डॉ प्रमोद तिवारी,
यूपी, काशी। कहा जाता है कि काशी में जो जन्म लेता है, वो केवल शरीर से नहीं, आत्मा से भी योद्धा होता है। 19 नवंबर 1828 को काशी के एक साधारण महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण परिवार में जन्मी एक बच्ची, जिसका नाम रखा गया मणिकर्णिका, उर्फ मनु। किसी ने सोचा भी नहीं था कि यही मनु एक दिन पूरे ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला देगी। आज हम उसे रानी लक्ष्मीबाई के नाम से जानते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि उसे सिर्फ झाँसी की रानी कहना उसके साथ अन्याय है। वो काशी की बेटी थी, है, और रहेगी। और यही काशी की बेटी का जज्बा था जिसने उसे रानी बनाया।
काशी में बचपन और अस्सी घाट की परवरिश
मणिकर्णिका के पिता मोरोपंत तांबे पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में एक साधारण कर्मचारी थे। माँ भागीरथी बाई का देहांत मनु के बहुत छोटी उम्र में ही हो गया था। इसलिए मनु का बचपन पिता की छत्रछाया में, लेकिन पेशवा के बच्चों के साथ बीता। काशी के घाट, अखाड़े, और काशी विश्वनाथ की गलियां उसकी पाठशाला थीं।
आप सोचिए, एक लड़की जो 5 साल की उम्र में घुड़सवारी सीख रही है, तलवारबाजी सीख रही है, मल्लयुद्ध देख रही है। पेशवा उसे प्यार से ‘छबीली’ कहते थे, क्योंकि वो लड़कों से भी ज्यादा शरारती और निडर थी। यहीं से उसके अंदर वो काशी वाला तेवर आया। काशी कभी किसी के आगे झुका नहीं, और न ही उसकी बेटी झुकी।
काशी ने उसे तीन चीजें दीं – शास्त्र, शस्त्र और स्वाभिमान। वो संस्कृत पढ़ती थी, वेद-पुराण सुनती थी, लेकिन साथ ही साथ घोड़े पर सवार होकर गंगा के किनारे दौड़ भी लगाती थी। यही संतुलन आगे चलकर उसकी सबसे बड़ी ताकत बना।
काशी से झाँसी तक – मनु से लक्ष्मीबाई बनने का सफर

1842 में 14 साल की उम्र में मनु का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से हुआ। विवाह के बाद उसका नाम रखा गया लक्ष्मीबाई। झाँसी एक छोटा सा राज्य था, लेकिन उसके लिए एक बड़ा मंच था।
1851 में उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ, दामोदर राव, लेकिन दुर्भाग्य से वो सिर्फ 4 महीने ही जीवित रहा। इस सदमे से राजा गंगाधर राव भी टूट गए और 21 नवंबर 1853 को उनका भी देहांत हो गया। अब कहानी में अंग्रेजों की एंट्री होती है।
उस समय गवर्नर जनरल था लॉर्ड डलहौजी, और उसकी सबसे घटिया नीति थी – Doctrine of Lapse, यानी हड़प नीति। अगर किसी राजा का अपना सगा बेटा नहीं है, तो उसका राज्य अंग्रेज कंपनी का हो जाएगा। दत्तक पुत्र को मान्यता नहीं।
डलहौजी ने झाँसी को भी हड़प लिया। रानी लक्ष्मीबाई को कहा गया कि महल खाली करो और 60 हजार रुपये सालाना पेंशन लो। यहाँ पर काशी की बेटी जागी।
रानी ने कहा – “मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी” – यह सिर्फ एक नारा नहीं था, यह काशी की मिट्टी की सौगंध थी।
1857 – जब काशी की बेटी ने तलवार उठाई
10 मई 1857 को मेरठ से क्रांति शुरू हुई। झाँसी में भी विद्रोह भड़का। रानी ने इस मौके को अपने राज्य को वापस लेने का अवसर माना। उन्होंने खुद सेना का नेतृत्व किया।
उनकी सेना में पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी थीं। उनकी महिला सेना की प्रमुख थी झलकारी बाई, जो देखने में बिल्कुल रानी जैसी लगती थी। यह रानी की चतुराई थी।
अंग्रेजों ने झाँसी को चारों तरफ से घेर लिया। जनरल ह्यूरोज के नेतृत्व में 20 हजार अंग्रेजी सेना और रानी के पास सिर्फ 1500 सैनिक। 23 मार्च 1858 से 4 अप्रैल 1858 तक 14 दिन तक युद्ध चला। रानी खुद किले की दीवार से तोपें चलाती थीं। किले की दो तोपें – कड़क बिजली और भवानी शंकर – आज भी इतिहास की गवाह हैं।
जब किला टूटने लगा, तो रानी ने अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधा और अपने प्रिय घोड़े बादल पर सवार होकर किले की 60 फीट ऊंची दीवार से छलांग लगा दी। यह छलांग इतिहास में अमर हो गई। अंग्रेज देखते रह गए।
कालपी से ग्वालियर – आखिरी युद्ध

झाँसी से निकलकर रानी कालपी गईं, वहाँ तात्या टोपे से मिलीं। दोनों ने मिलकर ग्वालियर पर कब्जा किया। ग्वालियर का किला अभेद्य माना जाता था, लेकिन रानी की रणनीति से एक दिन में ही किले पर भगवा लहरा दिया गया।
लेकिन अंग्रेजों ने फिर हमला किया। 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में आखिरी युद्ध हुआ। रानी अकेली 100 अंग्रेज सैनिकों से घिर गई थीं। उन्होंने वीरता से युद्ध किया, लेकिन एक गोली उन्हें लगी, तलवार का एक वार सिर पर लगा।
कहते हैं, मरते-मरते भी उन्होंने कहा कि मेरा शरीर अंग्रेजों के हाथ न लगे। उनके विश्वस्त सैनिकों ने वहीं उनका अंतिम संस्कार कर दिया। वो सिर्फ 29 साल और 7 महीने की थीं।
डॉ प्रमोद तिवारी की नजर में रानी लक्ष्मीबाई का महत्व
मैं पिछले 29 साल से पत्रकारिता कर रहा हूँ, और मैंने एक बात समझी है कि भारत को देवियों ने ही बचाया है। काशी की बेटी होना कोई मामूली बात नहीं। काशी मोक्ष की नगरी है, लेकिन वो शौर्य की भी नगरी है।
आज जब हम 19 नवंबर को UP गौरव दिवस मनाते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि रानी लक्ष्मीबाई UP की पहली ब्रांड एम्बेसडर थीं। उन्होंने दुनिया को बताया कि UP की बेटी क्या कर सकती है।
आज की बेटियों के लिए रानी सिर्फ इतिहास नहीं, एक रोल मॉडल हैं। जब कोई कहता है कि लड़की घुड़सवारी नहीं कर सकती, तलवार नहीं चला सकती, तो मैं कहता हूँ – काशी की बेटी का इतिहास पढ़ो।
मेरा मानना है कि केंद्र सरकार को रानी लक्ष्मीबाई के काशी वाले जन्मस्थान को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करना चाहिए। आज भी वाराणसी के भदैनी में उनका जन्मस्थान उपेक्षित है। हमें वहाँ एक भव्य स्मारक बनाना चाहिए, जहाँ हर बच्चा जाकर प्रेरणा ले सके।

- निष्कर्ष
रानी लक्ष्मीबाई मरी नहीं, अमर हुईं। उनकी कहानी 1858 में खत्म नहीं हुई, आज भी शुरू होती है – हर उस बेटी में जो अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती है।
मैं, डॉ प्रमोद तिवारी, काशी की इस बेटी को नमन करता हूँ और आप सभी से आग्रह करता हूँ कि 19 नवंबर 2026 को कॉन्स्टिट्यूशन क्लब, नई दिल्ली में हमारे सम्मान समारोह में आएं और इस वीरांगना को श्रद्धांजलि दें।
काशी की बेटी थी, झाँसी की रानी बनी,
अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली, वो मरदानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झाँसी वाली रानी थी…
जय हिंद, जय काशी, जय झाँसी।

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