ब्रिक्स के मंच पर मोदी की पहचान केवल भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे नेता के रूप में भी उभरी है जो बदलती विश्व व्यवस्था मेंभारत की भूमिका को स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ सामने रखतेहैं। भारत अब दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच अपनी जगह मांगता नहीं, अपनी जगह बनाता है। ब्रिक्स सम्मेलन समाप्त होने के बाद भीउसकी गूंज अभी बाकी है। घोषणाएं पीछे छूट जाएंगी, तस्वीरें इतिहास का हिस्सा बन जाएंगी, लेकिन सम्मेलन ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि बदलती वैश्विक शक्ति–संरचना में भारत अब दर्शक नहीं, महत्वपूर्ण खिलाड़ी है।

- राजेश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार
नई दिल्ली ,ब्रिक्स सम्मेलन खत्म हो गया…मंच सजा, दुनिया के बड़े नेता जुटे, तस्वीरेंबनीं, घोषणाएं हुईं और एक बार फिर यह संदेश गया कि दुनिया काशक्ति–संतुलन बदल रहा है। ब्रिक्स की चमकदार तस्वीर में भारत भी पूरे आत्मविश्वास के साथ दिखाई दिया। लेकिन कैमरों की रोशनी से परे कुछऐसे सवाल हैं, जिनसे आंखें चुराना आसान नहीं होगा।
क्या ब्रिक्स वास्तव में पश्चिम का विकल्प बन पाएगा? क्या यह अमेरिकीऔर पश्चिमी वर्चस्व के सामने एक नई वैश्विक व्यवस्था की मजबूतजमीन तैयार कर सकता है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या अलग–अलगहितों, महत्वाकांक्षाओं और रणनीतिक प्राथमिकताओं वाले देश वास्तव मेंएकजुट होकर एक प्रभावी शक्ति–केंद्र बन सकते हैं?
इन सवालों के बीच भारत की भूमिका सबसे अलग दिखाई देती है। भारतने न तो किसी शक्ति के सामने झुकने की जरूरत महसूस की और न हीकिसी के खिलाफ खड़े होने की। उसने अपने राष्ट्रीय हितों, स्वतंत्र विदेशनीति और विकासशील दुनिया की आकांक्षाओं को केंद्र में रखा।
यही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी ताकत भी है। भारतके रिश्ते अनेक हो सकते हैं, लेकिन भारत का हित एक है। मित्रता सबकेसाथ, संवाद सबके साथ, लेकिन फैसले भारत के हित में। ब्रिक्स के मंचसे भारत ने शायद यही संदेश सबसे स्पष्ट ढंग से दिया है कि बदलतीदुनिया में भारत किसी खेमे का हिस्सा बनने नहीं, बल्कि अपनी शर्तों परवैश्विक शक्ति–संतुलन को प्रभावित करने आया है।
आज की वैश्विक राजनीति में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है किउसने अपनी विदेश नीति को किसी एक खेमे की सीमाओं में कैद नहीं होनेदिया। अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, रूस के साथ पुराने औरभरोसेमंद रिश्ते, यूरोप के साथ आर्थिक–तकनीकी सहयोग और ग्लोबलसाउथ के देशों के साथ बढ़ती भागीदारी, भारत ने इन सभी रिश्तों को एकसाथ साधा है। यह कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि उस नए भारत कीपहचान है जो दुनिया से रिश्ते अपनी शर्तों पर बनाना चाहता है।
यही वजह है कि ब्रिक्स जैसे मंच पर भारत की भूमिका केवल संख्या कीनहीं, बल्कि प्रभाव की है। भारत किसी शक्ति–गुट का पिछलग्गू बनने केबजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले करता है और जरूरत केमुताबिक अलग–अलग शक्ति–केंद्रों से संवाद करता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को लेकर मतभेद हो सकते हैं औरलोकतंत्र में होने भी चाहिए। किसी भी सरकार की नीतियों की आलोचनालोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन इस तथ्य से भीइनकार नहीं किया जा सकता कि मोदी के दौर में भारत की वैश्विककूटनीतिक दृश्यता और सक्रियता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
“ ब्रिक्स के मंच पर मोदी की पहचान केवल भारत के प्रधानमंत्री के रूप मेंनहीं, बल्कि ऐसे नेता के रूप में भी उभरी है जो बदलती विश्व व्यवस्था मेंभारत की भूमिका को स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ सामने रखतेहैं। भारत अब दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच अपनी जगह मांगतानहीं, अपनी जगह बनाता है। अमेरिका से रूस तक, पश्चिम एशिया सेअफ्रीका और यूरोप से एशिया तक। भारत अलग–अलग शक्ति–केंद्रों सेसंवाद करता है, लेकिन अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितोंसे समझौता नहीं करता। “
हालांकि ब्रिक्स की ताकत उसका विस्तार है, लेकिन यही उसका सबसेबड़ा इम्तिहान भी है। अलग–अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक हितोंऔर रणनीतिक प्राथमिकताओं वाले देशों को एक साझा एजेंडे पर साथरखना आसान नहीं होगा। इसलिए आने वाले समय में असली सवाल यहनहीं होगा कि ब्रिक्स कितना बड़ा है, बल्कि यह होगा कि क्या वह अपनेआकार को वास्तविक वैश्विक प्रभाव में बदल पाता है? और इसी सवालके जवाब में ब्रिक्स का भविष्य और भारत की भूमिका, दोनों की असलीपरीक्षा छिपी है।

गौरतलब है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों के आर्थिक हित अलग हैं, विदेशनीति की प्राथमिकताएं अलग हैं और कई मुद्दों पर उनके बीच गंभीर मतभेदभी हैं। ऐसे में सवाल यह है कि जब साझा घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोसऔर कठिन फैसले लेने की बारी आएगी, तब क्या ये सभी देश एक साथखड़े रह पाएंगे? यही ब्रिक्स की सबसे बड़ी परीक्षा है। भारत के लिएब्रिक्स एक बड़ा अवसर भी है और उतनी ही बड़ी चुनौती भी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्षों में भारत की विदेश नीति को अधिकसक्रिय और दृश्यमान बनाया है। दुनिया के बड़े और छोटे देशों के साथभारत के संबंधों का दायरा भी बढ़ा है। लेकिन किसी भी देश की विदेशनीति केवल प्रधानमंत्री की लोकप्रियता, व्यक्तिगत रिश्तों या शिखरसम्मेलनों की तस्वीरों के सहारे लंबे समय तक नहीं चल सकती। उसकेपीछे मजबूत अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता, सैन्य शक्ति, व्यापारिकनेटवर्क और विश्वसनीय संस्थागत व्यवस्था का मजबूत आधार जरूरी है।
यही वह कसौटी है जिस पर आने वाले वर्षों में मोदी सरकार की विदेशनीति को परखा जाएगा। भारत की असली ताकत केवल यह नहीं होगी किवह कितने देशों से संवाद करता है, बल्कि यह होगी कि वह अपने प्रभावको कितने ठोस परिणामों में बदल पाता है।

- यदि भारत विकासशील देशों के लिए तकनीक, डिजिटल सार्वजनिकढांचे, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और विकास वित्त जैसे क्षेत्रों मेंव्यावहारिक और टिकाऊ सहयोग का मॉडल खड़ा करता है, तो उसकीवैश्विक विश्वसनीयता कहीं अधिक मजबूत होगी। यही वह क्षेत्र है जहांभारत के पास दुनिया को केवल भाषण नहीं, एक वैकल्पिक विकासमॉडल देने का अवसर है।
बहरहाल, इतिहास का फैसला आज नहीं होगा। वह आने वाले वर्षों मेंहोगा, जब घोषणाओं की चमक उतर चुकी होगी और परिणाम सामनेहोंगे। तब तय होगा कि ब्रिक्स महज एक कूटनीतिक मंच था या बदलतीविश्व व्यवस्था की नई ताकत बनने की शुरुआत।
बहरहाल,यह कहना ज्यादा उचित होगा कि ब्रिक्स खत्म हुआ है, लेकिनकहानी अभी शुरू हुई है। सम्मेलन खत्म हुआ है, लेकिन सवाल खड़े हैं।अब तस्वीरों और घोषणाओं से आगे बढ़कर काम का हिसाब देना होगा, क्योंकि बदलती दुनिया में असली ताकत वही है, जो अपनी बात मनवानेकी क्षमता रखती है।

