Rashtra Tak Hindi Monthly Magazine Mon, 20 Jul 2026 01:18:06 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0.2 https://www.rashtratak.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-cropped-WhatsApp-Image-2025-05-08-at-2.40.25-PM-32x32.jpeg Rashtra Tak 32 32 श्रीराम कथा के पाँचवें दिन सीता स्वयंवर का वर्णन हुआ: भारी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु, भजनों की धुन पर थिरके श्रोता https://www.rashtratak.com/sita-swayamvar-was-described-on-the-sixth-day-of-shri-ram-katha/ Sun, 19 Jul 2026 23:25:35 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2504   भारी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु, भजनों की धुन पर थिरके श्रोता नई दिल्ली, कंझावला के क़ुत्तबगढ़ रोड

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भारी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु, भजनों की धुन पर थिरके श्रोता

नई दिल्ली, कंझावला के क़ुत्तबगढ़ रोड पर स्थित माँ बगलामुखी शक्ति पीठ मंदिर जौन्ती में 15 जुलाई से एक दिव्य और भव्य धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया जा रहा है, जहाँ एक ओर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की महिमा गूँज रही है तो दूसरी ओर माँ पीताम्बरी देवी के महायज्ञ की आहुतियों से पूरा वातावरण शुद्ध होकर मन को आनंदित करने वाला है ।

 

इस अलौकिक महोत्सव को अयोध्या धाम से पधारे अंतर्राष्ट्रीय कथा व्यास,वैष्णव कुलभूषण श्रीमद्जगतगुरू रामानंदा चार्य श्री श्री 1008 स्वामी श्री श्री बल्लभाचार्य जी महाराज (श्री रामहर्षण मैथल सख्य पीठाधीश्वर) स्वामी जी के सानिध्य मे किया जा रहा है ।

इस भक्ति रस की शुरुआत 15 जूलाई को सुबह 9बजे एक भव्य और विशाल कलश यात्रा से शुरू हुई ।इसके बाद प्रतिदिन शाम चार बजे से प्रभु इच्छा तक संगीतमय राम कथा का अमृत प्रवाह बहरहा है ।संगीत की सुमधुम लहरियों के बीच जब स्वामी श्री श्री बल्लभाचार्य जी महाराज ने श्री राम जानकी विवाह की कथा सुनाई तो हर हृदय झूम उठा ।

 

कथा के दौरान श्री महाराज जी ने श्री राम कथा के पाँचवे दिवस रविवार को तुलसीकृत रामायण जी के सीता स्वयंवर राम सीता विवाह  का वर्णन किया।श्री श्री महाराज ने कथा में बताया कि जनक जी ने अपनी बेटी सीता के विवाह के लिए धनुष यज्ञ का आयोजन रखा तो उसमें देश-विदेश के दूर-दूर से हजारों राजा महाराजा शिव के धनुष को तोड़ने के लिए स्वयंवर में पहुंचे थे। रावण और बाणासुर जैसे महा योद्धा भी सीता जी से विवाह करने के लिए पूरी ताकत के साथ धनुष को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन धनुष तोड़ने की बात तो दूर बड़े-बड़े राजा महाराजा धनुष को हिला भी नहीं सके।

उन्होंने कथा सुनाते हुए आगे कहा कि गुरु विश्व मित्र के साथ दोनों राजकुमार राम और लक्ष्मण बैठे होते हैं। वह सब जान रहे हैं की राजा जनक जी के मन में क्या विचार चल हैं, जनक जी बोले की मुझे लगता है कि शायद पृथ्वी पर ऐसा कोई वीर नहीं है जो की धनुष को तोड़ दे। मुझे तो सारी पृथ्वी खाली नजर आ रही है। इस प्रकार के वचन जब राम जी के भ्राता लक्ष्मण जी ने सुने तो वह सभा में उठकर खड़े होते हैं और कहते हैं कि है राजन आपने ऐसे कैसे इतनी बड़ी बात कह दी कि पृथ्वी वीरों से खाली है। अगर गुरु जी और बड़े भाई मुझे आज्ञा दें तो आप तो धनुष तोड़ने की बात कह रहे हैं मैं सारा ब्रह्मांड भी उठा सकता हूं और जल को थल और थल को जल में परिवर्तन कर सकता हूं।

 

इस प्रकार से लक्ष्मण जी के कठोर वचन सुनकर गुरु विश्वामित्र उन्हें बैठने का इशारा करते हैं। इसी दौरान श्री राम गुरु विश्वामित्र को प्रणाम करते हुए मन में गुरु का स्मरण कर खड़े होते हैं और धनुष को उठाकर दो टुकड़े कर देते हैं। जैसे ही भगवान राम ने धनुष तोड़ा तो जनकपुरी में आयोजित सीता स्वयंवर में भगवान श्री राम के जय जयकार गूंज उठे।श्री श्री महाराज जी ने भक्तों को भगवान श्रीराम के कथा का स्मरण कराते हुए बताया कि गुप्त नवरात्रि के सिद्ध मुहूर्त में होने वाला भगवान श्री राम की कथा और माँ बगलामुखी पीतांबरा महायज्ञ, जो जीवन के समस्त विघ्नों, कष्टों और बाधाओं को समाप्त करने का प्रतीक हैं और सभी को अपने कार्य में सफलता और सर्वमनोकामनाओं की पूर्ति के लिए बेहद अचूक और कल्याणकारी उपाय माना जाता है ।

उल्लेखनीय हैं कि इस कथा के दौरान प्रातः 10 बजे माँ दोहसर धाम,भोजा वाली,पहाड़ी वाली माता के मंदिर का भूमि पूजन किया गया ।कथा के विश्राम के पश्चात प्रतिदिन भक्तों के लिए भव्य भोजन प्रसाद (भंडारे) भोग की व्यवस्था की गई है ।

श्री श्री स्वामी जी महाराज के इस कथा के दौरान सुनने आए कई श्रद्धालु भक्ति में झूमते नजर आए।

 

 

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संसद का मानसून सत्रः हंगामे नहीं, समाधान का संकल्प बने https://www.rashtratak.com/monsoon-session-of-parliament-resolution-should-be-made-for-solution-not-ruckus/ Sun, 19 Jul 2026 16:27:16 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2501 भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा बल उसकी संसद है। यही वह मंच है जहां देश की आकांक्षाएं, समस्याएं

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भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा बल उसकी संसद है। यही वह मंच है जहां देश की आकांक्षाएं, समस्याएं और भविष्य की दिशा तय होती है। संसद केवल कानून बनाने का स्थान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श, जवाबदेही और जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सर्वाेच्च मंच है। ऐसे में 20 जुलाई से प्रारंभ हो रहा संसद का मानसून सत्र केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता की नई परीक्षा भी है। देश की जनता की अपेक्षा है कि यह सत्र शोर-शराबे, आरोप-प्रत्यारोप और गतिरोध का नहीं, बल्कि सार्थक संवाद, गंभीर बहस और ठोस निर्णयों का सत्र बने। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में संसद के दृश्य लोकतांत्रिक गरिमा की अपेक्षा राजनीतिक टकराव के प्रतीक अधिक दिखाई दिए हैं। सदन में नीति और नीयत पर चर्चा कम तथा नारे, तख्तियां, वेल में प्रदर्शन और कार्यवाही बाधित करने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती रही है। संसद का प्रत्येक मिनट जनता के कर से चलता है, इसलिए उसका अनुत्पादक होना केवल संसदीय विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संसाधनों का भी दुरुपयोग है। संसद का उद्देश्य सरकार को घेरना अवश्य है, लेकिन केवल हंगामा खड़ा करना नहीं; उसी प्रकार सरकार का दायित्व केवल बहुमत के बल पर निर्णय लेना नहीं, बल्कि विपक्ष की बात सुनना और संवाद के लिए वातावरण बनाना भी है।
इस बार विपक्ष के पास अनेक ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर वह सरकार को घेरने की तैयारी में है। प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, शिक्षा व्यवस्था, महंगाई, बेरोजगारी, विदेश नीति, सीमा सुरक्षा, धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद, मन्दिरों में चोरी, कर व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया जैसे विषय निश्चित रूप से राष्ट्रीय महत्व के हैं। इन पर संसद में गंभीर चर्चा होना लोकतंत्र की आवश्यकता भी है और जनता का अधिकार भी। लेकिन यदि ये विषय केवल राजनीतिक नारेबाजी का माध्यम बनकर रह जाएं, तो उनका उद्देश्य समाप्त हो जाएगा। संसद में उठाया गया प्रत्येक मुद्दा समाधान की दिशा में बढ़े, यही लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रमाण होगा। विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य स्तंभ है। उसका दायित्व केवल सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार को बेहतर निर्णय लेने के लिए प्रेरित करना भी है। स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष सरकार की आंख और कान दोनों होता है। यदि वह केवल विरोध की राजनीति तक सीमित हो जाए, तो उसकी विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। दूसरी ओर सरकार भी यदि विपक्ष के प्रत्येक प्रश्न को राजनीतिक षड्यंत्र मानकर संवाद से बचती है, तो लोकतंत्र का संतुलन कमजोर पड़ता है। इसलिए सत्ता और विपक्ष, दोनों को अपने-अपने दायित्वों का गंभीरता से निर्वहन करना होगा।
मानसून सत्र में यदि शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा होती है तो उसका केंद्र छात्रों का भविष्य होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक लाभ। यदि महंगाई पर बहस हो तो उसका उद्देश्य आम नागरिक को राहत देने वाली नीतियों पर विचार होना चाहिए। यदि राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति अथवा सीमा संबंधी विषय उठते हैं तो उनमें दलगत राजनीति के बजाय राष्ट्रीय हित सर्वाेपरि होना चाहिए। संसद की बहस तब सार्थक कही जाएगी, जब उससे नीति निर्माण की दिशा निकले और जनता को यह विश्वास हो कि उसकी समस्याओं पर गंभीरता से विचार हो रहा है। लोकतंत्र में बहस और असहमति कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। किंतु जब असहमति का स्थान अवरोध ले लेता है और बहस की जगह बहिष्कार आ जाता है, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि संसद को चलाना ही लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है। यह विचार आज पहले से अधिक प्रासंगिक है। संसद का ठप होना किसी एक दल की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की हार है।
इस समय देश अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। युवाओं को रोजगार चाहिए, किसानों को बेहतर आय की अपेक्षा है, मध्यम वर्ग महंगाई से परेशान है, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की जरूरत है तथा वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बीच भारत को अपनी विकास गति बनाए रखनी है। ऐसे समय संसद से जनता समाधान चाहती है, संघर्ष नहीं। यदि पूरा सत्र केवल राजनीतिक टकराव में बीत गया तो सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक का होगा, जिसकी आवाज संसद तक पहुंचनी चाहिए। संसद की गरिमा केवल अध्यक्ष की कुर्सी या ऐतिहासिक भवन से नहीं बनती, बल्कि वहां बैठने वाले जनप्रतिनिधियों के आचरण से बनती है। सांसदों को यह स्मरण रखना चाहिए कि वे केवल अपने दल के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि देश की जनता के प्रतिनिधि हैं। संसद में उनका प्रत्येक शब्द और प्रत्येक व्यवहार लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा बनता है। इसलिए व्यक्तिगत आरोपों और कटुता के स्थान पर तथ्यों, तर्कों और नीति आधारित विमर्श को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
भारतीय जनता पार्टी का यह दावा रहा है कि वह विकास, सुशासन और नीति आधारित राजनीति में विश्वास रखती है। यदि ऐसा है तो उसे विपक्ष द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण प्रश्नों का तथ्यात्मक उत्तर देने में संकोच नहीं होना चाहिए। वहीं विपक्ष को भी यह समझना होगा कि केवल नारे लगाने अथवा कार्यवाही बाधित करने से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता। उसे वैकल्पिक नीतियां, ठोस सुझाव और रचनात्मक आलोचना प्रस्तुत करनी होगी। लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की सफलता संसद की सफलता से जुड़ी होती है। आज सूचना क्रांति के युग में जनता सब कुछ देख और समझ रही है। संसद में कौन बहस कर रहा है, कौन केवल राजनीतिक प्रदर्शन कर रहा है और कौन जनहित के प्रश्न उठा रहा है, इसका मूल्यांकन मतदाता स्वयं करता है। इसलिए अब केवल प्रतीकात्मक राजनीति से काम नहीं चलेगा। जनप्रतिनिधियों को अपने दायित्वों का निर्वहन अधिक गंभीरता, संवेदनशीलता और जवाबदेही के साथ करना होगा। दार्शनिक एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि संसद राष्ट्र के विवेक की आवाज होती है। यदि यही विवेक शोर में दब जाए तो लोकतंत्र का मार्ग भी धुंधला पड़ जाता है। इसलिए मानसून सत्र को ऐसे अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए, जहां सत्ता और विपक्ष मिलकर यह संदेश दें कि लोकतंत्र की असली शक्ति संवाद, सहमति और सार्थक बहस में निहित है।
किसी भी आदर्श एवं मजबूत लोकतंत्र की अपेक्षा है विपक्ष का समक्ष एवं सकारात्मक सक्रिय होना। क्योंकि विपक्ष लोकतंत्र की आंख है। लेकिन जब यह आंख केवल अंधविरोध में अंधी हो जाए, तो लोकतंत्र की दृष्टि धुंधली हो जाती है। जनता का दबाव ही विपक्ष को सद्बुद्धि दे सकता है। जब जनता यह स्पष्ट रूप से जताए कि उसे रचनात्मक, नीति आधारित विपक्ष चाहिए न कि नारेबाज नेता, तब विपक्ष को भी सुधरना पड़ेगा। विपक्ष को आत्मचिंतन करना चाहिए कि क्या वह जनता की लड़ाई लड़ रहा है या केवल सत्तालोलुपता की राजनीति कर रहा है? मीडिया को चाहिए कि वह हंगामे को महिमामंडित करने के बजाय, नीति और तर्क आधारित बहस को आगे बढ़ाए। संसद में विवाद होना लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन वही विवाद अगर दिशा विहीन हो जाए, तो वह कमजोरी बन जाता है। आज जरूरत है कि संसद की गरिमा को पुनर्स्थापित किया जाए, विपक्ष अपनी भूमिका को गंभीरता से निभाए और सरकार भी अहंकार छोड़कर संवाद को अवसर दे। संसद यदि सचमुच “लोक का मंदिर” है, तो वहाँ केवल सत्ता की पूजा नहीं, लोकमंगल की बात होनी चाहिए, यही मानसून सत्र से बड़ी अपेक्षा है।
इस सत्र में संसद का समय नीति निर्माण में ही लगे, वहां कार्यवाही स्थगित न हो। जनप्रतिनिधि जिन मुद्दों एवं उद्देश्यों को लेकर चुने जाते हैं, वे उन मुद्दों एवं उद्देश्यों पर खरे साबित हो। देश की जनता चाहती है कि संसद संकल्प का मंच बने, संग्राम का नहीं। सरकार विपक्ष की बात सुने, विपक्ष सरकार को जवाबदेह बनाए, लेकिन दोनों का अंतिम लक्ष्य राष्ट्रहित और जनकल्याण ही रहे। यदि इस मानसून सत्र में राजनीतिक कटुता के स्थान पर नीति आधारित विमर्श, आरोपों के स्थान पर उत्तरदायित्व और गतिरोध के स्थान पर समाधान का वातावरण बनता है, तो यह केवल संसदीय सफलता नहीं होगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का नया अध्याय भी सिद्ध होगा। संसद तब ही वास्तव में लोकतंत्र का मंदिर कहलाएगी, जब उसकी प्रत्येक आवाज देश के अंतिम व्यक्ति की आशाओं और अपेक्षाओं को अभिव्यक्ति दे सके।

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ब्रिटिश स्टैंडर्ड्स इंस्टीट्यूशन ने जोखिम प्रबंधन के लिए आरईसी की ISO 31000:2018 मान्यता का नवीनीकरण किया https://www.rashtratak.com/british-standards-institution-renews-recs-iso-310002018-accreditation-for-risk-management/ Thu, 16 Jul 2026 09:44:01 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2498 उप-शीर्षक: पिछले वर्ष, आरईसी लिमिटेड ISO 31000:2018 (एंटरप्राइज़ रिस्क मैनेजमेंट गाइडलाइंस) का अनुपालन करने वाली पहली भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की एनबीएफसी बनी नई दिल्ली: REC लिमिटेड,

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उप-शीर्षक: पिछले वर्षआरईसी लिमिटेड ISO 31000:2018 (एंटरप्राइज़ रिस्क मैनेजमेंट गाइडलाइंस) का अनुपालन करने वाली पहली भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की एनबीएफसी बनी

नई दिल्ली: REC लिमिटेड, विद्युत मंत्रालय के अधीन महारत्न सीपीएसई और अग्रणी इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग एबीएफसीने ब्रिटिश स्टैंडर्ड्स इंस्टीट्यूशन (बीएसआईद्वारा किए गए व्यापक पुनर्मूल्यांकन के बाद जोखिम प्रबंधन दिशानिर्देशों (Risk Management Guidelines) के लिए अपने ISO 31000:2018 मान्यता पत्र को सफलतापूर्वक नवीनीकृत कर लिया है। यह नवीनीकृत मान्यताबदलते व्यावसायिक परिवेश में वैश्विक स्तर के जोखिम प्रबंधन अभ्यासों को बनाए रखने और संगठनात्मक लचीलेपन को मजबूत करने के प्रति आरईसी की प्रतिबद्धता की पुष्टि करती है।

आरईसी के जोखिम प्रबंधन प्रभाग ने बदलते विनियामक आवश्यकताओं, उभरते व्यावसायिक जोखिमों, उद्योग की सर्वोत्तम प्रथाओं और बदलती बाजार गतिशीलता के अनुरूप संगठन के एंटरप्राइज रिस्क मैनेजमेंट (ERM) ढांचे का मूल्यांकन और उसे बढ़ाने के लिए पुनर्मूल्यांकन अभ्यास किया। एक व्यापक ऑडिट और मूल्यांकन प्रक्रिया के बाद, BSI ने ISO 31000:2018 के तहत निर्धारित सिद्धांतों और दिशानिर्देशों के अनुपालन के लिए आरईसी के मान्यता पत्र (Letter of Recognition) को नवीनीकृत किया।

ISO 31000:2018 एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानक है जो प्रभावी जोखिम प्रबंधन के लिए सिद्धांत, रूपरेखा और दिशानिर्देश प्रदान करता है। यह संगठनों को व्यवस्थित रूप से जोखिमों की पहचान करने, उनका आकलन करने, निगरानी करने और उन्हें कम करने में सक्षम बनाता है, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया बेहतर होती है, शासन में सुधार होता है, लचीलापन मजबूत होता है और दीर्घकालिक टिकाऊ विकास को समर्थन मिलता है।

आरईसी ने इससे पहले एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की थी, जब वह जुलाई 2025 में ISO 31000:2018 जोखिम प्रबंधन दिशानिर्देशों के अनुपालन के लिए BSI से मान्यता प्राप्त करने वाली पहली भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की NBFC बनी। यह एक मजबूत और उद्यम-व्यापी जोखिम प्रबंधन संस्कृति को संस्थागत बनाने के प्रति इसके अग्रणी दृष्टिकोण को दर्शाता है।

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आस्था, परम्परा, आध्यात्मिक चेतना का विराट उत्सव https://www.rashtratak.com/faith-tradition-great-celebration-of-spiritual-consciousness/ Wed, 15 Jul 2026 09:20:02 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2491 जगन्नाथ महायात्रा- 16 जुलाई, 2026 Rashtratak New Delhi: आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से प्रारम्भ होकर दस दिनों तक चलने

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जगन्नाथ महायात्रा- 16 जुलाई, 2026
Rashtratak New Delhi: आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से प्रारम्भ होकर दस दिनों तक चलने वाली भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, लोकआस्था, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक दर्शन का विराट उत्सव है। पुरी की यह महायात्रा हजारों वर्षों की परम्परा का जीवंत प्रतीक है, जिसमें भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। इसी कारण इसे ‘महायात्रा’ कहा जाता है। भारत के चार धामों में प्रतिष्ठित श्री जगन्नाथ धाम की यह यात्रा देश ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व के करोड़ों श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बनती है। वर्ष 2026 की रथयात्रा भी अपार श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई जा रही है, किन्तु इस बार इसके साथ एक नया विवाद भी जुड़ गया है। देश एवं विदेश के अनेक स्थानों पर इस्कॉन द्वारा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग तिथियों पर रथयात्राएं आयोजित किए जाने पर कुछ धार्मिक एवं परम्परावादी संगठनों ने आपत्ति व्यक्त की है। उनका मत है कि जगन्नाथ रथयात्रा की तिथि वही होनी चाहिए जो पुरी श्रीमंदिर द्वारा निर्धारित होती है। दूसरी ओर इस्कॉन का तर्क है कि विदेशों में स्थानीय प्रशासन की अनुमति, सार्वजनिक अवकाश, मौसम तथा अन्य व्यावहारिक कारणों से कभी-कभी तिथि में परिवर्तन आवश्यक हो जाता है। यह विवाद केवल तिथि का नहीं, बल्कि परम्परा और वैश्विक विस्तार के बीच संतुलन खोजने का विषय बन गया है।
वास्तव में यह समझना आवश्यक है कि पुरी की रथयात्रा और अन्य स्थानों पर आयोजित रथयात्राओं का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है, किन्तु उनका मूल उद्देश्य भगवान जगन्नाथ की भक्ति, लोककल्याण और धर्मप्रचार ही है। यदि परम्परा का सम्मान बना रहे और श्रद्धा अक्षुण्ण रहे तो मतभेद संवाद के माध्यम से सुलझाए जा सकते हैं। धर्म का मूल स्वरूप जोड़ना है, विभाजन करना नहीं। पुरी का श्रीमंदिर भगवान जगन्नाथ का मुख्य धाम है। लगभग 800 वर्ष पुराने इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण जगन्नाथ स्वरूप में अपने बड़े भाई बलभद्र एवं बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। प्रतिवर्ष केवल एक बार तीनों देव विग्रह अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर भक्तों को दर्शन देते हैं। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता है। सामान्य दिनों में जहां भगवान के दर्शन सीमित होते हैं, वहीं रथयात्रा में प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के भगवान के साक्षात दर्शन कर सकता है।
यात्रा की तैयारियां अक्षय तृतीया से प्रारम्भ हो जाती हैं। उसी दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीनों विशाल रथों का निर्माण आरम्भ होता है। प्रत्येक वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं। यद्यपि उनका स्वरूप और आकार सदियों से समान रहता है, फिर भी प्रत्येक वर्ष नई लकड़ी, नई सज्जा और नवीन निर्माण किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ गरुड़ध्वज (कपिलध्वज), बलभद्र का तालध्वज तथा सुभद्रा का दर्पदलन अथवा पद्मध्वज कहलाता है। इन रथों के निर्माण की प्रक्रिया केवल शिल्पकला नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना मानी जाती है। कारीगर विशेष धार्मिक नियमों का पालन करते हुए इन्हें बनाते हैं। यह परम्परा हमें यह संदेश देती है कि प्रत्येक वर्ष मनुष्य भी अपने भीतर की ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और लोभ को त्यागकर स्वयं का नव-निर्माण करे।
रथयात्रा के पीछे अनेक पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हैं। कहा जाता है कि एक बार सुभद्रा ने द्वारका नगर देखने की इच्छा व्यक्त की। तब भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने उन्हें अलग रथ पर बैठाकर नगर भ्रमण कराया। उसी स्मृति में तीनों भाई-बहनों की संयुक्त रथयात्रा निकाली जाती है। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान की अपूर्ण प्रतिमाओं का निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया था, जो आज भी जगन्नाथ संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। इस महायात्रा का एक अत्यन्त मार्मिक पक्ष यह भी है कि स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान अस्वस्थ माने जाते हैं और लगभग पन्द्रह दिनों तक सार्वजनिक दर्शन नहीं देते। इसके पश्चात वे रथों पर आरूढ़ होकर अपनी मौसी के घर गुण्डिचा मंदिर जाते हैं। वहां नौ दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर बहुड़ा यात्रा के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। लौटते समय भगवान का पोडा पीठा ग्रहण करना, पंचमी को देवी लक्ष्मी का रुष्ट होकर रथ का पहिया तोड़ना तथा बाद में भगवान द्वारा उन्हें मनाने की परम्परा भक्तिभाव एवं मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण है।
पुरी की रथयात्रा का एक अन्य अद्भुत दृश्य छेरा पहरा है। गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण निर्मित झाड़ू से रथों के मार्ग की सफाई करते हैं। यह परम्परा संदेश देती है कि ईश्वर के समक्ष राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान हैं। सत्ता का सर्वोच्च पद भी सेवा से बड़ा नहीं हो सकता। रथयात्रा के समय जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद भी विशेष आकर्षण का केन्द्र होता है। विश्व की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में से एक इस रसोई में मिट्टी के पात्रों में प्रसाद बनाया जाता है। दाल, चावल, सब्जियाँ, मालपुआ, गजामूंग, लाई, नारियल तथा अनेक प्रकार के व्यंजन अत्यंत अल्प मूल्य पर श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराए जाते हैं। यह प्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि समानता और साझेदारी का प्रतीक है।
धार्मिक ग्रन्थों में रथयात्रा का अत्यन्त महत्व बताया गया है। स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण तथा उत्कल खण्ड में भगवान जगन्नाथ की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि रथयात्रा के दर्शन एवं रथ को स्पर्श करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं तथा रथ खींचने वाले को मोक्ष का अधिकारी माना गया है। यद्यपि इन मान्यताओं का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि जो व्यक्ति अपने जीवन-रथ को धर्म, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलाता है, वही वास्तविक मुक्ति प्राप्त करता है। जगन्नाथ रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है। इस अवसर पर जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र अथवा सम्प्रदाय का कोई भेद नहीं रहता। लाखों श्रद्धालु एक साथ रथ की रस्सी खींचते हैं। यही वह क्षण होता है जब धर्म केवल पूजा-पद्धति न रहकर सामाजिक एकता का उत्सव बन जाता है।


आज यह यात्रा केवल पुरी तक सीमित नहीं रही। भारत के लगभग सभी प्रमुख नगरों सहित अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और अनेक यूरोपीय देशों में भी जगन्नाथ रथयात्रा आयोजित होती है। विशेष रूप से इस्कॉन ने इस परम्परा को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। करोड़ों विदेशी भक्तों ने इसी माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण एवं जगन्नाथ संस्कृति को जाना है। इसलिए यदि कहीं तिथियों को लेकर व्यावहारिक परिवर्तन भी किए जाएँ तो उनके पीछे धार्मिक अवमानना नहीं, बल्कि स्थानीय व्यवस्थाओं की विवशता भी हो सकती है। फिर भी यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जहाँ तक सम्भव हो, श्रीमंदिर की परम्परा और निर्धारित तिथि का सम्मान किया जाए, ताकि सम्पूर्ण विश्व में एकात्मता का संदेश और अधिक सुदृढ़ हो।
दार्शनिक दृष्टि से रथ मनुष्य के शरीर का, भगवान आत्मा का तथा रथ को खींचने वाली रस्सियाँ समाज और लोकशक्ति का प्रतीक हैं। आत्मा तभी सार्थक होती है जब समाज सहयोग करे और समाज तभी श्रेष्ठ बनता है जब उसके केन्द्र में ईश्वर, नैतिकता और आत्मशुद्धि का भाव हो। यही कारण है कि जगन्नाथ रथयात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मविशुद्धि, लोकमंगल, समरसता, सेवा और आध्यात्मिक जागरण का अनुपम पर्व है। वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार के वैचारिक, सामाजिक और धार्मिक विभाजनों से गुजर रहा है, तब भगवान जगन्नाथ की यह महायात्रा हमें स्मरण कराती है कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य विवाद नहीं, बल्कि संवाद है। वर्चस्व नहीं, बल्कि समन्वय है और बाहरी आडम्बर नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता है। यही इस महायात्रा का सनातन संदेश है कि जीवन का रथ तभी सही दिशा में चलता है जब उसमें श्रद्धा, सेवा, समरसता, आत्मसंयम और लोककल्याण के पहिए समान गति से चलते रहें। यही जगन्नाथ महायात्रा की शाश्वत महिमा है और यही इसकी वैश्विक प्रासंगिकता।

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अमेरिका-ईरान टकराव और विश्व शांति की नई चुनौती https://www.rashtratak.com/america-iran-confrontation-and-new-challenge-to-world-peace/ Mon, 13 Jul 2026 10:14:11 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2487 अमेरिका और ईरान के बीच लंबे तनाव के बाद बड़ी कठिनाई से बना संघर्ष विराम अपनी निर्धारित अवधि

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अमेरिका और ईरान के बीच लंबे तनाव के बाद बड़ी कठिनाई से बना संघर्ष विराम अपनी निर्धारित अवधि पूरी करने से पहले ही टूटने की कगार पर पहुंच गया है। ईरान द्वारा अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर किए गए ताजा हमलों और उसके जवाब में अमेरिका की भीषण बमबारी ने एक बार फिर पूरी दुनिया को युद्ध की आशंकाओं के बीच खड़ा कर दिया है। यह केवल दो देशों के बीच का सैन्य संघर्ष नहीं है, बल्कि वैश्विक शांति, आर्थिक स्थिरता और मानवीय मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती है। जिस समय विश्व को महामारी, आर्थिक मंदी, जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट जैसी समस्याओं से मिलकर लड़ना चाहिए, उस समय महाशक्तियों का युद्धोन्माद पूरी मानवता को पीछे धकेलने का कार्य कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर उत्पन्न विवाद ने इस संघर्ष को और अधिक विस्फोटक बना दिया है। विश्व के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होती है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो केवल तेल की कीमतें ही नहीं बढ़ेंगी, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक दुष्प्रभाव पड़ेगा। महंगाई बढ़ेगी, उत्पादन लागत में वृद्धि होगी, आपूर्ति शृंखलाएं टूटेंगी और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था सबसे अधिक प्रभावित होगी। युद्ध की आग कभी सीमाओं में नहीं रहती, उसकी तपिश अंततः पूरी दुनिया को झुलसाती है।
इस संघर्ष का सबसे दुखद पक्ष यह है कि इसमें निर्दोष नागरिकों, नाविकों और आम जनजीवन को सबसे अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। हाल के घटनाक्रम में भारतीय नाविकों के प्रभावित होने और भारत के सहयोग से विकसित रणनीतिक महत्व वाले चाबहार बंदरगाह परियोजना को नुकसान पहुंचने से यह स्पष्ट हो गया है कि युद्ध किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक विश्वास-तीनों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अमेरिका स्वयं को लोकतंत्र और विश्व व्यवस्था का संरक्षक बताता है, लेकिन उसकी विदेश नीति लंबे समय से प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और शक्ति प्रदर्शन पर आधारित रही है। किसी भी राष्ट्र को झुकाने के लिए आर्थिक प्रतिबंध, सैन्य हमले और राजनीतिक दबाव स्थायी समाधान नहीं हो सकते। महाशक्ति होने का अर्थ केवल सैन्य सामर्थ्य नहीं, बल्कि संयम, दूरदृष्टि और विश्व समुदाय के प्रति नैतिक उत्तरदायित्व भी है। यदि शक्ति विवेक से संचालित न हो तो वही शक्ति विनाश का कारण बन जाती है।
दूसरी ओर ईरान को भी यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों को अपने रणनीतिक हितों के लिए बंधक बनाना न तो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है और न ही वैश्विक विश्वास के अनुकूल। किसी भी देश की सुरक्षा तब तक स्थायी नहीं हो सकती जब तक वह पड़ोसी देशों और विश्व समुदाय के साथ सहयोग, विश्वास और पारदर्शिता का वातावरण निर्मित न करे। भय और प्रतिशोध पर आधारित सुरक्षा व्यवस्था अंततः स्वयं को ही असुरक्षित बना देती है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यशैली ने इस पूरे संकट को और अधिक अनिश्चित बनाया है। एक ओर वे कठोर सैन्य कार्रवाई करते हैं, दूसरी ओर वार्ता और समझौते की बातें करते हैं। इस प्रकार के विरोधाभासी संदेश न केवल कूटनीतिक विश्वास को कमजोर करते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अस्थिरता पैदा करते हैं। महाशक्तियों के नेताओं के प्रत्येक वक्तव्य का प्रभाव केवल उनके देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विश्व की अर्थव्यवस्था, निवेश, ऊर्जा बाजार और करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ता है। इसलिए नेतृत्व में धैर्य, स्थिरता और विश्वसनीयता अत्यंत आवश्यक है।
इतिहास गवाह है कि युद्धों ने कभी स्थायी समाधान नहीं दिया। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया तक, हर युद्ध ने नई समस्याएं ही पैदा की हैं। लाखों लोगों की जान गई, करोड़ों लोग विस्थापित हुए, लेकिन अंततः समाधान फिर बातचीत की मेज पर ही खोजे गए। यदि अंत में संवाद ही करना है, तो शुरुआत भी संवाद से ही क्यों नहीं हो सकती? यही प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने खड़ा है। भारत ने सदैव विश्व को शांति, सह-अस्तित्व और अहिंसा का मार्ग दिखाया है। गौतम बुद्ध, भगवान महावीर और महात्मा गांधी की भूमि ने यह सिखाया कि वास्तविक विजय शत्रु को पराजित करने में नहीं, बल्कि शत्रुता को समाप्त करने में है। भारत की विदेश नीति भी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘विश्वबंधुत्व’ के आदर्शों पर आधारित रही है। भारत ने हमेशा संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है। यही कारण है कि भारत आज विश्वसनीय मध्यस्थ, संतुलित शक्ति और जिम्मेदार वैश्विक भागीदार के रूप में सम्मान प्राप्त कर रहा है।

वर्तमान संकट में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत के अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंध हैं। भारत यदि संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों के माध्यम से सक्रिय शांति पहल करे, तो तनाव कम करने में उसकी भूमिका प्रभावी सिद्ध हो सकती है। साथ ही भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और विदेशों में कार्यरत भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी दूरदर्शी रणनीति अपनानी होगी। आज आवश्यकता किसी एक पक्ष की विजय की नहीं, बल्कि मानवता की विजय की है। हथियारों की होड़ से न तो समृद्धि आती है और न ही सम्मान। वास्तविक शक्ति मिसाइलों, बमों और युद्धपोतों में नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग और संवाद में निहित होती है। युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, वह केवल नई समस्याओं को जन्म देता है। अहिंसा कायरता नहीं, बल्कि आत्मबल, धैर्य और दूरदर्शिता का सर्वोच्च स्वरूप है।
विश्व समुदाय को अब यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि किसी भी देश की मनमानी, सामरिक अहंकार और युद्धोन्माद को स्वीकार नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र सहित वैश्विक संस्थाओं को अधिक प्रभावी, निष्पक्ष और सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यदि आज भी दुनिया ने युद्ध की राजनीति पर अंकुश नहीं लगाया, तो भविष्य की पीढ़ियां हमें क्षमा नहीं करेंगी। आज पूरी दुनिया की प्रार्थना यही है कि अमेरिका को शक्ति के साथ सद्बुद्धि मिले, ईरान को संयम और विवेक का मार्ग मिले तथा दोनों राष्ट्र हथियारों की भाषा छोड़कर संवाद की संस्कृति अपनाएं। शांति ही विकास का आधार है, संवाद ही स्थायी समाधान का मार्ग है और अहिंसा ही मानव सभ्यता का सबसे बड़ा अस्त्र है। यही समय की पुकार है, यही मानवता की अपेक्षा है और यही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।

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आरईसी लिमिटेड ने त्रिपुरा में बिजली और नवीकरणीय ऊर्जा विकास को गति देने के लिए ₹15,000 करोड़ के समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए https://www.rashtratak.com/rec-ltd-signs-mous-worth-%e2%82%b915000-crore-to-accelerate-power-and-renewable-energy-development-in-tripura/ Fri, 10 Jul 2026 09:24:05 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2483 नई दिल्ली/अगरतला: आरईसी लिमिटेड, विद्युत मंत्रालय के अधीन महारत्न सीपीएसई और अग्रणी एनबीएफसी, ने त्रिपुरा सरकार के साथ ₹15,000 करोड़ की बिजली और

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नई दिल्ली/अगरतला: आरईसी लिमिटेड, विद्युत मंत्रालय के अधीन महारत्न सीपीएसई और अग्रणी एनबीएफसीने त्रिपुरा सरकार के साथ 15,000 करोड़ की बिजली और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के समर्थन के लिए दो समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए हैं।

ये समझौता ज्ञापन डेस्टिनेशन त्रिपुरा बिज़नेस कॉन्क्लेव 2026‘ के दौरान हस्ताक्षरित किए गएजो पूर्वोत्तर में सतत विकास को सक्षम करने और बिजली के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए आरईसी की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

पहले समझौता ज्ञापन (MoU) के अंतर्गतआरईसी लिमिटेड ने त्रिपुरा सरकार के विद्युत विभाग के माध्यम से त्रिपुरा रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी (TREDA) के साथ साझेदारी की हैताकि 5,000 करोड़ तक की नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जा सके। इस समझौते पर आरईसी के गुवाहाटी क्षेत्रीय कार्यालय के मुख्य कार्यक्रम प्रबंधक श्री सुभेंदु रॉय और TREDA के महानिदेशक (प्रभारी) श्री डी. एस. दास ने हस्ताक्षर किए।

त्रिपुरा में नवीकरणीय ऊर्जा विकास के लिए नोडल एजेंसी के रूप में, TREDA पूरे राज्य में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के कार्यान्वयन को सुगम बनाएगाजबकि आरईसी लिमिटेड हरित ऊर्जा क्षेत्र में निवेश को सक्षम करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करेगा। इस साझेदारी से स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने में तेजी आनेत्रिपुरा की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को अनलॉक करने और क्षेत्र के सतत विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिलने की उम्मीद है।

राज्य के साथ अपनी साझेदारी को और मज़बूत करते हुएआरईसी लिमिटेड ने त्रिपुरा स्टेट इलेक्ट्रिसिटी कॉर्पोरेशन लिमिटेड (TSECL) के माध्यम से त्रिपुरा सरकार के ऊर्जा विभाग के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किएताकि 10,000 करोड़ की बिजली क्षेत्र की परियोजनाओं को सहायता दी जा सके।

हस्ताक्षर समारोह में त्रिपुरा सरकार के माननीय बिजली मंत्री श्री रतन लाल नाथ उपस्थित थे। समझौता ज्ञापन पर आरईसी क्षेत्रीय कार्यालयगुवाहाटी के मुख्य कार्यक्रम प्रबंधक श्री शुभेंदु रॉय और TSECL के प्रबंध निदेशक श्री बिस्वजीत बसु ने हस्ताक्षर किए।

10,000 करोड़ की यह साझेदारी राज्य में बिजली क्षेत्र की प्रमुख पहलों के लिए वित्तपोषण को सुगम बनाने के उद्देश्य से की गई हैजो त्रिपुरा के बिजली बुनियादी ढांचे के विस्तार और आधुनिकीकरण में योगदान देगी और साथ ही नागरिकों के लिए विश्वसनीय और टिकाऊ बिजली की पहुंच सुनिश्चित करेगी।

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डिजिटल क्रांति के दौर में बढ़ते साइबर अपराध, बड़ी चुनौती https://www.rashtratak.com/increasing-cyber-crime-revolution/ Wed, 08 Jul 2026 10:19:32 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2478 डिजिटल क्रांति ने भारत को अभूतपूर्व गति, सुविधा और पारदर्शिता प्रदान की है। आज मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई, ई-कॉमर्स,

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डिजिटल क्रांति ने भारत को अभूतपूर्व गति, सुविधा और पारदर्शिता प्रदान की है। आज मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने सामान्य नागरिक के जीवन को सरल और सक्रिय बनाया है। भारत विश्व की सबसे बड़ी डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से उभर रहा है और ‘डिजिटल इंडिया’ तथा ‘विकसित भारत-2047’ का सपना इसी तकनीकी परिवर्तन पर आधारित है। किंतु इस उजले परिदृश्य के समानांतर एक भयावह अंधेरा भी तेजी से फैल रहा है-साइबर अपराधों का बढ़ता साम्राज्य। डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन वित्तीय ठगी, फिशिंग, पहचान की चोरी, निवेश घोटाले, व्यक्तिगत गोपनीयता पर सेंध, सोशल मीडिया के माध्यम से अपराध, बाल यौन शोषण सामग्री का प्रसार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग आज केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक नैतिकता के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं। विडंबना यह है कि जिस तकनीक का उद्देश्य मनुष्य के जीवन को सुरक्षित, सुविधाजनक और ज्ञानसमृद्ध बनाना था, वही तकनीक अपराधियों के लिए सबसे प्रभावी हथियार बनती जा रही है। इंटरनेट की असीम संभावनाओं का लाभ जितनी तेजी से समाज ने उठाया है, उतनी ही तेजी से अपराधियों ने भी उसे अपने हित में ढाल लिया है। परिणामस्वरूप डिजिटल दुनिया में विश्वास का संकट गहराता जा रहा है।

 


डिजिटल व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी विश्वास है। जब कोई नागरिक मोबाइल पर क्यूआर कोड स्कैन करता है, यूपीआई से भुगतान करता है या किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर निवेश करता है, तब वह केवल तकनीक पर नहीं, बल्कि पूरे डिजिटल तंत्र की विश्वसनीयता पर भरोसा करता है। यदि यही भरोसा लगातार साइबर ठगी, फर्जी कॉल, फिशिंग, नितांत व्यक्तिगत सूचनाओं के सार्वजनिक होने के भय, निवेश घोटालों और पहचान की चोरी जैसी घटनाओं से टूटने लगे, तो डिजिटल अर्थव्यवस्था की नींव कमजोर पड़ जाएगी। जिस प्रकार नकली मुद्रा का प्रसार पूरी आर्थिक व्यवस्था को संकट में डाल देता है, उसी प्रकार डिजिटल धोखाधड़ी का बढ़ना कैशलेस अर्थव्यवस्था की अवधारणा को कमजोर कर सकता है। परंपरागत अपराधों और साइबर अपराधों में मूलभूत अंतर है। पहले अपराध किसी निश्चित क्षेत्र तक सीमित रहते थे, अपराधी की पहचान और गिरफ्तारी की संभावना अपेक्षाकृत अधिक होती थी। आज साइबर अपराधी हजारों किलोमीटर दूर बैठकर कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। उसके लिए जोखिम न्यूनतम और लाभ अधिकतम है। यही असंतुलन साइबर अपराध को अत्यंत खतरनाक बनाता है। अपराध का यह नया स्वरूप सीमाओं, भाषाओं और कानूनों की पारंपरिक सीमाओं को भी चुनौती दे रहा है।
चिंता केवल आर्थिक अपराधों तक सीमित नहीं है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया मंचों पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के प्रचार-प्रसार के आरोपों ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। यदि लोकप्रिय डिजिटल मंचों पर पैसे लेकर ऐसे विज्ञापन प्रसारित हो सकते हैं, तो यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक विफलता भी है। प्रश्न यह भी है कि क्या सोशल मीडिया कंपनियां केवल स्वयं को तकनीकी मंच कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती हैं? जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और एल्गोरिद्म यह तय करते हैं कि कौन-सा विज्ञापन किस व्यक्ति तक पहुंचेगा, तब उन मंचों की जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी हो जाती है। आज अनेक डिजिटल प्लेटफॉर्म आपत्तिजनक सामग्री हटाने का दावा करते हैं, किंतु व्यवहार में उनकी प्राथमिकता कई बार राजस्व और व्यावसायिक हित प्रतीत होती है। यदि बाल यौन शोषण, अश्लीलता, साइबर ठगी या संगठित अपराध से जुड़े विज्ञापन और सामग्री लंबे समय तक सक्रिय रह सकते हैं, तो यह केवल अपराधियों की सफलता नहीं, बल्कि डिजिटल मंचों की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाए बिना डिजिटल समाज स्वस्थ नहीं रह सकता।
साइबर अपराध का सबसे दुखद पक्ष पीड़ित की मानसिक पीड़ा है। जीवनभर की बचत कुछ मिनटों में गायब हो जाती है। इसके बाद पुलिस, बैंक और साइबर हेल्पलाइन के चक्कर लगते हैं, लेकिन समय पर कार्रवाई नहीं होने के कारण अधिकांश मामलों में धन वापस नहीं मिल पाता। इससे नागरिक के भीतर व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होता है। यदि अपराधी को दंड न मिले और पीड़ित को राहत न मिले, तो कानून का भय भी समाप्त होने लगता है। भारत सरकार ने साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अनेक कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल, हेल्पलाइन, साइबर क्राइम समन्वय केंद्र तथा डिजिटल सुरक्षा संबंधी अनेक पहलें शुरू की गई हैं। न्यायपालिका ने भी ऑनलाइन धोखाधड़ी को आर्थिक सुरक्षा से जोड़कर गंभीर चिंता व्यक्त की है। फिर भी नीति और उसके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच बड़ी दूरी दिखाई देती है। शिकायत दर्ज होने के बाद शुरुआती कुछ घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि इसी अवधि में बैंक खाते फ्रीज कर दिए जाएं और धन के प्रवाह को रोक दिया जाए तो बड़ी राशि बचाई जा सकती है। लेकिन अक्सर कार्रवाई में देरी अपराधियों के पक्ष में चली जाती है।
डिजिटल सुरक्षा अब केवल पुलिस का विषय नहीं रही। यह आर्थिक नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, शिक्षा, प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़ा बहुआयामी प्रश्न बन चुकी है। विकसित देशों ने साइबर सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के समान महत्व दिया है। विशेष एजेंसियां, अत्याधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित विशेषज्ञ, रियल टाइम डेटा साझा करने की व्यवस्था और कठोर दंडात्मक कानून वहां की व्यवस्था का हिस्सा हैं। भारत को भी इसी दिशा में और अधिक सुदृढ़ कदम उठाने होंगे। स्थानीय पुलिस को डिजिटल फॉरेंसिक, ब्लॉकचेन विश्लेषण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित जांच और अंतरराष्ट्रीय साइबर कानूनों का प्रशिक्षण देना समय की आवश्यकता है। इसके साथ ही नागरिक जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है। तकनीक जितनी उन्नत होगी, अपराधी भी उतने ही नए तरीके खोजेंगे। इसलिए विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से डिजिटल साक्षरता को जनआंदोलन बनाया जाना चाहिए। लोगों को संदिग्ध लिंक, फर्जी कॉल, निवेश योजनाओं और सोशल मीडिया के छल-प्रपंचों से बचने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि सुरक्षा का पूरा दायित्व नागरिक पर डालकर सरकार, बैंक और डिजिटल कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकतीं। सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराना संस्थागत दायित्व है।
भ्रष्टाचार, लापरवाही और कमजोर केवाईसी व्यवस्था भी साइबर अपराध को बढ़ावा देती है। यदि फर्जी पहचान के आधार पर बैंक खाते खुलते हैं, यदि भुगतान प्लेटफॉर्म समय पर संदिग्ध लेन-देन नहीं रोकते, यदि आंतरिक मिलीभगत से अपराधियों को सुविधा मिलती है, तो यह केवल तकनीकी दोष नहीं बल्कि संस्थागत अपराध है। इसलिए पारदर्शी ऑडिट, कठोर उत्तरदायित्व और सख्त दंड व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। साइबर अपराध अब किसी एक देश की समस्या नहीं रहा। इंटरनेट की दुनिया में अपराधी सीमाओं से मुक्त हैं, इसलिए समाधान भी वैश्विक होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सहित विश्व की प्रमुख शक्तियों को साइबर अपराध के विरुद्ध साझा कानूनी ढांचा, त्वरित सूचना आदान-प्रदान और तकनीकी सहयोग विकसित करना होगा। जिस प्रकार आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक सहयोग आवश्यक माना गया, उसी प्रकार साइबर अपराध के विरुद्ध भी विश्वव्यापी समन्वय समय की मांग है।
अंततः डिजिटल क्रांति का वास्तविक उद्देश्य केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि मानव जीवन को अधिक सुरक्षित, समृद्ध और सम्मानजनक बनाना है। यदि यही क्रांति भय, असुरक्षा और अविश्वास का कारण बनने लगे, तो उसकी सफलता अधूरी रह जाएगी। डिजिटल भारत की वास्तविक शक्ति उसके ऐप्स, सर्वरों और आंकड़ों में नहीं, बल्कि उस विश्वास में निहित है, जिसके साथ करोड़ों नागरिक प्रतिदिन अपने मोबाइल पर एक-एक लेन-देन करते हैं। आज आवश्यकता केवल तकनीकी समाधान की नहीं, बल्कि तकनीक, नैतिकता, कानून और उत्तरदायित्व के समन्वित मॉडल की है। सरकार को कठोर कानून, त्वरित न्याय और सक्षम जांच तंत्र विकसित करना होगा, डिजिटल कंपनियों को अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन करना होगा, वित्तीय संस्थानों को सुरक्षा और जवाबदेही बढ़ानी होगी और नागरिकों को डिजिटल अनुशासन अपनाना होगा। साइबर अपराध और भारतीय डिजिटल जीवनशैली के बीच संतुलन ही विकसित भारत की सबसे बड़ी कसौटी है। यदि यह संतुलन स्थापित हो गया, तो डिजिटल भारत विश्व का सबसे विश्वसनीय डिजिटल लोकतंत्र बन सकता है, अन्यथा तकनीकी उपलब्धियां भी अविश्वास के बोझ तले दम तोड़ देंगी।

 

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मिलावट है भारत के सपनों पर विषनुमा दाग https://www.rashtratak.com/adulteration-is/ Wed, 08 Jul 2026 10:11:32 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2474 भारत आज विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। वर्ष 2047 तक विकसित

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भारत आज विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का संकल्प राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन चुका है। आधुनिक राजमार्ग, बुलेट ट्रेन, डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष में नई उपलब्धियां और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रगति निश्चय ही गौरव का विषय हैं। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा कलंक है, जो इस समस्त प्रगति के माथे पर काले धब्बे की तरह दिखाई देता है-मिलावट। यह केवल खाद्य पदार्थों में मिलावट नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व में आई मिलावट का भी प्रतीक है। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति है कि एक ओर चिकित्सक रोगियों को स्वास्थ्य लाभ के लिए दूध, घी, फल, पनीर और पौष्टिक आहार लेने की सलाह देते हैं, वहीं दूसरी ओर बाजार में वही दूध डिटर्जेंट और यूरिया से भरा मिलता है, घी में जानलेवा रसायन मिलते हैं, फलों को जहरीले रसायनों से पकाया जाता है और दवाइयों तक में नकलीपन प्रवेश कर चुका है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर स्वस्थ जीवन की आशा किससे की जाए? नये भारत, विकसित भारत एवं मजबूत भारत का सबसे बड़ा हो- मिलावट-मुक्त भारत।
यह विडंबना केवल उपभोक्ता की नहीं, पूरे राष्ट्र की है। जिस देश की संस्कृति ‘अन्नं ब्रह्म’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का संदेश देती हो, वहां भोजन ही यदि विष बन जाए तो इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है? हाल के ही दिनों में देश के विभिन्न भागों से मिलावट के अनेक भयावह मामले सामने आए हैं। कहीं हजारों लीटर नकली दूध पकड़ा जाता है, कहीं करोड़ों रुपये का नकली शहद, कहीं मिलावटी घी, मावा और मसाले बरामद होते हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जीवन बचाने वाली दवाइयों में भी नकली और घटिया सामग्री का उपयोग पाया गया। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध है। जो व्यक्ति लाभ कमाने के लिए किसी बच्चे, गर्भवती महिला, वृद्ध या बीमार व्यक्ति के भोजन और दवा में जहर घोल देता है, वह केवल व्यापारी नहीं, समाज का अपराधी है।
दरअसल, मिलावट का सबसे बड़ा कारण केवल आर्थिक लालच नहीं, बल्कि नैतिक पतन है। पहले समाज में यह भावना थी कि दूसरों को कष्ट देकर कभी सुख नहीं मिल सकता। लोग ईश्वर, धर्म और समाज की नैतिक मर्यादाओं से डरते थे। आज परिस्थितियां बदल गई हैं। त्वरित धन अर्जित करने की अंधी दौड़ ने संवेदनाओं को कुचल दिया है। अब कुछ लोगों के लिए मुनाफा ही धर्म बन गया है, चाहे उसकी कीमत किसी की जान क्यों न हो। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास का भी प्रश्न है। मिलावटी खाद्य पदार्थ कैंसर, किडनी, लीवर, हृदय रोग, हार्माेन असंतुलन और बच्चों में कुपोषण जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी बोझ बढ़ता है, परिवार आर्थिक संकट में फंसते हैं और राष्ट्र की उत्पादक क्षमता प्रभावित होती है। दूसरी ओर, जब भारतीय खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारी विश्वसनीयता भी कमजोर होती है। विकसित भारत का सपना केवल ऊंची इमारतों और तेज आर्थिक विकास से पूरा नहीं होगा; उसके लिए स्वस्थ नागरिक और शुद्ध खाद्य व्यवस्था अनिवार्य है।


विडंबना यह भी है कि हमारे यहां कानून तो हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, निरीक्षण तंत्र और विभिन्न एजेंसियां मौजूद हैं, फिर भी मिलावट का कारोबार फल-फूल रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार, निरीक्षण व्यवस्था की कमजोरी, मुकदमों में देरी और दंड का अभाव है। त्योहारों पर कुछ छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई करके प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है, जबकि बड़े नेटवर्क अक्सर बच निकलते हैं। जब तक दोषियों को त्वरित और कठोर दंड नहीं मिलेगा, तब तक यह विषैला कारोबार समाप्त नहीं होगा। आज आवश्यकता केवल कानूनों की नहीं, बल्कि कठोर राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। हर जिले में आधुनिक खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाएं स्थापित हों। मोबाइल फूड टेस्टिंग लैब गांव-गांव और शहर-शहर पहुंचें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), ब्लॉकचेन आधारित आपूर्ति श्रृंखला और डिजिटल ट्रैकिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक हर स्तर पर निगरानी सुनिश्चित की जाए। नकली दवाइयों और मिलावटी खाद्य पदार्थों के मामलों के लिए विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें बनाई जाएं, ताकि कुछ महीनों के भीतर दोषियों को सजा मिल सके। ऐसे अपराधों को सामान्य आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि ‘जनस्वास्थ्य के विरुद्ध जघन्य अपराध’ घोषित किया जाना चाहिए। लेकिन केवल सरकार सब कुछ नहीं कर सकती। समाज की भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। उपभोक्ताओं को जागरूक बनना होगा। प्रमाणित उत्पादों का उपयोग, संदिग्ध वस्तुओं की शिकायत, स्थानीय स्तर पर जन-जागरण अभियान और विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं द्वारा नैतिक शिक्षा का प्रसार अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज मिलावट को केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक बहिष्कार योग्य कृत्य मानने लगे, तो इस बुराई पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।
विकसित भारत का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि नहीं होता। विकसित राष्ट्र वह है जहां नागरिक बिना भय के भोजन कर सकें, जहां दवा जीवन बचाए, जहां व्यापार विश्वास पर आधारित हो और जहां ईमानदारी आर्थिक सफलता का आधार बने। जापान, जर्मनी और अनेक विकसित देशों की सफलता का रहस्य केवल तकनीक नहीं, बल्कि गुणवत्ता और नैतिक अनुशासन भी है। भारत यदि विश्वगुरु बनने का स्वप्न देखता है, तो उसे सबसे पहले अपने बाजार को विश्वास का बाजार बनाना होगा। आज आवश्यकता एक नए राष्ट्रीय अभियान की है-‘मिलावट-मुक्त भारत अभियान’। जिस प्रकार स्वच्छ भारत अभियान ने जनभागीदारी से व्यापक परिवर्तन की शुरुआत की, उसी प्रकार मिलावट के विरुद्ध भी राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा किया जाना चाहिए। यह केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनचेतना का अभियान बने। प्रत्येक नागरिक यह संकल्प ले कि वह न मिलावट करेगा, न मिलावट को बढ़ावा देगा और न ही मिलावट करने वालों को सामाजिक सम्मान देगा।


हमें यह भी समझना होगा कि मिलावट केवल किसी दूसरे के परिवार को नहीं, अंततः पूरे समाज को नुकसान पहुंचाती है। जो व्यापारी आज मिलावट कर रहा है, उसका अपना परिवार भी इसी समाज में रहता है। उसके बच्चे भी इसी हवा में सांस लेते हैं, इसी बाजार से वस्तुएं खरीदते हैं। इसलिए मिलावट वास्तव में दूसरों के लिए नहीं, अपने ही भविष्य के लिए जहर तैयार करना है। स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर वर्ष 2047 का भारत तभी वास्तव में विकसित कहलाएगा, जब उसकी पहचान केवल आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि शुद्धता, विश्वसनीयता और नैतिकता से होगी। हमें ऐसा भारत बनाना है जहां दूध में दूध हो, दवा में दवा हो, भोजन में जीवन हो और व्यापार में विश्वास हो। यही सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर, समृद्ध और विकसित भारत की पहचान होगी।
भारत की पहचान योग, आयुर्वेद, शुद्ध आहार, नैतिक जीवन-मूल्यों और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की संस्कृति से रही है। यह पहचान तभी सार्थक होगी जब हमारे भोजन, दवाइयों और उपभोग की वस्तुओं में शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित हो। एक ऐसा भारत, जहां भोजन विश्वास का प्रतीक हो, जहां दवा जीवन का संरक्षण करे, जहां व्यापार नैतिकता पर आधारित हो और जहां उपभोक्ता निश्चिंत होकर बाजार से वस्तुएं खरीद सके-वही विकसित भारत का वास्तविक स्वरूप होगा। आज समय हमें पुकार रहा है कि हम विकास की ऊंची इमारतों के साथ चरित्र की मजबूत नींव भी रखें। यदि मिलावट समाप्त नहीं हुई, तो हमारी सारी प्रगति खोखली सिद्ध होगी। इसलिए सरकार कठोर कानून बनाए, प्रशासन निर्भीक कार्रवाई करे, न्यायपालिका त्वरित दंड सुनिश्चित करे और समाज नैतिक जागरण का बिगुल फूंके। आइए, आज ही संकल्प लें-‘शुद्ध आहार, स्वस्थ परिवार। मिलावट-मुक्त भारत, विकसित भारत का आधार।’ यही संकल्प 2047 के भारत को केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि नैतिक, स्वस्थ और विश्वसनीय राष्ट्र भी बनाएगा।

 

बाबा विश्वनाथ की आध्यात्मिक राजधानी “काशी से निकला, दुनिया को कहानी सुनाने: काशी दुबे

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हिंद-प्रशांत में भारत का बढ़ता सामर्थ्य एवं साझेदारियां https://www.rashtratak.com/indias-the-indo-pacific/ Wed, 08 Jul 2026 10:01:40 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2468 भारत आज केवल विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति ही नहीं, बल्कि एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति के

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भारत आज केवल विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति ही नहीं, बल्कि एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति के रूप में अपनी नई पहचान स्थापित कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति ने जिस आत्मविश्वास, स्पष्टता और दूरदृष्टि का परिचय दिया है, उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल दी है। कभी जो भारत अपनी रक्षा आवश्यकताओं के लिए विदेशी हथियारों पर निर्भर था, वही भारत आज आधुनिक मिसाइलों, रक्षा प्रणालियों और सैन्य उपकरणों का निर्यात करने वाला विश्वसनीय राष्ट्र बन चुका है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक, वैज्ञानिक, सैन्य और कूटनीतिक शक्ति का भी प्रमाण है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया सहित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ हुई उच्चस्तरीय वार्ताएं इस नई विदेश नीति की सफलता का सशक्त उदाहरण हैं। रक्षा, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, तकनीक और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्रों में हुए समझौते यह स्पष्ट करते हैं कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता और सुरक्षा का महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है।


भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता है। वर्षों तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक माना जाता था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल रही है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान ने रक्षा उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, पिनाका रॉकेट सिस्टम, तेजस लड़ाकू विमान और अत्याधुनिक रक्षा उपकरण आज विश्व के अनेक देशों का विश्वास जीत रहे हैं। भारत की स्वदेशी अस्त्र मिसाइल और ब्रह्मोस मिसाइल आज केवल भारतीय सेना की शक्ति का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि विश्व के अनेक देशों की सुरक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति का माध्यम भी बन रही हैं। पाकिस्तान के विरुद्ध आतंकवाद विरोधी अभियानों में इन हथियारों की प्रभावशीलता ने विश्व का ध्यान आकर्षित किया है। यही कारण है कि इंडोनेशिया जैसे महत्वपूर्ण देश अपने सुखोई लड़ाकू विमानों के लिए अस्त्र मिसाइल प्राप्त करना चाहते हैं तथा ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीदने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह भारत के रक्षा उद्योग के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास का प्रमाण है।
इंडोनेशिया हिंद-प्रशांत क्षेत्र का अत्यंत महत्वपूर्ण देश है। मलक्का जलडमरूमध्य जैसे विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग पर उसकी रणनीतिक स्थिति वैश्विक व्यापार के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। भारत और इंडोनेशिया के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग केवल दो देशों के संबंधों को मजबूत नहीं करता, बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को भी नया आयाम देता है। समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद विरोध, रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा और संयुक्त सैन्य अभ्यासों के माध्यम से दोनों देशों का सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करेगा। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भारत अब किसी पर निर्भर होकर नहीं, बल्कि समान साझेदारी और परस्पर सम्मान के आधार पर संबंध स्थापित कर रहा है। भारत किसी देश पर अपनी शक्ति थोपने में विश्वास नहीं रखता। उसकी विदेश नीति का मूल मंत्र है-‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ और ‘विश्व बंधुत्व’। यही कारण है कि भारत जहां अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भी विश्वासपूर्ण साझेदारी विकसित कर रहा है।
आज हिंद-प्रशांत क्षेत्र विश्व राजनीति का केंद्र बन चुका है। चीन का विस्तारवादी रवैया, दक्षिण चीन सागर में उसका सैन्यीकरण, छोटे देशों पर दबाव बनाने की नीति तथा आर्थिक प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास विश्व समुदाय के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। भारत ने इन परिस्थितियों में संतुलित, शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ रणनीति अपनाई है। भारत किसी के विरुद्ध युद्ध नहीं चाहता, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से कोई समझौता भी नहीं करता। यही संतुलित दृष्टिकोण भारत को विश्व का विश्वसनीय साझेदार बनाता है। भारत की बढ़ती रक्षा क्षमता चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के लिए स्पष्ट संदेश है कि नया भारत अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। भारत अब केवल सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्री सुरक्षा, अंतरिक्ष सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आधुनिक तकनीकी युद्ध की तैयारियों में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। स्वदेशी रक्षा उत्पादन इस दिशा में भारत की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है।

बाबा विश्वनाथ की आध्यात्मिक राजधानी “काशी से निकला, दुनिया को कहानी सुनाने: काशी दुबे

प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं की सबसे बड़ी सफलता यह रही है कि उन्होंने भारत की वैश्विक छवि को अभूतपूर्व ऊंचाई प्रदान की है। आज विश्व के बड़े राष्ट्र भारत को केवल विशाल बाजार के रूप में नहीं, बल्कि विश्वसनीय मित्र, तकनीकी साझेदार, निवेश गंतव्य और सुरक्षा सहयोगी के रूप में देख रहे हैं। जी-20 की सफल अध्यक्षता, क्वाड की सक्रिय भूमिका, इंडो-पैसिफिक सहयोग, वैश्विक दक्षिण की आवाज तथा जलवायु परिवर्तन, डिजिटल अर्थव्यवस्था और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भारत का नेतृत्व इसकी पुष्टि करता है। भारत की विदेश नीति अब केवल कूटनीतिक दस्तावेज नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय विकास का सशक्त माध्यम बन चुकी है। रक्षा निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा अर्जित हो रही है, लाखों युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सृजित हो रहे हैं, अनुसंधान एवं नवाचार को नई गति मिल रही है और भारतीय उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत हो रहे हैं। यह विकसित भारत के निर्माण की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।
भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र सदैव शांति, सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान रहा है। आदर्श स्थिति में किसी भी दो देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी की नींव किसी तीसरे देश के प्रति वैमनस्य या शत्रुता पर नहीं, बल्कि साझा विकास, सुरक्षा और स्थिरता पर आधारित होनी चाहिए। किंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति आदर्शों से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और शक्ति-संतुलन से संचालित होती है। आज चीन और पाकिस्तान अपने सैन्य एवं आर्थिक गठजोड़ को सऊदी अरब तक विस्तार देने के प्रयासों में जुटे हैं। हाल के सप्ताहों में सऊदी नेतृत्व और बीजिंग के बीच बढ़ती सक्रियता इस बदलते भू-राजनीतिक समीकरण का संकेत है। यद्यपि सऊदी अरब की प्राथमिक सुरक्षा चिंताएं पाकिस्तान और चीन से अलग हैं तथा उसका प्रमुख ध्यान खाड़ी क्षेत्र में ईरान के बढ़ते प्रभाव पर केंद्रित है, फिर भी बदलते वैश्विक समीकरण भारत के लिए सतर्क रहने का संदेश देते हैं। पाकिस्तान हर परिस्थिति में भारत के विरुद्ध रणनीतिक लाभ उठाने का अवसर तलाशता है, जबकि चीन अपने विस्तारवादी दृष्टिकोण के माध्यम से क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करने का प्रयास करता है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी, संतुलित और सक्रिय विदेश नीति भारत के हितों की प्रभावी सुरक्षा करती दिखाई देती है। उनकी कूटनीति केवल मित्र देशों के साथ विश्वास बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि चीन और पाकिस्तान की शरारतों, षड्यंत्रों तथा सामरिक चुनौतियों का संयमित और दृढ़ता से सामना करने की क्षमता भी प्रदर्शित करती है। यही दूरगामी सोच भारत को एक विश्वसनीय, जिम्मेदार और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है।
आज विश्व एक ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो शक्ति और शांति, विकास और सुरक्षा, तकनीक और मानवता के बीच संतुलन स्थापित कर सके। भारत इस भूमिका को सफलतापूर्वक निभाने की क्षमता रखता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह सिद्ध किया है कि सशक्त राष्ट्र वही होता है जो अपनी रक्षा करने में सक्षम होने के साथ-साथ विश्व शांति और मानव कल्याण का भी वाहक बने। निस्संदेह भारत अब विस्तारवाद का नहीं, विकासवाद का प्रतीक है। वह हथियारों का निर्माण युद्ध भड़काने के लिए नहीं, बल्कि शांति की रक्षा और संतुलन स्थापित करने के लिए कर रहा है। यही भारत की सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और जिम्मेदार वैश्विक नेतृत्व की पहचान है। आने वाले वर्षों में भारत की यही संतुलित विदेश नीति, आत्मनिर्भर रक्षा शक्ति और विश्वसनीय कूटनीतिक नेतृत्व न केवल विकसित भारत के स्वप्न को साकार करेगा, बल्कि विश्व व्यवस्था को भी अधिक सुरक्षित, संतुलित और न्यायपूर्ण दिशा प्रदान करेगा।

 

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बाबा विश्वनाथ की आध्यात्मिक राजधानी “काशी से निकला, दुनिया को कहानी सुनाने: काशी दुबे https://www.rashtratak.com/kashi-to-tell-the-story-to-the-world/ Sun, 05 Jul 2026 08:58:07 +0000 https://www.rashtratak.com/?p=2445 जयकर मिश्र (फ़ौजी महाराज) राष्ट्र तक .नई दिल्ली । नाम में काशी, कर्म में कला ! बाबा विश्व

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जयकर मिश्र (फ़ौजी महाराज) राष्ट्र तक .नई दिल्ली ।

नाम में काशी, कर्म में कला ! बाबा विश्व नाथ की नगरी काशी में जन्मे और कर्म की नगरी दिल्ली में पले-बढ़े मंजू-ब्रजेश के राज कुमार काशी दुबे आज उन कलाकारों में से एक हैं जो भीड़ में अलग दिखते हैं – क्योंकि वो भीड़ का हिस्सा बनने की कोशिश ही नहीं करते।

‘उस्ताद बंटू’ के बंटू को जब आप पर्दे पर ट्रम्पेट बजाते देखते हैं, तो लगता है ये किरदार नहीं, एक ज़िंदगी है। शादी में बैंड बजाने वाले उस लड़के में काशी ने वाराणसी की जड़ों की ईमानदारी और दिल्ली की सड़कों की सच्चाई दोनों घोल दी है। इसी ऑथेंटिसिटी ने उन्हें ‘कार्बोरेटर’ जैसे इंडिपेंडेंट प्रोजेक्ट्स में लीड रोल दिलाए।

*24 दिसंबर 1999* को जन्मे काशी ने करियर की शुरुआत में एक बात ठान ली थी – “ब्रेक का इंतज़ार नहीं करना है, खुद ब्रेक बनना है।” वाराणसी की तंग गलियों में लोगों को सुनना, दिल्ली की भीड़ में चेहरे पढ़ना – यही उनकी एक्टिंग स्कूल रही। उन्होंने एक्टिंग, लेखन, थिएटर एजुकेशन और डिजिटल कंटेंट – हर माध्यम को कहानी कहने का औजार बना लिया।

 

2021 काशी के लिए टर्निंग पॉइंट था। उन्होंने ‘चर्चे, एन एम्प्टी स्पेस’ की नींव रखी। ये सिर्फ एक स्पेस नहीं था, ये उस सोच का नाम था जो मानती है कि कला और बातचीत से ही कम्युनिटी बनती है। आज वो स्टेज पर नए कलाकारों को गढ़ते थिएटर ट्रेनर हैं, और स्क्रीन के पीछे कॉर्पोरेट ब्रांड्स के लिए क्रिएटिव स्ट्रैटेजी भी बनाते हैं।

काशी सोशल मीडिया पर भी वही करते हैं जो वो असल जिंदगी में मानते हैं – रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में बड़ी कहानी ढूंढना। ट्रेंड फॉलो करने के बजाय वो जिंदगी को ऑब्ज़र्व करते हैं, और फिर उसे ऐसे पेश करते हैं कि आप खुद को उसमें देख लें।

26 साल की उम्र में काशी ने ये साबित कर दिया कि सफलता शोर नहीं मांगती, निरंतरता मांगती है। खुद पर शक, “सिस्टम में फिट होने” का दबाव और इंडस्ट्री की बंदिशें – सबको पीछे छोड़कर उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया।

निर्देशक अर्श जैन द्वारा निर्देशित फ़िल्म उस्ताद बंटू को गोवा में 2500 डॉलर का प्रथम फ़िल्म फ़ेस्टिवल अवार्ड मिला। यह फ़िल्म भारतीय सिनेमा के द्वारा नीदरलैंड रोडर डैम्प इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में “उस्ताद बंटू “शामिल हुई जो जल्द ही भारतीय सिनेमा के पर्दे पर दिखेगी। इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल मैगज़ीन के पोस्टर व्याय काशी कुमार दुबे बने ,जिसके लिए अर्श जैन एवं उस्ताद बंटू के सभी कलाकार साथियों को “राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका राष्ट्र समाज “एवं “राष्ट्र तक “पोर्टल की ओर से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ

काशी कुमार दुबे आज के दौर के वो कहानीकार हैं जिनका मंत्र एक लाइन का है: “जो है उसी से शुरू करो। कहानी अपने आप बन जाएगी।”

* काशी कुमार दुबे
काशी में जन्मे, दिल्ली में पले-बढ़े। ‘उस्ताद बंटू’ और ‘कार्बोरेटर’ में लीड। संस्थापक: ‘चर्चे, एन एम्प्टी स्पेस’

* “ थिएटर ट्रेनर और क्रिएटिव स्ट्रैटेजिस्ट के तौर पर भी सक्रिय काशी के लिए सफलता का मतलब है – परफेक्शन नहीं, ऑथेंटिसिटी।”

उल्लेखनीय हैं निर्देशक अर्श जैन द्वारा निर्देशित फ़िल्म “उस्ताद बंटू “ को गोवा में 2500 डॉलर का प्रथम फ़िल्म फ़ेस्टिवल अवार्ड मिला। यह फ़िल्म भारतीय सिनेमा के द्वारा नीदरलैंड रोडर डैम्प इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में “उस्ताद बंटू “शामिल हुई जो जल्द ही आप सभी को भारतीय सिनेमा के पर्दे पर दिखेगी। इस फ़िल्म को इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल मैगज़ीन के पोस्टर व्याय के रूप में काशी दुबे को सौभाग्य प्राप्त हुआ ,जिसके लिए अर्श जैन एवं  उस्ताद बंटू के सभी कलाकार साथियों को “राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका “राष्ट्र समाज “एवं “राष्ट्र तक “पोर्टल की ओर से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ

 

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