान फिर भी बना रहा। एक दिन पत्नी मायके गईं और फिर संपर्क ही समाप्त हो गया। देवेश ने बहुत प्रयास किए, हर उम्मीद टूटी। तभी मन से निकला — _”रिश्ता रहे या न रहे, सम्मान हमेशा रहेगा।”_
अकेलेपन में जीवन ने दूसरा मोड़ लिया। सुनीता नाम की महिला से मुलाकात हुई। लगा फिर सहारा मिलेगा, पर गंभीर आरोप लगे और देवेश को जेल जाना पड़ा। साथ ही नौकरी भी चली गई। विवाह, कानून और रोजगार — सब एक साथ छूटते गए।
टूटे मन को लेकर देवेश वृंदावन चले गए। मंदिरों की घंटियाँ, राधे-राधे की गूंज और संतों के बीच लगभग एक वर्ष रहकर उन्होंने भीतर की शांति खोजी। संसार में सहारा खोजने वाला व्यक्ति अब ईश्वर की शरण में था। वहाँ एक और संबंध बना, पर स्थायित्व नहीं मिला। वे माता-पिता के पास लौटे, पर वृंदावन से नाता बना रहा।
फिर जीवन में एक सनातनी विचारों वाली महिला से मिलना हुआ। इस बार देवेश ने अपना अतीत छिपाया नहीं, स्वीकार किया। यही सच्चाई विश्वास बनी और दोनों ने वृंदावन की पावन धरती पर विवाह कर नई शुरुआत की।
देवेश ने रिश्तों की खुशी, बिछड़ने का दर्द, आरोप, जेल और अकेलापन सब देखा। पर एक चीज कभी नहीं छूटी — भजन। जो कभी आनंद था, वही अब साधना बन गया।
उनकी यात्रा सुरों से शुरू हुई, रिश्तों में उलझी, दर्द से गुजरी और भक्ति तक पहुँची। यही सिखाती है — *टूटना अंत नहीं, कभी-कभी टूटकर ही इंसान अपने भीतर की असली शक्ति को पा लेता है।

डा. अनीता मिश्रा, कवयित्री / लोकगायिका, लखनऊ (उ.प्र.)
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