सेवा और समर्पण भारतीय संस्कृति के मूल मूल्य हैं, जो नि:स्वार्थ भाव से दूसरों की मदद (सेवा) और बिना किसी फल की इच्छा के किसी उद्देश्य के प्रति खुद को पूरी तरह समर्पित करने (समर्पण) को दर्शाते हैं।यह जीवन को अर्थपूर्ण बनाते हैं, चाहे वह राष्ट्र निर्माण हो, किसी के प्रति करुणा हो, या कर्मयोगी की तरह कर्तव्य निभाना ही एकमात्र उद्देश्य हो तो वह सेवा और समर्पण के भाव से सभी जीवों पर दया करना ही पूर्ण कर्तव्य है।

उल्लेखनीय बातो को याद करते हुए एस यू प्रोडक्ट के एम डी श्री एस के गुप्ता ने बताया कि कंपनी हो या अन्य कोई वाहन निर्माता या संत या पारिवारिक सदस्य हो सब को अपने काम में रुचि रखने के साथ अपने जीवन में सेवा और समर्पण का भाव रखना चाहिए ताकि हम अपने जीवन और समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित कर सकें ।
सेवा और समर्पण के प्रमुख पहलू:
नि:स्वार्थ सेवा (Seva):
सेवा का अर्थ है अहंकार रहित होकर जरूरतमंदों की सहायता करना, जैसे कि बीमारों की देखभाल, शिक्षा, या समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना।
- पूर्ण समर्पण (Samarpan): समर्पण में ‘मैं’ का भाव मिट जाता है और व्यक्ति परिणाम की चिंता किए बिना अपना कार्य पूर्ण निष्ठा से करता है।
- कर्मयोग: सेवा को जब समर्पण के साथ किया जाता है, तो वह एक साधना (कर्मयोग) बन जाती है।
- उदाहरण: राष्ट्र के प्रति समर्पण, समाज के प्रति जिम्मेदारी, और नि:स्वार्थ भाव से कार्य करना।
- मुख्य उद्देश्य: जरूरतमंद पशुओं की मदद, शिक्षा और चिकित्सा स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना।
यह केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है जो व्यक्तिगत अहंकार को कम करके सामूहिक कल्याण को बढ़ावा देता है।

