श्री कृष्ण क्या थे? कौन थे? किस उपमा से अभिवंदित करें हम उन्हें? वृंदावन की निकुंज गलियों के छबीले गोपालक! मनहरण सुर-लहरियाँ छेड़ने वाले बंसी-बजैय्या! अधर्मी कंस, शिशुपाल आदि के प्राणहर्त्ता यदुवीर! युगांतरकारी महाभारत युद्ध के एकल नियंता! कुटिलता के विरुद्ध चतुर दाँव-पेंच खेलने वाले कुशल राजनीतिज्ञ! एक क्रांति-विधायक युगपुरुष! तत्त्व-ज्ञान की परम-निर्झरणी गीता के अपूर्व स्रोत! क्या कहें हम उन्हें? बंकिम के अनुसार श्री कृष्ण में हम ज्ञानार्जनी, कार्यकारिणी और लोकरंजनी- तीनों प्रकार की प्रवृत्तियों का एक साथ अवलोकन कर सकते हैं। उनमें प्रेम की रस माधुरी भीथी और वैराग्य की दीप्त ज्वाला भी। कहीं उन्होंने भक्ति की भावभीनी सुरभि बिखेरी, कहीं सनातन धर्म की महामहिम गरिमा प्रतिष्ठित की। कहीं भावरस के सरोवर में क्रीड़ाएँ कीं, कहीं हिंसा के ठेठ दावानल में मुस्कुराते हुए उतर गए। इस महाविभूति का महिमागान करते हुए महर्षि व्यास सारांशतः कह उठे- ‘कृष्णस्तु भगवान स्वयम्’– श्री कृष्ण पूर्ण भगवान हैं। 16 कलाओं से युक्त सर्वांशिक अवतार हैं। परात्पर सच्चिदानंद स्वरूप ब्रह्म का साक्षात् प्रतिबिम्ब हैं।
किन्तु विडम्बनीय तथ्य यह है कि आर्यावर्त्त, जो इस पूर्णावतार की लीला-स्थली रही, उसी की कुछ विद्वत संतानें इसे मुक्त हृदय से स्वीकार नहीं कर पाईं। उनके अनुसार श्री कृष्ण भगवान नहीं, एक विवादास्पद इतिहास-पुरुष थे। यही नहीं उनके अनुसार, कृष्ण एक कुटिल राजनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने महाभारत सदृश रक्तिम युद्ध को अवरुद्ध करने की अपेक्षा संचालित किया। संचालित भी कैसे? कुचालें चलकर! अनैतिक व अवैध रूप से!आइए इसी प्रज्ञा-दीप के प्रकाश में हम श्री कृष्ण की कुछ विवादास्पद लीलाओं का निरीक्षण करें।
श्री कृष्ण ने युद्ध अवरुद्ध क्यों नहीं किया? यदि श्री कृष्ण जगदीश्वर थे, तो सर्वसमर्थ भी थे। सर्वशक्तिशाली भी थे। इच्छा मात्र से युगांतरकारी परिवर्तन ला सकते थे। फिर उन्होंने महाभारत का प्रलयकारी, महाविनाशक युद्ध रोधित क्यों नहीं किया? ये संदेहास्पद प्रश्न जन-जन के हृदयों में पैठे हुए हैं। किन्तु ये संशय भी हमारी अल्पज्ञता के ही द्योतक हैं। निःसन्देह वह परम-सामर्थ्यवान है। किन्तु यह उसका उदार नियम है कि वह अपनी रचना, मानव को कर्म-संपादन की पूर्ण स्वतंत्रता देती है। उसके कर्म-क्षेत्र में किंचित भी हस्तक्षेप नहीं करती। हाँ, कर्म को सकारात्मक दिशा देने हेतु उसे प्रेरित ज़रूर करती है। सो श्री कृष्ण ने पग-पग पर यथाशक्य किया। युद्ध अवरोधन के क्रम में भी उन्होंने अपनी इसी आदर्श परिपाटी का अनुपालन किया। किन्तु जब दुर्योधन अपने कर्म-स्वातंत्र्य का दुरुपयोग करने पर उतारू ही रहा, उसने श्री कृष्ण के सभी शांति-प्रस्तावों को ठुकरादिया, तब विवश होकर धर्म-संरक्षक भगवान को महाविध्वंसकारी युद्ध का शंखनाद करना पड़ा।
श्री कृष्ण ने कूटनीति द्वारा शत्रु हनन क्यों करवाया? यह इस द्वापर युगीन अवतार के विरुद्ध एक ज्वलंत आक्षेप है। जब श्री कृष्ण धर्म के संरक्षक थे, फिर उन्होंने जरासंध, गुरु द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह आदि योद्धाओं को अधार्मिक व अवैध विधियों से क्यों मरवाया? श्री कृष्ण ने क्यों भीमसेन से इस नियम की उल्लंघना करा उसे दुर्योधन वधकरने हेतु दुष्प्रेरित किया? ऐसे ही प्रतिवादी प्रश्न कर्ण ने उठाए थे। प्रत्युत्तर में श्री कृष्ण ने जो कहा, वह मार्के का है। वह यह कि– ‘शठे शाठयं समाचरेत्’– Tit for Tat – जैसेको तैसा। यही उनकी युद्ध-सम्बन्धी प्रणाली थी। इसे किसी भी कोणानुसार ‘कूटनीति’कहना यथोचित न होगा। न ही इसे ‘कोरी राजनीति’ की संज्ञा देना उपयुक्त है। कारण कि कूटनीति अथवा राजनीति में प्रणालियाँ स्वार्थ-सिद्धि के लिए गठित की जाती हैं। किन्तु श्री कृष्ण की युद्ध पद्धति मात्र लोक-कल्याण पर एकलक्षित थी। उसका मात्र एक हेतु था- ‘धर्म-संस्थापना!’ ‘सत्य-प्रतिष्ठापना!’ इस व्यापक धर्म की संस्थापनार्थ जोकोई भी साधन अपनाया जाए, वह परम शुभ्र व सत्यस्वरूप बन जाता है। फिर चाहे स्थूल दृष्टि से वह निरादर्श अधार्मिक हथकंडा ही क्यों न प्रतीत हो! चाहे कितना ही कूट याछल-छद्मपूर्ण जान पड़े!

अतः श्री कृष्ण आलोचकों और प्रेमियों, आप सभी पूर्ण गुरु द्वारा दीक्षित होकर कृष्ण तत्त्व का अन्तर्बोध करें। तभी उन युगावतार प्रभु और उनकी लीलाओं में निहित तात्विक रहस्यों को जान पाएँगे। तभी उनके प्रति शाश्वत प्रेम व श्रद्धा प्रस्फुटित होगी। तभी समस्त संशय व अंतर्विरोध शून्य में विलीन होंगे। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से सभी पाठकों को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

