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झूले डोलें पीपल डाली,
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हरियाली ने चुनर संभाली।
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मेंहदी रचें हथेली प्यारी,
- सावन आई सखियों वाली।
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गीतों में मधुरिम तानें,
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बोलें दिल की अनकही बातें।
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नयनों में प्रिय की छाया,
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मन बोले– अब तो वो आए।
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श्रृंगार नहीं केवल बाहरी,
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मन का प्रेम बसे हर साज में।
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शिव-पार्वती की उस गाथा में,
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नारी बसी है हर आवाज़ में।
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बदले हैं रीत-रिवाज़ बहुत,
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पर तीज की बात पुरानी है।
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आधुनिक छांव हो या धूप,
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हरियाली तीज सुहानी है।
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सजते अब इंस्टा स्टोरी में,
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पर भाव वही हैं छोरी में।
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झूले हों चाहे पर्दे पर,
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मन अब भी झूमे डाले पर।
