Rashtra Tak Hindi Monthly Magazine Mon, 19 Oct 2026 07:54:52 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.3 https://www.rashtratak.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-cropped-WhatsApp-Image-2025-05-08-at-2.40.25-PM-32x32.jpeg Rashtra Tak 32 32 रेल सफर में शोर मचाने वालों की खैर नहीं, मोबाइल स्पीकर पर बात करने पर लगेगी लगाम https://www.rashtratak.com/%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a4%ab%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%8b/ Mon, 19 Oct 2026 07:54:51 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3212 नई दिल्ली : ट्रेन में सफर के दौरान सहयात्रियों को तेज आवाज, मोबाइल स्पीकर पर बातचीत और ऊंची

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नई दिल्ली : ट्रेन में सफर के दौरान सहयात्रियों को तेज आवाज, मोबाइल स्पीकर पर बातचीत और ऊंची आवाज में वीडियो या संगीत चलाकर परेशान करने वालों के लिए अब मुश्किलें बढ़ सकती हैं। रेलवे यात्रियों की सुविधा और शांतिपूर्ण सफर सुनिश्चित करने के लिए ऐसे व्यवहार पर सख्ती बरतने की दिशा में कदम उठा रहा है। दरअसल, लंबी दूरी की ट्रेनों में अक्सर यात्रियों की शिकायत सामने आती है कि कुछ लोग देर रात तक मोबाइल पर तेज आवाज में बातचीत करते हैं या बिना ईयरफोन के वीडियो और गाने चलाते हैं। इससे आसपास के यात्रियों, खासकर बुजुर्गों, बच्चों और रात में आराम कर रहे लोगों को परेशानी होती है। रेलवे का जोर इस बात पर है कि यात्री सफर के दौरान निर्धारित नियमों और शिष्टाचार का पालन करें। किसी यात्री को सहयात्रियों की नींद या शांति में बाधा डालने से बचना होगा। शिकायत मिलने पर ट्रेन स्टाफ स्थिति के अनुसार हस्तक्षेप कर सकता है और संबंधित यात्री को नियमों का पालन करने के लिए कहा जा सकता है। रेल प्रशासन की इस पहल का उद्देश्य यात्रियों को बेहतर और आरामदायक यात्रा अनुभव देना है। रेलवे की अपील है कि यात्री मोबाइल का इस्तेमाल करते समय ईयरफोन का प्रयोग करें और सार्वजनिक स्थान पर दूसरों की सुविधा का भी ध्यान रखें।

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जमानत सुनवाई से पहले जज को धमकी! आशुतोष-सौरव मामले में FIR दर्ज, तिहाड़ में बंद दोनों नेता https://www.rashtratak.com/%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%8b/ Mon, 19 Oct 2026 07:35:56 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3208 नई दिल्ली : आशुतोष और सौरव से जुड़े जमानत मामले में सुनवाई से पहले जज को कथित तौर

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नई दिल्ली : आशुतोष और सौरव से जुड़े जमानत मामले में सुनवाई से पहले जज को कथित तौर पर धमकी दिए जाने का मामला सामने आया है। इस संबंध में FIR दर्ज होने के बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया है। दोनों नेता फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद हैं और उनकी अदालत में पेशी को लेकर भी हलचल बनी हुई है। जानकारी के मुताबिक, जमानत से संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के बीच जज को धमकी मिलने की शिकायत सामने आई। इसके बाद संबंधित अधिकारियों ने मामले को गंभीरता से लेते हुए प्राथमिकी दर्ज की और धमकी के स्रोत की जांच शुरू कर दी है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि धमकी किसने दी और इसके पीछे मकसद क्या था। मामले को लेकर CJP की ओर से भी चिंता जताई गई है। कहा गया कि इस तरह की धमकी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने या आरोपियों की रिहाई में देरी कराने की कोशिश हो सकती है। हालांकि, धमकी के पीछे कौन है और उसका जमानत मामले से सीधा संबंध है या नहीं, इसकी पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी। आशुतोष और सौरव की जमानत पर अदालत में आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दोनों नेताओं की संभावित पेशी को लेकर भी चर्चा है। पुलिस और प्रशासन की नजर अब धमकी मामले की जांच के साथ-साथ आगामी न्यायिक कार्यवाही पर बनी हुई है।अधिकारियों का कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली किसी भी कोशिश को गंभीरता से लिया जाएगा और जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

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बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी पाबंदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट, कहा- मौलिक अधिकारों का भी रखना होगा ध्यान https://www.rashtratak.com/%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%9f-%e0%a4%87%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%ae/ Mon, 19 Oct 2026 07:21:39 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3205 नई दिल्ली: बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की मांग से जुड़े मामले में सुप्रीम

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नई दिल्ली: बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की मांग से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा बेहद जरूरी है, लेकिन उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर करना उचित समाधान नहीं हो सकता। इस मुद्दे पर बच्चों की सुरक्षा के साथ-साथ उनके मौलिक अधिकारों का भी ध्यान रखना होगा। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आज इंटरनेट शिक्षा, जानकारी हासिल करने और संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। ऐसे में बच्चों के लिए पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय ऐसा संतुलित तरीका अपनाने की जरूरत है, जिससे उन्हें ऑनलाइन खतरों से बचाया जा सके और उनके अधिकार भी प्रभावित न हों। अदालत के सामने इंटरनेट पर मौजूद अश्लील सामग्री, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण और बच्चों की डिजिटल सुरक्षा जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रभावी नियमन, अभिभावकीय निगरानी और तकनीकी सुरक्षा उपायों की जरूरत पर जोर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब दुनियाभर में बच्चों के स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर बहस तेज है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया से पूरी तरह अलग करने के बजाय उन्हें सुरक्षित और जिम्मेदार इंटरनेट इस्तेमाल के लिए तैयार करना अधिक प्रभावी तरीका हो सकता है। मामले में आगे की सुनवाई के दौरान अदालत इस मुद्दे से जुड़े कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से विचार कर सकती है।

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बिश्नोई गैंग के निशाने पर टाइगर, जानिए क्रीम-कपड़ों के कारोबार से कैसे खड़ी हुई 248 करोड़ की संपत्ति https://www.rashtratak.com/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%97%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/ Mon, 19 Oct 2026 07:16:55 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3202 नई दिल्ली: नई दिल्ली : मुंबई। अभिनेता टाइगर श्रॉफ एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार वजह

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नई दिल्ली:

नई दिल्ली : मुंबई। अभिनेता टाइगर श्रॉफ एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार वजह उनकी फिल्मों से ज्यादा उनकी कथित करोड़ों की संपत्ति और कारोबार से जुड़ी जानकारी है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जाता रहा है कि टाइगर की कुल संपत्ति करीब 248 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। वहीं, बिश्नोई गैंग से कथित खतरे की चर्चाओं के बीच उनकी सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। टाइगर की कमाई का मुख्य जरिया फिल्मों और ब्रांड एंडोर्समेंट को माना जाता है। इसके अलावा उनका नाम फैशन, कपड़ों और पर्सनल केयर से जुड़े व्यावसायिक उपक्रमों से भी जोड़ा जाता रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, विज्ञापन और ब्रांड प्रमोशन के जरिए भी उन्हें बड़ी आमदनी होती है। सोशल मीडिया पर उनकी मजबूत मौजूदगी उनकी ब्रांड वैल्यू को और बढ़ाती है। टाइगर की लाइफस्टाइल और फिटनेस से जुड़ी लोकप्रियता ने उन्हें युवाओं के बीच एक मजबूत ब्रांड बनाया है। यही वजह है कि कई कंपनियां उन्हें अपने उत्पादों के प्रचार के लिए पसंद करती हैं। हालांकि, 248 करोड़ रुपये की संपत्ति और बिश्नोई गैंग से जुड़े दावों को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े और जानकारियां सामने आती रही हैं। इसलिए इन दावों को आधिकारिक पुष्टि के बिना अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा। फिलहाल टाइगर की कमाई, कारोबार और सुरक्षा से जुड़ी चर्चाएं लगातार सुर्खियों में बनी हुई हैं।

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पंजाब में नशे का तांडवः वर्दी बनी त्रासदी https://www.rashtratak.com/panjab-nase/ Sun, 18 Oct 2026 10:13:50 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3193 पंजाब की धरती कभी शौर्य, पराक्रम, मेहनत, उद्यमशीलता और जीवटता के लिए जानी जाती थी। इसी मिट्टी के

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पंजाब की धरती कभी शौर्य, पराक्रम, मेहनत, उद्यमशीलता और जीवटता के लिए जानी जाती थी। इसी मिट्टी के नौजवानों ने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी और खेतों में पसीना बहाकर देश का अन्न भंडार भरा। लेकिन आज उसी पंजाब की पहचान नशे के बढ़ते कारोबार, युवाओं की बर्बादी और ड्रग्स माफिया के बढ़ते प्रभाव से जुड़ती जा रही है। यह केवल एक राज्य की सामाजिक त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, शासन-व्यवस्था और राजनीतिक इच्छाशक्ति की गंभीर परीक्षा है। जिस पंजाब के युवाओं के हाथों में कभी तलवार, हल और तिरंगा शोभा देते थे, वहां आज नशे ने अनेक हाथों को बेबस और अनेक परिवारों को बदहवास कर दिया है। विडंबना देखिए कि नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी जिन पुलिसकर्मियों की है, यदि उन्हीं के घर से करोड़ों रुपये की हेरोइन बरामद होने की खबर सामने आती है, तो यह व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। पंजाब में एक पुलिस कांस्टेबल के घर से कथित तौर पर 40 करोड़ रुपये की हेरोइन बरामद होने का मामला इसी सड़ांध की ओर संकेत करता है। यह घटना महज एक आपराधिक प्रकरण नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जिसमें अपराध रोकने के लिए नियुक्त व्यक्ति ही कथित तौर पर अपराध के संदेह के घेरे में आ जाए। यह तो वही स्थिति हुई कि ‘बाड़ ही खेत को खाने लगे’, तो फसल की रखवाली कौन करेगा? जिस पुलिस के कंधों पर नशा तस्करों को पकड़ने का दायित्व है, यदि उसी व्यवस्था के भीतर ऐसे तत्व पनपने लगें, तो आम नागरिक का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। इस मामले में निष्पक्ष जांच, दोषियों की पहचान और कठोर कानूनी कार्रवाई जरूरी है। किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन वर्दी की आड़ में अपराध करने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून से बचने का अवसर भी नहीं मिलना चाहिए।


पंजाब में नशे का कारोबार अब गलियों, गांवों और कस्बों तक अपनी जड़ें फैला चुका है। कभी नशे की समस्या को सीमावर्ती क्षेत्रों या शहरी युवाओं तक सीमित माना जाता था, लेकिन आज सिंथेटिक ड्रग्स सहित विभिन्न मादक पदार्थों की उपलब्धता ने संकट को और व्यापक बना दिया है। युवा पीढ़ी का एक हिस्सा नशे की गिरफ्त में आकर अपना स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भविष्य गंवा रहा है। कहीं मां की गोद सूनी हो रही है, कहीं वृद्ध पिता के बुढ़ापे का सहारा छिन रहा है और कहीं परिवार का कमाऊ सदस्य नशे की लत के कारण स्वयं अपने परिजनों पर बोझ बन रहा है। ‘घर का चिराग ही घर में अंधेरा कर दे’, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी! नशे की लत केवल व्यक्ति को नहीं तोड़ती, बल्कि पूरे परिवार और सामाजिक ताने-बाने को भीतर तक खोखला कर देती है। इस संकट की गंभीरता सरकारी आंकड़ों और पुलिस की कार्रवाइयों से भी समझी जा सकती है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार दस महीनों में पंजाब पुलिस ने 10,524 तस्करों को गिरफ्तार किया, जिनमें 153 बड़े ऑपरेटर शामिल थे। इस दौरान 790 किलोग्राम हेरोइन, 860 किलोग्राम अफीम और अन्य मादक पदार्थों के साथ 13 करोड़ रुपये से अधिक की ड्रग मनी जब्त की गई तथा नशे के कारोबार से जुड़ी 208 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति पर कार्रवाई की गई। ये आंकड़े कार्रवाई के पैमाने को अवश्य दर्शाते हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाते हैं कि इतनी बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ आखिर राज्य में पहुंच कैसे रहे हैं? इतनी गिरफ्तारियों और जब्ती के बावजूद यदि नशे की उपलब्धता और लत पर निर्णायक अंकुश नहीं लग रहा, तो स्पष्ट है कि समस्या की जड़ें गहरी हैं। ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की’ जैसी स्थिति से बचने के लिए गिरफ्तारियों की संख्या से आगे बढ़कर नशे की आपूर्ति, वित्तीय नेटवर्क और राजनीतिक संरक्षण की पड़ताल करनी होगी।
पाकिस्तान से लगी पंजाब की लगभग 553 किलोमीटर लंबी सीमा इस चुनौती को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ती है। ड्रोन के माध्यम से नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी की आशंकाएं सीमा प्रबंधन को और जटिल बनाती हैं। वर्ष 2026 में अब तक पंजाब की सीमा से 183 ड्रोन जब्त किए जाने का उल्लेख इस खतरे की गंभीरता को रेखांकित करता है। सीमा पार से संचालित तस्करी के नेटवर्क पर प्रहार करना आवश्यक है, लेकिन सारी जिम्मेदारी बाहरी ताकतों पर डालकर राज्य के भीतर की कमजोरियों से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। यदि स्थानीय तस्कर, संगठित गिरोह और भ्रष्ट तंत्र मिलकर काम कर रहे हों, तो सीमा पर कड़ी निगरानी के साथ-साथ भीतर भी कठोर कार्रवाई करनी होगी। ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ करने वाली जांच ही बता सकती है कि इस काले कारोबार में कौन मोहरा है, कौन खिलाड़ी और कौन पर्दे के पीछे बैठा सूत्रधार। आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार ने नशामुक्ति और तस्करों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर अनेक दावे किए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये दावे जमीन पर उतना परिवर्तन ला पाए हैं, जिसकी अपेक्षा पंजाब की जनता ने की थी? सत्ता में आने से पहले नशे के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई के वादे करना आसान है, लेकिन उस लड़ाई को परिणाम तक पहुंचाना राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और निरंतर जवाबदेही मांगता है। यदि नशे की उपलब्धता बनी हुई है, युवा लगातार इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं और तस्करी के नेटवर्क बार-बार सक्रिय हो जाते हैं, तो सरकार की रणनीति और उसके क्रियान्वयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। केवल छापेमारी, गिरफ्तारी और घोषणाओं से नशामुक्त पंजाब का सपना साकार नहीं होगा। सरकार की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि नशे की आपूर्ति कितनी घटी, कितने युवा उपचार के बाद सामान्य जीवन में लौटे और बड़े तस्करों तथा उनके संरक्षकों के विरुद्ध कितनी प्रभावी कार्रवाई हुई।
नशे के खिलाफ लड़ाई में पुलिस सुधार, आधुनिक तकनीक, सीमा सुरक्षा और वित्तीय जांच के साथ-साथ नशामुक्ति केंद्रों, मनोवैज्ञानिक परामर्श, रोजगार और पुनर्वास पर भी समान ध्यान देना होगा। नशे के शिकार युवाओं को केवल अपराधी मानकर खारिज करना समाधान नहीं है, उन्हें उपचार, सहारा और सम्मानजनक जीवन में लौटने का अवसर देना भी जरूरी है। गांवों में जनभागीदारी, स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता और परिवारों की सक्रिय भूमिका इस अभियान को जनांदोलन का स्वरूप दे सकती है। साथ ही, पुलिस और राजनीतिक तंत्र में किसी भी स्तर पर संरक्षण देने वालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पंजाब को नशे की गिरफ्त से निकालना केवल सरकार का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है, लेकिन नेतृत्व की पहली जवाबदेही सरकार की ही है। जब कानून के रखवाले ही संदेह के घेरे में आने लगें और करोड़ों की हेरोइन की बरामदगी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करे, तब आत्ममंथन टालना आत्मघाती होगा। ‘लकीर पीटने’ के बजाय अब निर्णायक परिणाम देने का समय है। पंजाब को खोखले नारों नहीं, कठोर कार्रवाई, पारदर्शी जांच और जवाबदेह शासन की जरूरत है। नशा माफिया की जड़ें उखाड़ने के लिए राजनीतिक संरक्षण की दीवारें तोड़नी होंगी और कानून का भय हर अपराधी तक पहुंचाना होगा। अन्यथा नशे का यह तांडव पंजाब की युवा शक्ति को ही नहीं, देश की सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी गंभीर क्षति पहुंचाता रहेगा।

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सुप्रीम कोर्ट के आवश्यक न्यायिक फैसलों के उजाले https://www.rashtratak.com/supimcort/ Sun, 18 Oct 2026 10:02:02 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3189 लोकतंत्र की मजबूती का वास्तविक प्रमाण केवल चुनावों का नियमित आयोजन, संसद में बहुमत अथवा राजनीतिक दलों की

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लोकतंत्र की मजबूती का वास्तविक प्रमाण केवल चुनावों का नियमित आयोजन, संसद में बहुमत अथवा राजनीतिक दलों की लोकप्रियता नहीं है, बल्कि यह है कि संविधान के सामने सत्ता, विपक्ष और सामान्य नागरिक की स्थिति समान हो। जब सामाजिक न्याय, आरक्षण, धार्मिक स्वतंत्रता और चुनावी निष्पक्षता जैसे प्रश्न एक साथ राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आते हैं, तब सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। न्यायपालिका वह संवैधानिक संस्था है, जिससे नागरिक यह अपेक्षा करता है कि वह राजनीतिक आग्रहों, सामाजिक दबावों और सत्ता के प्रभाव से मुक्त रहकर न्याय का मार्ग प्रशस्त करेगी। आज आरक्षण की पात्रता और धर्मांतरण से जुड़े विवादों से लेकर निर्वाचन प्रक्रिया तथा न्यायालय की गरिमा तक, अनेक प्रश्न इसी अपेक्षा की कसौटी बनकर सामने हैं। इन प्रश्नों पर विचार करते समय आवश्यक है कि हम न किसी राजनीतिक पक्ष के प्रचारक बनें, न किसी धार्मिक समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह रखें, बल्कि संविधान की भावना और न्याय के व्यापक उद्देश्य को केंद्र में रखें। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण भारतीय संविधान की उन ऐतिहासिक व्यवस्थाओं में है, जिनका उद्देश्य सदियों से चले आ रहे सामाजिक बहिष्कार, अस्पृश्यता और भेदभाव के दुष्परिणामों को दूर करना है। यह केवल रोजगार अथवा शिक्षा में कुछ अतिरिक्त अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं, बल्कि उस सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संवैधानिक हस्तक्षेप है, जिसने बड़ी आबादी को लंबे समय तक समान अवसरों से वंचित रखा। इसलिए आरक्षण और धर्मांतरण के संबंध में होने वाली बहस को भावनाओं, धार्मिक आग्रहों अथवा राजनीतिक आरोपों के बजाय संवैधानिक प्रावधानों और सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर समझना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह स्पष्ट किया जाना एक स्वागत योग्य कदम है कि अनुसूचित जाति (एससी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के व्यक्तियों द्वारा धर्मांतरण करने पर उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। तमिलनाडु सरकार द्वारा इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देना और अपने राज्य में इस प्रकार की सुविधा जारी रखना कि इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी आरक्षण का लाभ मिलता रहे, वास्तव में सनातन संस्कृति के आरक्षित वर्गों के हितों को कमजोर करने वाला और धर्मांतरण को परोक्ष रूप से बढ़ावा देने वाला कदम था। यह विडंबना ही है कि एक तरफ कुछ संगठन यह दावा करते हैं कि उनके यहां जातिगत भेदभाव का अस्तित्व नहीं है, वहीं दूसरी ओर वे एससी और ओबीसी वर्ग के लोगों को अपने पंथ में आने के बाद भी आरक्षण का लाभ मिलने की पुरजोर वकालत करते हैं। इस प्रकार के दोहरे लाभ और प्रलोभनों के कारण न केवल धर्मांतरण की प्रवृत्ति को बल मिलता है, बल्कि हिंदू समाज को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ता है, क्योंकि धर्मांतरित लोग आरक्षण के साथ-साथ अल्पसंख्यक दर्जे के लाभों का भी अनुचित दोहन करने लगते हैं। हालांकि विभिन्न राज्य सरकारें छल-कपट से होने वाले धर्मांतरण के विरुद्ध कड़े कानून बना रही हैं, फिर भी यह समस्या थमने का नाम नहीं ले रही है, जिसका प्रमुख कारण धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर हो रहा इसका दुरुपयोग है। अब समय आ गया है कि इस गंभीर विषय पर केंद्र सरकार और सर्वाेच्च न्यायालय मिलकर ठोस और प्रभावी कदम उठाएं ताकि इस दुरुपयोग को रोका जा सके।
इसी व्यापक संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय का चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवादों पर हस्तक्षेप भी उल्लेखनीय है। 12 अक्टूबर 2026 को राहुल गांधी सहित विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के नेताओं ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की ओर मार्च किया, इस पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रवैया भी सराहनीय है। भले ही विपक्ष ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं, मतदाताओं के नाम हटाए जाने और निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए, इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण न्यायिक परीक्षण और संबंधित अभिलेखों के आधार पर होना चाहिए, लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को अपनी राजनीतिक इच्छा व्यक्त करने का संवैधानिक अवसर है। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता किसी एक दल का नहीं, पूरे लोकतंत्र का प्रश्न है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करना एक गलत परम्परा का सूत्रपात है।
15 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय ने विपक्षी नेताओं की याचिका पर निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से जवाब माँगा। इससे स्पष्ट होता है कि निर्वाचन आयोग जैसी महत्त्वपूर्ण संवैधानिक संस्था के निर्णय भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं। आयोग की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि उसके प्रत्येक निर्णय को प्रश्नों से परे मान लिया जाए। इसी प्रकार, किसी निर्णय से असहमति अपने आप में यह प्रमाणित नहीं करती कि आयोग ने अनुचित कार्य किया है। न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य आरोपों और तथ्यों के बीच अंतर स्पष्ट करना, निर्णय प्रक्रिया की वैधानिकता जाँचना तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। इसी घटनाक्रम में सर्वोच्च न्यायालय ने 12 अक्टूबर के मार्च को लेकर राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य संबंधित नेताओं से भी जवाब माँगा। न्यायालय की चिंता यह थी कि राजनीतिक प्रदर्शन के माध्यम से न्यायपालिका पर दबाव बनाने की स्थिति उत्पन्न नहीं होनी चाहिए। इस प्रसंग का मूल्यांकन करते समय यह समझना आवश्यक है कि शांतिपूर्ण विरोध, राजनीतिक असहमति और न्यायालय की गरिमा-तीनों लोकतंत्र के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। विपक्ष को सरकार और निर्वाचन आयोग से प्रश्न पूछने का अधिकार है, लेकिन न्यायिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का सम्मान करना भी उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। दूसरी ओर, न्यायालय की गरिमा की रक्षा के नाम पर वैध आलोचना और शांतिपूर्ण असहमति के अधिकार को सीमित नहीं किया जाना चाहिए। नोटिस जारी होना किसी को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि उसका पक्ष जानने की न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
यही वह बिंदु है जहाँ न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम के बीच संतुलन का प्रश्न सामने आता है। यदि न्यायपालिका सामाजिक अन्याय, प्रशासनिक मनमानी अथवा संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर मौन रहे, तो आम नागरिक का न्याय व्यवस्था से विश्वास कमजोर हो सकता है। लेकिन यदि न्यायपालिका प्रत्येक राजनीतिक विवाद में स्वयं को निर्णायक नीति-निर्माता की भूमिका में रखे, तो शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत प्रभावित हो सकता है। लोकतंत्र की संस्थाएँ एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को संवैधानिक मर्यादाओं में रखने वाली व्यवस्थाएँ हैं। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि कानून तथा उनका क्रियान्वयन संविधान की सीमाओं के भीतर हों। इन तीनों के बीच स्वस्थ संतुलन ही लोकतांत्रिक स्थिरता की आधारशिला है। सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा उसके आदेशों की कठोरता से अधिक उसकी निष्पक्षता, स्वतंत्रता और तर्कपूर्ण निर्णयों से निर्मित होती है।
आज देश को ऐसी न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता है, जो अन्याय के सामने निर्भीक हो, लेकिन अपने अधिकार क्षेत्र के प्रति सजग भी रहे, जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे, लेकिन राजनीतिक आग्रहों से अप्रभावित रहे, जो संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखे, लेकिन उनकी जवाबदेही को भी सुनिश्चित करे। धर्मांतरण और आरक्षण के प्रश्न पर स्पष्टता, चुनावी विवादों में पारदर्शिता तथा न्यायालय के प्रति सम्मान-ये अलग-अलग विषय दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इन सभी के केंद्र में एक ही मूल प्रश्न है कि संविधान की सर्वोच्चता व्यवहार में कैसे सुनिश्चित हो। न्याय का अर्थ किसी पक्ष की जीत और दूसरे पक्ष की हार भर नहीं है। न्याय वह विश्वास है, जो नागरिक को यह भरोसा देता है कि उसकी आवाज सुनी जाएगी, उसके अधिकारों का निष्पक्ष परीक्षण होगा और शक्तिशाली व्यक्ति या संस्था भी कानून से ऊपर नहीं होगी। सर्वोच्च न्यायालय की वास्तविक शक्ति तभी सिद्ध होगी, जब उसका प्रत्येक निर्णय राजनीतिक शोर से ऊपर उठकर संवैधानिक विवेक, सामाजिक संवेदनशीलता और विधिक निष्पक्षता का उदाहरण बने।

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दशहराः शौर्य, साधना एवं नवसंकल्प का महापर्व https://www.rashtratak.com/dashaharaa/ Sun, 18 Oct 2026 09:56:47 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3184 भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने जीवन के उत्सवों को केवल आनंद और उल्लास

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भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने जीवन के उत्सवों को केवल आनंद और उल्लास तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें आत्मचिंतन, साधना, संस्कार और जीवन-परिवर्तन का माध्यम बनाया है। यहां प्रत्येक पर्व अपने भीतर कोई न कोई शाश्वत संदेश समेटे हुए है। दशहरा अथवा विजयादशमी ऐसा ही प्रेरणाप्रद पर्व है, जो भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों, आध्यात्मिक परंपराओं और जीवन-दर्शन से जुड़कर मनुष्य को सत्य, साहस, सदाचार और आत्मविजय की राह दिखाता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि जीवन की वास्तविक विजय दूसरों को पराजित करने में नहीं, बल्कि अपने भीतर विद्यमान दुर्बलताओं, विकारों और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने में है। असत्य पर सत्य, अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और अधर्म पर धर्म की विजय का यह उत्सव भारतीय जनमानस में सदियों से नई ऊर्जा, नया विश्वास और नया संकल्प भरता आया है।
दशहरे की सांस्कृतिक चेतना का सबसे प्रभावशाली आधार भगवान श्रीराम की रावण पर विजय है। रामायण का यह प्रसंग केवल एक ऐतिहासिक अथवा पौराणिक युद्ध की परिणति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और अहंकार के बीच संघर्ष का शाश्वत आख्यान है। श्रीराम मर्यादा, करुणा, सत्य, कर्तव्य और धर्मनिष्ठा के प्रतीक हैं, जबकि रावण ज्ञान, सामर्थ्य और वैभव से संपन्न होने के बावजूद अहंकार, अनियंत्रित इच्छाओं और अनैतिक आचरण का प्रतीक बन जाता है। रावण का व्यक्तित्व इस सत्य को उजागर करता है कि ज्ञान यदि विवेक से, शक्ति यदि मर्यादा से और समृद्धि यदि नैतिकता से विमुख हो जाए, तो मनुष्य के पतन का कारण बन जाती है। श्रीराम की विजय इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों का परित्याग नहीं किया। दशहरा हमें सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी ही कठिन क्यों न हों, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अंततः समाज की आस्था और इतिहास की प्रेरणा बनता है।
भारतीय संस्कृति में दशहरे का संबंध केवल राम की विजय से नहीं, बल्कि मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी जुड़ा है। नवरात्र के नौ दिनों में शक्ति की आराधना और दसवें दिन विजयादशमी का उत्सव इस बात का प्रतीक है कि साधना के बाद सिद्धि, संघर्ष के बाद सफलता और आत्मबल के जागरण के बाद विजय का मार्ग प्रशस्त होता है। मां दुर्गा की उपासना हमें यह संदेश देती है कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए शक्ति और संवेदना, साहस और विवेक तथा पराक्रम और करुणा का समन्वय आवश्यक है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति का अर्थ केवल बाहुबल अथवा प्रभुत्व नहीं है, बल्कि आत्मबल, इच्छाशक्ति, धैर्य, आत्मसंयम और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की नैतिक क्षमता भी है। इसीलिए दशहरा शक्ति की साधना के साथ-साथ उस शक्ति के सदुपयोग का भी पर्व है।
दशहरा पर्व का आध्यात्मिक पक्ष अत्यंत गहरा है। बाहरी रावण का दहन तभी सार्थक है, जब मनुष्य अपने भीतर बैठे रावण को पहचानने और परास्त करने का साहस जुटाए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी जैसी प्रवृत्तियां मनुष्य के व्यक्तित्व को भीतर से दुर्बल बनाती हैं। रावण के दस सिरों को इन दस विकारों के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है। प्रतिवर्ष रावण के पुतले जलते हैं, आतिशबाजी होती है और उत्सव संपन्न हो जाता है, लेकिन यदि हमारे भीतर ईर्ष्या, छल, स्वार्थ, द्वेष और अहंकार जीवित रहें, तो विजयादशमी का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सच्चा दशहरा वह है, जब हम किसी के प्रति अपने मन में पल रहे द्वेष को समाप्त करें, अपने व्यवहार से छल को निकालें, अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को स्वीकारें और अपनी सफलता में दूसरों के योगदान को भी सम्मान दें। आत्मविजय ही सभी विजयों का आधार है।
भारतीय संस्कृति उत्सव को साधना और साधना को जीवन की श्रेष्ठता से जोड़ती है। विजयादशमी इसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है। इस दिन शस्त्रपूजा की जाती है, नए कार्यों का शुभारंभ होता है और विजय की कामना के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लिया जाता है। शस्त्रपूजा का वास्तविक अर्थ केवल अस्त्रों की आराधना नहीं, बल्कि शक्ति के प्रति श्रद्धा और उसके उत्तरदायी उपयोग का संकल्प है। आज के संदर्भ में हमारे शस्त्र ज्ञान, विवेक, शिक्षा, विज्ञान, श्रम, नैतिकता और सत्यनिष्ठा भी हैं। यदि इन शक्तियों का उपयोग मानवता के कल्याण के लिए किया जाए, तो वे राष्ट्रनिर्माण के प्रभावशाली साधन बन सकती हैं। दशहरा हमें अकर्मण्यता से कर्मशीलता, निराशा से आशा और निष्क्रियता से सृजनशीलता की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह दिन अपने अधूरे संकल्पों को पूरा करने, नई संभावनाओं के द्वार खोलने और जीवन को श्रेष्ठ दिशा देने का अवसर है।


दशहरे का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्रकृति, कृषि और लोकजीवन से उसका संबंध भी है। भारतीय समाज में यह पर्व फसल, समृद्धि, ऋतु-परिवर्तन और सामुदायिक उल्लास की परंपराओं से जुड़ा रहा है। शमी वृक्ष की पूजा, उसके पत्तों का आदान-प्रदान और नए कार्यों का शुभारंभ प्रकृति के प्रति श्रद्धा तथा मंगलकामना की भावना को व्यक्त करते हैं। कृषि प्रधान भारत में फसल की समृद्धि केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि धरती, किसान और प्रकृति के परस्पर सहयोग का उत्सव भी है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि मनुष्य की प्रगति प्रकृति से अलग होकर संभव नहीं है। जिस संस्कृति ने वृक्षों, नदियों, पर्वतों और धरती में पवित्रता का अनुभव किया, उसकी उत्सवधर्मिता में पर्यावरण संरक्षण और सह-अस्तित्व की प्रेरणा भी अंतर्निहित है। आज जब पर्यावरणीय संकट मानवता के सामने गंभीर चुनौती बन रहा है, तब दशहरा हमें प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पुनः समझने का अवसर देता है।
विजयादशमी भारतीय संस्कृति की समन्वयकारी चेतना का भी उत्सव है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में इसे विविध रूपों में मनाया जाता है। कहीं रामलीला और रावण-दहन होता है, कहीं दुर्गापूजा के बाद मां की विदाई, कहीं शस्त्रपूजा तो कहीं लोकपरंपराओं के माध्यम से विजय का उल्लास व्यक्त किया जाता है। इन विविधताओं के पीछे एक साझा सांस्कृतिक सूत्र है-सत्य के प्रति आस्था, धर्म के प्रति निष्ठा, शक्ति के प्रति सम्मान और जीवन में मंगल की कामना। आज दशहरे के संदेश को अपने सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में उतारना पहले से अधिक आवश्यक है। भ्रष्टाचार, हिंसा, सामाजिक विद्वेष, अनैतिक प्रतिस्पर्धा, छलपूर्ण व्यवहार और स्वार्थपरक राजनीति जैसी प्रवृत्तियां समाज की नैतिक शक्ति को कमजोर करती हैं। इन बुराइयों का अंत केवल भाषणों, नारों अथवा प्रतीकात्मक आयोजनों से नहीं हो सकता। इसके लिए व्यक्तिगत चरित्र, सामाजिक उत्तरदायित्व और संस्थागत ईमानदारी को मजबूत करना होगा। यदि हम अपने कार्यक्षेत्र में प्रामाणिकता अपनाएं, सार्वजनिक जीवन में कर्तव्यनिष्ठ रहें, शिक्षा और चिकित्सा को मानवीय संवेदना से जोड़ें तथा समाज में प्रेम और सद्भाव को बढ़ावा दें, तो यही दशहरे की वास्तविक साधना होगी। राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी आर्थिक समृद्धि, सैन्य क्षमता अथवा तकनीकी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, नैतिकता, अनुशासन और परस्पर विश्वास में भी निहित होती है।

 


दशहरा अंततः बाहरी विजय से अधिक आंतरिक जागरण का पर्व है। यह हमें अपने भीतर प्रकाश का दीप जलाने, निराशाओं के बीच आशा खोजने, कठिनाइयों में साहस बनाए रखने और जीवन को नवसृजन की दिशा देने का संदेश देता है। आइए, इस विजयादशमी पर हम केवल रावण का पुतला जलाने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, स्वार्थ, असत्य और दुर्बलताओं को समाप्त करने का संकल्प लें। सत्य को अपना आधार, विवेक को अपना मार्गदर्शक, करुणा को अपना स्वभाव और कर्म को अपनी साधना बनाएं। यही भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक विरासत का सम्मान है, यही उत्सव की सार्थकता है और यही वह विजय है, जो व्यक्ति के जीवन को प्रकाशित करते हुए परिवार, समाज और राष्ट्र में नई चेतना का संचार कर सकती है। क्योंकि सच्चा दशहरा तभी है, जब रावण का दहन मैदान में ही नहीं, मन में भी हो; विजय का उत्सव केवल आतिशबाजी में नहीं, आचरण में दिखाई दे; और प्रकाश केवल दीपों में नहीं, हमारे विचारों, संस्कारों तथा कर्मों में भी प्रकट हो।

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सामाजिक सुरक्षा का कवच और समावेशी विकास का उजाला https://www.rashtratak.com/rashtratak-9/ Sun, 18 Oct 2026 09:48:14 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3181 किसी राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक मूल्यांकन केवल उसकी आर्थिक विकास दर, विशाल औद्योगिक परियोजनाओं, आधुनिक तकनीक, विदेशी

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किसी राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक मूल्यांकन केवल उसकी आर्थिक विकास दर, विशाल औद्योगिक परियोजनाओं, आधुनिक तकनीक, विदेशी निवेश और ऊंची प्रति व्यक्ति आय से नहीं किया जा सकता। विकास की सार्थकता तब सिद्ध होती है, जब समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी जीवन की अनिश्चितताओं से सुरक्षा मिले, श्रमिक को अपने भविष्य के प्रति विश्वास हो, वृद्धावस्था अभाव का पर्याय न बने और बीमारी किसी परिवार को आर्थिक संकट के गर्त में न धकेल दे। सामाजिक सुरक्षा इसी मानवीय विकास का आधार है। यह केवल सरकारी सहायता की व्यवस्था नहीं, बल्कि नागरिकों के सम्मान, आत्मविश्वास, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक न्याय का ऐसा आधारस्तंभ है, जिस पर एक सशक्त एवं समावेशी राष्ट्र का निर्माण होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पिछले वर्षों में जनकल्याणकारी योजनाओं के विस्तार के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा को व्यापक बनाने की दिशा में अनेक कदम उठाए हैं। इन पहलों ने करोड़ों लोगों को विभिन्न प्रकार की आर्थिक, स्वास्थ्य, खाद्य और सामाजिक सहायता से जोड़ने में भूमिका निभाई है। हालांकि, बदलती आर्थिक परिस्थितियों और विशाल श्रमबल की आवश्यकताओं को देखते हुए अभी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना शेष है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सामाजिक सुरक्षा का दायरा वर्ष 2015 के 19 प्रतिशत से बढ़कर 64.3 प्रतिशत यानी 94 करोड़ से अधिक नागरिकों तक पहुंच गया है। यह विस्तार बताता है कि सामाजिक संरक्षण अब देश की विकास संबंधी प्राथमिकताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। लेकिन सामाजिक सुरक्षा की सफलता का आकलन केवल लाभार्थियों की संख्या से नहीं होना चाहिए। वास्तविक प्रश्न यह है कि कितने लोगों को आवश्यकता के समय पर्याप्त सहायता मिलती है, कितने परिवार बीमारी और बेरोजगारी के संकट से उबर पाते हैं तथा कितने श्रमिक बुढ़ापे में सम्मानपूर्वक जीवन जीने की स्थिति में हैं। योजनाओं की व्यापकता के साथ उनकी पर्याप्तता, गुणवत्ता और निरंतरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सामाजिक सुरक्षा का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि यहां श्रमबल का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र से जुड़ा है। उपलब्ध श्रम संबंधी आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल श्रमबल में लगभग 87 प्रतिशत हिस्सेदारी असंगठित क्षेत्र की है। खेतों में काम करने वाले किसान-मजदूर, निर्माण श्रमिक, घरेलू कामगार, रेहड़ी-पटरी वाले, छोटे दुकानदार, दैनिक वेतनभोगी और विभिन्न सेवाओं से जुड़े कामगार देश की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। लेकिन इनमें से बड़ी संख्या के पास नियमित वेतन, भविष्य निधि, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और दुर्घटना सुरक्षा जैसी सुविधाएं नहीं हैं। रोजगार मिलने और छिनने के बीच उनका जीवन अक्सर अनिश्चितता से घिरा रहता है। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा को केवल संगठित क्षेत्र तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। इसकी पहुंच उन हाथों तक भी सुनिश्चित करनी होगी, जो देश की उत्पादन व्यवस्था और सेवा अर्थव्यवस्था को अपने श्रम से संचालित करते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने जनधन खातों, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, आधार आधारित पहचान और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के माध्यम से सरकारी सहायता को लाभार्थियों तक पहुंचाने के लिए एक व्यापक व्यवस्था विकसित की है। प्रधानमंत्री जनधन योजना ने बैंकिंग सुविधाओं से वंचित लोगों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने में योगदान दिया है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने अनेक योजनाओं में बिचौलियों की भूमिका कम करने और सहायता राशि सीधे लाभार्थियों के खातों तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त किया है। इन व्यवस्थाओं ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन को अधिक पारदर्शी बनाने की संभावनाएं मजबूत की हैं।
स्वास्थ्य सुरक्षा सामाजिक संरक्षण का सबसे संवेदनशील पक्ष है। आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ने पात्र परिवारों को अस्पताल में भर्ती होकर उपचार कराने के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को आयुष्मान वय वंदना योजना के माध्यम से स्वास्थ्य कवरेज के दायरे में लाने की पहल ने वृद्धावस्था में चिकित्सा संबंधी चिंताओं को कम करने का प्रयास किया है। फिर भी सार्वजनिक स्वास्थ्य पर व्यय बढ़ाने, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सशक्त बनाने, ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और दवाओं तथा जांच की लागत कम करने की आवश्यकता बनी हुई है। गंभीर बीमारी के कारण किसी परिवार की वर्षों की बचत समाप्त हो जाना या उसे कर्ज लेने के लिए विवश होना सामाजिक सुरक्षा की अपूर्णता को उजागर करता है। स्वास्थ्य सुविधाएं तभी प्रभावी सुरक्षा कवच बनेंगी, जब उपचार की उपलब्धता के साथ उसकी वहनीयता भी सुनिश्चित होगी।
आर्थिक सुरक्षा के क्षेत्र में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना जैसी पहलें अलग-अलग वर्गों की आवश्यकताओं को संबोधित करती हैं। पीएम-किसान के माध्यम से पात्र किसान परिवारों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता मिलती है। अटल पेंशन योजना असंगठित क्षेत्र के लोगों को वृद्धावस्था में नियमित आय की व्यवस्था से जोड़ने का प्रयास करती है। जीवन ज्योति बीमा और सुरक्षा बीमा योजनाएं क्रमशः जीवन बीमा तथा दुर्घटना बीमा के माध्यम से परिवारों को संभावित आर्थिक संकट से बचाने में सहायक हैं। प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना, जिसे पीएम-पोषण के नाम से जाना जाता है, विद्यालयों में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के माध्यम से पोषण और शिक्षा से जुड़े सामाजिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाती है।
श्रमिकों की दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) का दायरा बढ़ाने संबंधी कदम भी महत्वपूर्ण हैं। उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, 17 सितंबर 2026 से अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा के लिए मासिक वेतन सीमा 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये किए जाने का प्रावधान है। यदि इसका क्रियान्वयन निर्धारित स्वरूप में होता है, तो लगभग 51 लाख अतिरिक्त कर्मचारी अनिवार्य भविष्य निधि व्यवस्था के दायरे में आ सकते हैं। यह बदलाव उन कर्मचारियों के लिए विशेष महत्व रखता है, जिनका वेतन बढ़ने के कारण वे पुरानी सीमा के बाहर रह जाते थे। भविष्य निधि में नियमित अंशदान से सेवानिवृत्ति के लिए बचत का आधार तैयार होता है, जबकि लागू प्रावधानों के अनुसार पेंशन और बीमा संबंधी सुविधाएं भी परिवार को आर्थिक सहारा प्रदान कर सकती हैं। हालांकि, इस विस्तार के साथ कर्मचारियों की वर्तमान हाथ में आने वाली आय, नियोक्ताओं की लागत और छोटे उद्यमों की वित्तीय क्षमता के बीच संतुलन बनाना भी आवश्यक होगा।
सामाजिक सुरक्षा के विस्तार में ई-श्रम पोर्टल एक महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरा है। बदलती अर्थव्यवस्था ने सामाजिक सुरक्षा के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी की हैं। गिग और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में काम करने वाले डिलीवरी कर्मियों, कैब चालकों तथा अन्य सेवा प्रदाताओं को रोजगार के अवसर तो मिलते हैं, लेकिन उनकी आय, कार्य-अवधि और भविष्य की सुरक्षा अक्सर अनिश्चित रहती है। इसी प्रकार महिलाओं, प्रवासी श्रमिकों, दिव्यांगों और वृद्ध नागरिकों की जरूरतें एक जैसी नहीं हैं। महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ और सुरक्षित कार्यस्थल, प्रवासी श्रमिकों के लिए राज्य की सीमाओं से परे भी उपलब्ध रहने वाली सुविधाएं तथा निर्माण श्रमिकों के लिए कल्याणकारी योजनाओं तक सरल पहुंच सुनिश्चित करना आवश्यक है। सामाजिक सुरक्षा का ऐसा लचीला मॉडल विकसित होना चाहिए, जिसमें व्यक्ति के नियोक्ता, कार्यस्थल अथवा निवास स्थान बदलने पर भी उसके अधिकार बाधित न हों।

इसके साथ ही वृद्धावस्था और विधवा पेंशन की राशि को महंगाई के अनुरूप अधिक पर्याप्त बनाने, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय बढ़ाने और असंगठित श्रमिकों के लिए योगदान आधारित पेंशन तथा बीमा विकल्पों को सरल एवं सुलभ बनाने पर विशेष ध्यान देना होगा। पंचायतों, नगर निकायों और साझा सेवा केंद्रों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के प्रसार तथा पंजीकरण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। विकसित भारत का स्वप्न तभी साकार होगा, जब आर्थिक विकास के साथ सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय गरिमा भी समान गति से आगे बढ़ें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सामाजिक सुरक्षा का विस्तृत होता दायरा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तन को रेखांकित करता है। लेकिन अगला चरण केवल योजनाओं के विस्तार का नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन, पर्याप्त वित्तीय संसाधनों और अंतिम व्यक्ति तक वास्तविक लाभ पहुंचाने का होना चाहिए। सामाजिक सुरक्षा पर होने वाला व्यय सरकारी खजाने पर बोझ नहीं, बल्कि स्वस्थ, उत्पादक और आत्मविश्वासी समाज के निर्माण में निवेश है। जब श्रमिक को भविष्य की चिंता से राहत मिलेगी, किसान को संकट में सहारा मिलेगा, वृद्ध को सम्मानपूर्ण जीवन और गरीब परिवार को बीमारी के समय उपचार का भरोसा मिलेगा, तभी विकास की उपलब्धियां जनजीवन में सार्थक परिवर्तन ला सकेंगी। यही समावेशी विकास की वास्तविक कसौटी और एक सशक्त, संवेदनशील तथा आत्मनिर्भर भारत की आधारभूमि है।

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गुरमीत चौधरी और ईशा मालवीय ने दिल्ली में किया ‘तुम मेरे हो’ का प्रमोशन, 23 अक्टूबर को होगी रिलीज https://www.rashtratak.com/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%88%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a5%80/ Sun, 18 Oct 2026 09:23:42 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3178 नई दिल्ली : अभिनेता गुरमीत चौधरी और अभिनेत्री ईशा मालवीय अपनी आगामी रोमांटिक म्यूजिकल फिल्म ‘तुम मेरे हो’

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नई दिल्ली : अभिनेता गुरमीत चौधरी और अभिनेत्री ईशा मालवीय अपनी आगामी रोमांटिक म्यूजिकल फिल्म ‘तुम मेरे हो’ के प्रचार के लिए दिल्ली पहुंचे। इस दौरान राजधानी के बोबाची (शेफ युवराज कोहली) में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों कलाकारों ने मीडिया से बातचीत की और फिल्म की कहानी, अपने किरदारों तथा शूटिंग के अनुभव साझा किए। फिल्म 23 अक्टूबर 2026 को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज होगी। फिल्म ‘तुम मेरे हो’ गुरमीत चौधरी के करियर के लिए खास है, क्योंकि इसके जरिए वह पहली बार निर्माता के रूप में अपनी नई पारी शुरू कर रहे हैं। फिल्म का निर्माण उनके प्रोडक्शन बैनर देब गुरु फिल्म्स और रेवा क्रिएटिव हाउस के सहयोग से किया गया है। वहीं, ईशा मालवीय इस फिल्म के जरिए बॉलीवुड में डेब्यू कर रही हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुरमीत चौधरी ने कहा कि यह फिल्म उनके लिए बेहद खास है। एक अभिनेता के रूप में उन्हें इसमें रोमांस, भावनाओं और एक्शन के अलग-अलग रंग दिखाने का अवसर मिला है। वहीं, निर्माता के तौर पर उनकी कोशिश ऐसी कहानी पेश करने की रही है, जो भव्य होने के साथ दर्शकों से भावनात्मक जुड़ाव भी बनाए। ईशा मालवीय ने अपने बॉलीवुड डेब्यू को लेकर खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि फिल्म की कहानी प्यार, भावनाओं और रिश्तों की गहराई को दर्शाती है। गुरमीत के साथ काम करने का अनुभव शानदार रहा और उन्हें उम्मीद है कि दर्शक फिल्म के किरदारों तथा उनकी प्रेम कहानी से जुड़ाव महसूस करेंगे। निर्देशक आशीष पांडा के निर्देशन में बनी इस फिल्म के ट्रेलर में रोमांस, दिल टूटने का दर्द, जुनून और एक्शन की झलक देखने को मिलती है। फिल्म में गुरमीत चौधरी और ईशा मालवीय मुख्य भूमिकाओं में हैं, जबकि अनुष्का लुहार और शान ग्रोवर भी महत्वपूर्ण किरदार निभा रहे हैं। दोनों मुख्य कलाकारों की ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री को फिल्म के प्रमुख आकर्षणों में शामिल किया जा रहा है। फिल्म का संगीत भी इसकी खासियत है। इसके म्यूजिक एल्बम से मिथुन, विशाल मिश्रा, संजू राठौड़, असीस कौर, मधुर शर्मा, जावेद अली, मोहम्मद फैज और अर्जुन हरजाई सहित कई कलाकार जुड़े हैं। फिल्म का संगीत इसकी रोमांटिक कहानी और भावनात्मक दृश्यों को और प्रभावशाली बनाने में अहम भूमिका निभाएगा। आरती एस और देबिना बनर्जी द्वारा निर्मित तथा रोमांच मेहता और अमन रियास्ती द्वारा सह-निर्मित ‘तुम मेरे हो’ प्रेम, संगीत, भावनाओं और एक्शन से भरपूर सिनेमाई अनुभव पेश करने की तैयारी में है। फिल्म 23 अक्टूबर 2026 को सिनेमाघरों में दस्तक देगी।

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Handa Bangles का स्पष्टीकरण: केवल 24 कैरेट गोल्ड प्लेटेड ज्वेलरी का कारोबार करने का दावा https://www.rashtratak.com/handa-bangles-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%b2-24-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b0/ Fri, 16 Oct 2026 10:58:21 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=3169 नई दिल्ली : ज्वेलरी ब्रांड Handa Bangles ने अपने उत्पादों की प्रकृति और कारोबार को लेकर स्पष्टीकरण जारी

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नई दिल्ली : ज्वेलरी ब्रांड Handa Bangles ने अपने उत्पादों की प्रकृति और कारोबार को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया है। कंपनी की ओर से जारी दो औपचारिक घोषणा-पत्रों में कहा गया है कि उसके प्रतिष्ठानों और विभिन्न शहरों में स्थित शाखाओं में केवल 24 कैरेट गोल्ड प्लेटेड ज्वेलरी का कारोबार किया जाता है। कंपनी के अनुसार, इन आभूषणों को शुद्ध सोना, ठोस सोना या हॉलमार्क गोल्ड बताकर नहीं बेचा जाता।26 सितंबर 2026 को जारी एक घोषणा-पत्र में Handa Bangles – 1 Gram Gold Jewellery की प्रोप्राइटर सीमा हांडा ने स्पष्ट किया कि उनके प्रतिष्ठान में ग्राहकों को केवल गोल्ड प्लेटेड ज्वेलरी उपलब्ध कराई जाती है। घोषणा-पत्र में यह भी कहा गया है कि प्रतिष्ठान शुद्ध सोने, ठोस सोने या हॉलमार्क गोल्ड के आभूषणों की बिक्री नहीं करता। इसी तारीख को Handa Bangles के स्वामी कमल हांडा ने भी अलग घोषणा-पत्र जारी किया। इसमें कहा गया है कि भारत के विभिन्न शहरों में संचालित उनके प्रतिष्ठानों और शाखाओं में भी केवल 24 कैरेट गोल्ड प्लेटेड ज्वेलरी का कारोबार किया जाता है। कंपनी के मुताबिक, दोनों घोषणा-पत्र 26 सितंबर 2026 को दिल्ली में जारी किए गए थे और उन पर संबंधित व्यक्तियों के हस्ताक्षर तथा प्रतिष्ठान की मुहर मौजूद है। कंपनी ने कहा कि इस स्पष्टीकरण का उद्देश्य ग्राहकों और संबंधित पक्षों को उत्पादों की वास्तविक प्रकृति से अवगत कराना तथा गोल्ड प्लेटेड ज्वेलरी और शुद्ध सोने के आभूषणों के बीच किसी भी तरह की गलतफहमी से बचना है। घोषणा-पत्र में Handa Bangles का पता 2/15, Temp Connection Road, East Patel Nagar, New Delhi–110008 दिया गया है।

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