भीषण मंहगाई के दौर में दाम के लिहाज से मात्र चार अंकों की हद में सिमटे इस सिलेंडर को तो पहचानते होंगे आप? सुर्ख लाल रंग की होकर भी नीली लौ देने वाली टंकी। जो इन दिनों आम लोगों को लाल पीला कर रही है। साथ ही ख़ास लोगों को अवसर दे रही है काला सफेद करने का। वो भी ऐसे वैसे नहीं घोर आपदा काल में। चलताऊ सोशल मीडिया से बिकाऊ मीडिया तक चर्चाओं में। सियासी सत्यवादियों के चेहरे उजागर करते हुए। बिना किल्लत के ज़िल्लत का सबब बन कर। जानते हैं किसकी वजह से? उसी विपक्ष की वजह से, जो केवल मुद्दे ढूंढता रहता है। जलेबी सी सरल और कुरकुरे सी सीधी हमारी सरकार को घेरने के लिए। बेवजह बदनाम करने की मंशा से। दूध की धुली सरकार, उसके सरदार, सिपहसालार और आलमबरदारों की जगहंसाई कराने के लिए।
जानते हैं आप, क्या किया इस नामुराद खंड खंड विपक्ष ने। अटल, अखंड सरकार के धुर विरोध में..? नहीं जानते ना..? कैसे और क्यों जानेंगे आप…?
गांधारी की तरह आंखों पर पट्टी जो बैठे हैं बांध कर। लाचार धृतराष्ट्र के प्रेम में दीवाने हो कर। गांधारी कम से कम सुन और बोल तो लेती थी। आपने तो पतिव्रत धर्म में उसे भी कोसों पीछे छोड़ दिया। “बिन फेरे, हम तेरे” की तर्ज पर। कान में रूई नहीं बोतल का कॉर्क ठूंस कर। मुंह के कूंडे में गधैया के दूध का दही जमा कर। न बोलने के रहे, न सुनने के। पता नहीं गगनभेदी नारों की आवाज़ किधर से निकालते हैं आप लोग। वो भी कभी कभी नहीं, अमूमन हर दिन। एकाध दफा नहीं दो चार बार। किसी न किसी बहाने से। पता नहीं कहां से ले आते हो ताली कूटने का दम। इस छाती कूटने के दौर में।
हां हां, वही अच्छे दिन (बुरी रात) वाला दौर, जिसका बेड़ा कमबख्त विपक्ष नेे गर्क कर रखा है। करते रहते हैं कोई न कोई बखेड़ा आए दिन खड़ा। पता नहीं, अक़्ल की घोड़ी किस खेत में छोड़ रखी है चरने के लिए। लगे रहते हैं झूठ फैलाने और भोली भाली जनता को बरगलाने में। नेक नीयत सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए।
यह जानते हुए भी, कि बेचारी चुनाव काल के अलावा ठीक से खड़ा होना तो दूर, बैठ पाने की हालत में भी नहीं। कोई ऐसे ही पसर जाता है क्या, किसी के भी सामने..? वो भी बिना किसी तक़लीफ़ के। साष्टांग दंडवत की स्टाइल में। चाल में लोचा भी तभी होता है साहब, जब पांव में मोचा होता है। ऐसे में क्या तुक बनती है फोकट में गदर मचाने की।
सारे विपक्ष को पता था कि एक के बाद दूसरा घमासान छिड़ चुका है। पूरी दुनिया दम साधे टेक्स फ्री दंगल देखने में जुटी है। ऐसे में क्या ज़रूरत थी किरकिरी का नया मोर्चा खोलने की..? कुलबुला गए ना शैतान खोपड़ी में फितूर के कीड़े। सड़ांध मारती सनक की सतह पर। नहीं कुलबुलाए थे, तो काहे बढ़ा दिए लाल, नीली टंकी के भाव..? काहे लगा दिए छोटे, बड़े नौकरशाह गैस गोदामों को स्टेडियम बना कर फील्डिंग के लिए..? काहे लगा दी बुकिंग और रीफिलिंग पर जबरिया पाबंदी..? काहे शुरू करा दी डिजिटल इंडिया में सर्वर डाउन की मनमानी लीला..? फैला दिया ना “पैनिक” रायते की तरह।
झूठ आदत और नीयत में है, बोलते, मगर सोच तो लेते थोड़ा सा। कुछ बोलने और करने से पहले। मचवा दिया ना बेमतलब का बवाल..?
“आपदा में अवसर” के गुरुमंत्र पर अमल करना था ना गुरुभक्तों..! अपनी और अपनों की खाली बोरियां भरने के लिए..? तो कर लेते थोड़ी बहुत रिहर्सल, “सुर में सुर मिलाने” की। आख़िर क्या सूझ गई अपनी अपनी ढपली, अपना अपना राग करने की..? काहे डाल दिए तुमने सरकार के दरबारियों के श्रीमुख रूपी भाड़ में जुगाड़ रूपी बोल वचन के चने। भटक गए ना बेचारे महाप्रभु के अनन्य उपासक।
कोई दक्षिण को चल दिया, कोई उत्तर को। बिगड़ गई अच्छी खासी नौटंकी। ये काम होता है विपक्ष का..? समझ गई ना जनता सारा खेला..? नहीं समझती तो काहे लगता जगह जगह भीड़ का मेला..?
समझ गई जनता कि सब किया धरा विपक्ष का ही है। सत्ता पक्ष के पास कहां फुर्सत कुछ भी करने धरने की। उन बि(चारों) का तो सारा टाइम सीलिंग और डीलिंग के साथ फीलिंग करने कराने में खोटा हो रहा है।
उन बेचारों को क्या पता तंत्र, मंत्र और षड्यंत्र का। इसमें तो विपक्षी ही पारंगत हैं। तभी तो केंद्र से फुदक कर जा पहुंचा है हाशिए पर। पूरा करने जा रहा है नाकामियों का शतक। शातिर हैं तभी तो जानता है नए नए प्रयोग का हुनर। खोटी चवन्नी चल गई तो नाम धर दिया “अशर्फी।” नहीं चला कोई दांव तो पटक दिए पांव और ले लिया “यू टर्न” एक झटके में। बना दिया थूक को च्यवन प्राश। उसे चाटने को दिलवा दी “वीभत्स” के बजाय “श्रृंगार रस” की मान्यता, सियासत में।
धूर्त विपक्ष ने ही तो सिखाया सारे सिस्टम को खिलवाड़ का ढंग। उसी ने तो बताया आने को आठ आने में बदलने का धांसू फंडा। वरना अबोध तंत्र को कहां से आता “उल्टे उस्तरे” से हर तरह की खोपड़ी सफाचट कर डालने का हुनर।
विपक्ष ने ही सीख दी होगी, कि बढ़ा दो पहले से बेलगाम गैस के दाम। कर डालो उसे सुलभ से दुर्लभ। अपने आप चल जाएगा पता कि कितनी ढीली कराई जा सकती है जनता की जेब। वो भी रातों रात की गई बढ़ोत्तरी से ध्यान हटा कर। विपक्ष का ही तो था सारा मशवरा। वरना, सिस्टम को कैसे पता चलता कि चंद रुपए की वृद्धि से भड़की जनता त्राहिमाम की मुद्रा में आ जाएगी।
मासूम तंत्र कैसे जान पाता कि हज़ार से नीचे बिकने वाला घरेलू सिलेंडर ढाई से तीन हज़ार में भी बिक सकता है। असली खेल तो अब आगे देखना आप। विपक्ष अपने रिमोट से रोबोट स्वरूपा सरकार को चलाएगा तो और क्या भला होगा?
ये भी विपक्ष ने ही तो समझाया कि नीला सिलेंडर काले बाज़ार में कितनी वैल्यू बढ़ा सकता है मिस्टर इंडिया की तरह गायब होने के बाद। विपक्ष ने ही तो लगाया नीली टंकियों की आपूर्ति पर प्रतिबंध। सरकार को तो मालूम ही नहीं था रेहड़ी पटरी से ढाबे और होटल तक को दंडवत मुद्रा में लाने का यह नायाब और कामयाब फार्मूला। विपक्ष न होता तो सत्तानशीनों की मशीनों में कौन डालता कुप्पी लगा कर अकल का तेल। “सूखा बता कर बाढ़ लाओ और देवराज इंद्र कहलाओ” वाला फार्मूला। ये ज्ञान भी विपक्ष ने ही दिया होगा ज़रूर। वरना, समानता का डमरू बजाने वाले उस्ताद के पट्ठे क्यों खेलते असमानता का दांव। शहर को आपूर्ति 25 दिन में तो गांव को 45 दिन में करने की डुग्गी पीट कर।
करा दिया ना “सबका साथ, सबका विकास” वाली थीम का सत्यानाश..? समझा दिया ना भारत और इंडिया के बीच का दशकों पुराना फासला। किस काम का ऐसा विपक्ष, जो सारे सत्यवादियों को झूठ बोलना सिखा दे। एकमुखी को दशमुखी सिद्ध करा दे। कोई भंडार बताते न अघाए तो कोई संयम बरतने का पाठ पढ़ाएं। आपाधापी, मारामारी, तनातनी और सनसनी, खलबली जैसे मंज़र भी विपक्ष ने ही तो उपजा दिए रातों रात। बिचारे सत्ता वाले तो सारे कर्म दिन में करने के पक्षधर हैं। वो भी शुभ मुहूर्त और चौघड़िया देख कर। भूल गए हों तो मोटबंदी और लॉकडाउन को याद कर लो।
अब सारी अफ़वाह भी विपक्ष ही फैला रहा है।
यह बताने के बाद भी अब नियम बदल गया है। सच बोलने का नाम दहशत पैदा करना हो गया है। आशंका जताने का मतलब अफ़वाह फैलाना। विपक्ष ही तो लुटाता है अरबों रुपए मीडियाई मुर्गों पर। जी हां, उन्हीं विरदावली गायकों पर, जो नज़ारे दिखा रहे हैं कोहराम के और भाषण सुनवा रहे हैं इंतज़ाम के। पता ही नहीं चल रहा कि सच क्या है और झूठ क्या..? एलपीजी के लिए देश लाइन में लगा नहीं है, लगवाया गया है। ये भी विपक्ष की ही करतूत है शायद।
उसी ने तो खड़ा किया था पहले भी बैंकों के बाहर लोकतंत्र के देवी देवताओं को। बेचारी सेवक सरकार क्यों करेगी ऐसे सितम..? हो सकता है कि जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वो सब झूठे और मनगढंत हों। हो सकता है भीषण गर्मी में एक अदद सिलेंडर के लिए पसीना बहाने वाले पगला गए हों। रामराज्य के सुंदर कांड में अरण्य कांड का मज़ा ले रहे हों। जंगल सफारी के शौक को पूरा करने के लिए।
हो सकता है लोगों को ही बैठे ठाले शौक चर्राया हो शादी, ब्याह में लकड़ी की पुरानी भट्टी जलवाने का। होटल, ढाबे वालों को इंडेक्शन, हीटर जैसे विकल्प अपनाने का। ज़रूर विपक्ष ने ही रोका होगा महान नुस्खे पर अमल करने से। वरना, देश में क्या कमी है गैस का विपुल उत्पादन करने वाले नालों की। जिनकी पावन गैस से चाय जैसा दिव्य और अमृत तुल्य पेय बन सकता है, उससे भोजन, व्यंजन और पकवान नहीं बन सकते क्या? विपक्ष के उकसावे पर लगे पड़े हैं ब्लैक में रेड सिलेंडर हासिल करने की होड़ में। मेक इन इंडिया और स्किल डेवलपमेंट की पिटवा दी ना भद्द इस मरे विपक्ष ने।
सरकार को क्या पड़ी है कि सस्ती गैस गायब कर मंहगी बिजली की खपत बढ़वाए। बिजली के उपकरण खरीदने पर लोगों को बाध्य करे। उसे कोई चंदा या कमीशन तो दे नहीं रहे यह सब बनाने वाले उद्योगपति। लखपति से अरबपति बने विपक्ष के चहेते और भाई भतीजे। लगता है इसमें भी मिलीभगत विपक्ष की ही है। उसे ही चस्का लगा हुआ है चंदाखोरी व चिंदीचोरी का। विपक्ष का ही तो खज़ाना लबालब हुआ है इलेक्टोरल बॉन्ड्स से।
वही तो बेच रहा है देश की संपदा गिने चुने घरानों को, याराना बनाए रखने के लिए। टाटा, बिड़ला की विरासत वाले देश को अडानी, अंबानी की मिल्कियत व सल्तनत बनाने का ताना बाना भी विपक्ष ही तो बुन रहा है। हर नाकामी से औरों की नाकामी को बड़ा बताने वाले चिंटू, पिंटू भी विपक्ष ने ही बैठा रखे हैं चैनलों पर। विश्लेषक और विशेषज्ञ के रूप में दिहाड़ी पर।
बेशक़, सारा बवंडर विपक्ष का ही उठाया हुआ है। वही तो पढ़ाता है सीधे सादे हुक्मरानों को उल्टी पट्टी। टी/20 वर्ल्ड कप की जीत के जश्न में डूबे थे लोग। त्यौहारी सीज़न में एक्टीवेट था सरकारी इवेंट मोड। पता नहीं, क्या सूझा नाकारा विपक्ष को। कर दिया आवश्यक सेवा क़ानून का फ़रमान जारी। हड़कंप तो मचना ही था, नहीं तो खाया पिया कैसे पचता..? खैरात की तरह एक सिलेंडर मांगने पर मजबूर विपक्ष ने ही तो किया जनता को। ताकि गोदामों में उपलब्ध भंडार को सौगात के रूप में बांट कर वाहवाही बटोरी जा सके। यही तो काम आनी थी इस साल बंगाल में और अगले साल यूपी में।
जनता भी बदमाशी में विपक्ष से कुछ कम नहीं। अच्छा मौका अता किया था ऊपर वाले ने, नमक हलाली का। प्रखर राष्ट्रवाद के भरपूर प्रदर्शन का। गच्चा खाते आ ही रहे थे बरसों से। थोड़े दिन कच्चा खा लेते, गैस नहीं मिलती तो। हाज़मा नेताओं सरीखा दुरुस्त होता और दांत व दाढ़ मज़बूत। क्या बिगड़ जाता अगर 2047 के (आदमी) दौर में पहुंचने से पहले कुछ महीने ईसा पूर्व 247 के (आदम) युग में जी लेते। लता, पत्ते, साग, सब्ज़ी, फल, फूल और कंद मूल खा कर। पेट ही तो भरना था, खाली करने के लिए। बट्टा तो न लगता कम्प्यूटर से भी तेज़ दिमाग़ वाले “चच्चा चौधरी” की साख पर। लानत तो न बरसती उनके अनन्य प्रिय दमदार “साबू” और असंख्य दुमदार “रॉकेटों” की शान पर।
अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है भक्तजनों! सुधर जाओ थोड़ा बहुत। विश्वगुरु की आबरू का दुश्मन विपक्ष बर्बाद न कर डाले तुम्हें। जिस धरती पर आत्माएं तक आती जाती रहती हैं, वहां गैस के न आने जाने का मलाल क्यों? गैस सिलेंडर आना “बंद” न होगा तो “चालू” कैसे होगा..? एक नए उत्सव का क्या आनंद, अगर घोड़ा मातम न हो।
विपक्ष की बात पर कान न करें। वैसे भी “पकाने” के लिए गैस ही ज़रूरी नहीं। जब गैस नहीं थी तब भी पक ही रहा था ना खाना। “खयाली पुलाव” बहुत ठूंस चुके। कुछ दिन “दिमागी खिचड़ी” का ज़ायका ले लो। काम नहीं कर पा रहे तो आराम कर लो। राम जी का प्रसाद मान कर।
कुल मिला कर विपक्ष के हाथी, घोड़े, ऊंट मत बनो। सियासत की चौसर पर सत्ता के बादशाह के पिद्दी (प्यादे) बने रहने का अपना मज़ा है। वज़ीर को बचाओगे तो नज़ीर बनाओगे। पकाने को गैस नहीं तो ना सही।
नेता और चैनल वाले हैं ना पकाने के लिए। कुछ दिन दाल फ्राई की जगह “भेजा फ्राय” का लुत्फ़ लेकर भी देखो। एआई का ज़माना है और इमेजिन का समय। असली सूरत की जगह इमोजी से काम चलाते हो ना..? एकाध महीने सिलेंडर की जगह उसकी तस्वीर से मन बहला लो। खाना सदियों से पका ही रहे हो। कुछ दिन ख़ुद पक लोगे तो कौन सा आसमान फट जाएगा। फिलहाल, तेल देखो तेल की धार देखो और आने वाले त्यौहार देखो। तुम केवल उत्सव मनाने को पैदा हुए हो, टसुए बहाने के लिए नहीं। ठहाके लगाओ कि “इंडिया” में हो।।
