नई दिल्ली, भारतीय किशोरों में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति एवं क्रूर मानसिकता चिन्ताजनक है, नये भारत एवं विकसित भारत के भाल पर यह बदनुमा दाग है। पिछले कुछ समय से किशोरों में बढ़ती हिंसा की प्रवृत्ति निश्चित रूप से डरावनी, मर्मांतक एवं खौफनाक है।उल्लेखनीय बाते – हल्दीराम स्नैक्स फूड प्राइवेट लिमिटेड – HSFPL) के चेयरमैन/निर्देशक- मधुसूदन अग्रवाल ने “राष्ट्र समाज पत्रिका” को एक साक्षात्कार के दौरान बताया।
श्री अग्रवाल ने कहा कि आज देश में नैतिक शिक्षा, चरित्र निर्माण और जीवन मूल्यों पर आधारित शिक्षण लगभग समाप्त हो गया है, जो आज समाज के लिये एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी हैं । समाज की गिरती हुई नैतिक शिक्षा,चरित्र निर्माण चिंता का बड़ा कारण इसलिए भी है क्योंकि जिस उम्र में किशोरों के मानसिक और सामाजिक विकास की नींव रखी जाती है, उसी उम्र में कई बच्चों में आक्रामकता एवं क्रूर मानसिकता घर करने लगी है और उनका व्यवहार हिंसक होता जा रहा है। बदलते समय के साथ समाज के व्यवहार में आई यह हिंसक तीव्रता और आक्रामकता अब केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका सबसे चिंताजनक प्रभाव किशोर पीढ़ी पर स्पष्ट रूप से दिखाई देना ज्यादा परेशान करने वाला है। हाल के वर्षों में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों की संख्या और उनकी क्रूरता ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह गया, बल्कि यह सामाजिक संरचना, पारिवारिक मूल्यों, शिक्षा व्यवस्था और सांस्कृतिक प्रभावों के गहरे संकट का संकेतक बन चुका है।

दिल्ली के दयालपुर क्षेत्र में मात्र चार सौ रुपये के विवाद में एक युवक की नृशंस हत्या, जिसमें तीन किशोरों ने बेरहमी से चाकू घोंपे और चौथा उसका वीडियो बनाता रहा, इस विकृति का भयावह उदाहरण है। यह घटना केवल एक हत्या नहीं, बल्कि संवेदनाओं के क्षरण, नैतिकता के पतन और कानून के भय के समाप्त हो जाने का प्रतीक है। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर किशोरों में यह दुस्साहस और हिंसात्मक प्रवृत्ति कहां से जन्म ले रही है? वस्तुतः, किशोर अपराधों के बढ़ते ग्राफ के पीछे कई परस्पर जुड़े हुए कारण हैं, जिनका विश्लेषण आवश्यक है। सबसे पहला और प्रमुख कारण है पारिवारिक संरचना का विघटन। पहले संयुक्त परिवारों में बच्चों को दादा-दादी, चाचा-चाची और अन्य सदस्यों के सान्निध्य में नैतिकता, अनुशासन और सामाजिक मर्यादाओं का सहज प्रशिक्षण मिलता था। आज एकल परिवारों में माता-पिता की व्यस्तता और समयाभाव के कारण बच्चों के साथ संवाद का अभाव हो गया है। परिणामस्वरूप, किशोर अपनी समस्याओं और जिज्ञासाओं का समाधान बाहर ढूंढते हैं, जो कई बार उन्हें गलत दिशा में ले जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण है डिजिटल और सोशल मीडिया का अनियंत्रित प्रभाव। इंटरनेट ने जहां ज्ञान के द्वार खोले हैं, वहीं अपराध, हिंसा और अश्लीलता से भरी सामग्री भी किशोरों के लिए सहज उपलब्ध कर दी है।

फिल्मों, वेब सीरीज और टीवी धारावाहिकों में हिंसा को जिस प्रकार ग्लैमराइज किया जाता है, वह किशोर मन को प्रभावित करता है। वे अपराध को एक साहसिक कार्य या रोमांच के रूप में देखने लगते हैं। कई बार वे यह भूल जाते हैं कि वास्तविक जीवन में इसके गंभीर और जीवन विनाशक घातक परिणाम होते हैं। तीसरा पहलू शिक्षा व्यवस्था का है। आज शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा और रोजगार तक सीमित हो गया है। नैतिक शिक्षा, चरित्र निर्माण और जीवन मूल्यों पर आधारित शिक्षण लगभग समाप्त हो गया है। शिक्षकों की भूमिका भी अब मार्गदर्शक की बजाय केवल पाठ्यक्रम पूर्ण करने तक सीमित हो गई है। विद्यालयों में अनुशासन और संवाद का जो वातावरण होना चाहिए, वह धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है।
@rajivagrawal

