“ बुरी हूं बुरी ही सही”
बुरी हूँ तो बुरी ही सही, कम से कम तुम्हारे तरहअंदर से ज़हर और बाहर से गुलाब तो नहीं हूँ।
मेरी खामियाँ मेरी हैं, मैं उन्हें छुपाती नहीं, दिल में जो बात हो, ज़ुबाँ पर लाने से घबराती नहीं।
कुछ लोग चेहरे बदल लेते हैं मौसम की तरह,मैं हर हाल में एक सी हूँ, रंग बदलना आता नहीं जो हूं खुली किताब हूं कोई नकाब तो नहीं,
पीठ पीछे वार करूं ऐसा मेरा हिसाब तो नहीं ।
सच कड़वा है तो क्या हुआ झूठ का ख़्वाब तो नहीं ,अपने वसूलों पर जीती हूं किसी की परछाई या जवाब तो नहीं ।मै जैसे हूं सामने हूं दो चेहरे रखती नहीं ,मतलब निकल जाए तो रिश्ते बदलती नहीं ।
औकात की बात वो करे जो किरदार में साफ हो मै झुक सकती हूं किसी के आगे बिकती नहीं ।मेरी खामियां मेरी है मै उन्हें छिपाती नहीं ,दिल में जो बात है कहने से घबराती नहीं ।
क़िरदार की खुशबू ही इंसान की पहचान होती हैं अनी “वरना चेहरे वक्त के साथ बदल ही जाते है ।।

- डॉ अनीता मिश्रा कवयित्री लोकगायिका
- लखनऊ उत्तर प्रदेश 226022

