– डॉ. प्रमोद तिवारी जी के वक्तव्य पर आधारित, 25 दिसंबर महामना मालवीय एवं अटल जी जयंती विशेषांक के लिए:
25 दिसंबर का दिन विश्व में क्रिसमस पर्व के रूप में मनाया जाता है, लेकिन भारत के लिए यह दिन दोहरी गौरव की अनुभूति लेकर आता है। इसी दिन दो महामानवों ने भारत की धरती पर जन्म लिया था।
एक हैं शिक्षा के प्रकाशपुंज, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी और दूसरे हैं भारतीय राजनीति के अजातशत्रु, कवि हृदय, पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी।
मैंने अपने विचार में यही कहा था कि महामना मालवीय जी केवल एक व्यक्ति नहीं, एक विचारधारा थे। उनका जन्म 25 दिसंबर 1861 को प्रयागराज में हुआ था। उस समय देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। अंग्रेजी शिक्षा भारतीय संस्कृति को नष्ट कर रही थी। ऐसे समय में मालवीय जी ने सोचा कि यदि भारत को फिर से विश्वगुरु बनाना है तो उसे अपनी जड़ों से जुड़ी हुई आधुनिक शिक्षा देनी होगी।
उन्होंने भीख मांग-मांग कर, घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा करके 1916 में *काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)* की स्थापना की। यह केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, भारत के आत्मगौरव का प्रतीक था। आज BHU से निकले लाखों विद्यार्थी देश-विदेश में भारत का नाम रोशन कर रहे हैं। मालवीय जी ने अपने जीवन में चार मंत्र दिए – सत्य, सेवा, त्याग और परोपकार। वे कहते थे कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज को जगाना है। इसीलिए उन्होंने ‘अभ्युदय’ और ‘लीडर’ जैसे समाचार पत्र निकाले।
दूसरी ओर अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म भी 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में हुआ। नियति का कैसा संयोग है कि गुरु और शिष्य जैसे दो महापुरुषों का जन्म एक ही दिन हुआ। अटल जी ने राजनीति को नया अर्थ दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि राजनीति में भी कविता हो सकती है, विरोधी का भी सम्मान हो सकता है और सत्ता में रहकर भी सादगी से रहा जा सकता है।
मैंने अपने संबोधन में कहा कि अटल जी के जीवन से हमें तीन बड़ी सीख मिलती हैं। पहली – *राष्ट्र सर्वोपरि*। चाहे पोखरण में परमाणु परीक्षण करना हो या करगिल युद्ध में पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देना हो, उन्होंने कभी राष्ट्रहित से समझौता नहीं किया। दूसरी सीख है – *सुशासन*। उन्होंने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और सर्व शिक्षा अभियान जैसी योजनाएं शुरू कीं जो आज भी देश की रीढ़ हैं। तीसरी सीख है – *भाषा और संस्कार*। संसद में उनका एक-एक शब्द साहित्य होता था। वे विरोधी दल के नेता होते हुए भी पंडित नेहरू जी की प्रशंसा करने से नहीं चूकते थे।
आज जब हम देखते हैं कि शिक्षा व्यापार बन गई है, तब महामना का वह त्याग याद आता है जब उन्होंने अपनी वकालत की मोटी कमाई छोड़ दी और अपना सब कुछ विश्वविद्यालय को दान कर दिया। आज जब राजनीति में गाली-गलौज और आरोप-प्रत्यारोप का दौर है, तब अटल जी की वह मर्यादा याद आती है जब वे कहते थे – “छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।”
महामना ने शिक्षा के द्वारा राष्ट्र निर्माण किया और अटल जी ने विचार और विकास के द्वारा राष्ट्र निर्माण किया। दोनों का मार्ग अलग था लेकिन मंजिल एक थी – एक सशक्त, समृद्ध और संस्कारवान भारत।
राष्ट्र समाज पत्रिका का उद्देश्य भी यही है। हम भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हमारे पाठक केवल खबरें न पढ़ें, बल्कि महामना और अटल जी जैसे महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लें।
25 दिसंबर हमें यह संकल्प लेने का दिन है कि हम अपने बच्चों को केवल अंग्रेजी नहीं, अपनी मातृभाषा हिंदी और संस्कृत का ज्ञान भी देंगे। हम उन्हें केवल नौकरी के लिए नहीं, राष्ट्र सेवा के लिए तैयार करेंगे। यही महामना और अटल जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अंत में मैं यही कहूंगा –
“महामना का त्याग और अटल की वाणी,
यही तो है भारत की अमर कहानी।”

इन दोनों पुण्यात्माओं को कोटि-कोटि नमन।
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