इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की 5 दिन में दो राय, दोनों एक-दूसरे से उलट है
Live-in Relationship: देश में लिव-इन रिलेशन को लेकर सामाजिक के साथ ही कानूनी तौर पर भी गंभीर मतभेद हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया ऑब्जर्वेशन भी इस भेद को बताते हैं. कोर्ट की एक बेंच ने कुछ और तो दूसरी पीठ ने कुछ और फैसला दिया है.
मनीष कुमार
इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के हालिया टिप्पणी ने शादीशुदा व्यक्ति के लिव-इन रिलेशंस को लेकर कानूनी बहस को फिर तेज कर दिया है. अदालत ने 25 मार्च को एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ आपसी सहमति से रिलेशनशिप में रह रहा है, तो इसे स्वतः अपराध नहीं माना जा सकता. यह टिप्पणी अदालत के पूर्व के रुख से अलग मानी जा रही है, जिससे इसे यू-टर्न के रूप में देखा जा रहा है.
क्या था पहले की टिप्पणी
स्पष्ट कानूनी दिशा-निर्देश की जरूरत
ताजा टिप्पणी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक या वैवाहिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाने के लिए स्पष्ट कानूनी दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग पीठों के विरोधाभासी रुख से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है और भविष्य में इस मुद्दे पर उच्चतर न्यायिक व्याख्या की जरूरत पड़ सकती है. फिलहाल, Allahabad High Court के इन विरोधाभासी अवलोकनों ने यह संकेत दिया है कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में लाइव-इन संबंधों, विवाह और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर बहस अभी जारी है.

- अपराध नहीं, लेकिन नैतिक बहस: इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया (मार्च 2026) फैसलों में कहा गया है कि यदि दो बालिग (adult) आपसी सहमति से साथ रहते हैं, तो यह सीधे तौर पर अपराध नहीं है।
- तलाक के बिना वर्जित: दूसरी ओर, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि शादीशुदा व्यक्ति, जिसके कानूनी पति/पत्नी जीवित हैं, वे बिना तलाक लिए किसी अन्य साथी के साथ लिव-इन में नहीं रह सकते। ऐसा करना कानूनन तलाक के आधार के रूप में देखा जाता है।
- सुरक्षा याचिकाओं पर रुख: अदालतें उन विवाहित जोड़ों की सुरक्षा याचिकाओं को खारिज कर देती हैं जो तलाक लिए बिना लिव-इन में रह रहे हैं।
- वयस्कता: लिव-इन में रहने के लिए दोनों भागीदारों का बालिग (18+) होना अनिवार्य है।
- बच्चे: लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को कानूनी मान्यता प्राप्त है और उन्हें माता-पिता की संपत्ति में हक मिलता है।
- महिला के अधिकार: यदि लिव-इन रिश्ता लंबे समय तक चलता है, तो महिलाओं को घरेलू हिंसा २००५ के तहत भरण-पोषण और संरक्षण का अधिकार मिल सकता है।
हालाँकि बालिगों के लिए लिव-इन में रहना अपराध नहीं है, लेकिन शादीशुदा होते हुए तलाक के बिना ऐसा करना कानूनी पेचीदगियों और पारिवारिक विवादों का कारण बन सकता है।
