जय सियाराम जी मार्कण्डेय मुनि जी ,
वन की हरियाली में आज भी एक कथा मौन होकर बहती है।जहाँ सरोवर की लहरें तप की गाथा गुनगुनाती हैं, जहाँ वृक्षों की छाया ऋषियों के ध्यान की साक्षी बनती है वहीं विराजमान हैं अमर तपस्वी मार्कण्डेय मुनि समाधि की गहन निस्तब्धता में लीन महर्षि के चरणों तक जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी पहुँचे, उनके साथ थीं त्याग, पतिव्रता और करुणा की प्रतिमूर्ति माता सीता, तथा सेवा, समर्पण और पराक्रम के प्रतीक लक्ष्मण सहित तीनों ने विनम्रता से मुनिवर को प्रणाम किया। ध्यान टूटा, नेत्र खुले और तप का प्रकाश मानो समस्त वन में फैल गया।
मुनि जी ने मुस्कराकर कहा—
“धर्म केवल युद्धभूमि में नहीं जीता जाता, वह मनुष्य के आचरण में खिलता है। सत्य उसकी वाणी है, करुणा उसका हृदय है, और त्याग उसका वास्तविक वैभव।” श्रीराम जी ने श्रद्धा से शीश झुकाया।
सीता ने लोकमंगल का आशीष माँगा लक्ष्मण ने सेवा को ही अपना धर्म माना। उस दिन वन ने केवल एक भेंट नहीं देखी, बल्कि तप और मर्यादा का दिव्य संगम देखा था। एक ओर तपस्या का अनंत तेज था, दूसरी ओर धर्म की मर्यादा का अनुपम स्वरूप। आज भी जब मनुष्य सत्य के पथ पर डगमगाता है, तब महर्षि मार्कण्डेय जी का तप और श्रीराम जी की विनम्रता उसे यही स्मरण कराती है कि—
“ज्ञान से विवेक जन्म लेता है,
तप से तेज प्रकट होता है,
विनम्रता से सम्मान मिलता है,
और धर्म से ही जीवन अमर बनता है।”

रचनाकार
डॉ अनीता मिश्रा
कवयित्री एवं लोकगायिका
लखनऊ, उत्तर प्रदेश – 226022
मो.: 7054452829

